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हर क्षण-स्वर

नदी बहती है किनारे भी बहते हैं साथ जीवन क्षण-धारा के सांसो के तट भी बहते हैं जो बीता बीत गया वर्तमान शेष रहा आने वाले का आभास महज शेष रहा चलती सांसों की ही धरती पर जीवन है बीते की- आते की- स्मृति लिए जीवन है यह जीता समय काल उसका ही मंदिर घर उसके मंदिर से ही उठता है हर क्षण-स्वर ................................................ अरुण

इक अनंत सागर है

नदी बहती है किनारे भी बहते हैं साथ जीवन क्षण-धारा के सांसो के तट भी बहते हैं गंध मधुर बिखराते सुमनों सा यह जीवन प्रेम सुरस पसराते सुजनों सा यह जीवन जीवन यह करुणा है जीवन है प्रेमभाव जीवन के सागर में जीवन की चले नाव उसमें ही प्रेम सकल भरी हुई गागर है उसमें ही करुणा का इक अनंत सागर है ................................................ अरुण

टुकड़े से लिपटा है

नदी बहती है किनारे भी बहते हैं साथ जीवन क्षण-धारा के सांसो के तट भी बहते हैं खींच कर रेखाएँ बाँट दी सारी धरती इधर की प्राण-प्रीय उधर की पराई सारा का सारा यह जगत का पसारा यह उसका ही घर है यह सारा का सारा यह टुकड़ों में जो सोचे टुकड़ों में बंटता है सारे को छोड़ व्यर्थ टुकड़े से लिपटा है ...................................... अरुण

सब उसी का तो है

नदी बहती है किनारे भी बहते हैं साथ जीवन क्षण-धारा के सांसो के तट भी बहते हैं तूफानी हवा पर उडता पत्ता और उसपर खड़ा यह जीव जो व्यर्थ ही परेशान है अपनी सुरक्षा को लेकर यह तूफान भी उसी का, पत्ता भी उसी का और यह छटपटाता जीव भी उसी का तो है ...................................... अरुण

अहंकार – स्पष्ट और सुप्त

कहतें हैं कि अहंकार सुप्त या स्पष्ट स्वरूप में सब में ही होता है राजा को अपनी सत्ता का तो आश्रम में रहने वाले को अपने भक्तों की बढती संख्या का ................ देश में चल रही आज की घटनाओं में भी जीवन का यह सत्य दिख जाता है ..... राज्य पर बैठे तो राज्य-सत्ता की मस्ती में हैं ही परतु सत्ता को झुकाने का दावा करनेवाले बाबा और अन्ना का व्यवहार भी उनके सुप्त अहंकार को (उनकी देह-भाषा और वक्तव्यों द्वारा) उजागर कर ही देता है खैर, इतना तो राजनैतिक प्रसंग में चलता ही हैं .............................................. अरुण

एक निरंग धरातल

इस स्वच्छ स्वस्थ निर्मल निरंग धरातल पर पिछला इतिहास और अगला आभास प्रक्षेपित है एक चल-चित्र की तरह चलते चित्रों की गति को ही मिल गया है एक प्रति-अस्तित्व और अब धरातल के सारे प्राण हिलते और डोलते मालूम पडतें है इसी प्रति अस्तित्व की धुन पर ....................................... अरुण

काया, माया और छाया

मन है अस्तित्व को पहचाननेवाला काया (तन) है अस्तित्व का ही अभिन्न अंग मन है काया से फलनेवाली माया सामाजिक मनाधीन बसा मनुष्य का जीवन उसी माया की छाया में विचरती काया है ........................................ अरुण