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सम्पूर्ण जागृति में घटा आचरण ही सही है

‘ क्या करें और क्या न करें ’ इस तरह की सीख जीवन बाबत का एक समाज द्वारा दिया प्रशिक्षण है, इस सीख का अनुपालन करनेवाले का जीवन समाज-प्रतिष्ठित या मान्य तो होगा पर ऐसे जीवन को अंतर-विरोध और अंतर-संघर्ष का भी सामना करना पडता है ...................... वैसे एक ही सूत्र सबसे सटीक है वह है- सम्पूर्ण जागृति में घटा आचरण ही सही है ................................. अरुण

समाधी यानि एकत्व की अनुभूति

अशरीर, शरीर और प्रतिशरीर (मन) ये तीनो हीं एक ही उर्जा की तीन भिन्न लयों पर ((Rhythm) होनेवाली अभिव्यक्तियाँ हैं Rhythm के भिन्नत्व के कारण से वे तीनों भिन्न हैं ऐसा लगने लगता है जब अवधान जागता है तो तीनों के एकत्व (Harmony) की अनुभूति होती है प्रायः एकत्व की इसी अनुभूति को समाधी कहा जाता होगा

सिर्फ पहुंचे को पहुँचने पर रास्ता दिखे

दृष्टि ( Vision) उस स्थिति का पूरा दृश्य स्पष्ट कर देती है जिसमे दृष्टिधारक पहुँच चुका है और इस पहुंचे हुए को वह कैसे पहुँचा इस बात का तर्क-पथ भी दिखला देती है परन्तु पहुँचने का प्रयास करने वाले को ऐसे किसीभी तर्क-पथ का ज्ञान नही हो सकता जो उसे सही दृष्टि दे दे ................... दृष्टि धारक ‘ गीता ’ की रचना कर देता है परन्तु गीता का अभ्यासक दृष्टि नही पा सकता .................................. अरुण

सिर्फ पहुंचे को पहुँचने पर रास्ता दिखे

दृष्टि ( Vision) उस स्थिति का पूरा दृश्य स्पष्ट कर देती है जिसमे दृष्टिधारक पहुँच चुका है और इस पहुंचे हुए को वह कैसे पहुँचा इस बात का तर्क-पथ भी दिखला देती है परन्तु पहुँचने का प्रयास करने वाले को ऐसे किसीभी तर्क-पथ का ज्ञान नही हो सकता जो उसे सही दृष्टि दे दे ................... दृष्टि धारक ‘ गीता ’ की रचना कर देता है परन्तु गीता का अभ्यासक दृष्टि नही पा सकता .................................. अरुण

Mind- driving और Understanding

जानने का काम मन (देह बुद्धि ) का है समझना काम है ह्रदय (अस्तित्व) का ......... अभिव्यक्ति के मोह के आधीन होकर जब समझ मन का प्रयोग शुरू कर देती है तब वह जानने का काम करने लगती है वह Mind - driving बन जाती है वैसे तो शुद्ध समझ हमेशा मन के बाहर खड़ी है इसीलिए शायद उसे understanding कहते हैं ..................................... अरुण

अस्तिव प्रारंभ और अंत के परे

शुरुवात मन की होती है अंत भी मन का है अस्तित्व की न तो शुरुवात है और न ही अंत इसी लिए अस्तिव की कोई परिभाषा नही बन बाती ................ मन की छोटी सी भाषा निर्भाष को अभिव्यक्त करने में असमर्थ है अस्तित्व केवल ‘ है ’ पन का दूसरा नाम है ................................. अरुण

मन मन खुद को मत भटकाना

मन मन खुद को मत भटकाना दीप जाग्रति की आभा में मन को रिता बना आ आ ना उस आभा के तार तार से बनते मन के गलियारे मन मानस में शब्द बुन रहा जिसमें अंतर सुध हारे तार तार को छोड़ सकल ज्योति में खुद खो जाना ................................. अरुण