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द्वार ढूँढती रहती है .....

सत्य की खोज निराली है यह सदा जारी है, बस जारी ही है किसी दिवार से टकरा भी जाए तो भी थमती नही द्वार ढूँढती रहती है , रास्ते ढूँढती रहती है , दिवार पर लिखे निष्कर्षों को पढ़कर लौटती नही न ही दिवार पर नये निष्कर्ष लिखते बैठती है जिन्हें निष्कर्षों की जल्दी है वे पंडित बन कर रह जातें है रास्ते ढूँढना छोड़कर रास्ते बतलाना शुरू कर देते हैं ..................................... अरुण

अहंकार का तमस

जलती मोमबत्ती पकड़कर चलो चारो ओर होगा प्रकाश और ठीक हाँथ के नीचें होगा अंधकार ठीक इसीतरह अहंकार कितना ही सजग क्यों न हो कितना ही ध्यान क्यों न फैलाये उसके केंद्र में होगा उसका अपना तमस अहंकार का एक भी तमस बिंदु जबतक बाकी हो सारा प्रकाश अज्ञानमय ही है भले ही उसे प्रतिष्ठा क्यों न प्राप्त हो ........................................... अरुण

दो मुक्तक

याद याद बीते की याद आते की जिंदगी कैसे कटी ये तो मुझे याद नही ......... अँधेरा खुद जला ...... दिये की रोशनी से सब अँधेरे को भगाते हैं अँधेरा खुद जला और मिट गया देखा किसी ने ? ...................... अरुण

घड़े का खालीपन

'मै' पन पानी बनकर घड़े में भरा हुआ है पूरा का पूरा और अब वह जानना चाहता है कैसा होता है घड़े का ख़ालीपन घड़े का ख़ालीपन तो जीवित ही है केवल 'मै' पन को रिक्त होना होगा ........................ अरुण

स्मृति की आँखे अंधी

रास्तों को ढूँढने में स्मृति काम आती है पर कदमों तले उभरनेवाली पगडंडियों को वह देख नही पाती उसपर से गुजर तो जाती है पर उसे बिना देखे, उसके प्रति सोये हुए ................................ अरुण

परमात्मा ही परमात्मा को जाने

परमात्मा स्वयं को अनुभूत कर रहा है प्रति पल प्रति स्थल इस सत्य को जानने के लिये परमात्मा ही बन जाना होगा इसका मतलब की अपनी व्यक्तिगत पहचान को भुलाना होगा इस ऐसी पहचान की निरर्थकता को पहचानना होगा ................................ अरुण

क्षण ही जीवन

मनुष्य 'समय' पर यात्रा करता है जब की परमात्मा का 'समय' पर है निवास मनुष्य का जीवन क्षण क्षण की कड़ी को जोड़कर बनता है परमात्मा हर उस कड़ी को एक सम्पूर्ण जीवन के तौर पर जी रहा है मनुष्य का जीवन 'समय' का जुडाव है और 'समय' है परमात्मा का पड़ाव ..................... अरुण