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एक दोहा

एक दोहा ********** अगला कुई न जानता, अगले में .....का होय? यह गुर जो भी जान ले, बिना किसी डर सोय - अरुण  जो भी लोग अगला या भविष्य को जानने की बाधा से ग्रस्त हैं, वे नादान हैं। भविष्य किसी को भी पता नहीं होता, न पता हो सकता है । क्योंकि समय या काल एक मनोवैज्ञानिक उत्पाद है, अस्तित्वगत तथ्य नही। - अरुण

राजनीति का अखाड़ा

राजनीति का अखाड़ा ********************* बिछी हुई मिट्टी को रौंदते हुए, उसमें अपने पैर जमाते, उसकी मुलायमियत का फ़ायदा उठाते... अपनेको चोट से बचाते हुए, कोई भी पहलवान  अखाड़े में कुश्ती के दाँवपेंच खेलता रहता हैं। सामनेवाले को चित करते हुए, उसे धूल चटाना, उसके खेल का पहला मक्सद होता है । इस लोकतांत्रिक देश के अखाड़े में राजनैतिक उम्मीदवार और  पार्टियाँ यही खेल चुनाव आयोग की देखरेख में बड़ी ही कुशलता से खेल रही हैं । पहलवान, कुश्ती, दाँवपेंच, अखाड़ा, चित करना, पटकनी देना, धूल चटाना..... इन शब्दों या उपमाओं का तो औचित्य, राजनीति के संदर्भ में, आसानी से समझ आ जाता है । पर सवाल उठेगा.... मिट्टी की उपमा किसके लिए ? मिट्टी ... यानि यह भोलीभाली, मुलायम, सभी को बर्दाश्त करनेवाली, दुष्टों को भी पांव जमाने का मौका देनेवाली.... भारत की सहिष्णु जनता । चुनाव के दौरान यह जनता पार्टिंयों के हर प्रचारी सचझूठ को सुन लेती हैं, उनके बहकावी आश्वासनों के स्वागत के लिए तैयार रहती है... भावुकता की जादुई  हवा अगर चल पड़े तो बहक भी जाती है । पार्टीयों के  आपसी गालीगलोच से अपना मन बहला ...

सबका अंतिम सत्य तो एक ही है

दौड़ती रेलगाड़ी का एक डिब्बा, भीतर, यात्री चल फिर रहे हैं ... डिब्बे के एक छोर से दूसरे छोर के बीच, दोनों तरफ की दीवारों के बीच...... उनके चलने-फिरने में भी कोई न कोई गति लगी हुई है,  किसी न किसी दिशा का भास है कहने का मतलब... डिब्बे के भीतर चलते फिरते लोगों से पूछें तो हर कोई अपनी भिन्न दिशा और गति की बात करेगा जबकि सच यह है कि.. सभी यात्री दौड़ती रेल की गति और दिशा से बंधे है उनकी अपनी गति और दिशा...एक भ्रम मात्र है सभी का अंतिम सत्य तो एक ही है भले ही हरेक का आभास भिन्न क्यों न हो -  अरुण

मुक्ति

पिंजड़े का पंछी खुले आकाश में आते मुक्ति महसूस करे यह तो ठीक ही है परन्तु अगर पिंजड़े का दरवाजा खुला होते हुए भी वह पिंजड़े में ही बना रहे और आजादी के लिए प्रार्थना करता रहे तो मतलब साफ है.... आजादी के द्वार के प्रति वह सजग नही है वह कैद है अपनी ही सोच में - अरुण

साँस

साँस ******** जीने जिलाने की ही दुनिया हो तो बस,  हलकी सी  साँस बहुत है दुनिया मिलने मिलाने की हो तो फिर हर साँस के साथ.. पास और दूर वाले रिश्तों की निर्भरता जुड जाती है..... पाने-खोने, कमाने-गँवाने वाली दुनिया में जी रही साँसों से हिसाबों की भारी भारी तख़्तियाँ लटक कर साँसों को बोझिल बना देतीं हैं ऐसे बोझिल साँस वालों को ही ' आलोम विलोम' वाले आसानी से अपना ग्राहक बना लेते हैं पर कुछ नही होता... कोई नही बताता ऐंसों को कि अपनी साँसों से बस रिश्तों की निर्भरता हटाओ हिसाबी तख़्तियाँ उतार लो... साँस फिर से हलकी होकर बहने लगेगी... एक मधुर मृदुल पवन-झोंके की तरह - अरुण

संस्कारों से हो रही घुटन की आवाज़

क्यों न की मेरी अंतिम यात्रा की... शुरुवात उसी दिन जिस दिन मैं इस धरती पर आया उसी दिन से तो शुरू कर दिया आपने गला घोटना मेरी कुदरती आजादी का उसी दिन तो शुरू किया आपने मेरे निरंग श्वांसों में अपनी जूठी साँस भरकर उसमें अपना जहर उतारना उसी दिन से तो सही माने में मेरी क़ैद शुरू हुई, आपके विचारों, विश्वासों और आस्थाओं ने मेरी सोच को रंगते हुए मुझे बड़ा किया...मुझे पाला पोसा बढ़ाया.... आप जैसे 'अच्छे-भलों' के बीच में लाया आपने ज अच्छा समझा वैसा ही जीना सिखाया पर कभी न समझा कि आप फूल को उसकी अपनी ज़िंदगी नही समाज को जो भाए ,ऐसी मौत दे रहे हो, मै तो बस सामाजिक प्रतिष्ठा और उपयोग का सामान बनकर रह गया, अब पहुँचने जा रहा हूँ अंतिम छोर पर... उस राह के जिसका आरम्भ ही कभी न हो पाया अरुण

निजता का भावभ्रम ही सारी मनोवैज्ञानिक परेशानियों का मूल

जीव के जन्म का जीवशास्त्रीय अर्थ है, माँ की कोख से अलग हुए एक स्वतंत्र जीव का अवतरण व उसके जीवन की शुरुवात। यह शुरुवाती जीवनस्वरूप ही जीव का मूल जीवन स्वरूप है। बात यदि मनुष्य के संदर्भ में की जाए तो.....मनुष्य-जन्म से कुछ अवधि या समय तक, मनुष्य में, मनुष्य और पूरी मानवता के बीच... भिन्नता का, कोई भाव रहता ही नही । बाद में, सामाजिकता का स्पर्श ही मनुष्य में भिन्नता जगाते हुए निजता का भावभ्रम सजीव कर देता है।   यहीं से, निजता या द्वैतभाव या individuality की परंपरा या अादत हर व्यक्ति की मानसिकता को जकड़ लेती है । यह निजता सामाजिक जीवनयापन के लिए एक सुविधा भी है और कष्ट या suffering भी, सुरक्षा की माँग भी है और असुरक्षा का भय भी । जीवन के सारे मानसिक संघर्षों और परेशानियों का जन्म इसी निजता या भिन्नता के भाव से होता है । 'जागे हुओं' ने कहा है ...... गहन आत्मावलोकन में निजता के ओझल होते ही निजताजन्य वेदनाओं की स्मृति भी ग़ायब हो जाती है, और पुनः अवतरित होता/होती है... मूल जीवन-स्वरूप या वह मूल सकल प्रेम-अवस्था। अरुण बात को इससे अधिक सरल नहीं बना पा रहा, समझ आ जाए तो ठीक, न आए...