Posts

जड़ को देखो और विवाद से उबरो

सारे विवाद मानने और न माननेवालों के बीच होते हैं, एक कहता है होता है तो दूसरा कहता है नही होता, झगडा है ‘होता’ और ‘नही होता’ के बीच जिसे किसी भी झगड़े या विवाद की जड़ दिख गई उसके दिमाग में विवाद का वृक्ष उगता ही नही -अरुण        

आदमी सिर्फ बटोरता है

किनारों से गुजरती हुई पहुँच जातीं हैं नदियाँ समंदर में बिना समेटे तजुर्बों को जो आते रहे,जाते रहे, मिलते रहे बिछुड़ते रहे   हर पल हर वक्त..... और नदियाँ सिर्फ उठाती रहीं लुफ्त अपनी रवानी का ........     परन्तु आदमी जिस रास्ते से गुजरता है उस रास्ते को ही बटोरता चला जाता है बिना अपनी गुजरन और रफ़्तार को देखता निहारता और जब आखिर हिसाब करने बैठता है तो पाता है कि सिवा कंकड़ पत्थर और धूल के कुछ भी हासिल न हुआ -अरुण      

संबंधों का दर्पण

बिना संबंधों के जीना आदमी के लिए संभव कहाँ ? कोई संबंधों के दर्पण में स्वयं की खोज जारी रखते हुए रूपांतरित होते हैं , प्रेम जगाते हैं तो कोई संबंधों में अपना   निहित स्वार्थ खोजते हुए मैत्री और दुश्मनी का सिलसिला चालू कर देते हैं - अरुण     

माने हुए को ही मन कहते हैं

जो है ही नही फिरभी जिसके होने को मान लिया गया है, उसीको मन कहते हैं यह ‘मान लिया गया हुआ’ यानि मन .... क्या कर सकता है सिवा ‘मानने’ के? ..मानने को ही फैलाने और गहराने के ? ---------- नापना,तोलना,गिनना,सोचना-विचारना,पाना-खोना और परिणाम के रूप में हसना-रोना और प्रतिक्रिया के रूप में क्रोध, लोभ आदि को प्रकट करते रहना ... ये सब इसी ‘मानने’ की क्रिया का ही विस्तार है, गहराई है -------------- सागर के कम्पन को लहर मान लिया गया है, अब यह मान्यता ही लहरों को गिनने, छोटी बड़ी मानते हुए उनमे तुलना साधने का काम करने लगती है. ----------- सामने पेड़ हो ही न, फिर भी यदि   मान लिया गया कि है... तो फिर... ‘वह पेड़.’ बढेगा, फैलेगा, लहराएगा ...सबकुछ वह करेगा जो एक जीवंत पेड़ करता है -अरुण                  

पौधा और पवन

पौधा अपने को पवन के हवाले छोड़े हुए उसके साथ मस्ती में डोलता रहता है. अगर पौधा, पवन के साथ अपनी सुसंगति को भुलाकर, पवन को ढकेलने लगे तो टूट कर बिखर जाएगा. ----------- मन-ऊर्जा और स्मृति का नाता कुछ ऐसा ही है. जब स्मृतियाँ मन ऊर्जा पर तैरती होती है तब मन बिलकुल शांत होता है और जब स्मृतियाँ अज्ञानवश मन ऊर्जा को चलाने या drive करने लगतीं हैं तब ऊर्जा और स्मृतियाँ, दोनों ही खंडित होकर , मन-शांति को भंग कर देतीं हैं. ---------------- अहंकार या कर्ता भाव का जागना ही. स्मृति द्वारा ऊर्जा को drive किया जाना है. स्मृति का ऊर्जा के हवाले होना ही,   कर्ता भाव का विलोपित हो जाना है. -अरुण