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सार असार संसार

जो है अस्तित्व में और जिसके होनेपन में अस्तित्व है उसे काया कहें जो नही है अस्तित्व में फिरभी अस्तित्व जिसके होनेपन को ले आता है उसे माया कहें और काया माया के इस सार असार को ही संसार कहें .......................... अरुण

दुःख का जन्म ही थम जाए

दुःख दूर नही किया जा सकता है हाँ , उसे टाला जा सकता है दुःख का कारण दूर हो जाए – बस परन्तु यह कारण कहीं बाहर नही दुःख की अनुभूति में ही छुपा हुआ है जिसे त्रयस्थ भाव से देखना बन पड़े तो दुःख का जन्म ही थम जाए ................................ अरुण

नम्रता क्यों अच्छी लगती है?

नम्र व्यक्ति का व्यक्तित्व हमें अच्छा लगता है ऐसे में सवाल उठना चाहिए क्यों अच्छा लगता है ? क्या इसलिए कि नम्रता हमारे लिए सहज नही हो पाती या इसलिए कि उसकी नम्रता अप्रत्यक्ष रूप से हमारे अहंकार की तुष्टि है .......................................... अरुण

समझ और ज्ञान

सामने जो भी वस्तु खड़ी हो आईने में पूरी की पूरी उतर आती है टुकड़ों टुकड़ों में प्रतिबिंबित नही होती अंतर-दृष्टि भी ऐसी ही अखंडित हो तो समझ ( Wisdom) फलती है अन्यथा केवल ज्ञान (Knowledge) ही उत्पन्न होता है सत्य-बोध के लिए समझ की जरूरत है ज्ञान की नही ........................................ अरुण

योगाभ्यास प्रतिबन्ध है, इलाज नही

योगाभ्यास बीमारी होने से पहले ही आदमी को उससे बचाता है ऐसी योग-साधना जिन्हें सहज हो चुकी है उनका मार्गदर्शन उपयोगी है सिर्फ उनके लिए जो अभी बीमार नही है, उनके लिए नही जो किसी बीमारी से पीड़ित हैं ........................................ अरुण

वक्त

ख्याल चलते हैं समय चलता नही है आदमी का ये जगत थमता नही है आदमी ही गिन रहा है वक्त की परतें मगर वक्त इंसा को कहीं गिनता नही है .................................... अरुण

समझ संवाद-विवाद से परे

संवाद हो या विवाद दोनों के लिए दो या दो से अधिक टुकड़ों (पक्षों या व्यक्तियों) का होना जरूरी है समझ एक की एक है जिसमें अखंडत्व होता है परन्तु यदि मन के भीतर दो या दो से अधिक टुकड़े संवाद कर रहे हों तो वह समझ नही, वह तो मन के भीतर चलनेवाला संवाद या विवाद है विचार तो टुकड़ों के बीच के संवाद/विवाद से फलता है जब विचार निष्क्रीय हो जाता है तभी समझ की संभावन फलती है ............................................... अरुण