तामसी आलस्यवश कोशिशे छोड़ सुस्त पड़ा
रहता है. राजसी का कर्तुत्वभाव उसे कोशिश करने के लिए आग्रह करता रहता है. सात्विक,
जब जैसा आन पड़े वही करता है, उसमें न पलायन वृति है और न ही सिद्धी की ललक.
प्रकाश’ का तात्पर्य **************** प्रकाश के प्रभाव को उजाला कहिए और प्रकाश के अभाव को अंधेरा अस्तित्व, जब समझ (प्रकाश) में आए, ज्ञान (उजाला) कहिए और जब वह समझ के दूर (अभाव) हो कहिए उसे अज्ञान (अंधेरा) -अरुण ‘अपना’ ही खो जाए तो ******************** अपना कुछ खो जाए तो दुख ही दुख यह ‘अपना’ ही खो जाए तो ख़ुशी ही ख़ुशी…टिकाऊ ख़ुशी -अरुण कैसे नादान हैं हम? ************* अजिंदे भूत ने क़ब्ज़ा कर रखा है इस जिंदगी पर और छोड रखा है दो साँसों और दिल की धड़कनों का सहारा जीने के लिए एक हम हैं ऐसे मूरख कि भूत में समायी हुई ग़ैरमौजूदगी से ही पूछ रहें हैं अपनी मौजूदगी के बारे में उठ्ठे सवाल -अरुण
इच्छा का संचार विचार की शक्ल लेता है और इच्छा आभासित होती है विचारक के रूप में.. मन है..इच्छा का संचार -अरुण लोग अच्छे हो न पाए पर दिख रहे अच्छे ‘अच्छाईयत’ का आजकल जो बाज़ार गरम है -अरुण जो हमने रची चीज़ें.. हमें ही ख़रीद लेती हैं और फिर, नया कुछ भी हमें रचने नही देती -अरुण दूसरों से पाए हुए चिराग़….अंधेरा हटाते नही, गहराते हैं -अरुण बदन-ओ-मन से उसे क्यों जुड़ाव हो हैं दोनों किराये पे मिले…… रहन वास्ते -अरुण
धीमी-धीमी मृदुल हवा से गतिमान समन्दर की लहरें हों या बवंडर से आघातित ऊँची ऊँची उछलती लहरें समन्दर की लहरों में हमेशा ही एक लय बद्धता है उनमें कोई आतंरिक संघर्ष नही सभी लहरें एक ही दिशा में एक ही ताल, रिदम में चलती, उछलती हुई परन्तु मन की लहरें आपस में ही भिड़ती, एक दूसरे से जुदा होते हुए अलग अलग दिशा में भागती तनाव रचती, संघर्ष उभारती मन की लहरें समन्दर की लहरों के पीछे एक ही निष्काम-शक्ति है मन की लहरों के पीछे परस्पर विरोधी इच्छा-प्रेरणाएँ ............................................................. अरुण
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