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मन-बुद्धी का खेत

सदियों से सींचत रहे मन-बुद्धी का खेत प्राणों तक पहुंचा नहीं कुछ भी शुभ-सन्देश सदियाँ गुजर गईं, मनबुद्धि गतानुभावों के कवच में ढकीं पड़ी है कोई भी शुभ-ज्ञान जैसे गीता बाइबल या कुरान प्राणों की गहराई में पहुँच नहीं पा रहा -अरुण

चूँकि, परछाई मुझे मेरी लगती है .....

यह तो सूरज है जिसके सामने जब मै खड़ा हो जाता हूँ, आगे जमीन पर परछाई फैल जाती है,   जैसे जैसे सूरज मेरे ऊपर से गुजरने लगता है , परछाई सिकुड़ती और फिर जब सूरज पीछे आता, तो फिर फैल जाती है. चूँकि मुझे लगता है कि यह मेरी परछाई है, मेरी मनोदशा का फूल इसके फैलाव और सिकुडन से बंध चुका है, फैलाव देख फूल खिलता है, सिकुडन देख मुरझा जाता है -अरुण    

अनउलझा उलझत गया....

अनउलझा उलझत गया , बाहर खोजत हल ज्ञान, शांति वा सुख सभी, भीतरही हर पल आदमी मूलतः अन-उलझा है, परन्तु इस बातकी उसे खबर नही, सुख, ज्ञान और विश्राम उसके अन-उलझेपन में ही समाहित है   परन्तु इन्हें वह बाहर खोजने में लग जाता है , परिणामतः वह और भी उलझता जाता है -अरुण

ज्ञान, विज्ञान, अद्वैत और द्वैत

अध्यात्मिक खोज में समर्पित अवधानता अस्तित्व के एकत्व में   रमती हुई, उसके साथ एक हो जाती है. इसी एकत्व को ज्ञान कहते है. जब बुद्धि ऐसे ज्ञान से दूरी बनाते हुए अवधानता को, अस्तित्व के किसी अंश पर केन्द्रित करती है, तो बुद्धि की इस कृति को विज्ञान की संज्ञा दी जाती है. इसतरह, एकत्व में रमने से अद्वैत तो ज्ञान से दूरी बनाने पर द्वैत उभरता है    -अरुण

अंतःकरण की समझ से ही ज्ञान फलित

इन्द्रियों एवं भीतर की प्रति-इन्द्रियों को पूरी की पूरी सृष्टि दिखाई नहीं देती. परन्तु ऐसी अपूर्ण सृष्टि ही पूरी की पूरी सृष्टि है, - ऐसा देखे जाने के कारण ही भूल यानि अज्ञान फलित होता है. जो दिखता है उसमें ही अन्तःकरण से (बाह्य या प्रति-बाह्यकरण से नहीं) जब पूर्ण की समझ जागती है तो ज्ञान फलित होता है -अरुण