Friday, June 30, 2017

जून २०१७ की रचनाएँ

मुक्तक
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मँझधार में बहता जो... जीता है वही
जो किनारे ढूँढता .. भयभीत है
तृप्ति पाकर ठहर जाने की ललक
कायरी मुर्दादिली की... रीत है
-अरुण

मुक्तक
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जबतक उबाल न आया...पानी भाप न बन पाया
बर्फ़ीला, शीतलतम कुनकुनापन..........सब बेकार
आदमी कितना भी झुके या..........उठ जाए ऊपर
भगवत्ता न जाग पाए अगर... उसका होना बेकार
-अरुण
न भला न बुरा
************
न कुछ बुरा है और
न ही है कुछ भला
क्योंकि एक ही वक्त एक ही साँस
एक ही सर में
एक ही रूपरंग लिए
सबकुछ ढला.... साथ साथ
परंतु बाहर...
सामाजिकता की चौखटपर खडे पहरेदारों ने
उसे अपने मापदंडों से बाँट दिया

कुछ को ‘भला’ कहकर पुकारा
तो कुछ पर ‘बुरे’ का लेबल चिपका दिया
-अरुण
कर्ता-धर्ता
********
घर की छत से होकर बह रही तेज हवा...
सामने मैदान में खड़े पेड़ों को हिलाडुला रही है
घर को लगे कि पेडों का हिलनाडुलना
है उसीका कर्तब

देह की छत... यानि सर..
जहाँसे होकर गुज़र रहा है विचारों का तूफ़ान
और जिसके बलपर हो रहे सारे काम....
देह को लगे कि वही है इन कामों का
कर्ता-धर्ता
-अरुण
तीनों अलग अलग
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तमन्ना.....बेइख्तियार हुई जाती है
मगर बदनाम हुआ जाता है दिल..बेजा

जबभी की....कौम की तारीफ तो बढ़ी इस्मत
ख़ुद की जरासी क्या कर दी....मिली रुसवाई

है यह इल्म कि नापाक इरादे हैं....फिरभी
जी लेता हूँ मै यहाँ.......दुनिया के बदस्तूर

-अरुण

निर्भय छलाँग
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भीतर गये बग़ैर......... नही जो दिखता
बाहर की चौकसी न........ काम आती है
डरे डरे का तैरना भी... तो ऊपर ऊपर
सिर्फ निर्भय छलाँग सच को जान पाती है
-अरुण
मनु का भ्रमजाला
**************
भरम के हांथों ने...... है भरम जो फैलाया
भरम की आँखों को वो असल नजर आया
इसीतरह से बनी है..... मनु की दुनिया यह
खुदा की नगरी है और मनु का भ्रमजाला
-अरुण

मुक्तक
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पल पल जानते रहना....
यानि आँख-कान-गंध-स्वाद और स्पर्श की
संवेदनापर बहते रहना ही
जीवन के मुख्यप्रवाह को जानते रहना है

किसी निष्कर्ष, सिद्धांत या
संकल्पना की गाँठ से
संवेदनाओं को कसकर उन्हें समझना....
घाट पर बैठे बैठे नदी के प्रवाह में
तैरने की कोशिश करने जैसा है
-अरुण

मुक्तक
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एक पकड़ो तो........ दूसरा छूट जाता है
छूटा वही बेहतर था....... ख़्याल आता है
खुलते तो खुलते हज़ारों रास्ते साथ साथ
चुनने की परेशानी में ही चलना रुक जाता है
-अरुण

मुक्तक
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प्रभु है और वहींपर है............. प्रभु का प्यारा भी
सिर्फ आसमां खड़ा है बीच......काले घने बादल हैं
ह्रदय की आँखों को बादलों की अड़चन कहाँ ?
तर्कवाले ही खोजते रहें क्योंकि... आँखों से घायल हैं
-अरुण
मुक्तक
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ह्रदय-तल से हार जिसने मान ली
उसमें ‘उसको’ जीत सकने की वजह
अपनी ताक़त का जरासा भी भरोसा
'उससे’ कोसो दूर रहने की वजह
-अरुण

बिगड़ी हुई दृष्टि
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देखने का यंत्र यदि
गलत ढंग से पकडा जाए
सही आँखों को भी जो दिखेगा
गलत दिखेगा

समाज के लिए जो तरीक़ा ठीक हो
समाज उसी तरीके से बालक के मस्तिष्क में
देखने की आदत बो देता है
और तब से ही आदमी की
आँखों को जो भी दिख रहा है
गलत ही दिखता रहा है

जीवनपर मुक्त एवं स्पष्ट चिंतन ही
इस बिगड़ी हुई दृष्टि को पुन: ठीक करने की
संभावना रखता है
ऐसा चिंतन अनायास ही फलता है
किसी अभ्यास या प्रयास से नही
-अरुण
मूलभाव
**********
“तुम उस कुम्हार के बर्तन हो
मै इस कुम्हार की रचना
तुम उसके चाक पे ढल आये
मै इसके चाक की घटना
तुम भी मिट्टी मै भी मिट्टी
एकही भूमि अपनी”

ऐसे मूलभाववाले बर्तन
पता नही कैसे?.. बादमें
अपना पात्रता-धर्म छोड़कर
शत्रुता-धर्म अपनाते हैं और
आपस में टकराकर टूट जाते हैं
-अरुण

मुक्तक
******
परम से टूटना ही असल में........ रोग है
उससे छूटने का दु:ख ही तो.......वियोग है
इसी रोग ओ दु:ख को धूमिल करता विषयानंद
परमानंद तो तभी जब...... परम से योग है
-अरुण

मुक्तक
*******
जगत के अस्तित्व में
अपने भिन्नत्व का
हो जिसे आभास
उसे न होता क्षण को भी
सकल जगत एहसास

सकल जगत एहसास ही
साँस सबन की होवे
उसी साँस की धरतीपर
हरकुई निज-स्वर बोवे

जिसके उतरा ध्यान में
यह सत उसका का सार
दुनिया के जंजाल में
वह भव-सागर पार
-अरुण

शायद किसी ने कहा है
*******************
जिधर हो बहाव तेरा
वहीं से बहना
जीवन को अपने स्वभाव से
बहने देना
परम-समाधान के सागर में
पहुँचना है तो
पूरब को चलूँ या पश्चिम को
इस सवाल में मत पड़ना
- अरुण

पाप-निष्पाप
*************
जिसके हाँथों पाप घटना संभव नही
वह साधु है
जिसकी समझ और होश उसे पाप करने नही देती
वह सत्चरित्र है
जो पाप करने से डरे
वह पापभीरु क़िस्म का पापी है
जिसके हाँथों अनजाने में पाप घटता हो  
वह निष्पाप है
अपने को सत्चरित्र कहलाने के लिए जो चुनिंदा आचरण करे
वह ढोंगी है
और जो जानबूझकर पाप कर रहा हो
वह है पाप का सौदागर
-अरुण
कल किसी को कहते सुना कि
*********************
हवा का गुबारा है
हममें से हर कोई

गुबारे की ऊपरी परत को
समझ लेते
हम अपनी अलग पहचान

परत को तोडे बिना ही
जागकर...जान सकता है
हम में से हर कोई कि
यह सब खेल है हवा का

हवा जो केवल हवा है
न तेरी है न मेरी और न ही सबकी
-अरुण

योगिता Vs उपयोगिता
*********************
खोजते ही रहना और
हर वक्त
नये नये सवालों के हाँथ पकड
उनकी गहराई में
खोज को उतारते रहना ही
फ़ितरत है आदमी के
सहज स्वाभाविक प्रज्ञा की

छोटे बालकों द्वारा पूछेजानेवाले
प्रश्नों के माध्यम से
ऐसी जीवंत प्रज्ञा प्रगट होती रहती है

जैसे ही ‘उपयोगिता’ का पहलू
जीवंत प्रज्ञा को छू जाता है
प्रज्ञा गूढ प्रश्नों का सामना करना छोड
मूढ़ सवालों में ही उलझ जाती है

इन मूढ सवालों के हल भले ही
आदमी के जीवन में उपयोगी रहे हों
आदमी अपनी ‘योगिता’ को
(सृष्टि से जुड़ाव)
भूलकर ‘उपयोगिता’ के ही रास्तेपर चल पड़ा है
अब आदमी खुश तो हो जाता है
परंतु समाधानी नही
-अरुण
सूर्यवत प्रकाश ही प्रकाश
******************
आनंद ही आनंद है सिर्फ
कौन है आनंदित  यह पूछना सही नही
क्योंकि आनंद का कोई उपभोक्ता नही

आनंद केवल अवतरण है
उस सत स्थिती का
जहाँ कोई भी किसी को देखता नही
और न ही कुछभी किसीके द्वारा
देखा या किया जा रहा हो.....

जो भी है बस होता हुआ है
आनंद वहाँ नही जहाँ कुछ हो गया
बन गया.. दिख गया हो
जीवंत वर्तमान ही है आनंद
सत-चित-आनंद
जहाँ न कोई काया है न माया
न धूप है न छाया
है केवल सूर्यवत प्रकाश ही प्रकाश
-अरुण
चित्तावस्थाएँ
***********
गहरी नींद होती..
होता तभी विशुद्ध मस्तिष्क
न चलता स्व का खेल.. न होता चित्त अस्वस्थ
न सपने बोलते हैं और न ही उभरते हैं विचार
शरीर विश्रांत होनेसे... हो न पाए मन-संचार

गहरी नींद टूटे.......
चित्त चलता जागरण की ओर
स्व फिर जागता है स्वप्न, चिंतन का मचे है शोर
तन तो जागता पर ...
मनस्वरूपी नींद घुस आती
तन में जागृति निखरे.. जो मन में है धुमिल होती

धुमिलता चित्त की ही आदमी को अधजगा रखे
हमेशा........जागरण की पूर्णता को अधसधा रखे
समाधी की अवस्था... जागरण की पूर्णता का रूप
जहाँपर नींद भी गहरी.. घनी हो जागरण की धूप
-अरुण
ईश्वर क्यों चाहिए ?
***************
बिना साफ साफ देखेसमझे
सच को सच कहना... गलत होगा
झूठ को झूठ मान लेना भी गलत होगा

कहने के लिए तो आदमी हमेशा
अच्छी बातें ही कहता रहता है....
क्योंकि यही सिखाया जाता है

ईश्वर या सत्य के बाबत
वह कहता है....
ईश्वर सर्वत्र है... क्षण क्षण में है, कण कण में है
फिर, उसे वह अपने दुश्मनों में क्यों नही देखता?
परधर्म को माननेवालों में क्यों नही देखता?
क्यों नही परदेसीयों में उसे वह दिखाई देता?

जहाँपर उसे.. ईश्वर है ऐसा लगे..
उसी के सामने वह हाँथ जोड़ता है
क्योंकि
उसे तो ईश्वर चाहिए सिर्फ हाँथ जोड़ने के लिए
जरूरत पड़े तो अपने माने हुए ईश्वर के नाम पर
बखेड़ा खड़ा करने के लिए
संकट के समय
पुकारने के लिए.. बस
-अरुण
मन
*****
मानना....
कुछ भी मानना
या मान लेने की क्रिया..जहाँ से होती है...
मन... उसी को कहते होंगे शायद

मानी हुई बातों का
जोड-घट, उनकी उथल-पुथल, उनमें वाद-संवाद
उनका काल्पनीकरण.. निष्कर्षन जो करता है..
उसीको मन कहा जाता होगा शायद

इस मन से जो भी बातें
वास्तव बनकर हमारे बीच आकर बसती हैं
और हमारे जीवन कलापों का आधार बनती हैं
उन्हे ही ‘मानसिक’ कहा जाता होगा शायद
-अरुण

मौत किसी को नहीं जानना चाहती है
******************************
ये तो याद नहीं कि
मेरे जन्म के समय मुझे मिलनेवाली जिंदगी ने
मेरा नाम पता ठिकाना मकसद और मंजिल के बारे में
मुझसे पूछा था या नहीं?
परंतु यह तो मै साफ साफ देख पा रहा हूँ कि
सामने खड़ी मौत को
इस बात में कोई रूचि नहीं है
कि  मै कौन हूँ, किस जातपात,
देश सूबा से ताल्लुक रखता हूँ,
जिंदगी में मैंने क्या कमाया या खोया हैं...
उसे तो इस बात से भी कोई सरोकार नहीं कि
मै आदमी हूँ, या कोई और प्राणी या किसी जंगल में पला पेड़ पौधा
-अरुण

आकार-बोझ से रिक्त.. सदा ही मुक्त
******************************
पिंजड़े में तोता फड़फड़ाता है मुक्ति
के लिए....पिंजड़े को कुछ भी
पता नही होता


हाँ, अगर पिंजडे को होश आ जाए और...
वह तोते की बंधन-पीडा देख ले
तो शायद...
कोई सुध ले वह तोते के दर्द की
और यह सोचने के लिए विविश हो जाए कि

अगर पूरा का पूरा आकाश गुजर जाता है उससे होकर
फिर आकाश में उड़ सकनेवाला यह तोता क्यों नही?

उसका यह मूलभूत सवाल
सबके लिए ही प्रकाश बन सकता है
इस सबक़ के साथ कि

बंधन तो आकार को होता है
आकाश को नही
जिनका चित्त किसीभी आकार-बोझ से रिक्त हो
वे सदा ही मुक्त हैं
-अरुण




आकार-बोझ से रिक्त.. सदा ही मुक्त
******************************
पिंजड़े में तोता फड़फड़ाता है मुक्ति
के लिए....पिंजड़े को कुछ भी
पता नही होता

हाँ, अगर पिंजडे को होश आ जाए और...
वह तोते की बंधन-पीडा देख ले
तो शायद...
कोई सुध ले वह तोते के दर्द की
और यह सोचने के लिए विविश हो जाए कि

अगर पूरा का पूरा आकाश गुजर जाता है उससे होकर
फिर आकाश में उड़ सकनेवाला यह तोता क्यों नही?

उसका यह मूलभूत सवाल
सबके लिए ही प्रकाश बन सकता है
इस सबक़ के साथ कि

बंधन तो आकार को होता है
आकाश को नही
जिनका चित्त किसीभी आकार-बोझ से रिक्त हो
वे सदा ही मुक्त हैं
-अरुण

मुक्तक
*******
सपने ही जिन्हें सच्चे लगते हैं
उनसे कहते रहना कि
“आप सपने देख रहे हो.. सच्चाई नही”
किसी काम का नही

उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए.. उनके साथ रहते हुए
जो उपाय उन्हे नींद से पूरी तरह जगा देंगे
वही उपाय काम आएँगे

पूरी तरह जागकर ही कोई जान सकता है कि
वह सपने देख रहा था.... सच्चाई नही
-अरुण















































 




















 








Saturday, June 17, 2017

मई २०१७ की रचनाएँ

मई २०१७ की रचनाएँ
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रुबाई
*****
यह जीवन सूरज की उर्जा है...गलत नही
यह जीवन धरती का है सार.. गलत नही
चलती
साँस, बहती हवा और सारा आकाश
यही तो है जीवन, यही है संसार….गलत नही
-अरुण
जिंदगी ही जीती है उसमें .....
*************************
बंदा किये जाता है.. अपने को ‘करनेवाला’ समझ
दरअसल खुद ही किया जाता है वह.....न पता उसको
लगे उसे कि वह जीता जिंदगी को अपने ढंग से
दरअसल, जिंदगी ही जीती है उसमें... न पता उसको
-अरुण
सामान ज़रूरी
——————
जीने के लिए होता है............. सामान ज़रूरी
सामान की हिफाजत का......... सामान ज़रूरी
बदले है जरूरत.............यूँ अपना सिलसिला
जीने से अब ज़्यादा............. सामान ज़रूरी
-अरुण
मान्यताएँ
—————
जहाँ से शुरू करो वह शुरुवात नही होती
जहांपर ख़त्म करो वह अंत नही होता
आरंभ और अंत तो केवल हैं मान्यताएँ
जो मान लिया जाए वह सच नही होता
-अरुण
शब्दों में स्थिरा दिया गया
*********************
कालप्रवाह को ‘समय’ नामक खाँचे में जमा दिया गया
बहते जलकणों को... ‘नदी’ नामक वस्तु बना दिया गया
वैसे तो हर पदार्थ, वस्तु, स्थिति गतिमान ही है फिर भी,
शब्दों में उन्हे किसी न किसी........ स्थिरा दिया गया
-अरुण

रुबाई
*****
रात हि होवे दिन नही.. यह कैसे संभव है?
पश्चिम के बिन पूरब होवे.. कैसे संभव है?
पूरी पूरी सच्चाई ही............सच्चाई होवे
साँस अधुरी लेकर जीना..... कैसे संभव है?
-अरुण

रुबाई १
*******
हकीकत को नजरअंदाज करना ही नशा है
असल में होश खोता आदमी ही….दुर्दशा है
तरीके मानसिक सब,…होश खोने के यहांपर
कोई साधन मिले.....बेहोश होना ही नशा है
– अरुण
रुबाई २
*******
बैसाखी के बल पर ही लंगडा चलता है
किसीका कंधा पकड अंधा आगे बढ़ता है
होश को तो चलना ही न पड़े, क्योंकि वह
जागी निगाहोंसे ही अंतर तय करता है
– अरुण
रुबाई
*******
ये बस्ती, ये जमघट,..हैं सुनसान मेले
सभी रह रहे साथ.......फिर भी अकेले
जुड़े दिख रहे…..........बाहरी आवरण ही
सभी के......ह्रदय-धाग …. ……टूटे उधेडे
– अरुण

रुबाई
*******
ज़र्रा ज़र्रा है जुदा ना मलकियत उनकी अलग
फिर करोड़ों में मेरी यह शख़्सियत कैसे अलग?
यह उतारा दिल में जिसने सच्चा बुनियादी सवाल
देखता ख़ुद में खुदाई....... ना खुदा जिससे अलग
– अरुण
रुबाई
*****
पेड पर जड़े हुए फल कभीभी खरे नही होते
जड़ से जुड़े फल कभीभी दिखावे के नही होते
जान से नही.... परंतु मन से केवल जानते जो
होते जानकारी के धनी वे...जीवन-धनी नही होते
-अरुण

यादें
******
आतीं तो हैं पर ठहरती नही यादें
न जगह बनाती.....
न जगह घेरती हैं यादें
फिर भी लगता है कि
मन में एक बड़ा फैलाव है यादों का
जन्म से अबतक जीवित है
एक पड़ाव है यादों का

याद से नयी याद झलकते ही
पुरानी खो जाती है ख़ुद में ही.....बिना देखे अपना विसर्जन
और समझती है कि जैसे किसी अखंड प्रवाह का
हो रहा हो सर्जन..... भीतर ही भीतर

इस प्रवाह भ्रम में ही
प्रतिबिंबित होता है
विचारों और प्रतिमाओं का संचरण उस नदी जैसा
जो अपने से ही निकलती, अपने में ही बहती और
समा जाती अपने में ही...... बिना छोड़े कोई भी सबूत अपना

यादें.... होते हुए भी नही होतीं
पर भर देती है आदमी में जीव
ख़ुद रहते हुए निर्जीव
-अरुण










हो रहा अपने आप से
**********************
अहंकार को कर्म का सुख है
तो प्रारब्ध की चिंता भी
पुराने कृत्यों का
हिसाब चुकाना पड़ेगा
यह भय भी

जिसमें न रहा अहंकार
न बचा कोई कर्ताभाव...
उसे न रहा कोई लगाव
न ही पुण्य से
और न ही पाप से

क्योंकि वह सदैव विश्रांत है
इस धुन में
कि जो भी हो रहा यहाँ..
हो रहा अपने आप से
-अरुण


नीति बनाम धर्म
**************
कृत्य अच्छा था या बुरा...
नीति का है यह विषय
कृत्य के पीछे छुपा भाव... शुद्ध ही हो...
यही है धर्म का आशय
-अरुण
क्षण की गली
***********
क्षण की गली है बहुत ही संकरी
या तो तुम ठहरो यहाँ
या उसे ही रहने दो
ठहरने दो यहां बोध को
या बुद्धि को ही चलने दो

दोनों को समां ले ऐसी इसमें जगह नही
वर्तमान ही ठहर पाए यहाँ...है यह उसीका घर
न है यहाँ कोई बीता.. न आता प्रहर
और न ही कोई दोपहर
-अरुण

सुख में सुमिरन...
**************
दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय- कबीरदासजी
--------------
जो सुख में सुमिरन करे..... वो तो बुधसम होय.....
क्योंकि ऐसे बुद्धसम सत्य-जिज्ञासियों का चित्त तो
सुख और दुख... दोनों के ही परे होता होगा।
-अरुण




समझने के दो तरीके
******************
किसी भी बात को समझने के दो तरीके हैं
एक है.. उस बात के बारे में जानना और
दूसरा है... उस बात को जीना
जानना.... काम है मन, बुद्धि और स्मृति का
और जीना..... काम है ह्रदय की अवधानता का
जानना.... जानते हुए भी न जानने के बराबर है
और जीना.... न जानते हुए भी पूरीतरह जान लेने के बराबर

आध्यात्म .... जानने की वस्तु नही
जीने का वास्तव है
-अरुण  
एक शेर
*******
तफ़सील पे तफ़सील की प्यासे को क्या गरज
प्यासे को कत्रा दरिया का.. दरिया सा लग रहा
-अरुण
कहाँ है हमारा आज?
*****************
हमारा बीता कल ही
आज का चेहरा पहनके जीता है
और आनेवाले कल पर
अपनी आँखें टिकाये रहता है
-अरुण
दोनों ही हैं अनजान
******************
बंदा खुद से ही बड़बड़ाता है
अपनी ही कही बात को सुनता है
बाहर से आतेजाते एहसासों से
अपने भीतर
नये नये ख्यालात ओ जज़्बात
बुनता है

इसतरह बंदा जो भी करे ...
‘वह’ अनजान है
और ‘वह’ जो भी करे उससे
बंदा अनजान है
इस माने में... दोनों ही हैं अनजान
-अरुण



रंगीनीयत और पानीपन
*********************
संस्कारों से नहीं बदलता ख़ून ओ बदन का रंग
हाँ, बदलता है आदमी के जीने का ढंग केवल
******
पानी में जब घुल जाते हैं रंग कई..
रंगीनीयत को पानी नज़र नही आता..
पानीपन मगर बरक़रार रहे जल का..
पानीपन पर कोई भी रंग चढ नही पाता..
-अरुण

आत्मघात... आत्मसमर्पण
*********************
अतिनिराश हुआ अहंकार प्रवृत्त होता है
आत्मघात के लिए
अपनी उपद्रवक्षमता से जो अहंकार घनापरिचित हो जाए
वही सहज प्रवृत्त होता होगा
आत्मसमर्पण के लिए
-अरुण

















Monday, May 1, 2017

अप्रैल २०१७ की रचनाएँ


अप्रैल २०१७ की रचनाएँ
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‘पागलपन’ 
*********
हाँ, यह ऐसा पागलपन है
जो हमेशा सवार है सरपर,
पर, इस ‘पागलपन’ को 
उभारती रहती जो बत्तियाँ...  
वो तो जलबुझ रही हैं 
सर के भीतर

उन बत्तियों के जलतेबुझतेपन पर 
ध्यान आ टिके तो ‘पागलपन’ हटे...
ध्यान के अभाव में ही
यह पागलपन घटे

ऐसा यह ‘पागलपन’ 
इस दुनिया में 
जीने के लिए ज़रूरी है
और इस ‘पागलपन’ को ही,
सयानपन समझ लेना
आदमी की मजबूरी है
-अरुण
मुक्तक
******
आँखों में भरी हो पहले से जो सोच
वह सोचै देख रही दुनिया
सीधे उतरे जो आँखों में तस्वीर
वह तस्वीर न देखी जाए है 
-अरुण 
बच निकलने के लिए
*******************
आसमां में है चमकता सूरज 
है धूप ही धूप चहुँओर 

फिर भी 
आदमी को तो मिल ही जाती हैं परछाईंयां 
बच निकलने के लिए 

बोध के सागर में ही डूबी हुई है
सकल की अंतर-आत्मा  
फिर भी मिल गया है आदमी को
मनबुद्धि का सहारा.... बोध से 
बच निकलने के लिए
-अरुण
कोई नही है देखनेवाला
********************
बस, देखना ही देखना तो है यहाँ 
कोई नही है देखनेवाला
सोचना... मस्तिष्क का व्यापार केवल
कोई नही है सोचनेवाला

बस, क्रिया या प्रक्रिया ही जिंदगी है
कर्म कर्ता.. नासमझ की समझदारी
नासमझ की खोज हैं सारे विशेषण
नाम और आकार मन की देनदारी

येही दुनिया की हकीकत की हकीकत
फिर भी दुनिया मान्यता से चल रही है
फिर भी नासमझी के क़िस्से सबके हिस्से
मोह मायाही असल.. लगती खरी है
-अरुण
चेतना का सागर
*************
सागर की हर लहर
सागर से ही निकलती 
और खो जाती है सागर में ही
पर सागर में गिर जाने तक
वह अपने को सागर नही 
एक भिन्न अस्तित्व 
समझती है

बात सागर की नही, मन की हो रही है
चेतना के सागर में 
मन उठता और खो जाता हो भले ही 
पर जब उठता है
अपने को ही समझता है
सबकुछ 
-अरुण
ज्ञान बनाम अवधान
*****************
शब्दकोश में
शब्दों का अर्थ समझानेवाले शब्द 
उसी शब्दकोश के हिस्से होते हैं

मानव मस्तिष्क भी जो जान लिया गया है
उसको जोडतोड कर ही 
कुछ नया सोच पाता है

मनुष्य का समग्र अवधान ही 
सकल अस्तित्व को
अपने बोध से छू सकता है

मनुष्य का ज्ञान तो
बहुत बहुत बहुत सीमित और कामचलाऊ है
-अरुण
जी रहे हम जिंदगी जो
******************** 
हम वह जिंदगी जी रहे हैं
जिसमें हैं सवाल ही सवाल 
और जवाब ही जवाब

उस जिंदगी पर तो 
हम अभी जागे ही नही
जहाँ केवल हैं
जवाब ही जवाब
बिना किसी सवाल के
-अरुण

क्या गिनते और कौन गिनता?
***********************
अनुभवों को गिनने बैठ जाओ
तो समय के टुकड़े हाँथ लगते हैं
समय की गिनती करो 
तो अनुभव याद आते हैं

अनुभव न होते 
तो समय का क्या होता?
और अगर इनके टुकडे ही न होते
तो क्या गिनते और कौन गिनता?
-अरुण

सोच अजीब तो बोध अजब
**********************
राह पर चलना पकडना जो भी चाहा...
मानो..
राह भी गर साथ चलती
उस गति से जिस गति से
चाहनेवाला चले फिर?   
फिर कुछ न होता..
न चाहना, न चलना, न पकड़ना...
न राह और न ही राही कोई
-अरुण
अजीबसा एहसास
**************
चल के आता हूँ जिस राह से
उसीको रखकर सामने 
फिर से
चलता रहता हूँ..

लम्बे समय चलने के बाद ही
जान पाया कि
अपने ही रचे रास्तेपर 
ज़िन्दगीभर चलता रहा.....
नया कुछभी न देख पाया
-अरुण

आदमी हर पल सरल साधा
***********************
सरल और साधा हुआ हर आदमी हर हाल में
कठिनता ऐसी कि समझे वह स्वयं को कुछ विशेष
बैठा हुआ है धूप में और निकट हरदम सूर्य है
पर लगे उसको कि सूरज..... बंद दरवाज़ों में है
-अरुण
आग विभक्ति की
****************
बुझानी आग हो तो क्यों धुएँ से जाके कहते हो
कहो पानी से......पानी ही बुझाए आग की लपटें
उडे है मन धुआँ बन, जब लगे है आग अलगावी
बुझा सकता है जल भक्तिका ज्वाला-ए-विभक्ती को
-अरुण

मन से मुक्ति
*************
लहरों का शोर तब...
शोर ना लगे
कोलाहल ह्रदय को दे रहा
हल्कासा स्पर्श
मन का बवंडर पड़ गया हो शिथिल जब
ना दु:खदायी होवे कछु
ना देत हर्ष
-अरुण
कुछ मुक्तक
***********
हटे जब मोह बाहर का, खुले इक द्वार भीतर में  
पुकारे खोज को कहकर- यहाँ से बढ़, यहाँ से बढ़

भरी ज्वानी में जिसको जानना हो मौत का बरहक*
उसी को सत्य जीवन का समझना हो सके आसाँ 

जिसम पूरी तरह से जाननेपर रूह खिलती है
‘कंवल खिलता है कीचड में’ – कहावत का यही मतलब

ख़यालों भरी आँखों से मै दुनिया देखूं 
दुनिया दिखे ख़यालों जैसी 

अँधेरे से नहीं है बैर.......... रौशनी का कुई 
दोनों मिलते हैं तो रौनक सी पसर जाती है

बरहक = सत्य, * सिद्धार्थ (भगवान बुद्ध) के बारे में
-अरुण
मुक्तक
********
नजर में उतरी दुनिया
या के मैंने उसे उतारा
दिखना कहो या देखना
खेल तो एक ही है सारा
-अरुण

रोज़ाना की जिंदगी
***************
दो सांसो को चलाए रखने....
देह को पोसना पड़ता है 
अपनी अस्मिता बनाये रखने...
संबंधो को सँवारना पड़ता है 
देह को पोसना यानी..श्रम करने की जरूरत 
और संबंधो को सवारने के लिए..
जरूरत है
किसी न किसी व्यवस्था की 

श्रम यानि सारे अर्थ-कलाप 
व्यवस्था यानि सत्ता, संघर्ष, प्रतिरक्षा,
नीति-नियम, कायदे, रिवाज

आदमी की रोज़ाना जिंदगी
इन दो सांसो और अस्मिता के 
रखरखाव के सिवा 
और कुछ भी नही
-अरुण  


एक झूठ से ही निकले दूसरा झूठ
**************************
जगत में पिंजड़ा और पक्षी दोनों हैं 
अलग अलग 
परंतु मन-पटल पर पक्षी अपने चहुंओर 
पिजड़ा लेकर ही अवतरित होता है 
और फिर बाहर निकलने के लिए फडफडाता रहता है 

मन में विचार का पक्षी उड़े...बिना किसी आकाश के...
आदमी ऐसा सोच ही नही पाता
जहाँ विचार का संचार होगा
वहाँ आकाश का बंधन तो होगा ही
विचार होगा तो विचारक भी होगा ही
एक झूठ के पेट से ही निकलता है
उससे जुड़ा.... दूसरा झूठ
-अरुण
समस्या या उलझन
****************
समस्या या उलझन
जब अपने से सीधे सीधे बोलती है..हम उसे ठीक से देख लेते हैं
परन्तु जब उसे देखते वक्त हम अपने से ही
बोलने लगते हैं..... समस्या को पूरी तरह देख नही पाते 

समस्या को बिना किसी बडबडाहट या हडबडाहट के 
पूरी तरह देख लेना ही 
समस्या का हल है...
उसे अधूरे या अस्पष्ट देखना 
उसे न देखने जैसा ही है 
-अरुण  
आध्यात्म बोध है... शब्दों का शोध नही
**********************************
एक बाप के दो बेटे थे – 
शब्द्पंडित और बोधस्पर्शी

जिस कमरे में वे तीनों बैठे थे..
उसका दरवाजा बंद था और भीतर घुटन जैसी हो रही थी

बाप ने कहा – दरवाजा खोलो ! 

शब्द्पंडित ने ‘दरवाजा’ खोला..और भीतर ‘द्वार’, ‘पट’, ‘पर्दा’ और ऐसे ही 
कई समानार्थी शब्दों की शृंखला घुस आई पर घुटन तो होती ही रही

परंतु जब बोधस्पर्शी ने दरवाजा खोला तो कमरे में ठन्डी बयार बहने लगी..
घुटन थम गई 

आध्यात्म बोध है... शब्दों का शोध नही
-अरुण
बोधिवृक्ष
*******
“आँगन में यहाँ जो वृक्ष खड़ा है
कहना गलत नही कि 
वह इस सूबे.. पृथ्वी..
सारे ब्रह्म में खडा है”

यह तथ्य 
एक सत्यबोध बनकर
जिनके ह्रदय में उतरा होगा 
उनके लिए वह वृक्ष... केवल वृक्ष नही
एक बोधिवृक्ष बन गया होगा
-अरुण
मुक्तक
*******
डूबजाना समंदर में... है लहर की फ़ितरत 
'आगे क्या?'- यह सवाल भी साथ में डूबे  

मोक्ष मुक्ती की करो ना बात अभ्भी
बंध बंधन का...समझ लो...बस बहोत है

न ही उम्मीद कुई और न ही मै हारा हूँ
पल पल की जिंदगी ही.. अब जिंदगी है
-अरुण
मुक्तक
********
इस तट की लम्बाई ......उस तट से दिखती है
उस तट की.. इस तट से

चाहो गर, जीवन पूर इक पल में देख सको......
अगर देख सको उसको
अपने ख़ुद से हट के
-अरुण
मुक्तक
******
आकार देख पाया नही .........निराकार को
नाम दे सको न कभी तुम.........अनाम को
धुरी नही हो ऐसा कोई...... चक्र भी कहाँ 
इच्छा करे ना.. ऐसा कोई मन नही कहीं 
-अरुण

पंछी और पिंजड़ा
***************
पंछी चाहे 
पिंजड़े की पकड से छूटना,
यह बात सही सहज स्वाभाविक है, परंतु
जिस क्षण पंछी का अपने भीतर फड़फड़ाना
पिंजड़े के लिए कष्टदायी बने, आदमी 
उसी क्षण की तलाश में बेचैन है 
क्योंकि 
आदमी अपने को 
कभी पंछी समझता है तो 
कभी पिंजड़ा..
यह देख ही नही पाता कि
वह स्वयं पंछी भी है
और पिंजड़ा भी....
-अरुण

 













Wednesday, April 12, 2017

पंछी और पिंजड़ा

पंछी चाहे
पिंजड़े की पकड से छूटना,
यह बात सही सहज स्वाभाविक है, परंतु
जिस क्षण पंछी का अपने भीतर फड़फड़ाना
पिंजड़े के लिए कष्टदायी बने, आदमी
उसी क्षण की तलाश में बेचैन है
क्योंकि
आदमी अपने को
कभी पंछी समझता है तो
कभी पिंजड़ा..
यह देख ही नही पाता कि
वह स्वयं पंछी भी है
और पिंजड़ा भी....
-अरुण

Tuesday, April 11, 2017

मुक्तक

मुक्तक
******
आकार देख पाया नही .........निराकार को
नाम दे सको न कभी तुम.........अनाम को
धुरी नही हो ऐसा कोई...... चक्र भी कहाँ
इच्छा करे ना.. ऐसा कोई मन नही कहीं
-अरुण

Sunday, April 9, 2017

मुक्तक

मुक्तक
*******
डूबजाना समंदर में... है लहर की फ़ितरत
'आगे क्या?'- यह सवाल भी साथ में डूबे

मोक्ष मुक्ती की करो ना बात अभ्भी
बंध बंधन का...समझ लो...बस बहोत है

न ही उम्मीद कुई और न ही मै हारा हूँ
पल पल की जिंदगी ही.. अब जिंदगी है
-अरुण

Saturday, April 8, 2017

March 2017

मुक्तक
*******
हाँ..ना.. में दिया जा सके.... जिंदगी ऐसा जवाब नही
कोई रखे हिसाब इसका.... जिंदगी ऐसा हिसाब नही
अनगिनत हैं अक्षर यहाँ  ............. अनगिनत तजुर्बे हैं
जिंदगी कुछ जाने पहचाने अक्षरों की..... किताब नही
-अरुण

मुक्तक
********
जीने की तमन्ना ने बाँटी सारी दुनिया दो हिस्सों में
जो इधर हुआ अपना हिस्सा जो उधर बचा सारा जहान
-अरुण

अभी यहाँ कल ही कल
**********************
अभी यहाँ जो भी है.... आँखों के सामने
देखता उसको तो.. जो कल है बीत चुका
अभी यहाँ सपने भी..... आनेवाले.. कल के
कल तो बस कल ही है.. आये या ना आये
-अरुण

एक शेर
********
इधर इसका जले इतिहास....... तो जलता उधर उसका
धुआँ और आग तो सबकी..... नही इसकी नही उसकी
-अरुण

चेतना का काम है चे.त.ना ..जब चेतती है हर एक के बीते हुए अनुभवों को,  याद के रूप में चेताती है।अनुभवों में व्यक्तिगत भिन्नता होने के कारण, लगता यूँ है कि हरेक के भीतर जलती चेताग्नि ..
दूसरों के चेताग्नि से भिन्न है..।  सच तो यह है कि सबकी चेतना की आग और यादों का धुआँ तो common ही है।

जबतक अंतरदृष्टि न चौंधे
************************
आकाश में बिजली चौंधनेपर
पसर जाती है अचानक सर्वव्यापक रौशनी
और मिट जाता है सारा का सारा पसरा अंधेरा

हमारे इस रोज़ाना जिंदगी में
मन में.. अंतर्दृष्टि की चकाचौंध
जबतक नही होगी
सर्वव्यापक अवधान भी न पसरेगा....
हम विचारों के आभासित प्रकाश में ही
अपना रास्ता बनाते हुए
नज़र आते रहेंगे
फिर भी
रहेंगे तो हम तमस में ही....
इच्छाओं के भ्रम में उलझे
और भ्रम-जाल से निकलने के
मिथ्या प्रयासों में
डूबे हुए
-अरुण
मनुष्य में सकलता का अभाव
**************************
आमतौर पर,
 उसकी विचारशीलता को
आधार मानकर
मनुष्य को विवेकधारी पशु या
Rational Animal) कहा गया
परंतु दुनिया का परिदृश्य तो कुछ अलग ही कहानी कहता है
सच्ची बात तो यह है कि
मनुष्य से जादा विवेकशून्यता और कहीं भी नही
और जगत में मनुष्य से अधिक स्व-केंद्रित भी कोई नही
उसकी स्व-केंद्रितता उसे प्रकृति से जुदा कर रही है

प्रकृति से समरसता के मामले में भी
पशु मनुष्य से आगे है
दुसरी ओर,  अपने समूह में भी
मनुष्य पूरीतरह से घुलमिल नही पाता

क्योंकि उसके विचारों में स्वरसता का प्रभाव है
और सकलता का अभाव
-अरुण
रिश्ता तर्क और समझ का
***********************
तर्कपूर्ण समझ ही विज्ञान है
समझपूर्ण तर्क को ही प्रज्ञान कहिए
तर्कहीन समझ है.....एक जानकारी या ज्ञान
समझहीन तर्क को अज्ञान कहिए
-अरुण
मानवता का सागर
****************
मानवता के
इस विस्तीर्ण सागर में
हज़ारों लाखों करोड़ों घडे तैर रहे हैं
हर घड़ा लहरों पर सवार होकर
जिधर लहरें ले जाएँ उधर बढ़ रहा है
लहरों से छलकता जल अपने में समेटते हुए
आगे बढ़ रहा है अपनी उम्र की राह पर

घडा अपने को दूसरे घड़ों से अलग
समझते हुए अपने भीतर
संकलित जल को भी अपना मान लेता है

क्योंकि वह बेख़बर है कि ...
न तो वह जल उसका है और न ही वह मिट्टी
जिससे वह बना है
-अरुण

“व्यक्तिपन”
***********
जंगल में खड़ा पेड खड़ा
और जंगल के बाहर बस्ती में
अकेला खड़ा वृक्ष.....दोनों ही
न तो अकेलापन महसूस करते हैं
और न ही कोई सामुहिकता, क्योंकि....
भीतर दोनों के ही
कोई भी “व्यक्तिपन” नही पनपता

“व्यक्तिपन” की भूल तो
आदमी के साथ ही घटती रही है
और शायद घटती रहेगी
आदमी ही महसूस करता रहेगा
या तो अकेलापन
या सामुहिकता का दंभ
-अरुण
वसुधैव कुटुंबकम्
****************
पेड के पत्ते ने कभी नही कहा
“पेड ही मेरा कुटुंब है”
ज़िंदा सांसे हर लहर की अपने को
सागर ही समझती हैं.....लहर नही

परंतु क्या यह अजीब नही कि हम इंसान
जो भीतर में दूसरों से डरे डरे हैं....
इस पढ़ी पढ़ाई शब्दावली को
रुक रुककर दुहराते रहते हैं...
सारी वसुधा ही हमारा कुटुंब है...
वसुधैव कुटुंबकम्
-अरुण
विचार
*******
हँसाते हैं विचार...विचार ही रुलाते हैं
विचार ही रखते हैं सजग गंभीर और निष्पक्ष
विचारों में बदल होते बदल जाता विचारक
विचारों और विचारक में कहाँ है भेद कोई?

स्थिती को देखना सुनना सभी का एक जैसा
मगर उस देखने-सुनने में घुस जाते विचार
किसी के वास्ते है वह स्थिती सुखमय सुखद
किसी पे आ गिरा हो दु:ख का कोई पहाड़

सभी ये वेदना-संवेदनाएँ शांत निर्मल
और सजग होते हुए भी,
आदमी बेहोश और अस्वस्थ है
बस...विचारों की वजह से
-अरुण
मन का घना वन
***************
बीज पसरे तो............. पेड और जंगल पसरे
जंगल में फँसे हुए तो निकल भी सकते हैं बाहर
कल्पना के बीज से ही पसरता है मन का घना वन
इस वन में खोया हुआ न कोई बाहर आया है अबतक
-अरुण

आभासमय है जीवन
*****************
पेड की परछाई को छूने से....
पेड का स्पर्श नही होता..
यह बात सबको मालूम है अच्छे से.....फिरभी
असत्य को ही सत्य समझने की भूल सभी कर रहे होते हैं

अस्तित्व गतिशील है सर्वत्र..देह के बाहर और भीतर भी
इस गति से मनुष्य की दृष्टि-गति एवं समझ-गति...
दोनों ही मेल नही खाती और..... इसकारण
सीधे अस्तित्वगति को देखने की जगह
उसके आभास को ही.....अस्तित्व समझकर...
आदमी जीवन जी रहा है
-अरुण
होता कुछ और..लगता कुछ और
*************************
अंधेरे में ज़मीन पर पड़ी हुई रस्सी
देखते ही
भय और असुरक्षा महसूस हुई
वजह इसकी साफ़ थी
देखनेवालेको... रस्सी.. रस्सी न लगकर.... साँप लगी

कहने का मतलब....होता कुछ और है
और लगता कुछ और

अस्तित्व है....”कुछ होते रहना”
मगर मन है.....”कुछ और ही लगते रहना”

‘‘होने’ और ‘लगने’ के भेद को....भेद सकता है
केवल ध्यान
न कोई मन.. न कोई ज्ञान
-अरुण
अस्तित्व का धर्म
**************
हो रहा दिन.. हो रही है रात
पर ये बात...
हरदम ख़्याल में रखे रहो के

सिर्फ पल पल में बदल
बदलाव ही
अस्तित्व का है धर्म

इसे दिन कहें या रात?
सिर्फ अपने चयन की बात
-अरुण
जीवन सारा प्रतिबिंबों का, बिंब बिंब से खेल रहे हैं
***************************************
प्रतिबिंबों के रूप बदलते, नये चित्र प्रतिमाएँ रचते
उन्हे हिलाते उन्हे मिलाते, नया रूप धर बोल रहे हैं

प्रतिबिंबों के बिंब बन रहे, बिंबों के नव बिंब बन रहे
इस बिंबात्मक मन में हरदम, बिंब सजग लग रेल रहे हैं

बिंब कणों की यात्रा चलती, विचार गढ़ती विचार करती
आती बीती की बातों से........ भूतभावि को ठेल रहे हैं

प्रतिबिंबों की पूरी रचना..........जब चेते यह पूरी रचना
अपना व्यर्थ स्वरूप निहारे, सत-स्वरूप पा डोल रहे हैं
-अरुण
सारी कायनातही नज़रों में....
*********************
वैसे तो, सारी कायनातही नज़रों में बसी रहती है
ये ज़रूरतें हैं........... जो नज़रों को सिकुडती रहती
वैसे तो देख सकता है ये इंसान... सभीकुछ लेकिन
नज़रों को सिर्फ...................उसकी जरूरत दिखती

जो कुछ हो रहा है इर्द गिर्द............. औ  ख़ुद में
छोटासा हिस्साही......... उसकी पकड का है हिस्सा
ये ज़मीं आसमान...................बंदा है सारी दुनिया
फिर भी उसकी समझ में वो तो सिर्फ इक क़िस्सा
-अरुण
जीवन-कला
***********
न ये दुनिया और न ही यह जिंदगी...
किसी मक्सद की ओर दौड़ रही है
केवल चलते रहना ही इसका काम है
इसी चलते रहने या जीवनगति के
आनंद में डूबे रहना ही है...
जीवन की कला
-अरुण
स्वामित्व
*********
हर वस्तु, पदार्थ और जीव ही
स्वयं का मालिक है
कोई अन्य उसका स्वामी नही,

वैसे तो स्वामी या स्वामित्व
केवल एक विचार या संकल्पना मात्र है
यह संकल्पना जब किसी चीज आदि से
जुड जाती है या उससे
तादात्म स्थापित करती है
मन में स्वामित्व का भाव जाग जाता है
-अरुण
किताबी जीवन
**************
अगर आध्यात्मिक किताबें न होती..
न होती दार्शनिक नसीहतें
तो शायद आदमी
अपनी मौलिक मनवेदनाओं का हल
स्वयं में ओर स्वयं से ढूँढता
अपने को समझते समझते पूरी मानवता के
स्वभाव को देख लेता

पर ऐसा हुआ नही
कुछ अपवादों के साथ..
आदमी आँखें बंद किए हुए
दूसरों की नज़रों से दुनिया को
जानने के लिए प्रवृत्त हुआ
अपना जीवन जीने की जगह
किताबी जीवन जीने लगा
-अरुण
अजब यह व्याकरण और गणित
**************************
जानना ही जानता है...जो जना(जाना) जाए
अजब है व्याकरण इस जिंदगी का,
कर्ता क्रिया और कर्म सबकुछ
एक क्षण और एक स्थल में ही सिमट जाए

पेड ही जड़ और पत्ता, दृश्य दर्शन और द्रष्टा
एक ही ह्रद-श्वांस में सबकुछ गना जाए
अजब है यह गणित इस जिंदगी का
-अरुण

मोटेतौर पर तीन तरह के लोग
*************************
मोटेतौर पर तीन तरह के लोग इस दुनिया में रहते हैं
एक वह जो देखे बिना ही किसी बात को मान लेते हैं
दूसरे वह जो बात को देखते और उसपर सोचते रहते हैं
तीसरे वह जो बात को देखते.. सोचते और
ख़ुद में, उसे पूरी तरह स्पष्टता से समझ लेते हैं

पहलेवाले बंधन में रहते हुए भी नही जानते कि वे बंधन में हैं
दूसरेवाले बंधन के दर्द को महसूस करते हुए
या तो उससे समझौता करते हैं या संघर्ष

तीसरे वे जिनकी स्पष्ट एवं समुचित समझ उन्हे
बंधन में फंसने ही नही देती
-अरुण
सत में रहते सत ना जाने
**********************
केवल रात ही रात होती जीवनभर तो
रात को ही आदमी दिन समझ लेता
दिन में भी अगर होता वह बंद कमरों में
आशय दिन का किताबों में ही रहता

असत ही है जब जीवन का तानाबाना
लगता आदमी को यही है असली जीना
अपनी साँस ओ धड़कन को किए नज़रअंदाज़ै
पूछे संतों से..कहाँ है मेरी धड़कन मेरी साँस?
-अरुण
दिखता है वही...
*************
जब भी देखता हूँ...बाहर या भीतर
दिखता वही है जो अबतक देखा है
वैसा का वैसा या.. थोडासा बदलासा
वही बने नया जो पहले से सीखा है
-अरुण
तन के बोल मन की मनमन
**************************
एक दूसरे के सामने खडे हुए,
हम एक दूसरे से बात करते हुए दिखते हों भले ही,
पर सच तो यह है कि
मेरा मन मेरे मन से और तुम्हारा मन तुम्हारे मन से,
इस तरह दोनों ही, अलग अलग, अपने स्वयं से ही बोल रहे हैं

बोलना और सुनना, चुंकि, एक दूसरे की ओर निशाना साधे,
खुलकर चल रहा है, मान लिया जाता है हम दोनों
एक दूसरे से वार्तालाप कर रहे हैं।

सामुदायिक रूप से चल रहा यह सारा शोरशराबा
आदमीयों के मनों के भीतर चल रही
मनमन का ही परिणाम है
-अरुण
क्षितिज और मन
**************
क्षितिज धरती ही नही आकाश से भी दूर है
होता नही है जो मगर.. फिरभी नज़र आता
आदमी का मन क्षितिज जैसा....निरा आभास
होता नही है फिरभी जग...इसमें समा जाता
-अरुण
‘उसे’ निर्गुण निराकार क्यों कहते हैं?
*****************************
हवा पर तैरते बादल नही आकार उनको
हमें जो चाहिए आकार हम वह देख लेते
हमें जो चाहिए वैसीही दिखती है ये दुनिया
नही आकार गुण और नाम लेकर यह उगी है
-अरुण
मन का उजाला.. अंधेरे ही जैसा
**************************
मन हमें अपने ही उजालों में भटकाये रखता है
और फिर हम हो जाते हैं
प्रकाश की संभावना से कोसों दूर

कोसों दूर.. इसलिए
क्योंकि मन ही हमें प्रकाश जैसा लगने लगता है
अपनी तमाम परेशानियों का समाधान
हम मन में ही खोजने लगते हैं.. और फिर
जिसे समाधान समझते हैं वही उभरकर
बन जाता है एक नई परेशानी

“परेशानी... समाधान और फिर परेशानी”
इस शृंखला से तभी मुक्ति संभव है
जब आदमी मन के उजालों से
चिपके रहने के बजाय
मन को ही प्रकाशित हुआ देख ले
-अरुण

बोधिवृक्ष

बोधिवृक्ष
*******
“आँगन में यहाँ जो वृक्ष खड़ा है
कहना गलत नही कि वह इस सूबे.. पृथ्वी..
सारे ब्रह्म में खडा है”

यह तथ्य
एक सत्यबोध बनकर
जिनके ह्रदय में उतरा होगा
उनके लिए वह वृक्ष... केवल वृक्ष नही
एक बोधिवृक्ष बन गया होगा
-अरुण

Sunday, April 2, 2017

March 2017

मुक्तक
*******
हाँ..ना.. में दिया जा सके.... जिंदगी ऐसा जवाब नही
कोई रखे हिसाब इसका.... जिंदगी ऐसा हिसाब नही
अनगिनत हैं अक्षर यहाँ  ............. अनगिनत तजुर्बे हैं
जिंदगी कुछ जाने पहचाने अक्षरों की..... किताब नही
-अरुण

मुक्तक
********
जीने की तमन्ना ने बाँटी सारी दुनिया दो हिस्सों में
जो इधर हुआ अपना हिस्सा जो उधर बचा सारा जहान
-अरुण

अभी यहाँ कल ही कल
**********************
अभी यहाँ जो भी है.... आँखों के सामने
देखता उसको तो.. जो कल है बीत चुका
अभी यहाँ सपने भी..... आनेवाले.. कल के
कल तो बस कल ही है.. आये या ना आये
-अरुण

एक शेर
********
इधर इसका जले इतिहास....... तो जलता उधर उसका
धुआँ और आग तो सबकी..... नही इसकी नही उसकी
-अरुण

चेतना का काम है चे.त.ना ..जब चेतती है हर एक के बीते हुए अनुभवों को,  याद के रूप में चेताती है।अनुभवों में व्यक्तिगत भिन्नता होने के कारण, लगता यूँ है कि हरेक के भीतर जलती चेताग्नि ..
दूसरों के चेताग्नि से भिन्न है..।  सच तो यह है कि सबकी चेतना की आग और यादों का धुआँ तो common ही है।

जबतक अंतरदृष्टि न चौंधे
************************
आकाश में बिजली चौंधनेपर
पसर जाती है अचानक सर्वव्यापक रौशनी
और मिट जाता है सारा का सारा पसरा अंधेरा

हमारे इस रोज़ाना जिंदगी में
मन में.. अंतर्दृष्टि की चकाचौंध
जबतक नही होगी
सर्वव्यापक अवधान भी न पसरेगा....
हम विचारों के आभासित प्रकाश में ही
अपना रास्ता बनाते हुए
नज़र आते रहेंगे
फिर भी
रहेंगे तो हम तमस में ही....
इच्छाओं के भ्रम में उलझे
और भ्रम-जाल से निकलने के
मिथ्या प्रयासों में
डूबे हुए
-अरुण
मनुष्य में सकलता का अभाव
**************************
आमतौर पर,
 उसकी विचारशीलता को
आधार मानकर
मनुष्य को विवेकधारी पशु या
Rational Animal) कहा गया
परंतु दुनिया का परिदृश्य तो कुछ अलग ही कहानी कहता है
सच्ची बात तो यह है कि
मनुष्य से जादा विवेकशून्यता और कहीं भी नही
और जगत में मनुष्य से अधिक स्व-केंद्रित भी कोई नही
उसकी स्व-केंद्रितता उसे प्रकृति से जुदा कर रही है

प्रकृति से समरसता के मामले में भी
पशु मनुष्य से आगे है
दुसरी ओर,  अपने समूह में भी
मनुष्य पूरीतरह से घुलमिल नही पाता

क्योंकि उसके विचारों में स्वरसता का प्रभाव है
और सकलता का अभाव
-अरुण
रिश्ता तर्क और समझ का
***********************
तर्कपूर्ण समझ ही विज्ञान है
समझपूर्ण तर्क को ही प्रज्ञान कहिए
तर्कहीन समझ है.....एक जानकारी या ज्ञान
समझहीन तर्क को अज्ञान कहिए
-अरुण
मानवता का सागर
****************
मानवता के
इस विस्तीर्ण सागर में
हज़ारों लाखों करोड़ों घडे तैर रहे हैं
हर घड़ा लहरों पर सवार होकर
जिधर लहरें ले जाएँ उधर बढ़ रहा है
लहरों से छलकता जल अपने में समेटते हुए
आगे बढ़ रहा है अपनी उम्र की राह पर

घडा अपने को दूसरे घड़ों से अलग
समझते हुए अपने भीतर
संकलित जल को भी अपना मान लेता है

क्योंकि वह बेख़बर है कि ...
न तो वह जल उसका है और न ही वह मिट्टी
जिससे वह बना है
-अरुण

“व्यक्तिपन”
***********
जंगल में खड़ा पेड खड़ा
और जंगल के बाहर बस्ती में
अकेला खड़ा वृक्ष.....दोनों ही
न तो अकेलापन महसूस करते हैं
और न ही कोई सामुहिकता, क्योंकि....
भीतर दोनों के ही
कोई भी “व्यक्तिपन” नही पनपता

“व्यक्तिपन” की भूल तो
आदमी के साथ ही घटती रही है
और शायद घटती रहेगी
आदमी ही महसूस करता रहेगा
या तो अकेलापन
या सामुहिकता का दंभ
-अरुण
वसुधैव कुटुंबकम्
****************
पेड के पत्ते ने कभी नही कहा
“पेड ही मेरा कुटुंब है”
ज़िंदा सांसे हर लहर की अपने को
सागर ही समझती हैं.....लहर नही

परंतु क्या यह अजीब नही कि हम इंसान
जो भीतर में दूसरों से डरे डरे हैं....
इस पढ़ी पढ़ाई शब्दावली को
रुक रुककर दुहराते रहते हैं...
सारी वसुधा ही हमारा कुटुंब है...
वसुधैव कुटुंबकम्
-अरुण
विचार
*******
हँसाते हैं विचार...विचार ही रुलाते हैं
विचार ही रखते हैं सजग गंभीर और निष्पक्ष
विचारों में बदल होते बदल जाता विचारक
विचारों और विचारक में कहाँ है भेद कोई?

स्थिती को देखना सुनना सभी का एक जैसा
मगर उस देखने-सुनने में घुस जाते विचार
किसी के वास्ते है वह स्थिती सुखमय सुखद
किसी पे आ गिरा हो दु:ख का कोई पहाड़

सभी ये वेदना-संवेदनाएँ शांत निर्मल
और सजग होते हुए भी,
आदमी बेहोश और अस्वस्थ है
बस...विचारों की वजह से
-अरुण
मन का घना वन
***************
बीज पसरे तो............. पेड और जंगल पसरे
जंगल में फँसे हुए तो निकल भी सकते हैं बाहर
कल्पना के बीज से ही पसरता है मन का घना वन
इस वन में खोया हुआ न कोई बाहर आया है अबतक
-अरुण

आभासमय है जीवन
*****************
पेड की परछाई को छूने से....
पेड का स्पर्श नही होता..
यह बात सबको मालूम है अच्छे से.....फिरभी
असत्य को ही सत्य समझने की भूल सभी कर रहे होते हैं

अस्तित्व गतिशील है सर्वत्र..देह के बाहर और भीतर भी
इस गति से मनुष्य की दृष्टि-गति एवं समझ-गति...
दोनों ही मेल नही खाती और..... इसकारण
सीधे अस्तित्वगति को देखने की जगह
उसके आभास को ही.....अस्तित्व समझकर...
आदमी जीवन जी रहा है
-अरुण
होता कुछ और..लगता कुछ और
*************************
अंधेरे में ज़मीन पर पड़ी हुई रस्सी
देखते ही
भय और असुरक्षा महसूस हुई
वजह इसकी साफ़ थी
देखनेवालेको... रस्सी.. रस्सी न लगकर.... साँप लगी

कहने का मतलब....होता कुछ और है
और लगता कुछ और

अस्तित्व है....”कुछ होते रहना”
मगर मन है.....”कुछ और ही लगते रहना”

‘‘होने’ और ‘लगने’ के भेद को....भेद सकता है
केवल ध्यान
न कोई मन.. न कोई ज्ञान
-अरुण
अस्तित्व का धर्म
**************
हो रहा दिन.. हो रही है रात
पर ये बात...
हरदम ख़्याल में रखे रहो के

सिर्फ पल पल में बदल
बदलाव ही
अस्तित्व का है धर्म

इसे दिन कहें या रात?
सिर्फ अपने चयन की बात
-अरुण
जीवन सारा प्रतिबिंबों का, बिंब बिंब से खेल रहे हैं
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प्रतिबिंबों के रूप बदलते, नये चित्र प्रतिमाएँ रचते
उन्हे हिलाते उन्हे मिलाते, नया रूप धर बोल रहे हैं

प्रतिबिंबों के बिंब बन रहे, बिंबों के नव बिंब बन रहे
इस बिंबात्मक मन में हरदम, बिंब सजग लग रेल रहे हैं

बिंब कणों की यात्रा चलती, विचार गढ़ती विचार करती
आती बीती की बातों से........ भूतभावि को ठेल रहे हैं

प्रतिबिंबों की पूरी रचना..........जब चेते यह पूरी रचना
अपना व्यर्थ स्वरूप निहारे, सत-स्वरूप पा डोल रहे हैं
-अरुण
सारी कायनातही नज़रों में....
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वैसे तो, सारी कायनातही नज़रों में बसी रहती है
ये ज़रूरतें हैं........... जो नज़रों को सिकुडती रहती
वैसे तो देख सकता है ये इंसान... सभीकुछ लेकिन
नज़रों को सिर्फ...................उसकी जरूरत दिखती

जो कुछ हो रहा है इर्द गिर्द............. औ  ख़ुद में
छोटासा हिस्साही......... उसकी पकड का है हिस्सा
ये ज़मीं आसमान...................बंदा है सारी दुनिया
फिर भी उसकी समझ में वो तो सिर्फ इक क़िस्सा
-अरुण
जीवन-कला
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न ये दुनिया और न ही यह जिंदगी...
किसी मक्सद की ओर दौड़ रही है
केवल चलते रहना ही इसका काम है
इसी चलते रहने या जीवनगति के
आनंद में डूबे रहना ही है...
जीवन की कला
-अरुण
स्वामित्व
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हर वस्तु, पदार्थ और जीव ही
स्वयं का मालिक है
कोई अन्य उसका स्वामी नही,

वैसे तो स्वामी या स्वामित्व
केवल एक विचार या संकल्पना मात्र है
यह संकल्पना जब किसी चीज आदि से
जुड जाती है या उससे
तादात्म स्थापित करती है
मन में स्वामित्व का भाव जाग जाता है
-अरुण
किताबी जीवन
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अगर आध्यात्मिक किताबें न होती..
न होती दार्शनिक नसीहतें
तो शायद आदमी
अपनी मौलिक मनवेदनाओं का हल
स्वयं में ओर स्वयं से ढूँढता
अपने को समझते समझते पूरी मानवता के
स्वभाव को देख लेता

पर ऐसा हुआ नही
कुछ अपवादों के साथ..
आदमी आँखें बंद किए हुए
दूसरों की नज़रों से दुनिया को
जानने के लिए प्रवृत्त हुआ
अपना जीवन जीने की जगह
किताबी जीवन जीने लगा
-अरुण
अजब यह व्याकरण और गणित
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जानना ही जानता है...जो जना(जाना) जाए
अजब है व्याकरण इस जिंदगी का,
कर्ता क्रिया और कर्म सबकुछ
एक क्षण और एक स्थल में ही सिमट जाए

पेड ही जड़ और पत्ता, दृश्य दर्शन और द्रष्टा
एक ही ह्रद-श्वांस में सबकुछ गना जाए
अजब है यह गणित इस जिंदगी का
-अरुण

मोटेतौर पर तीन तरह के लोग
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मोटेतौर पर तीन तरह के लोग इस दुनिया में रहते हैं
एक वह जो देखे बिना ही किसी बात को मान लेते हैं
दूसरे वह जो बात को देखते और उसपर सोचते रहते हैं
तीसरे वह जो बात को देखते.. सोचते और
ख़ुद में, उसे पूरी तरह स्पष्टता से समझ लेते हैं

पहलेवाले बंधन में रहते हुए भी नही जानते कि वे बंधन में हैं
दूसरेवाले बंधन के दर्द को महसूस करते हुए
या तो उससे समझौता करते हैं या संघर्ष
 
तीसरे वे जिनकी स्पष्ट एवं समुचित समझ उन्हे
बंधन में फंसने ही नही देती
-अरुण
सत में रहते सत ना जाने
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केवल रात ही रात होती जीवनभर तो
रात को ही आदमी दिन समझ लेता
दिन में भी अगर होता वह बंद कमरों में
आशय दिन का किताबों में ही रहता

असत ही है जब जीवन का तानाबाना
लगता आदमी को यही है असली जीना
अपनी साँस ओ धड़कन को किए नज़रअंदाज़ै
पूछे संतों से..कहाँ है मेरी धड़कन मेरी साँस?
-अरुण
दिखता है वही...
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जब भी देखता हूँ...बाहर या भीतर
दिखता वही है जो अबतक देखा है
वैसा का वैसा या.. थोडासा बदलासा
वही बने नया जो पहले से सीखा है
-अरुण
तन के बोल मन की मनमन
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एक दूसरे के सामने खडे हुए,
हम एक दूसरे से बात करते हुए दिखते हों भले ही,
पर सच तो यह है कि
मेरा मन मेरे मन से और तुम्हारा मन तुम्हारे मन से,
इस तरह दोनों ही, अलग अलग, अपने स्वयं से ही बोल रहे हैं

बोलना और सुनना, चुंकि, एक दूसरे की ओर निशाना साधे,
खुलकर चल रहा है, मान लिया जाता है हम दोनों
एक दूसरे से वार्तालाप कर रहे हैं।

सामुदायिक रूप से चल रहा यह सारा शोरशराबा
आदमीयों के मनों के भीतर चल रही
मनमन का ही परिणाम है
-अरुण
क्षितिज और मन
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क्षितिज धरती ही नही आकाश से भी दूर है
होता नही है जो मगर.. फिरभी नज़र आता
आदमी का मन क्षितिज जैसा....निरा आभास
होता नही है फिरभी जग...इसमें समा जाता
-अरुण
‘उसे’ निर्गुण निराकार क्यों कहते हैं?
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हवा पर तैरते बादल नही आकार उनको
हमें जो चाहिए आकार हम वह देख लेते
हमें जो चाहिए वैसीही दिखती है ये दुनिया
नही आकार गुण और नाम लेकर यह उगी है
-अरुण
मन का उजाला.. अंधेरे ही जैसा
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मन हमें अपने ही उजालों में भटकाये रखता है
और फिर हम हो जाते हैं
प्रकाश की संभावना से कोसों दूर

कोसों दूर.. इसलिए
क्योंकि मन ही हमें प्रकाश जैसा लगने लगता है
अपनी तमाम परेशानियों का समाधान
हम मन में ही खोजने लगते हैं.. और फिर
जिसे समाधान समझते हैं वही उभरकर
बन जाता है एक नई परेशानी

“परेशानी... समाधान और फिर परेशानी”
इस शृंखला से तभी मुक्ति संभव है
जब आदमी मन के उजालों से
चिपके रहने के बजाय
मन को ही प्रकाशित हुआ देख ले
-अरुण

Wednesday, March 1, 2017

फ़रवरी २०१७ में लिखी रचनाएँ

१ फ़रवरी से २८ फ़रवरी २०१७ तक
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क्रांतिमय सही स्वर
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आदमी ने ही आदमी को बिगाड़ा है
जिसे जैसा लगा वैसा उसे मोड़ा है
उसे सीधा कर सकने के दावेदार कई
एक भी नही जिस्ने सीधा कर छोड़ा है

सीधा करनेवालों की कोशिशें बाहर बाहर
पर मुडावट तो घटी है अंतस्थ के भीतर
स्वयं के अंतस्थ में जो झाँक सका अपने से
उसके ही भीतर बज पाया क्रांतिमय सही स्वर
-अरुण

दिल सुकून.. मन ख़ुराफ़ात
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खिडकी से बाहर
केवल झांकना ही झांकना हो
तो दिल में है सुकून ही सुकून
पर अगर झांकती आँखों में
भापने, जांचने, नापने, बूझने जैसी
शैतानियत का अंजन लगा हो...
तो कई खुराफातें सताने लगती हैं मन को

दरअसल,
दिल का मतलब ही है सुकून और
मन का सिरफ ख़ुराफ़ात
-अरुण

वैज्ञानिक एवं ज्ञानिक
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अवास्तविकता से सत्य तक का सफ़र
वास्तव से होकर गुज़रता है...

वैज्ञानिक किसी वैज्ञानिक निचोड़ के साथ
वास्तव पर ही ठहर जाता है

ज्ञानिक को वास्तव में भी
छुपी-अवास्तविकता के दर्शन होते रहते हैं
और इसकारण उसका खोज-सफर
तबतक ठहरता नही जबतक वह स्वयं की
अवास्तविकता को भी देख नही लेता
-अरुण
कैसे संभव है?
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परछाई हाँथों की अपने
पकड़ी न गई हाँथों से
ख़ुद को ख़ुद से पकड़ूँ ?
कैसे संभव है?
आंखों में ही घने बादल
भले सामने हो सूरज
आँखों को दिख जाए?
कैसे संभव है?
-अरुण
समय और आसमां
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यादें कहती है
वक्त पीछे निकल गया है
इरादों को लगता है
समय तो आगे खड़ा है
समय तो वही और वहींपर है
कल आज और कलभी
और आसमां भी है वही का वही
ऊपर नीचे बाहर भीतर कहींभी
-अरुण

रंगीनीयत और पानीपन
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पानी में घुल गये हैं रंग कई
रंगीनीयत को पानी नज़र नही आता
पानीपन मगर बरक़रार रहे जल का
पानीपन को कोई भी रंग हटा नही पाता
-अरुण

गड़बड़ी है नज़र में
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गड़बड़ी है देखनेवाले की नज़र में
जिंदगी हर हाल में दुरुस्त है
नोचते हुए दिखते हों लहरों को तूफ़ान... मगर
समंदर तो हर हाल में मस्त है
-अरुण

भागे जा रहा है....
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भागे जा रहा है हर कोई, नही है कहींभी पहुँचना उसे
बस जहाँ है वहाँ से तुरत निकल पड़ना उसे

पूछता ही रहता है कई ठिकानों का पता
बग़ैर जाने कि अभी कहाँ है वह...किस ठिकाने

सवालों पर सवाल पूछे जाता है इसलिए नही कि उसे कुछ जानना है
बल्कि इसलिए कि उसने क्या जाना अबतक..... वह उसे जतलाना है
-अरुण

लगना और होना
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जैसा लगता है वैसा होता नही है
जैसा होता है वैसा लगता नही है
ध्यान से देखो तो सच्चाई समझ आती है
ध्यान अगर देखकर हो.. तो सच्चाई खो जाती है
-अरुण


अंतर-सुसंगती
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सितार से
संगीत अवतरित होता है
यह केवल सितार के तारों की कमाल नही,
केवल उन उँगलियों की भी देन नही जो तारों को छूती हुई
गतिशील होती हैं
न ही सारा श्रेय बजानेवाले के अंतरंग में
गूँजनेवाली स्वररचना को दिया जा सकता है

तीनों की आपसी अंतर-सुसंगती से ही सितार
बोल उठती है
-अरुण

मै वास्तविक हूँ
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“मै न आस्तिक हूँ, न नास्तिक हूँ,मै वास्तविक हूँ”
यह बात देश के एक महान रामकथा वाचक
के मुख से जब सुनी तो मन प्रसन्न हो गया।
ओशो के बारे में, मुरारी बापूजी महाराज
अपनी सोच को अभिव्यक्त कर रहे थे,
यह बात उन्होंने उसी समय कही
-अरुण

तन या मन
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तन, मन को चलाय
या मन, तन को...समझ न आय
न रह जाए दोनों में अंतर तो..
सवाल सुलझ जाय
-अरुण
वही बेसुर लगे
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झूठ सबके जिंदगी का प्राण है
सच की नज़दीकी से मन को डर लगे
मौत की आहट निकट से जब सुनी
जो रमाती धुन... वही बेसुर लगे
-अरुण
आमने-सामने और एकांत
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सामने से ही फले है आमने
आमने के सामने अरि-मीत है
भीड़ में हर आदमी एकांत होवे
जगत तो एकांत का ही गीत है
-अरुण
तात्पर्य
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‘तू’ की कल्पना में ही ‘मै’ की कल्पना जन्मती है। ‘मै’ के सामने कोई न कोई होता ही है-शत्रु या मित्र। ये आमने-सामने वाले संबंध अस्तित्व में होते ही नही। अस्तित्व में हर कोई एकांत में है (अकेला नही)। अस्तित्व तो एकांतमयी है।
-अरुण

क्या यह सच नही कि-
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छोटे छोटे बच्चों के साथ बैठकर गुड्डीगुड़िया जैसे बच्चों के खेल खेलनेवाले अभिभावक,
खेल में रमते हुए भी खेल से बाहर रहते हैं। परंतु अपनी निजी जिंदगी में अपने सांसारिकता के खेल से बाहर निकल नही पाते.....खेल में रमते हुए उसी में डूब जाते हैं।
-अरुण

मन संरक्षक या भक्षक
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हज़ारों वर्षों से गुजरकर शायद
उत्क्रांति ने
आत्मरक्षा के लिए आदमी के भीतर
मन को जन्माया है
मगर संरक्षण के नाम पर
मन के भीतर से
सृष्टि-संहार का ही दौर चल आया है

मन ने जंगल उजाड़े, प्राणियों और पक्षियों को
नष्ट किया और अब
सारी मानवता को ही बर्बाद करने का
इरादा रखते हुए
कई न्यूक्लिअर हथियार
इजाद कर रखे हैं
-अरुण


मन ले जाता है असलियत से दूर
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यादें ही याद करती हैं
यादें ही याद आती हैं
याद करना भी
और याद आना भी
दोनों ही साथ साथ
एक ही वक्त एक ही जगह
यादों के द्वारा ही

फिर भी आदमी समझता है
कि वही है जो याद करता है यादों को

समझ की उसकी इस
मूलभूत नादानी ने ही
उसके जीवन को
कई अन्य नादानियाँ से भर दिया है
कई परेशानियों में उलझा दिया है

ऐसे में,
अंतर-जागरण ही असलियत को
उजागर करता है
-अरुण

जानकार तो आदमी ही
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पीपल का पेड नही जानता
कि उसका नाम पीपल है
न ही बरगद अपनी विशेषता
को जानता है

अपनी अलग पहचान या जानकारी
तो आदमी की मजबूरी है
किसी और की नही

औरों को जीवन चलाने के लिए
कुदरत से बना हुआ उनका एकत्व ही
काफ़ी है
इसी एकत्व से दूर हो चुके आदमी को ही
जानकारी की जरूरत है
-अरुण
नया ही नये के काम आता है
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पुरखों ने दी है हमें
हमारी अपनी दुनिया
इस दुनिया की समस्याएँ भी हमारी अपनी हैं
और इसालिए समाधान भी होने चाहिए हमारे अपने....
इतना ही नही....आगे आनेवाली संतानों को भी
मिलने चाहिए जीवन जीने के ऐसे मौके,
जो हों उनकी अपनी परिस्थिति और समझ के अनुसार
नया ही नये के काम आता है
पुराना उसे आगे बढ़ने से रोक देता है
-अरुण
क्या है मेरा?
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“क्या है मेरा
और क्या मेरा नही है?”

इस बात पर सोचने से पहले
मुझे यह सोचना पड़ रहा है कि
मै क्या हूँ और मै क्या नही हूँ?
हूँ भी या नही?
गर हूँ तो कहाँ से कहाँ तक हूँ?

इन सवालों पर ही सोचते सोचते
जिंदगी कट जाए शायद!!!
-अरुण
देखना या घुलमिल जाना
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देखने के लिए जो देखना हो उससे कुछ दूर रहकर ही देखा जाता है
अगर उसमें घुलमिल जाओ तो फिर कौन किसको देखे?

जिंदगी को देखकर जीना है.....एक तजुर्बा... जो बयां हो सके
जिंदगी में घुलमिल जाना है.... एक एहसास.... जो बयां न हो सके
-अरुण



सफ़र एक ही मगर सोच अलग
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जिंदगी का सफ़र तो
एक ही है हमसब का.....
एक ही रास्ते से हम सब गुज़र रहे हैं
परंतु ‘चलना’ उस रास्ते पर हर किसी का
है अलग अलग
हरेक का ज़हन उसकी अपनी
‘चलने की अनुभूति’
का ही संचय होने के कारण
वह सोचता है कि वह और उसका सफ़र
दूसरों से अलग है
-अरुण

मन तो है एक भीड़
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दो या दो से अधिक लोगों में संवाद चले...
यह कोई नई बात नही
परंतु मन के बाबत ...
बात कुछ अजीबसी है

हरेक का मन उसका अपना एक निजी मामला होते हुए भी
वह मन...कभी भी एक या अकेला नहीं होता
एक ही समय..
मन कई भूमिकाओं में
बँटा हुआ रहता है
बोलनेवाला भी वही....सुनने वाला भी वही
दोनों को आपस में बोलते-सुनते हुए
देखनेवाला भी वही....
वही बहकता भी है और वही उसे बहकने से
रोकता भी है...
ग़ुस्सा भी करे वही और ग़ुस्से को
शांत भी करे वही...

बहुभूमिकाओं में उलझा हुआ यह
मनुष्य का निजी मन
कभी भी चुप नही रह पाता
वह अशांत है... वह अकेला नहीं
हमेशा एक भीड़ का रूप लिए हुए है
-अरुण


दुनिया होते रहने.. चलते रहने का नाम
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आकाश में, धरतीपर और ज़मीन की गहराई में
हरपल हरक्षण कुछ न कुछ होता ही रहता है

आदमी के संदर्भ में भी बात अलग नही, वही है।
उसके बाहर भीतर और सतह पर
किसी न किसी बदलाव का दौर
चलता ही रहता है
ऐसे ही होते रहने... चलते रहने
से ही दुनिया चल रही है

जब आदमी अपने होते रहने या चलते रहने से
ध्यान हटाकर बाहर देखता है तो उसे लगता है कि
दुनिया एक ठहरे हुई वस्तु या आकार के रूप में है

जब अपने में होते बदलावों को भुलाकर
ख़ुद को देखता है उसे लगता है
वह किसी अहंकार के रूप में है
-अरुण