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तीन रुबाईयां

रुबाई ******* बैद मन का.. मर्ज़ को अच्छा नही करता टेढ़ को सीधा करे .....अच्छा नही करता सबके सब सीधे से पागल.. ऐसे सीधों से वह कभी मिलता नही ...चर्चा नही करता - अरुण रुबाई ***** ठहराव नही है ......है बहाव जिंदगी न रुका कुछ भी, न पड़ाव है जिंदगी न चीज़, न शख़्स, न जगह है कोई 'है' का न वजूद यहाँ, बदलाव है जिंदगी - अरुण रुबाई ******* सिक्के के पहलुओं में दिखता विरोध गहरा भीतर से दोनों हिलमिल आपस में स्नेह गहरा ऊपर से दिख रही हो आपस की खींचातानी भीतर में बैरियों के ... बहता है प्रेम गहरा - अरुण

रुबाई

रुबाई ***** पेड़ जंगल में समाजिक नही....एकांत में है भीड़ से हट के भी हर शख़्स खड़ा भीड़ में है भीड़ में पला बढ़ा भीड़ का ही एक रूप हुआ आसमां सब का एक ही न किसी भीड़ में है - अरुण

तीन रुबाईयां

रुबाई ****** ज़रूरत को सयाना ठीक से परखे ज़रूरी जानकारी को टिकी रख्खे निरा मूरख पढत-पंडित गलत दोनों गिरे कोई तो कोई ज्ञान को लटके - अरुण रुबाई ****** दुनिया में नही होती कुई बात कभी पूरी दिन रात जुड़े इतने .....छूटी न कहीं दूरी हर रंग दूसरे से कहीं ज़्यादा कहीं फीका इंसा ना समझ पाए क़ुदरत की समझ पूरी - अरुण रुबाई ****** यह जगत टूटा हुआ तो है नही....."लगता" ज़रूर और फिर आते निकल.. ....स्वार्थ भय ईर्षा ग़रूर इसतरह मायानगर आता नज़र.. ....बनता बवाल "लगना" ऐसा जो निहारे....जगत उसका शांतिरूप - अरुण

रुबाई

रुबाई ******* जहांपर पाँव रख्खा है वहीं पर 'वो' खड़ा है प्रयासों से मिले .....ऐसी न कोई संपदा है नज़ारे जी रहें हैं ...हो नज़र सोयी या जागी सभी मारग सभी खोजें समझ की मूढ़ता है - अरुण

रुबाई

रुबाई ******** है यहीं अभ्भी ....उसे पाना नही है पाया हुआ है...ढूँढने जाना नही है देख लेना है कहीं ना बंद हो आँखें ख़्वाब में या याद में खोना नही है - अरुण

रुबाई

रुबाई ******* चुप्पी भी बोलती है चुप हो के फिर सुनो अपनी ही सोच में हो...बाहर निकल,सुनो कुछ जानना नही है ख़ुद को भी भूल जाओ पूरे जगत की धुन में घुल जाओ फिर सुनो - अरुण

रुबाई

रुबाई ****** दिल से समाना सकल में आराधना है मन से हुई जो याचना... ना प्रार्थना है अपनी बनाई मूर्ति को भगवान कहना एक अच्छा और भला सा बचपना है - अरुण