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मनुष्य वैज्ञानिक भी है और अद्ध्यात्मिक भी

दृश्य या पदार्थ जगत में तथ्यों की खोज के लिए, दृश्य नक्शों का प्रयोग किया जाता है परन्तु अदृश्य या परमात्म जगत की सच्चाई देखने के लिए, अपनी अदृश्य अवस्था में, अदृश्य माध्यमों का प्रयोग घटता है. ऐसी दोनों ही खोजे मनुष्य के लिए संभव है. क्योंकि मनुष्य वैज्ञानिक भी है और अद्ध्यात्मिक भी -अरुण

समय खड़ा है, चलता नहीं

इस अपरिमित आकाश में खड़ा है समय, आकाश के कण कण में समाये हुए, न कोई आरम्भ और न अंत लिए, मगर इस समयाकाश में   इन्सान चल रहा है अपनी गति, दिशा और यात्रा-समय का हिसाब रखते हुए -अरुण      

मन विवेकी बने, विवेक मनमानी नहीं

धर्मग्रंथ ‘गीता’ मुझे सही जानकारी देता है वह कहता है कि ‘विवेक मन को मनमानी करने से रोकता है’ पर यह मूल्यवान वचन अभी भी मेरे प्राणों का हिस्सा नही बन पाया है ...... इस बात का एहसास मुझे कल परसों की घटनाओं से हुआ मैं कल के दिन अपने अप्रिय जनों के साथ हिंसा करता रहा. लेकिन यह बात मन को चुबती रही पर मेरा मनमानी विवेक मुझे कहता रहा- कोई पछतावा मत करो क्योंकि परसों तुम पूरे शांत थे,   उस दिन अपना पूरा दिन तुमने बिना किसी हिंसा के गुजारा था सो तुम्हारे जैसा आदमी हिंसक नहीं कहलाया जा सकता मेरे मनमानी विवेक ने मेरे मनमानी मन को Justification की एक अच्छी खुराक पिला कर शांत कर दिया था -अरुण

स्वधर्म

हरेक आदमी व्यापक अर्थ में जिस स्थान पर खड़ा है उस स्थान के अनुकूल की जानेवाली कृति ( action) ही उसकी अपनी कृति हो सकती है इसी स्थान-भिन्नता को गीता में स्व-धर्म कहा गया है. यह स्व-धर्म पूर्णतः निजी है और   इसीलिए इसे निजता कहना भी उचित होगा जो जहाँ खड़ा है वहीँ से चलना शुरू करे. अपना स्थान न पहचानते हुए, दुसरे के स्थान को ही अपनी निजता जानकर आगे बढ़ना सर्वथा एक गलत कदम सिद्ध होगा इसी निजता या स्वधर्म को आज की भाषा में aptitude, Mental tendency, Start-point, Thinking and understanding pattern आदी भी कहा जाता है -अरुण      

विवेक एवं श्रद्धा

विवेकवान श्रद्धा तक पहुँचने की संभावना रखता है परन्तु श्रद्धावान के लिए विवेक की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि श्रद्धावान विवेक से परे निर्विचार अवस्था में होता है -अरुण