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अपने ही शोरोगुल में .....

अपने ही शोरोगुल में खोई है हर लहर उसको नही पता, वो समंदर की श्वाँस है अपना नही है फिर भी अपनाए जा रहा बन्दा है बेखबर के क्या उसका खास है -अरुण      

संजय दत्त को सजा सहने के लिए साहस प्रदान करना ही बेहतर होगा

समाज की सुरक्षा को ध्यान में रखकर हम ही ने कायदे और सजाओं की व्यवस्था की है, हम ही ने न्याय व्यवस्थाएं रची हैं और न जाने अब क्यों हम उससे पीछे हटकर किसी व्यक्ति विशेष को, उसको दी गई सजा के कष्ट से, बचाना चाहते हैं? माफी का कैसे जुगाड़ किया जाए, इस बात को लेकर परेशान हैं. बेहतर यही होगा की ऐसी चर्चा/चिंताओं में न उलझते हुए, हम अपने प्रिय दण्डित को शांति पूर्वक सजा सहने का साहस दिलाने का काम करें -अरुण  

‘शुद्ध जीवन’

जीव ही देखे जीव को, जीव ही समझे जान गर सुध ही बेसुध रहे, रहे जान बेजान जान = शुद्ध जीवन ---- मनुष्य समेत सभी प्राणी, वनस्पति एवं पदार्थ के सन्दर्भ में, ‘शुद्ध जीवन’ अपने व्यापक और गहरे अर्थ में जन्म के पहले से मृत्यु के बाद भी किसी न किसी स्वरूप में सतत जीवंत है. यदि मनुष्य अपने सम्बन्ध में इस ‘शुद्ध जीवन’ को देखना-समझना चाहे   तो उसे अपने जन्म से सटी सजीवता और मृत्यु से जुडी   अजीवता को सतत ध्यान में जीवंत रखते हुए ही देखना-समझना होगा -अरुण  

फैसला भले ही अप्रिय पर स्वीकारना ही उचित

संजय दत्त को सुनाई गई सजा भले ही जनमानस को अप्रिय लगे पर श्रेयस्कर यही होगा कि इसे पूरी तरह स्वीकारा जाए परन्तु यदि दबाव वश न्यायलय के निर्णय को निष्क्रिय किया जाता है तो यह बात     देश की न्याय-प्रियता के प्रति   संदेह उठाने वाली साबित हो सकती है -अरुण          

पके हुए तथ्य

तथ्यों का संग्रह करने वालों से वह आदमी बिलकुल भिन्न हैं जो तथ्यों को            अनुभूति की आंच से इतना पका देता हैं कि तथ्य अपने आप किसी निमित्त को पकड़कर उसकी समझ-भूमि पर गिरकर उसमें समां जाते हैं -अरुण