Tuesday, October 30, 2012

पशु और मनुष्य



पशु जो भी करता है
ठीक ही होता है,
परन्तु मनुष्य
अपनी पशुता को
‘ठीक होने का’ दर्जा देने के लिए
तर्क या बुद्धि या विवेक का
सहारा जुटा लेता है
और इसीलिए शायद
मनुष्य को विवेकी पशु कहते हैं
-अरुण    

Saturday, October 27, 2012

द्वैत और संघर्ष


सिर्फ कहने के लिए नहीं बल्कि
तन मन और ह्रदय की
गहराई से
जिसे यह बात छू जाए कि-
‘ईश्वर कण कण में समाया हुआ है’-
उसके जीवन से द्वैत-भाव
और उसका परिणाम यानि
संघर्षमयता पूरी तरह लुप्त हो जाएगी,
यही स्वाभाविक है
-अरुण  

Monday, October 22, 2012

हमें होश तो है पर होश का होश नहीं



‘मैं हूँ’ –
इस बोध को हम
चेतना या चैतन्य कहते हैं,
इसी बोध या जानकारी को केंद्र में रखकर
सारी जानकारियाँ बनती और संचालित
होती रहती हैं
यह ‘निरंतर संचालन’ ही जीवन जान पड़ता है
जो जीवन ‘मै हूँ’ के बोध की
निर्मिती और गति को आकार  देता है
उस जीवन का होश ही नहीं है
इसतरह हमें होश तो है पर
होश का होश नहीं
-अरुण    

Sunday, October 21, 2012

जीवन के तीन उपकरण



सारा जीवन हम
तीन उपकरणों के
बल पर व्यतीत करते हैं
उर्जा उपकरण , संवेदना उपकरण और बुद्धि उपकरण
होता यूँ है कि हमारा सारा ध्यान-प्रकाश
बुद्धि उपकरण ने जगाये प्रकाश द्वारा
आच्छादित हो जाता है
फलतः हम उर्जा, और संवेदना का उपयोग कर
अपना बुद्धि-प्रकाश संचालित करने में
ही जुट जाते हैं
ध्यान प्रकाश दबा दबा सा रह जाता है
-अरुण  

Friday, October 12, 2012

संवेदना भी वेदना ही



संवेदना भी शरीर के लिए
वेदना जैसी ही है. संवेदना का विषय
उस वेदना को मीठी या खट्टी बनाता है.
ज्ञान की प्रक्रिया में भी,
अंतर-इन्द्रियों के प्रयोग के कारण
अंतर-वेदना अनुभूत होती है
इसीलिए विचार-गति के चलते
मन दुखी या प्रसन्न होता रहता है
हाँ जिस विचार में शुद्ध निरपेक्षता हो
(यानि जिसमें अहंकार का विनियोजन न हो)
वही विचार शुद्ध समझ या बोध जगा पाता है
-अरुण