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पेज ७२ तक

एक गजल ********** क्योंकर सज़ा रहे हो परछाईयों के घर? जागोगे जान जाओगे सपने के तू असर कुछ साँस ले रहे हैं .,ज़माने के वास्ते कुछ मेहरबाँ बने हैं ज़माने से सीखकर जो ख़ुद को देखता है..दूजों की आँख से दूजों को जान देता है अपनी निकालकर उसको ही लोग कहते खरा साधु खरा संत जिस 'संत' का है मोल किसी राजद्वार पर जिसके लिए बदन हो किराये का इक मकान उसको न चाहिए.......कोई दीपक मज़ार पर अरुण Please meditate on this – ------------------------------------- Mind cannot be total awareness only because it is a byproduct of unawareness. Yes, mind can be aware of itself (within) and others (without). Awareness is not being ‘aware of’. Awareness is a state which is off (or beyond) the mind. ‘Being aware of’ is a focusing by a subject on an object, whereas, awareness is beyond subject-object duality Arun मेरी बातें.... ************* मेरी बातें सुनके शायद तुम बदल जाओ मै बदल पाऊँ न पाऊँ कह नही सकता रास्ते होते नही मंजिल अजब ऐसी ऐसी मंजिल को बयां मै कर नही सकता भीड़ ब...

६५ पेज तक का संकलन

वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया अरुण हिंदी ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही ------------------------------------------------ मराठी आकाश नसते तर धरणी नसती भिंती नसत्या तर मने ही नसती अरुण मराठी- बोध-स्पर्शिका **************** व्यक्ति आणि व्यक्तिमत्व ----------------------------- कोणती भाषा लिहिणे आहे, यावर कागदा चा पोत ठरत नसतो कसे ही असो व्यक्तिमत्व व्यक्ति मात्र एकच असतो ............................ तहानल्यां चे गोत -------------------- तहान केवळ माझीच... ओलावतो माझेच मी ओठ असती जर ती सामुहिक.. तर बनले असते 'तहानल्यांचे' ही गोत ............................... अरुण हिंदी - चिंतन ************* विज्ञान और आध्यात्म का आपसी सहयोग ******************************************* विज्ञान और आध्यात्म आपस में एक दूसरे से सहयोग करते हुए ही... सृष्टि और उसके जीवन संबंधी सत्य को समझ सकते हैं। विज्ञान के पास सही explanations हैं तो आध्यात्म के पास सही समझ । ...

५० पेज तक का संकलन

सच्ची बात *********** कोई तो क़रीबी होते हैं......कोई तो पराये होते हैं ऐसे भी कई रिश्ते जोके  शिद्दत से भुलाये होते हैं अरुण सच्ची बात *********** हर जगत की सहुलियत को रच दिया है सोच ने सहुलियत ने सोचने की...रच दिया ईश्वर सहज अरुण सच्ची बात *********** आदमी है जब..... आदमी से ही डरा हुआ फिर अमन-ओ-चैन कहां और किधर से आएगा ? अरुण सच्ची बात *********** इशारे करने वालों से न नजरें जोड़ के रखना इशारा जिस तरफ़ हो उस तरफ़ ही देखना वाजिब अरुण सच्ची बातें *********** रौशनी हो तो नज़ारा साफ़ दिखता है, बात सही है पर.... न रौशनी न नजारा.. एक दूसरे पे निर्भर है ------------------------------------------- भगवान रौशनी है ........ऐसी प्रखर प्रगाढ़ जिसमें सभी उजागर हैं दिल के कारोबार अरुण सच्ची बात ********** शख़्स में हर- 'मै अलग हूँ' - ख़्याल आया जहनियत हिलने लगी भूचाल आया अरुण सच्ची बात ************ हज़ारों क़ायदे आये अमन-ओ-चैन के ख़ातिर न होगा कुछ असर.....हर ज़हन में ही जंग जारी है अरुण सच्ची बात ************ क़ुदरत को क्या पता हो... के उसका क्या ...

सच्ची बातें और कुछ कविताएँ

सच्ची बात ************ भीतर.. प्रकाश कायम है...लाना नहीं है, फिर आदमी अदिव्य  (unenlightened) क्यों है?, क्योंकि कल्प-सामग्री  (image-material) से बने ज्ञान-समझ-अहंकार की दीवार ने प्रकाश को उसतक पहुँचने से रोक रख्खा है, जब दीवार ढहेगी तब ...दिव्यत्व जागेगा -अरुण   सच्ची बात ************ किसी अनजान शहर में ......राह चलते जो भी दिखता है उसे हम देखते जाते हैं - आदमी, पेड़, वस्तुएं, दुकाने... ऐसे ही  सबकुछ - उनसे एक रिश्ता तो बनता है पर न तो हम उन्हें स्वीकरते हैं और न ही उन्हें नकारते हैं. इसतरह जुड़कर भी अनजुड़े रहे रिश्ते में आदमी का स्व (Self) उघाड़ता जाता है बिना किसी कोशिश के भीतर बाहर का अभिन्न्त्व खुला हो जाता है आदमी के ‘भीतर’ का उसके ‘बाहर’ से यही खरा रिश्ता है. परन्तु हम तो हमेशा ...पूर्वाग्रह ग्रस्त (baised और prejudiced) रिश्तों में ही जीते हैं -अरुण रुबाई ******* आसमां वक्त से हटते हुए........ ..देखा न कभी हर सेहेर  बाद रात....सिलसिला बदला न कभी कभी तूफान कभी मंद....... ..कभी ठहरा समीर आसमां अपनी जगह ठहरासा,  हिलता न क...

कुछ सच्ची बातें

सच्ची बात ********** कोईभी रचाता नही है जगत ये है रचना जो खुदसे रची जा रही है जिसे ये समझ आ गई बात गहरी उसे हर जटिलता सुलभ लग रही है - अरुण सच्ची बात ********** न किसी की मेहरबानियों के लिए हूँ झुकता..... जमीं चूमने के लिए है कुदरत में घुलना.. सही जिंदगी नही उससे......कुछ माँगने के लिए अरुण सच्ची बात ************ सृष्टि की न भाषा कोई.. न है बोलना उसे सृष्टि बनकर रहना और फिर .भोगना उसे संवाद विवाद न चक्कलस न चर्चा ज़रूरी जिओ केवल उसमें समाए, न परखना उसे अरुण सच्ची बात ********** जिंदगी हाँ.. ना......में दिया जबाब नही हिसाब रखनेवालों का ......हिसाब नही अनगिनत अक्षर हैं ....नये नये तजुर्बों के कुछ जानेपहचाने अक्षरों की किताब नही अरुण सच्ची बात *********** डर नही है मौत का.. है जिंदगी खोने का डर जी नही पूरीतरह से ..अधुर रह जाने का डर लम्हा लम्हा जिंदगी का जो जिया पूरी तरह मर रहा लम्हे में उसको खाक मर जाने का डर अरुण सच्ची बात ************ सत्य और शांति की तलाश में हिमालय जैसे निर्जन (जहाँ कोई जन न हो) स्थलों पर जाना भी ठीक होगा, अगर तलाश करनेवाला अ...

रुबाई

रुबाई ******* ज़र्रा ज़र्रा है जुदा ना मलकियत उनकी अलग फिर करोड़ों में मेरी ये शख़्सियत कैसे अलग? यह उतारा दिल में जिसने सच्चा बुनियादी सवाल देखता ख़ुद में खुदाई ना खुदा जिससे अलग - अरुण

तीन रुबाईयां

रुबाई १ ******* हकीकत को  नजरअंदाज करना ही नशा है असल में होश खोता आदमी ही....दुर्दशा है तरीके मानसिक सब,...होश खोने के यहांपर ललक भी कम नही, बेहोश होना ही नशा है - अरुण रुबाई २ ******* बैसाखी के बल लँगड़ा ...चल पाता है अंधा हर हांथ का भरोसा..कर लेता है होश को चलना नही होता..ये अच्छा है बिन चले जागी निगाहों से पहुँच जाता है - अरुण रुबाई ३ ******* ये बस्ती ये जमघट हैं सुनसान मेले सभी रह रहे साथ.. फिर भी अकेले जुड़े दिख रहे.....बाहरी आवरण ही परंतु..ह्रदय धाग .... ......टूटे उधेडे - अरुण