Thursday, October 29, 2015

29 0ctober

अपने चित्तपर व्यापक ध्यान जाते दिखे
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चित्त है....... चित्र की तरह विचित्र
अलग अलग प्रतिमाएँ...
एकही स्याही है।
एकही धरातल पर चित्र बने..
दिखे कहीं पर्वत तो
दिखे कहीं खाई है।
अरुण
कुछ शेर
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हटा जब मोह बाहर का, खुले इक द्वार भीतर में
पुकारे खोज को कहकर- यहाँ से बढ़, यहाँ से बढ़

भरी ज्वानी में जिसको जानना हो मौत का बरहक*
उसी को सत्य जीवन का समझना हो सके आसाँ

जिसम पूरी तरह से जानने पर रूह खिलती है
'कमल खिलता है कीचड में' - कहावत का यही मतलब

ख़याल भरी आँखों से............. मै दुनिया देखूं
तो दुनिया दिखे ......................ख़यालों जैसी

अँधेरे से नहीं है.............. बैर रौशनी का कुई
दोनों मिलते हैं तो रौनक सी पसर जाती है

बरहक = सत्य, * सिद्धार्थ (भगवान बुद्ध) के बारे में
- अरुण
एक शेर
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एकही वक़्त.. कई सतह पे जीनेवाला
आदमी ख़ुद में खुदा और खुदाई भी है
- अरुण

ग़ौर करें
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किसी को याद  करना फिर उसीको भूल जाना
वजह येके.......नयीही सोचका दिल में उभरना
कोई भी सोच..........अपनेआप में पूरी नही है
यही वो सत्य जिसको दिल की गहराई से छूना
- अरुण

Monday, October 26, 2015

26 अक्तूबर

वे भी भरोसेमंद नही...
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वे लोग जिनकी राष्ट्रनिष्ठा पर शक हो उन्हे
भरोसे लायक न समझना वैसे तो ठीक ही है ।

पर क्या वे लोग या संगठन
जो देश के संविधान की मूलभूत आत्मा को ही सिरे से नकारते हैं ..
और फिर भी अपनी इस सोच और इरादे को
आदर्शवादी शब्दों एवं धारणाओं में छुपाकर रखते हैं....
भरोसेमंद हो सकते हैं?
अरुण

एक शेर
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अल्फ़ाज़ हैं इशारें महज़.. ..हकीकत नही
पर उसे ही मान लेते सच.....ऐसे कम नही
अरुण

यह जीवन केवल एक संचार है
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जीवन सिर्फ है एक संचार...न कोई आकार न प्रकार
न कोई नाम न उच्चार
न किसी काल-पट्टी के खांचो से कट सके ....
न भूत, भविष्य और वर्तमान में बट सके
न बिंदु है सो न है रेखा..
दिखे... जैसा जिसने देखा
जब देखो तभी है ....न कल था न अभी है ....और इसीलिए
इसे नया या पुराना कहना भी ठीक नहीं
न पुराना था कभी सो ............नया कहना भी सटीक नहीं
अज्ञानवश निरंतरता का आभास जगाने वाला
स्थाई या कि अस्थाई....
इन जैसे सवालों को उठानेवाला...
यह जीवन केवल एक संचार है
-अरुण    
एक शेर
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अपने रिश्तों के धरातल का नाम है दुनिया
दुनिया वो नही जो .......दूर कहीं रखी हो
अरुण

एक शेर
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मसलों से हैं निपटते.....कुछ इसतरह सभी
पेड़ों की ना ख़बर लें,  पत्तों का बस ख़याल
- अरुण

एक शेर
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अपना ही रूप दुनिया.. दुनिया में.. फिरभी हम
अपने को दूर रखकर.......दुनिया की सोचते हैं
- अरुण

एक शेर
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भीतर में इक ख़याली.... है पेड़ उग गया
छाया में जिसकी ढलते....मेरे तमाम रिश्ते
अरुण

एक शेर
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'नींद से बाहर निकल आना' नही है जागना, क्योंके
जागने पर... .....जागनेवाला न बचता.....अलहिदा
अरुण
एक शेर
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नही कथन.. न कोई कहने-सुननेवाला है
कई तरह की... सर में हो रही हैं आवाज़ें
अरुण
एक शेर
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एक ही आदमी जीता है हर ज़माने में
कई तरह के रूप रंग और क़िस्से लिए
अरुण
एक शेर
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जबसे स्वीकारी मुल्क जात की पहचान
ज़मीन एक मगर आदमी के टुकड़े हुए
अरुण
एक शेर
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हरपल निराला है...निराली जिंदगी है
जाने वही के जिसका न हो कोई नाम
- अरुण

Wednesday, October 21, 2015

21 0ctober

एक शेर
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हालात-ओ-तजुरबात के चेहरे.... अलग अलग
आदमी तो एक ही है जो लगता....  जुदा जुदा
अरुण


फूल और प्रेम
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भले ही फूल किसी खास टहनी से
जुड़ा लगता हो,
उसकी सुगंध
परिसर के कण कण में घुल जाती है..
मगर आदमी का प्रेम
अपनों तक ही
सिमटकर रह जाता है
-अरुण

मुक्ति
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पिंजड़े का पंछी
खुले आकाश में आते
मुक्ति महसूस करे
यह तो ठीक ही है
परन्तु अगर
पिंजड़े का दरवाजा
खुला होते हुए भी
वह पिंजड़े में ही बना रहे और
आजादी के लिए प्रार्थना करता रहे तो
मतलब साफ है....
आजादी के द्वार के प्रति वह
सजग नही है
वह कैद है
अपनी ही सोच में
अरुण


मृत्यु
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मृत्यु को लेकर
बहुत अधिक गूढगुंजन करना
व्यर्थ है।मृत्यु भी एक प्रकार की
गाढ़ी नींद ही है।

गाढ़ी नींद हो या पूरी बेहोशी ...
अगर प्राणी प्राणडोर से बँधा हो तो
उसके जागने की संभावना बनी रहती है।
प्राण निकल गये हों तो अन्य उसे
मृत हुआ जान लेते हैं।

मतलब यह कि...
गाढ़ी नींद या पूरी बेहोशी...दोनोंही,
पुन: जागने की संभावना से युक्त,
मृत्यु की ही अवस्थाएँ हैं।
अरुण

अस्तित्व की अस्तित्वता
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अस्तित्व की क्षमताएं एवं
अंतर-व्यवस्था हर हाल में ,
एक जैसी ही रहती है,
चाहे मनुष्य अस्तित्व को
मायावी ढंग से उपयोग में लाए या
स्वयं अमायावी अवस्था में रहकर
उसमें रम जाए।
फूल चाहे जंगल में डोले
या छत के गमले में
उसकी महक एक जैसी ही
फूलती-बहरती है।
अरुण

एक शेर
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बला का वक़्त है ये... बक रहे सब जो जुबां चाहे
सभी खिलवाड़ करते दिख रहे हैं.... राष्ट्र गरिमासे
अरुण

एक शेर
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ध्यान चूका.. ढल गई इक नींद..मैं वह नींद हूँ
जागने के देखता हूँ खाब............सारी उम्रभर
- अरुण

14 0ctober

सच्ची बात
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गर नदी होती नहीं... फिर तट न होते
दृश्य - दर्शक,...दृष्टि के ही दो किनारे
अरुण
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'अंतिम यात्रा'
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क्यों न शुरू की मेरी 'अंतिम यात्रा' की तैयारी... उसी दिन
जिस दिन......... मैं इस धरती पर आया
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उसी दिन से तो शुरू कर दिया आपने गला घोटना मेरी कुदरती आजादी का..
उसी दिन तो शुरू किया आपने.....मेरे निरंग श्वांसों में.....
अपनी जूठी साँस भरकर...उसमें अपना जहर उतारना......
उसी दिन से तो सही माने में मेरी क़ैद शुरू हुई,
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आपके विचारों, विश्वासों और आस्थाओं ने मेरी सोच को रंगते हुए .......
मुझे बड़ा किया...मुझे पाला पोसा बढ़ाया....आप जैसे 'अच्छे-भलों' के बीच में लाया....
आपने जिसे अच्छा समझा वैसा ही जीना सिखाया.....पर कभी न समझा कि......
आप फूल को ......उसकी अपनी ज़िंदगी नही,  समाज को जो भाए , ऐसी मौत दे रहे हो,
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अब तो मै बस ....सामाजिक प्रतिष्ठा और उपयोग का सामान बनकर रह गया हूँ ...
अब पहुँचने जा रहा हूँ अंतिम छोर पर.......
उस राह के...जिसका आरम्भ ही न हो पाया कभी ....
अरुण
साँस
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जीने जिलाने की ही दुनिया हो तो
बस,  हलकी सी  साँस बहुत है

दुनिया मिलने मिलाने की हो तो फिर
हर साँस के साथ..
पास और दूर वाले रिश्तों की निर्भरता जुड जाती है.....

पाने-खोने, कमाने-गँवाने वाली दुनिया में
जी रही साँसों से
हिसाबों की भारी भारी तख़्तियाँ
लटक कर साँसों को बोझिल बना देतीं हैं

ऐसे बोझिल साँस वालों को ही ' आलोम विलोम' वाले
आसानी से अपना ग्राहक बना लेते हैं
पर कुछ नही होता...

कोई नही बताता ऐंसों को कि
अपनी साँसों से बस
रिश्तों की निर्भरता हटाओ
हिसाबी तख़्तियाँ उतार लो...
साँस फिर से हलकी होकर बहने लगेगी...
एक मधुर..मृदुल.. पवन-झोंके की तरह
- अरुण

Monday, October 12, 2015

तारीख़ १२ अक्तूबर २०१५ तक

एक शेर
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कोई नही इरादा..... कोई नही डिज़ाइन
इंसा का मन ज़हन ही इस सोंच से परेशां
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सारी क़ुदरत किसी मक्सद से नही और न ही किसी योजना का हिस्सा है।
ये आदमी ही है केवल जो मक्सद की सोचता है।
अरुण

सच्ची बातें
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हर मंजिल........ कोशिश के चलते पायी जाती है
इक ऐसी भी, कोशिश के थमते... पास चली आती
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चेहरे देखकर ही दिल से दिल जुड़ते नही हैं
फकत पढ़ शब्द गीता के प्रभु मिलते नही हैं
अरुण
एक शेर
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है यादों के परे जो, बस उसका भान हो जाए
प्रभु को याद करने से ....प्रभु मिलते कहाँ हैं?
अरुण





प्रेमपत्र
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सभी लिख रहे हैं अपने भीतर
अपनी अपनी कहानियाँ,
अपनी अपनी सोच और मंसूबे.......
जिसपर लिखा जा रहा है
वह काग़ज़, पत्र या प्रेमपत्र तो
सब का एक ही है
अरुण
यह 'प्यास' तो निजी ही है
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यह भीड़ उन लोगों की ही
जो अपनी निजी 'प्यास' का समाधान ढूंढ़ नही पाए पर
यह जान कर कि इर्दगिर्द भी लोगों में ऐसी ही 'प्यास' है,
वे इकठ्ठा हुए,'प्यास' का उपाय ढूँढने में जुट गए,
कई सार्वजानिक तरकीबें इजाद की,
मंदिर मस्जिद बने, पोथियाँ लिखी- पढ़ी गईं , पूजा पाठ,नमाज़
प्रवचन,भजन पूजन ऐसा ही सबकुछ......
और अब भी यही सब.....
मानो 'प्यास' बुझाने के तरीकें मिल गएँ हों
पर सच तो यह है कि
निजी 'प्यास' अभी भी बनी ही हुई है
और फिर भी संगठित धर्मों को ही प्यास बुझाने का उपाय
माना जा रहा है,
इसी सार्वजनिक भूल की वजह
'निजी समाधान' खोजने की दिशा में
आदमी आमतौर पर  प्रवृत्त नही हो पा रहा
अरुण

विचारणीय
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प्यासे सभी इकट्ठा होते रहे
पानी पे ख़ूब चर्चा करते रहे
अनुभूत हो न पाया इक बूँद भी
अनुभूतियों के क़िस्से पढ़ते रहे
अरुण
एक शेर
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जानना हो...अंश केवल जान पाओगे
जागने पर ...कुछ न बचता जानने को
अरुण
विचारणीय
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परछाइयाँ अपनी बनाती जा रही परछाइयाँ
मन में झाँका तो नज़ारा इसतरह का ही दिखा
अरुण




स्वप्न और भूत
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सजेधजे भूतों को
कहते हैं – स्वप्न
और
मिलेमिटे स्वप्नों को
कहते हैं – भूत
-अरुण

ज्ञान नहीं सिर्फ परिचय
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अपना लिबास देखकर अपने को जानना
यह जानना नहीं है, सिरफ ऊपरी झलक
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मुझे मेरे स्वयं का ज्ञान नहीं है, सिर्फ परिचय है
इस परिचयभर से मेरा काम चल जाता है।
इस परिचय से परे जाना हो तो
परिचय के अंतर्गत निहित सभी भूलों (अज्ञान)
को सही सही जान लेना होगा और यह बात
तभी संभव है जब जो सामने दिखे उसे देखने का
साहस जुटा लिया गया हो
-अरुण        
एक शेर
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सामने आया... नहीं देखा लगाकर ध्यान पूरा
ध्यान धारा टूटकर भागे विगत के अनुभवों पर
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जो सामने आए उसपर ध्यान पूरी तरह नहीं ठहर पाता।
मन उसे पिछले अनुभवों की ओर खींचकर ले जाता है।
- अरुण
आज के लिए ये तीन शेर
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आदम से न देखी शक्ल आदमी ने अपनी
अपने अक्स से काम चला लेता है

चर्चा-ए- रौशनी किसी काम का नही
दरवाजा खुला हो यही काफी है

बंद आँखों में अँधेरा, खुलते ही सबेरा
न फासला है और न है चल के जाना
अरुण

अहंता
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मन की धारा पर चढ़ा कुछ इस तरह
अहंता का भ्रांत भाव
बहता पानी... और नदी का नाम मिलते
रूप ले लेता बहाव
अरुण

एक शेर
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आदतें अच्छी बुरी हों.....मुक्त होना है ज़रूरी
गहनता ही देख पाती... मन पे दोनों ही सवार
अरुण

मन तो है प्रतिबिम्ब
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मन तो है
जीवन का प्रतिबिम्ब,
अहंकार है इसी प्रतिबिम्ब का एक
चलायमान केंद्र,
यही केंद्र मन को चलाता रहता है,
मन की इस गतिशीलता को ही
मनुष्य
असली जीवन समझते हुए जीने की
भूल करता है।
जो मन के परे जागा
वही जीवन से परिचित हो सका।
अरुण
एक शेर
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आग है.. उसका धुआँ भी और....पूरा आसमां
आदमी के रूप तीनों ... देह, मन, मानव जगत
अरुण
सच्ची बात
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एक छोटी चुभन से ही .....ज़िन्दगी बनती बवाल
एक क़तरा तजुरबा ही ...समय ले बनता ख़याल
ज़िन्दगी हर साँस में जो ......जिसने पूरी देख ली
मौत के उपरांत क्या?  उसको न खाये यह सवाल
अरुण


एक शेर
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पढके धार्मिक ग्रंथ.......इतना ही समझ पाया
ज़िन्दगी ही ख़ुद को पढ़ ले, पढ़नेवाले के बग़ैर
अरुण


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सच्ची बात
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गर नदी होती नहीं... फिर तट न होते
दृश्य - दर्शक,...दृष्टि के ही दो किनारे
- अरुण