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समाधान-दायक ज्ञान

हर दृष्टि किसी कोण से ही साधी जा सकती है जिस दृष्टि का कोई भी कोण नहीं या जो दृष्टि कोण-विरहित है उसके समक्ष जो भी संवेदित होता है   वह ज्ञान है परन्तु किसी कोण या तर्क के माध्यम से जो भी दिखता है वह नए प्रश्नों को जननेवाला अर्ध-ज्ञान है जिसमे जानने के लिए कुछ न कुछ बच ही जाता है वह समस्या-निवारक हो सकता है, समाधान-दायक नहीं -अरुण  

अपनी बेहोशी को देख लेना है

जहां कुछ पाना ही नहीं, कहीं जाना ही नहीं न पहुँचना है कहीं. जहां हैं हमेशा - अपनी बेहोशी के साथ, बस वहीँ हो लेना है, होश के साथ -अरुण  

कहो तो .....

कहो तो - है, कहो तो -नहीं है कहो तो - यहाँ है, कहो तो - यहाँ से बहुत दूर, कहो तो - बड़ा है, कहो तो - बिलकुल ही छोटा इस “कहो तो” वाली शब्दावली का   क्या मतलब है? इस शब्दावली के पहले कुछ सापेक्ष निर्देश छुपे हुए हैं. जैसे   इस जगह से देखकर कहो तो और उस जगह से देखकर कहो तो, इसकी तुलना में कहो तो या उसकी तुलना में कहो तो , इसने कहा होता तो या उसने कहा होता तो..... और ऐसी अनेक शर्तें अपने silent mode में ‘कहो तो’ इस शब्द क्रम से पहले जुडी हुई होती हैं -अरुण          

स्थितप्रज्ञता के लिए बाधक मनोअवस्था

देखा चाहा संग सजोना सोचा, बाधा से भिड़कर क्रोध जगा बन अग्नि अग्नि से उठता मोह, धुएँ से अँधा अपने बीते को ठीक समझ ना पाए एवं तथ्यों को सही सही ना देखे   ऐसा पागलपन बुद्धिभ्रष्ट का लक्षण अपने को खो देता यह ऐसा जग-जन -अरुण

स्वप्न और भूत

सजेधजे भूतों को कहते हैं – स्वप्न और मिलेमिटे स्वप्नों को कहते हैं – भूत -अरुण