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प्रकाश के रास्ते में ......

प्रकाश के रास्ते में प्रकाश को रोके खड़ा हो गया सामने खड़ी हो गई एक परछाई जिंदगी कट गई पर लाख कोशिश के बावजूद भी परछाई को हटा न पाया रास्ते से हट जाना भी मेरे बस में कहाँ बस बचा एक ही उपाय मै स्वयं ही प्रज्वलित हो जाऊं फिर कभी भी, कहीं भी कोई परछाई न होगी प्रकाश अपने रास्ते से गुजर जाएगा सीधे सीधे .................................. अरुण

शब्द और आशय एक दूजे से मुक्त ..

जब विचार ‘ कर्ता ’ की भूमिका निभाते हैं सांसारिकता में घुले रहतें हैं जब वे ‘ कर्म ’ के रूप में विचरते हैं सांसारिकता से मुक्त रहते हैं सांसारिकता से मुक्त मन ही समाधी अवस्था का परिचायक है सांसारिकता क्या है? अस्तित्व को दिए गये अर्थ या आशाय्ररूपी संकेत आपस में संवाद करते हुए हमारी सांसारिकता को (हमारी consciousness को) सजीव बनाते हैं शब्द या आशय का एक दूसरे से मुक्त होना ही समाधी है ................................................................ अरुण

कौन सी मिटटी मेरी ?

योग करूँ ? ध्यान करूँ? व्यायाम या प्राणायाम करूँ? क्या करूँ? ज्ञान से जाऊं कि ध्यान से कि भक्ति से ? व्यर्थ हैं ऐसे प्रश्न इसका जबाब न स्वयं के पास होगा और न दूसरा दे सकता है अगर कोई बीज पूछे कौन सी मिटटी, किस रंग सुगंध की मिटटी, मेरे लिए सही होगी? हमारे पास बस यही जबाब होगा- जहाँ गिरकर तुम फूटो, फलो, ऊगो, पौधा बन जाओ, वही मिटटी तुम्हारी है बाकि सब बेमेल, थोता या झूठा है ................................. अरुण

रेखा होती ही नही ......

सच्चाई यह है कि समय होता ही नही परन्तु काल (त्रिकाल) का सदैव अनुभव हो रहा है ऐसा इसलिए कि ध्यान बंट गया है टुकड़ों में और इसीलिए ध्यान और अध्यान का एक क्रम बन जाने से यानी ध्यान-अध्यान .. ध्यान-अध्यान .... ध्यान-अध्यान के अनुभूत होने से निरंतरता की कल्पना जाग उठी है दूसरे शब्दों में ऐसा भी कह सकतें हैं कि रेखा होती ही नही केवल बिंदु ही बिंदु हैं परन्तु बिंदुओं के प्रति अध्यानावस्था होने से रेखा की कल्पना सजीव हो गई है .................................................. अरुण

संगठन – स्वार्थ का गठजोड़

संगठित होना जरूरी है किसी के विरोध में या पक्ष में कुछ हासिल करने को या किसी से आजाद होने के लिए परन्तु ऊपरी तौर पे आदमी को आदमी से जोडते दिखते ये बहाने गहराई में, स्वार्थ के गठजोड़ है अलगाव के बहाने हैं क्योंकि ये पक्ष-विपक्ष के रोगसे मुक्त नही हैं ............................................. अरुण

समय मन की उपज

सूर्य, चंद्र, पृथ्वि, तारे ये सब चलते हैं किसी समय के आधीन होकर नहीं बल्कि मानव-मन ही इनकी गति के आधार पर अपनी घडी की रचना करता है ............................................................. अरुण

प्रेम यानी अनन्यभाव

जिनमें अनन्यभाव जागा प्रेम और करुणा फल उठी साधारणतया हम जिसे प्रेम कहते हैं वह अपनत्व, लगाव, आत्म- तादात्म , सहानुभूति समानुभूति, समवेदना से अधिक कुछ भी नही इन सारे भावों में 'मै' का अस्तित्व बना रहता है आत्मसत्ता काम करती रहती है अनन्य भाव का अभाव रहता है ...................................................... अरुण