चुंकि काम अच्छा है, शक जताया नही जाता हालांकि, पाप भीतर है बाहर से मिटाया नही जाता जबकि ‘ टीम ’ में सिमट बैठीं है कई चिडचिडी रूहें ऐसी रूहों के बल पे भूत भगाया नही जाता -अरुण
वे सब मेरी आरती उतारते हैं और मै उनसे अपनी आरती उतरवाकर अपने को धन्य हुआ पाता हूँ. मै उनको मन की शांति के लिये मोह-मुक्ति पर प्रवचन देता हूँ और वे सब अपनी वासनाओं की तृप्ति के लिए मुझे पूजते रहते हैं मेरे उनके बीच एक अजीबसा रिश्ता है -अरुण
जब आतंरिक या बाहरी बाध्यता जोर पकड़ गई, जो कहा नही जा सकता, उसे भी कह देने की कोशिशे हुईं शांति को शब्दों से सजाया गया शांति सज तो गई परन्तु न कही और न ही सुनी गई जो कही और सुनी गई वह शांति न थी. वह थे गीता, कुरान, उपनिषद, और ऐसी ही कई पुस्तकों में दबे मजबूर शब्द -अरुण
हर आदमी को स्वयं की मर्जी के अनुसार निर्णय लेने और कृति करने की आजादी है ऐसी आजादी के समर्थन में उस आदमी के लिए उचित जगह या space छोडनी होगी. अपने निर्णय और कृति में अगर वह कोई चूक करता है तो जो परिणाम निकलेंगे उसका सामना करने की जिम्मेदारी भी उसी की है. चूक करने का और उससे निपटने का, दोनों का उसे अधिकार है , यह बात भुलनी न चाहिए -अरुण
समाज की न्याय-व्यवस्था कितनी ही प्रगतिशील और मानवतापूर्ण क्यों न हो. समाज का ही पक्ष लेते हुए न्याय प्रदान करती है. उसी के आधार पर सजा का निर्धारण करती है. परन्तु इस व्यवस्था को यह हक नही है कि वह इस बात का धैर्य और ख्याल रखे कि व्यक्ति को दी जानेवाली सजा कहीं व्यक्ति के अन्तः-परिवर्तन की प्रक्रिया में बाधा तो नही बन रही. इसका मूल कारण यह है कि न्याय-व्यवस्था अपराध से पीड़ित व्यक्ति या लोगों को न्याय दिलाने के विचार से ही बंधी हुई है, उसे घोषित अपराधी के भविष्य में परिवर्तन की संभावन का विचार करने की कोई आजादी नही है -अरुण
टिमटिमाती मोमबत्ती की कदमभर रोशनी में भी चलना हो पाता है और दिन के घने पूरे आच्छादित प्रकाश में भी, पहला कदम-ब-कदम वाला सफर अनसुलझे संदेहों को थामे हुए आगे बढता है तो दूसरा संदेह-विरहित अंतर-मन से -अरुण