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जिंदगी की लम्बाई......

जिंदगी की लम्बाई चौड़ाई, ऊंचाई और गहराई क्षण या साँस की लम्बाई चौड़ाई, ऊंचाई और गहराई से अधिक नही यह तो आदमी की याददास्त का आंगन है जिसमें जिंदगी दिन, सप्ताह, वर्ष, दशक, शतक और युगों के पैमाने में फैलती दिखती है ................................................, अरुण

मन एक भूमिका अनेक

रंगमंच पर एक ही पात्र एक साथ अनेक भूमिकाएं इस सटीक ढंग से निभाता है कि लगता है - कई पात्र मिलकर विभिन्न भूमिकाएं कर रहें है दर्शक भी इतने रम जातें हैं कि उन्हें प्रतीत होता है कि मानो रंगमंच पर कई पात्र साकार हो चुके है मन भी इसीतरह का ‘ एक पात्र और बहुभूमिका ’ वाला नाटक है मन के इस नाटक में अभिनेता-दर्शक (दोनों एक ही यानी मन ) इस सच्चाई से बेखबर हैं कि वही एक (स्वयं) अनेक भूमिकाएं निभा रहा है ....................................... अरुण अब कुछ दिन विराम

नैतिक मूल्यों में गिरावट

ऐसी गिरावट के एक नमुने के रूप में, किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा किए गये कुछ ऐसे बयान आजकल भारत में पढने-सुनने को मिलते हैं -- “ हमारी पार्टी आपके पार्टी जैसी भ्रष्ट नही है. यह ईमानदार लोगों की पार्टी है हमारे यहाँ अगर कोई मिनिस्टर अपने रिश्तेदारों में सार्वजनिक जमीन गलती से बाँट भी देता है तो यह बात सार्वजिक तौर पर उजागर होने पर, उनसे वापस लेकर जनता को लौटा भी देता है. आपके पार्टी के मिनिस्टर जैसा नही कि खाए और डकार जाए ” ........................................... अरुण

दृष्टिमय बोध

संसार की हर वस्तु, तथ्य, दृश्य, या प्रक्रिया का वर्णन किया जा सकता है परन्तु हर वर्णन के बाद भी कुछ अवर्णित ( unexplained) शेष बचता ही है और इसीलिए कहते हैं कि वर्णन हमेशा अधूरा है अतः जरूरत है इस अधूरेपन को भी देख सके उस दृष्टि की, केवल वर्णन की नही ........ वर्णन करना काम है विज्ञान का अधूरे के साथ साथ पूरे को देख सकना काम है दृष्टिमय बोध का इस दृष्टिमय बोध के अभाव के कारण ही सदियों से सच समझाना जारी है और कभी भी पूरा नही हो पा रहा ......................................... अरुण

दुहराता वही शेर

अपनी ही हर खुशी से परेशां हैं सारे लोग किसको खुशी कहें , हर दिल में हो तलाश अँधेरा काट लेगा, डर के न भागो यारों इसी जगह पे छुपा है, रौशनी का चिराग सवाल उठने से पहले जबाब हाजिर हो ऐसे माहोल में नयी सोच नही बन पाती जहाँ खिला है फूल खुश है जिंदगी पाकर पिरोके माला में मौत उसे मत देना महलों को गरीबी में सादगी दिखती गरीबी में ख्वाब उठते हैं महलों के अँधेरा–ओ-उजाला, बेखुदी-ओ-होशियारी दोनों ने नही देखा एक-दूजे को ................................................. अरुण

आज का तीसरा शेर

अँधेरा–ओ-उजाला, बेखुदी-ओ-होशियारी लफ्ज दोनों साथ, न ताल्लुक बीच में ................................................. अरुण

आज के दो शेर

जहाँ खिला है वहाँ खुश है जिंदगी पाकर पिरोके माला में फूल, उसे मौत न दे .............. अच्छा है, गर महलों को गरीबी में सादगी दिखती और दिखते गरीबों को महलों के ख्वाब ................................................. अरुण