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शब्दों की राजनीति

दो भिन्न व्यक्ति ‘ राम ’ शब्द का उच्चार करतें है उच्चार समान होते हुए भी जरूरी नही कि उसका आशय एक ही हो एक के राम में पूरा अखंड, असीम विश्वरूप है तो दूसरे का ‘ राम ’ दशरथ-पुत्र राम की बात करता है शब्दों को लेकर बहस छेड़ना आसान है राजनीतिज्ञों को ऐसी बहसें अच्छी लगती हैं ........................................................... अरुण

ध्यान वैज्ञानिक है फिर भी विज्ञान-स्वीकृत नही

मन को मन से समझने का काम मनोवैज्ञानिक ढंग से हो जाता है इसमें वैज्ञानिक पद्धति का ही उपयोग है परन्तु ‘ तन-मन-अस्तित्व ’ को सकल रूप में समझने के लिए ध्यान का उपयोग होता है जिसमें वस्तु-निष्ठता और व्यक्तिनिष्टता दोनों का ही समावेश होते हुए भी इसे अभीतक विज्ञान नही माना गया विज्ञान - सार्वजनिक वस्तुनिष्ठ निरिक्षण है और ध्यान - व्यक्तिगत वस्तुनिष्ठ-निरिक्षण चूँकि यह व्यक्तिगत है, विज्ञान इसे अपनी श्रेणी में रखने को तैयार नही ............................................. अरुण

मनोवैज्ञानिक गुलामी

अगर रेल के डिब्बे में सीट रिझर्व हो तो उस सीट पर दूसरे को बैठा देख अचानक गुस्सा आ जाता है कारण क्या है? विश्लेषण दर्शाता है कि - ‘ यह चीज मेरी है ’ ऐसा आशय जब मन में उभरता है तब दो में से कोई एक भाव सक्रीय हो जाता है एक यह कि यह चीज मेरे उपयोग के लिए उपलब्ध हुई है या दूसरा यह कि इस चीज पर मेरी अपनी मालकी है पहला भाव तथ्य का परिचायक है तो दूसरा भाव हमारी मनोवैज्ञानिक गुलामी का .......................................................... अरुण

अनेकता में एकता

अनेकता में एकता इस नारे को भारत में बड़ा सन्मान है परन्तु ऐसी एकता तभी संभव है जब सभी एक दूसरे को समझते हुए एक साथ रहते हों एक दूसरे को अड़चन समझकर एक साथ रहना एकता नही ला पाता ............................... अरुण

चुनौती से भिडना-भागना या गुजर जाना

जीवन में हर पल की चुनौती सामने आते ही मन या तो उससे भिड़ता है या उससे भागने का रास्ता खोज लेता है दोनों ही स्थितियों में मन चुनौती से मुक्त नही है प्रायः हम सभी जीवन चुनौतियों से लढकर या भागकर बीतातें हैं जो तन-मन-दृदय से जागा हो चुनौती उससे या वह चुनौती से होकर गुजर जाता है चित्त पर चुनौती की कोई छाप नही छूटती ...................................... अरुण

इच्छा यानी मानसिक उपभोग

किसी भी वस्तु या अनुभव का मानसिक उपभोग शुरू होते ही हम कहते है हमें वस्तु की इच्छा हो रही है उदाहरण के लिए जलेबी खाने की इच्छा होने का अर्थ है हमने मन से जलेबी खाना शुरू कर दिया है मानसिक उपभोग को ही इच्छा कहा जाता है .................................. अरुण

शब्दों की गाड़ी हमेशा ही खाली

शब्दों की गाड़ी हमेशा ही खाली न इसपर कोई अर्थ लदता है और न ही उतरता है फिर भी इसपर लादने-उतारने का काम जारी है इसपर अर्थ लादने वाले ने क्या अर्थ लादा यह लादनेवाला ही जाने अर्थ उतारने वाले ने क्या उतारा यह उतारने वाला ही जाने फिर भी व्यावहारिक जगत में यह खाली गाड़ी अर्थ-वहन का काम करती रहती है शब्दों से संवाद तो हो जाते हैं पर संमिलन नही .................................. अरुण