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जागते हुए भी गहरी नींद

सोचने से सोच हट न पायी     सूरज की गैरहाजिरी में रात ढल न पायी जिसमें सूरज जैसा ध्यान जाग उठ्ठा हो उसने जागरण में भी गहरी नींद पायी -अरुण

देखनाभर ही सबकुछ

अर्धनींद और अर्धजागृति में ही सांसारिकता गतिमान है। उसे मन के माध्यम से ही जीना पड़ता है। उसका सारा कारोबार - पाना खोना, लेना देना, हसना रोना ...... मन की ही लीला है जिसमें प्रयास और समय की अवधारणा का विनियोजन अपरिहार्य होता है। पूर्ण जागृति में गहन व्यापक समझ फलित होने से - प्रयास, समय, मार्ग की कोई अवधारणा जन्मती ही नहीं, बस देखते ही कृति, - देखनाभर ही कृति है। - अरुण 

मै हूँ दिल्ली – सुनो मेरी कैफियत

आजकल मेरे राजनैतिक धरातल पर धूम-थ्री   का शो बड़े ही शोरोगुल के साथ चालू है. पहले यह तमाशा केवल धूम-टू तक ही सीमित हुआ करता था, अब उसमें धूम थ्री का आयाम जुड़ गया है. दोनों ही अनुभवी तमाशेबाज,   तीसरे की हर चाल को नौटंकी की संज्ञा दे रहे है क्योंकि तीसरा अभी नौसिखिया है. वह हर कदम अपने अभिभावकों (जनता जनार्दन) को पूछकर उठाना चाहता है और दोनों इसबात पर उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं. अभिभावकों को पूछकर निर्णय लेना – दोनों को ही बड़ा बचकाना लगता है क्योंकि उनका स्वयं का अनुभव बिलकुल ही दूसरे छोर का रहा है. दरअसल किसी ने सोचा ही न था कि मेरे अखाड़े में दो के अलावा तीसरा भी कोई खिलाडी प्रवेश पा सकेगा. दोनों का मुझपर बहुत ही भरोसा था. उनके इस भरोसे का चक्का टूटते ही, दोनों ही धडाम से नीचे गिर पड़े है. एक की हालत बिलकुल ही नाजुक है तो दूसरा उठकर फिर चल सकने की सोच पा रहा है. अभी तो मेरे राजनैतिक आकाश में नैतिकता की बयार चल पड़ी है, और इसीलिए अनैतिक मार्ग का सहारा लेना तीनो खिलाडियों को इतना सुविधाजनक नहीं रहा. ढकोसले की आड़ में बड़ी बड़ी बातें करने और एक दूसरे की बखिया उधेड़ने के सिवाय ...

अस्तित्व का गति संचार

भीतर बाहर, इधर उधर, नीचे ऊपर, हर छूटी भरी जगह में केवल अस्तित्व ही अस्तित्व है। इसके अंतर्बाह्य गति संचार में ही निद्रस्थ असत्य एवं जागृत सत्य, दोनों विराजमान हैं। - अरुण

ज्ञान-उर्जा का स्पर्श

छूवे को कह जान तो अनछूवे को मान सब छूवा- जाना नहीं, कुछ छूवा तो जान -अरुण जो अपनी जीवंत ज्ञान-उर्जा के माध्यम से सकल को छूते रहते हैं, वे ‘कुछ भी जाना नहीं’ वाली अवस्था में होते हैं. जानने का मतलब ही है कि कुछही जाना है. जो जाना गया वही है ज्ञान, जो नहीं जाना गया, उसे मान यानि मान्यता की संज्ञा देनी होगी. अज्ञानी या असकल ज्ञानी   -हमेशा ‘कुछ जाना कुछ माना’ वाली अवस्था में होता है. -अरुण    

धर्म संकट में तो उलझी है दिल्ली की जनता

उबानेवाली पार्टियों और राजनीति को खदेड़ने के लिए दिल्ली की जनता ने अरविन्द केजरीवाल की लाठी (आम आदमी पार्टी) का इस्तेमाल तो कर लिया पर अब जब नयी व्यवस्था स्थापित करने की बात चल पड़ी है .. अरविन्द की लाठी किसी काम न आ रही, यह लाठी तो सिर्फ खदेड़ना जानती है, सरकार बनाना या चलाना नहीं. यह नया अनुभव सीखने के लिए केजरीवाल को अभी कुछ और समय चाहिए. यह अवसर उन्हें मिले या न मिले ... अभी कुछ कहा नहीं जा सकता. -अरुण      

समस्या आपसे बोलती है ....

जब समस्या या उलझन आपसे सीधे सीधे बोलती है, आप उसे ठीक से देख लेते हो. परन्तु जब आप अपनी समस्या से (अपने से ही) बोलने लगते हो, आप उसे पूरी तरह देख नहीं पाते. समस्या को पूरी तरह देख लेना ही समस्या का हल है. उसे अधूरे या अस्पष्ट देखना उसे बनाए रखता है. -अरुण