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शांति के स्वरूप की पूर्व-कल्पना असम्भव

शांति की खोज ही शांति का संकट है शांति से गौर करे खुदको, वह शांत है ...................... अपनी परस्पर विरोधी इच्छाओं और खींचातानी से परेशान आदमी शांति की तलाश करे, यह तो ठीक ही है परन्तु इसतरह से चाही शांति सम्भव ही नही हो पाती शांति के स्वरूप की पूर्व-कल्पना करना भूल होगी स्वयं की पूर्ण समझ की अवस्था में ही शांति उभरती है ....................................... अरुण

जिंदगी हर नये क्षण के प्रति बेखबर है

देखा ही नही और बयान शुरू फिर बयान के चलते देखना बंद या यूँ कहें कि हर नई साँस को लेते वक्त पुरानी सांसों से ही जुड़ा रहने वाला मन नया बनने का मौका ही नही पाता और इसीलिए यह जिंदगी हर नये क्षण के प्रति बेखबर है ................................. अरुण

सारी जिंदगी यही नासमझी कायम है

गन्दे नाले से कपडे निकालो नाले के बहते प्रवाह में उन्हें धोवो और फिर उसी नाले के कीचड़ भरे किनारे पर उन्हें सुखाने के ख्याल से रख दो क्या ऐसा करने से कपडे साफ होंगे ? ........................... मन से जुड़े हम जैसों को मन से बड़ी समस्या कोई नही है फिर भी मन में चुबती बातों को मन ही मन सुधार लिया जाता है और फिर उसी मन की गहराइयों में छोड़ दिया जाता है सारी जिंदगी यही नासमझी कायम है ...................................................... अरुण

अपनी पहचान

हांथ टूटे या घायल हो जाएं तो हाथों के काम रुक जाते हैं, पैरे न हो तो चलना मुश्किल बन जाता है. ठीक इसी तरह मस्तिष्क की कुछ विशेष प्रकार की खराबियों की वजह से आदमी अपनी तथा आसपास के लोगों की पहचान भूल बैठता है मतलब साफ है – अपनी और अपने संबंधों की पहचान केवल मस्तिष्क निर्मित भ्रम-वस्तु है, यह अस्तित्वगत नही है ........................................... अरुण

सही सवाल

दिल की गहराई से उठ्ठे उसी को खोज कहें किसी से पूछकर पूछे सवाल नकली हैं ........................ वही सवाल सही हैं जो भीतर चुबते हैं दिमाग से उठ्ठे सवाल सही नही होते वही सवाल भीतर चुबते हैं जो भीतरी खोज के दरमियाँ पैदा होते हैं बाहरी खोज तो सिर्फ दिमागी सवालों को जन्म देती है ........................................... अरुण

ख्वाइश-ए-मकसद

जिंदगी का मकसद खोजने वाला पहले यह खोजे कि यह ख्वाइश-ए-मकसद आई कहाँ से ........................................... अरुण

'सत्यमेव जयते '

एक वक्तव्य पढा और इससे मिलतेजुलते विचार भी कई बार सुनने को मिलते हैं. वक्तव्य है – ' सत्यमेव जयते ' इस कलियुग का सन्देश नहीं बन सकता है . सत्य के मुँह पर असत्य ने कई बार कालिख पोती है और वह उपहास का पात्र बन सर झुकाए खड़ा रहा. फिर किस पर विश्वास करें ? ये मूल्य और नैतिकता तब कहाँ दिलासा दे पाते हैं ? ...... ऊपर अभिव्यक्त भावनाओं पर चिंतन होना जरूरी है. ‘ आखिर सत्य ही जीतता है ’ – इस वाक्य को बहुत ही गलत ढंग से समझा गया है. जीवन में सत्य-असत्य का संघर्ष मनुष्य के आदिकाल से ही चला आ रहा है. असत्य और सत्य दोनों ही एक साथ जीवंत रहते हैं, ऐसा नही कि सत्य के सामने असत्य खड़ा ही नही होता. परन्तु असत्य को इस बात की सदैव वेदना है कि उसे सत्य का सम्मान नही मिलता. असत्य की भले ही विजय होती प्रतीत होती हो पर जीतने वाला कभी नही कहता कि विजय असत्य की हुई है, वह असत्यको सत्य का सम्मान देकर ही उसे स्वीकारता है. इसी अर्थ में यह कहा गया है की विजय सत्य की ही होती है. परास्त हुआ असत्य भी जानता है कि सत्य क्या है, वह सत्य के आधार पर ही अपनी विजय का मूल्यमापन करता है. यदि ऐसी ...