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आज के रूहानी शेर

जुबां से बयाने सच, मुमकिन मगर सच पकड़ना, जुबां के बस में नही ......................... शक उठाने औ उसे दूर किये जाने पर बात तह तक समझ में आती है ........................ पल पल जिए, सच्चाई अपनी नजारा- ए- वक्त, बदलता रहता है ....................... जमीं से उठ्ठी भाप के दरिया सी शख्सियत कैसे जमीं को थामे जो गहरी हकीकत ................................................ अरुण

जीवनगत एक गज़ल

सभी कामनाएँ सफल हो गयीं पर नही तृप्त होती मनस प्यास पूरी सारे सवालात जीवंत मन के जबाबों से उनकी नही कोई दूरी किसी भी शिला से निकालो निरर्थक बचे शिल्पसा एक सार्थक जरूरी व्यक्तित्व की तब निद्रा विखंडित अचानक सजगता, करे वार भारी कभी शेर में ढल , कभी मुक्त कविता मनन चिन्तना की, बहे धार सारी ................................................ अरुण

आज के ताजे शेर

जो भी होता ठीक ही है इस जहाँ में अच्छा बुरा तो आदमी का इक हिसाब ................................. जेहनी कोशिशें जेहन से पार जाने की साहिल पे खड़े दरिया में तैरने जैसा ...................... अँधेरा देख लेना, मुकम्मल देख लेना एक ही पल में इसी को जागने की इंतिहा कहते है ............................................................. अरुण

आज के शेर

सीखकर जिंदगी की राह पे बढ़नेवाले हर कदम राह छोड़ नक्शों पे चलतें है .................................... बहती धारा है धरम कुदरते जीवन का बहाव पूजे जाते जो धरम, ठहरे हुए पानी हैं .................................................. अरुण

आज के नये शेर

दिमागी खेल हुआ करती दुनियादारी कुदरती जिंदगी तो दिल को समझ आती है ................ दौड़ते जिस्म ने जानी जो लहू की गर्मी किसी पोथी में समझाई नही जा सकती ................. हिन्दू हो या मुसल्मा या कोई धरम ये तो चोलें हैं, इनके परे है सच्चाई .............................. न चलना है न जाना है न पहुँचना है कहीं जहाँ पे खड़े हैं, वहीँ पे लौट आना है .................................................... अरुण इस ब्लॉग पर ठीक एक साल पहले लिखना शुरू किया. लगातार लिख रहा हूँ. पाठकों का आभारी हूँ ----- अरुण खाडिलकर

मिले वैसी ही जिंदगी तो .......

जिसने कोई न सुनी और पढ़ी ज्ञान की बात क्या कभी ज्ञान को उपलब्ध नही हो सकता ? .................... पूरी कुदरत की रूह जिस तरह से जिन्दा है मिले वैसी ही जिंदगी तो कितना अच्छा हो ........................... चेहरे सत्पुरुषों के आइनों से कम नहीं उनमें दिखती है असल जो भी है सूरत अपनी ....................... तोड़कर फूल पिरोकर जो बनाते माला फूल से बच्चे, मरे जाते अदब के खातिर ....................... जिसने दिन ढलते ही आँखों को मूँद रखा हो सुबह हो गई हो उसको पता कैसे हो ................................................ अरुण

कुछ शेर

जिसने कोई न सुनी और पढ़ी ज्ञान की बात क्या कभी ज्ञान को उपलब्ध नही हो सकता ? .................... पूरी कुदरत की रूह जिस तरह से जिन्दा है मिले वैसी ही जिंदगी तो कितना अच्छा हो ........................... चेहरे सत्पुरुषों के आइनों से कम नहीं उनमें दिखती है असल जो भी है सूरत अपनी ....................... तोड़कर फूल पिरोकर जो बनाते माला फूल से बच्चे, मरे जाते अदब के खातिर ....................... जिसने दिन ढलते ही आँखों को मूँद रखा हो सुबह हो गई हो उसको पता कैसे हो ................................................ अरुण