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जहाँ यार न हो कोई अपना .....

जीवन के किनारे से जाना है कहीं अब दूर जहाँ यार न हो कोई अपना, जहाँ प्यार न हो मजबूर उल्फत के नज़ारे ले दिनरात बहुत आये हरबार मोहब्बत पे छाये गम के साये अब ऐसा ठिकाना हो, चाहत हो दिल से दूर जहाँ यार न हो कोई अपना .......... फूलों की महक का शौक हर दिल में जगह पाया गैरों की वफा का फूल दिल को न किसी भाया दिल ऐसे जहां में चल, जहाँ लोग न हों मगरूर   जहाँ यार न हो कोई अपना .......... उम्मीद ही जीने की हर राह – ओ – सरहद है   रो रो के भी जी लेना   जिसकी भी कुई हद है   आँसू-ओ-हंसी का खेल,जिस जगह नही मंजूर जहाँ यार न हो कोई अपना .......... जीवन के किनारे से जाना है कहीं अब दूर जहाँ यार न हो कोई अपना, जहाँ प्यार न हो मजबूर -अरुण

लेकिन तुम्हारी याद आती है

वही नजरें वही हलचल वही मुस्कान होठों पर ये कोई और है लेकिन तुम्हारी याद आती है                  ये कितनी बेबसी है याद तेरी खो नही सकता हजारों बार सोचा फिर भी मुझसे हो नही सकता न जाने क्यों हमारे सामने वे लोग आते हैं कि जिनमें तेरे साये हैं मगर मै छू नही सकता वही नजरें ........ नयी उम्मीद का हर ख्वाब लेकर मै भटकता हूँ सहारे के लिए हर दर पर मै बस झांक लेता हूँ बदकिस्मत- किसी दर पे ये वैसी ही शकल दिखती नया सब भूलकर मै फिर पुराना दर्द पाता हूँ वही नजरें ............ अलग ही क्यों न हो हर नक्श तेरे नक्श से लेकिन नजर मेरी वही जिसने तुम्हारे ख्वाब देखें हैं पुरानी दास्ताँ खोने नये फूलों को जब देखा वही नजरें वही हलचल वही अंदाज देखे हैं वही नजरें वही हलचल वही मुस्कान होठों पर ये कोई और है लेकिन तुम्हारी याद आती है -अरुण

जर जर शरीर पर्वत का क्यों?

कसक, वेदना, विरह, कष्टसे भींगे नैन, कुंठित स्वर, जर जर शरीर पर्वत का क्यों ? क्योंकि – सरिता ने देकर मधुर प्रेम स्मृतियाँ कितनी, सहवास तृप्त और वचन अनेक- आघात किया, खोया विश्वास, कपट किया और स्वार्थ भरे उर से पर्वत को छोड़, सागर को प्रस्थान किया -अरुण

तो अचानक ही ..........

मेरी यादों पे जवां हुस्न उतर आता है तेरी आहट से मेरा जिस्म सिहर जाता है मै चला दूर, कहीं दूर गम की दुनिया से हर किनारा मुझे हँसता ही नजर आता है इन ख्यालों में मेरा दिल रमा होता है तुम यहीं पास हो ऐसा ही गुमा होता है तो अचानक ही हकीकत की हवा आती है मेरा सोया हुआ हर गम जवां होता है -अरुण

आप बतला दें मुझे भूल तो नही जाएंगी

अप्रैल १, २०१२ आज से कुछ दिनों तक अपनी पुरानी रचनाओं को इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूँ   ............... मै न भूलूँगा कभी साथ निभाना दिल से आप बतला दें मुझे भूल तो नही जाएंगी आपकी पहली मुलाकात में जादू कैसा जो हमें आपके हांथो में हांथ देना पड़ा आपका आना हकीकत को साथ लाना हुआ जो हमें ख्वाब के दामन का साथ खोना पड़ा मै न छोडूंगा कभी हांथ मिलाया दिल से   आप बतला दें मुझे ...... मैंने क्यों आप में उस ख्वाब की मूरत पायी उम्रभर जिसकी तमन्ना में साँस लेता रहा   आप ही क्यों हमारे दिल को जीत कर बैठीं   इस सवालात में मै खुदको आज खोता रहा   मै न खोऊंगा कभी प्यार सजाया दिल में आप बतला दें मुझे ...... जाने क्यों मुझको मुहब्बत में डर सा लगता है क्योंकि हर बार दर्द ही नसीब आया है    इसलिए बार बार आपसे मै   पूछता हूँ    आपने प्यार का साया तो नही लाया है    मै न भूलूँगा कभी आपका साया भी अब   आप बतला दें मुझे भूल तो नही जाएंगी -अरुण

जिंदगी आयी तब जिन्दा थी

जिंदगी आयी तब जिन्दा थी, पर आज ? जिंदगी मतलब है, मकसद है और इसीलिए परेशां भी है जिंदगी साँस तो लेती है मगर सांसों से कहीं दूर खड़ी लाश सी है - अरुण  

कला-विज्ञान- तकनीक और कौशल्य

अस्तित्व कणों की प्रीतिकर प्रस्तुति को कला कहते हैं कला की बारीकियों के तर्कपूर्ण अध्ययन को विज्ञान कहते हैं और विज्ञान के व्यावहारिक उपयोग को तकनीक कहते है और इन तीनों के साथ सही सही न्याय करने को कौशल्य कहना ठीक होगा -अरुण