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चलो इक बार फिर से ... अजनबी बन जाएँ हम दोनों

साहिर लुधियानवी की रचना- चलो इक बार फिरसे अजनबी बन जाएँ हम दोनों .... आध्यात्मिक सोच से मेल खाती है अनुभूति जबतक परिचित नहीं होती ...यानि जबतक उसे कोई नाम नहीं होता   वह विशुद्ध अवस्था में होती है परिचय का रोग लग जाते ही .. मानसिक पीडाओं और विवंचनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है .. चित्त को आनंद देने वाली संवेदना मन के लिए एक बोझ बनाते हुए उसे वेदना देती है -अरुण                   

अपनी निरंतरता खोने के भय से मन हमेशा ग्रसित

मस्तिष्क और मन के बीच, विचार सन्देशवाहक का काम करता है उसे जो लगे (realize हो), उसे मस्तिष्क मन तक पहुंचाना चाहता है ..... ..... परन्तु होता कुछ और ही है ...... मस्तिष्क किसी बात को ठीक से realize कर पाए इसके पहले ही विचारक हस्तक्षेप करते हुए ... मस्तिष्क की अधूरी-समझ को अध-ढले विचारों के माध्यम से मन तक ले जाता है ताकि मन इन अध-ढले विचारों यानि प्रतिमाओं के आधार से अपनी निरंतरता बनाए रख्खे. अपनी निरंतरता कहीं टूट न जाए, यह भय मन को, हमेशा बना रहता है -अरुण              

जिंदगी इसे एक न एक दिन तो नोंच ही लेगी

मायावी कोष में रमता यह जीवन जिंदगी एक न एक दिन तो नोंच ही लेगी और हमें मौत की पीड़ा देगी ..... क्यों न हम स्वयं, इस मायावी चोले से बंधे मिथ्या जगत को त्यागकर अमायावी जीवन की मुक्त धारा में विहार करें -अरुण  

यह जीवन केवल एक संचार है

जीवन सिर्फ है एक संचार न कोई आकार न प्रकार न कोई नाम न उच्चार न किसी काल-पट्टी के खांचो से कट सके .... न भूत, भविष्य और वर्तमान में बट सके न बिंदु है सो न है रेखा दिखे... जैसा जिसने देखा   जब देखो तभी है .... न कल था न अभी है ....और इसीलिए इसे नया या पुराना कहना भी ठीक नहीं न पुराना था कभी सो नया कहना भी सटीक नहीं अज्ञानवश निरंतरता का आभास जगाने वाला स्थाई या कि अस्थाई.... इन जैसे सवालों को उठानेवाला ...यह जीवन केवल एक संचार है -अरुण