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यह ‘मै’ ही अमुक्ति है

अबतक के अनुभवों की सारी बीती, सारा इतिहास जी रहा है भीतर हमारा मन बनकर, इस मन से ही उभरकर और फिर इस मन को ही संचालित करता ‘ मै ’ बनकर यह ‘ मै ’ ही अड़चन है मुक्ति के मार्ग में क्योंकि यह ‘ मै ’ ही अमुक्ति है -अरुण        

जिंदगी जीना भूल गये हैं

जिंदगी जीना भूल गये हैं जिंदगी के बाबत बने सिद्धांतों को ही जी रहे है .....अब कोई कहे कि कुछ न करो सिर्फ अंदर-बाहर से निहारते रहो इस जिन्दा जिंदगी को, दूसरों से सीखी बातों में न भटको, अपनी ही पल पल की सच्चाई पर ठहरकर जानो इस जिन्दा जिंदगी को ... तो बात मुश्किल लगती है क्योंकि हमारी रूचि जिंदगी जीने में नही किसी सिखाई बातों में ही उलझ जाने में है प्यास को जानने में नही पानी को समझने में है -अरुण  

रास्ता ही खींच लेता है

आध्यात्म के क्षेत्र में प्रेममयी, प्रेरणादायी सहज और सरल मार्गदर्शन की जरूरत है ऐसे मार्गदर्शन में मार्गदर्शी की स्वतंत्रता बनी रहती है  वह अपने को ‘ यह करो ’ या ‘ यह न करो ’ जैसे निर्देशों से बंधा महसूस नही करता सही रास्ता उसे सहज आकर्षित कर लेता है   -अरुण

वही सच्ची सेवा है

सेवाव्रत का बोझ सम्हाले मनुष्य की सेवा करने वाले, खुशियाँ नही, बोझ बाँट रहे हैं जो सही माने में खुश हैं वही अपनी खुशियाँ बांटना चाहते हैं और ऐसे लोग दूसरों के लिए जो भी करते हैं वही सच्ची सेवा है   -अरुण

दोहरा आचरण

आदमी में समझ भी है और समझ से भागने की प्रवृत्ति भी, बैसे ही उसे अपनी मूर्खता का तो परिचय है पर वह इसकी जिम्मेदारी बाहरी तत्वों पर थोपने की प्रवृत्ति का भी शिकार है. जबतक आदमी में अपने स्वतंत्र अस्तित्व के होने का मोह बरक़रार है आदमी के इस दोहरे आचरण का कोई इलाज नही - अरुण     

जान और जानना

जान और जानना ये दोनों ही शब्द एक दूसरे के करीब दिखते तो हैं पर एक दुसरे के विरोध में खड़े हैं सत्य अस्तित्व की जान है परन्तु सत्य को जानने वाले अस्तित्व को जी नही पाते अस्तित्व को तन मन और ह्रदय की समग्रता से जीनेवाले, जरूरी नही कि अस्तित्व के सत्य को जानते ही हों -अरुण

किसलय की छावों में छुपकर

किसलय की छावों में छुपकर मेरी बाँहों में आ जाना दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना तेरी पूजा के खातिर मै, अंतर में हूँ नव-स्वप्न लिए तेरा सिंगार रचाने को, प्रेमाश्रु का मै रत्न लिए बैठा हूँ मै कितने पल से, वो पल पल सार्थक कर देना दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना तेरे दर्शन के खातिर अब, इन नयनों में आशाएं हैं मस्तिक पट पर अब तेरी ही स्मृतियों की रेखाएँ हैं तुम आज प्रतिक्षा-भूमि पर, क्षण मधुर मिलन के बो देना दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना मधुमिलन-पर्व के खातिर अब, सब पर्वों ने धीरज खोया क्षण क्षण प्रीती ही मेला जब, मेलों से चित्त नही भाया सब पर्व मानने के खातिर सहजीवन पर्व दिला देना   दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना किसलय की छावों में छुपकर मेरी बाँहों में आ जाना दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना -अरुण