Wednesday, March 1, 2017

फ़रवरी २०१७ में लिखी रचनाएँ

१ फ़रवरी से २८ फ़रवरी २०१७ तक
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क्रांतिमय सही स्वर
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आदमी ने ही आदमी को बिगाड़ा है
जिसे जैसा लगा वैसा उसे मोड़ा है
उसे सीधा कर सकने के दावेदार कई
एक भी नही जिस्ने सीधा कर छोड़ा है

सीधा करनेवालों की कोशिशें बाहर बाहर
पर मुडावट तो घटी है अंतस्थ के भीतर
स्वयं के अंतस्थ में जो झाँक सका अपने से
उसके ही भीतर बज पाया क्रांतिमय सही स्वर
-अरुण

दिल सुकून.. मन ख़ुराफ़ात
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खिडकी से बाहर
केवल झांकना ही झांकना हो
तो दिल में है सुकून ही सुकून
पर अगर झांकती आँखों में
भापने, जांचने, नापने, बूझने जैसी
शैतानियत का अंजन लगा हो...
तो कई खुराफातें सताने लगती हैं मन को

दरअसल,
दिल का मतलब ही है सुकून और
मन का सिरफ ख़ुराफ़ात
-अरुण

वैज्ञानिक एवं ज्ञानिक
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अवास्तविकता से सत्य तक का सफ़र
वास्तव से होकर गुज़रता है...

वैज्ञानिक किसी वैज्ञानिक निचोड़ के साथ
वास्तव पर ही ठहर जाता है

ज्ञानिक को वास्तव में भी
छुपी-अवास्तविकता के दर्शन होते रहते हैं
और इसकारण उसका खोज-सफर
तबतक ठहरता नही जबतक वह स्वयं की
अवास्तविकता को भी देख नही लेता
-अरुण
कैसे संभव है?
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परछाई हाँथों की अपने
पकड़ी न गई हाँथों से
ख़ुद को ख़ुद से पकड़ूँ ?
कैसे संभव है?
आंखों में ही घने बादल
भले सामने हो सूरज
आँखों को दिख जाए?
कैसे संभव है?
-अरुण
समय और आसमां
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यादें कहती है
वक्त पीछे निकल गया है
इरादों को लगता है
समय तो आगे खड़ा है
समय तो वही और वहींपर है
कल आज और कलभी
और आसमां भी है वही का वही
ऊपर नीचे बाहर भीतर कहींभी
-अरुण

रंगीनीयत और पानीपन
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पानी में घुल गये हैं रंग कई
रंगीनीयत को पानी नज़र नही आता
पानीपन मगर बरक़रार रहे जल का
पानीपन को कोई भी रंग हटा नही पाता
-अरुण

गड़बड़ी है नज़र में
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गड़बड़ी है देखनेवाले की नज़र में
जिंदगी हर हाल में दुरुस्त है
नोचते हुए दिखते हों लहरों को तूफ़ान... मगर
समंदर तो हर हाल में मस्त है
-अरुण

भागे जा रहा है....
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भागे जा रहा है हर कोई, नही है कहींभी पहुँचना उसे
बस जहाँ है वहाँ से तुरत निकल पड़ना उसे

पूछता ही रहता है कई ठिकानों का पता
बग़ैर जाने कि अभी कहाँ है वह...किस ठिकाने

सवालों पर सवाल पूछे जाता है इसलिए नही कि उसे कुछ जानना है
बल्कि इसलिए कि उसने क्या जाना अबतक..... वह उसे जतलाना है
-अरुण

लगना और होना
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जैसा लगता है वैसा होता नही है
जैसा होता है वैसा लगता नही है
ध्यान से देखो तो सच्चाई समझ आती है
ध्यान अगर देखकर हो.. तो सच्चाई खो जाती है
-अरुण


अंतर-सुसंगती
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सितार से
संगीत अवतरित होता है
यह केवल सितार के तारों की कमाल नही,
केवल उन उँगलियों की भी देन नही जो तारों को छूती हुई
गतिशील होती हैं
न ही सारा श्रेय बजानेवाले के अंतरंग में
गूँजनेवाली स्वररचना को दिया जा सकता है

तीनों की आपसी अंतर-सुसंगती से ही सितार
बोल उठती है
-अरुण

मै वास्तविक हूँ
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“मै न आस्तिक हूँ, न नास्तिक हूँ,मै वास्तविक हूँ”
यह बात देश के एक महान रामकथा वाचक
के मुख से जब सुनी तो मन प्रसन्न हो गया।
ओशो के बारे में, मुरारी बापूजी महाराज
अपनी सोच को अभिव्यक्त कर रहे थे,
यह बात उन्होंने उसी समय कही
-अरुण

तन या मन
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तन, मन को चलाय
या मन, तन को...समझ न आय
न रह जाए दोनों में अंतर तो..
सवाल सुलझ जाय
-अरुण
वही बेसुर लगे
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झूठ सबके जिंदगी का प्राण है
सच की नज़दीकी से मन को डर लगे
मौत की आहट निकट से जब सुनी
जो रमाती धुन... वही बेसुर लगे
-अरुण
आमने-सामने और एकांत
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सामने से ही फले है आमने
आमने के सामने अरि-मीत है
भीड़ में हर आदमी एकांत होवे
जगत तो एकांत का ही गीत है
-अरुण
तात्पर्य
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‘तू’ की कल्पना में ही ‘मै’ की कल्पना जन्मती है। ‘मै’ के सामने कोई न कोई होता ही है-शत्रु या मित्र। ये आमने-सामने वाले संबंध अस्तित्व में होते ही नही। अस्तित्व में हर कोई एकांत में है (अकेला नही)। अस्तित्व तो एकांतमयी है।
-अरुण

क्या यह सच नही कि-
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छोटे छोटे बच्चों के साथ बैठकर गुड्डीगुड़िया जैसे बच्चों के खेल खेलनेवाले अभिभावक,
खेल में रमते हुए भी खेल से बाहर रहते हैं। परंतु अपनी निजी जिंदगी में अपने सांसारिकता के खेल से बाहर निकल नही पाते.....खेल में रमते हुए उसी में डूब जाते हैं।
-अरुण

मन संरक्षक या भक्षक
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हज़ारों वर्षों से गुजरकर शायद
उत्क्रांति ने
आत्मरक्षा के लिए आदमी के भीतर
मन को जन्माया है
मगर संरक्षण के नाम पर
मन के भीतर से
सृष्टि-संहार का ही दौर चल आया है

मन ने जंगल उजाड़े, प्राणियों और पक्षियों को
नष्ट किया और अब
सारी मानवता को ही बर्बाद करने का
इरादा रखते हुए
कई न्यूक्लिअर हथियार
इजाद कर रखे हैं
-अरुण


मन ले जाता है असलियत से दूर
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यादें ही याद करती हैं
यादें ही याद आती हैं
याद करना भी
और याद आना भी
दोनों ही साथ साथ
एक ही वक्त एक ही जगह
यादों के द्वारा ही

फिर भी आदमी समझता है
कि वही है जो याद करता है यादों को

समझ की उसकी इस
मूलभूत नादानी ने ही
उसके जीवन को
कई अन्य नादानियाँ से भर दिया है
कई परेशानियों में उलझा दिया है

ऐसे में,
अंतर-जागरण ही असलियत को
उजागर करता है
-अरुण

जानकार तो आदमी ही
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पीपल का पेड नही जानता
कि उसका नाम पीपल है
न ही बरगद अपनी विशेषता
को जानता है

अपनी अलग पहचान या जानकारी
तो आदमी की मजबूरी है
किसी और की नही

औरों को जीवन चलाने के लिए
कुदरत से बना हुआ उनका एकत्व ही
काफ़ी है
इसी एकत्व से दूर हो चुके आदमी को ही
जानकारी की जरूरत है
-अरुण
नया ही नये के काम आता है
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पुरखों ने दी है हमें
हमारी अपनी दुनिया
इस दुनिया की समस्याएँ भी हमारी अपनी हैं
और इसालिए समाधान भी होने चाहिए हमारे अपने....
इतना ही नही....आगे आनेवाली संतानों को भी
मिलने चाहिए जीवन जीने के ऐसे मौके,
जो हों उनकी अपनी परिस्थिति और समझ के अनुसार
नया ही नये के काम आता है
पुराना उसे आगे बढ़ने से रोक देता है
-अरुण
क्या है मेरा?
***********
“क्या है मेरा
और क्या मेरा नही है?”

इस बात पर सोचने से पहले
मुझे यह सोचना पड़ रहा है कि
मै क्या हूँ और मै क्या नही हूँ?
हूँ भी या नही?
गर हूँ तो कहाँ से कहाँ तक हूँ?

इन सवालों पर ही सोचते सोचते
जिंदगी कट जाए शायद!!!
-अरुण
देखना या घुलमिल जाना
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देखने के लिए जो देखना हो उससे कुछ दूर रहकर ही देखा जाता है
अगर उसमें घुलमिल जाओ तो फिर कौन किसको देखे?

जिंदगी को देखकर जीना है.....एक तजुर्बा... जो बयां हो सके
जिंदगी में घुलमिल जाना है.... एक एहसास.... जो बयां न हो सके
-अरुण



सफ़र एक ही मगर सोच अलग
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जिंदगी का सफ़र तो
एक ही है हमसब का.....
एक ही रास्ते से हम सब गुज़र रहे हैं
परंतु ‘चलना’ उस रास्ते पर हर किसी का
है अलग अलग
हरेक का ज़हन उसकी अपनी
‘चलने की अनुभूति’
का ही संचय होने के कारण
वह सोचता है कि वह और उसका सफ़र
दूसरों से अलग है
-अरुण

मन तो है एक भीड़
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दो या दो से अधिक लोगों में संवाद चले...
यह कोई नई बात नही
परंतु मन के बाबत ...
बात कुछ अजीबसी है

हरेक का मन उसका अपना एक निजी मामला होते हुए भी
वह मन...कभी भी एक या अकेला नहीं होता
एक ही समय..
मन कई भूमिकाओं में
बँटा हुआ रहता है
बोलनेवाला भी वही....सुनने वाला भी वही
दोनों को आपस में बोलते-सुनते हुए
देखनेवाला भी वही....
वही बहकता भी है और वही उसे बहकने से
रोकता भी है...
ग़ुस्सा भी करे वही और ग़ुस्से को
शांत भी करे वही...

बहुभूमिकाओं में उलझा हुआ यह
मनुष्य का निजी मन
कभी भी चुप नही रह पाता
वह अशांत है... वह अकेला नहीं
हमेशा एक भीड़ का रूप लिए हुए है
-अरुण


दुनिया होते रहने.. चलते रहने का नाम
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आकाश में, धरतीपर और ज़मीन की गहराई में
हरपल हरक्षण कुछ न कुछ होता ही रहता है

आदमी के संदर्भ में भी बात अलग नही, वही है।
उसके बाहर भीतर और सतह पर
किसी न किसी बदलाव का दौर
चलता ही रहता है
ऐसे ही होते रहने... चलते रहने
से ही दुनिया चल रही है

जब आदमी अपने होते रहने या चलते रहने से
ध्यान हटाकर बाहर देखता है तो उसे लगता है कि
दुनिया एक ठहरे हुई वस्तु या आकार के रूप में है

जब अपने में होते बदलावों को भुलाकर
ख़ुद को देखता है उसे लगता है
वह किसी अहंकार के रूप में है
-अरुण









































Monday, August 1, 2016

1-31 July Hindi Sher with Marathi version

1 -31 July Sher and Bodhsprshika
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एक शेर
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एक से ही टूटकर ‘उस’.. अनगिनत टुकड़े बने हैं
बस समाओ एक में ‘उस’..... छोड दो गनना उसे
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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नसणे किंवा असणे.. याच दोन शक्यता
मोजत बसणे............. हा गणिती प्रपंच
- अरुण
एक शेर
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व्यर्थ में सदियों न करना इंतज़ार, सच कह रहा
ठीक पीछे मै खड़ा हूँ बस पलटकर देख लो
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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खुद्द प्रकाश शोधणाराच ज़र अडसर असेल
तर मग उजेड त्याचे पर्यंत पोहचणार कसा?
- अरुण
एक शेर
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जन्म, मृत्यु, आयुरेखा, आपदाएँ,  ये नही अपने चयन
फिर किस चयन की बात करते हैं सभी दुनियाई बंदे?
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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अंगण निवडलेले असले आणि खेळ ही आवडी चा असला, तरीही
निवड करणाऱ्याचा जन्म किंवा मरण त्याला विचारून घडत नाही
- अरुण
एक शेर
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डोर जीवन की इसे सुलझी उसे उलझी लगे
डोर तो डोर ही रहे....जो भी लगे जैसी लगे
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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जगणे नेहमीच असते सरळ साधे
जगणाऱ्याची नजरच जाते वेडी वाकडी
- अरुण
एक शेर
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लहरें भटकाती हैं........निज सपाट पर
सागर से मिलना हुआ?....डूबकर ही जानो
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
वरवरचे जगणे राहते............ वरवरचेच
पोकळीत शिरल्या शिवाय ‘जगणे’ नाही
- अरुण
एक शेर
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सिर्फ साहिल तक पहुँचना है सरल
असली जोखिम है समंदर में छलाँग
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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नदीत डुंबण्याचा आनंद पाहिजे असणारे
नदीत डुंबण्याचे साहस न करता
घाटावरच थांबुन नदी चे गुणगान करत राहतात
- अरुण
एक शेर
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एक ही वह साँस जिसमें दुनिया जीती है
मेरी तेरी उसकी कहकर जी रहे हैं हम सभी
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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एकच वारा एकच प्रकाश
प्रत्येकाचे एकच आकाश
तरी ही प्रत्येकाला वाटे, माझेच खास?
असे कां ?
- अरुण
एक शेर
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जिसे मै ‘मै’ कहूँ ऐसा न ‘मै’ जीआ कभी भी
जिलाए जा रही बस याद उसकी याद की यादें
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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जे सर्वांचे ते कोणाचेच नाही
कारण ‘कोणी’ असा जगतात
न कधी होता न कधी राही
- अरुण
एक शेर
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खुद को देखना बाकी रहा और देख ली दुनिया
इसी दुनिया से, अब हम दरबदर अपना पता पूछें
- अरुण

मराठी बोधस्पर्शिका
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चश्मा लावून कांही ही शोधा, शिवाय
नाकावरल्या चश्म्याच्या
- अरुण
एक शेर
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सुख का नही है कोई दुख से अलग ठिकाना
ऊपर उठे तो छत है...........नीचे रहे तो फ़र्श
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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सृष्टी म्हणजे जणु अख्ख् एकच झाड़
ज्याची प्रत्येक फाँदी प्रत्येक पान वेगळ्या रंगरूपाचे....
ज्यांना रंगरुपातील हे वेगळेपण दिसते
ते भेदबुद्धीने ग्रासतात
ज्यांना ते सर्व एकूण एकच झाड आहे असे दिसते
ते सृष्टीच्या एकत्वात रमतात
- अरुण
एक शेर
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मराठी बोधस्पर्शिका
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हा गोड़ समज की
शरीरावर असते मनाचे नियंत्रण,
तोवर कायम होता जोवर
ध्यानात न आले की
मन सुद्धा आहे शरीराच्याच आधीन
- अरुण
एक शेर
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जैसा देखा सुना बयां वही नही होता
समझनेवाले का भी अनुमान ही सहारा है
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
जसेचे तसे सांगता येत नाही शब्दांतुन
समजणाऱ्याने ही शेवटी अंदाजानेच ओळखावे
- अरुण
एक शेर
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अब और अभी ..
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जो गुजर चुका उसे पकड़कर रख्खे
जो आया ही नही, उसे बांधकर रख्खे
- ऐसी नादानीवाला यह आदमी का दिमाग
कैसे देख पाए ?
जिंदगी का अब और अभी..
-अरुण
एक शेर
*******
जो गुज़र चुका उसे थामकर जो हुआ नही उसे देख ले
मौजूदगी सोयी हुई....................हर वक्त इंसा बेख़बर
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
दिवसा विचारांची गड़बड़ रात्री स्वप्नांची दगदग
जगण्या साठी पाहिजे तशी वेळ अजुन सापडत नाही
- अरुण
एक शेर
*******
दिखाया किसीने रास्ता और हम चल पड़े उसपर मगर
न यह सवाल उठा के क्या कहीं कोई रास्ता होता भी है?
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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ज्या प्रांतात..... निघणे, चालणे, पोहचणे अशा क्रिया नाहीतच
तिथे गंतव्य, मंजिल किंवा मुक्काम या शब्दांचेही काय औचित्य?
- अरुण
एक शेर
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सामने जो भी तमाशा.. है तुम्हाराही तमाशा
बात दुनियाकी करो या खुदकी, दोनों एक ही
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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समोरच्यात जे जे दिसते ते बघणाऱ्यात ही असते
समोर आरसा आहे हे बघणाऱ्याने विसरायचे नसते
- अरुण
एक शेर
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उड़ी जो धूल चमकते कणोंपे जो उभरा
वही है चित्र हमारा हमारी दुनिया का
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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माणसातला ‘मी’ म्हणजे उडणाऱ्या धुळीच्या कणांवर चमकणाऱ्या
चित्रा सारखा. या चित्रालाच काल्पनिक जीवन मिळते
आणि तेच वाटते या ‘मी’ ला त्याचे जीवन
- अरुण
एक शेर
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अजीब है व्याकरण जिंदगीका चीज़ें हैं नही,लगती हैं
वक्त भी होता कहाँ है मगर सुईयां उसकी चुभती हैं
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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नसून ही कांहीही इथे जग आहेच आहे
काळ नसला तरी काल आज उद्या आहे
- अरुण
एक शेर
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बँट जाए जो भीतर वही तो बड़बड़ाए
एकही बनके रहे उसमें मौन बस जाए
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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माणसाच्या जाणीवेचे अनेक तुकडे
एकमेंकांशी बडबडत असतात
आणि म्हणुनच माणुस अस्वस्थ असतो
- अरुण
एक शेर
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ख़्वाहिशों ने ही मचाया है बवाल बेतहाशा
और ख़्वाहिशों ने ही की उम्मीद के सुकून आ जाए
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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हे हवे ते हवे ह्या हव्यासालाच
आता हवी आहे शांतता आणि मुक्तता
- अरुण

एक शेर
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मसला ये है के मसलोंसे मुंह चुराता हूँ
शिकायत भी करूँ के ये हमें जीने नही देते
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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सामोरे जाई त्याच्यासंगे जीवन नाचे
भित्यापाठी मात्र ब्रह्मराक्षस
- अरुण
एक शेर
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हरकोई सवालात सवालात नही होते
कुछ सुलझी हुई बातें भी उलझा देतीं
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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धाग्यात धागा गुंतला की झालेला गुंता सोडवण्यासाठी प्रयत्न करावे लागतात,
परंतु मनातला गुंता किंवा confusion , त्याचे गुंतलेपण स्पष्ट दिसुन येताच सुटतो.
मानसिक गुंत्यांबाबत स्पष्टपणे बघणे हीच एक कृती ठरते, वेगळी कोणती
कृती करण्याची गरजच नसते.
- अरुण
एक शेर
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सब अपने अपने इतिहासों से मेरी बात समझते हैं
कोई इसतरह, कोई उसतरह, तो कोई कुछ और समझता है
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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प्रत्येका समोर असतो तो एकच देखावा
मग बघणाऱ्यांना वेगवेगळा कां दिसतो?
- अरुण
एक शेर
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वैसे तो मै ही हूँ अपना परिचय अपनी सोहबत-ओ-परेशानी
वरना कौन है इस जहान में अपना या के पराया ?
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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म्हटले तर.... सारेच इथे आपले... म्हटले तर... कोणीच कुणाचा नाही
- अरुण

एक शेर
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कोशिशों से न कोई नम्र हुआ करता है
कोशिशें नम्रता विनम्रता के ठीक ख़िलाफ़
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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इथे नम्रतेचे पारितोषिक इच्छिणारेच सारे
पण नम्र कुणी ‘इक्का दुक्का’च
- अरुण



एक शेर
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तुम्हें लगती मेरी बातें कठिन उलझी जटिल क्यों?
शायद, तुम्हें अच्छा लगे.... वह कह न पाऊँ मै
- अरुण
एक शेर
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सीधी सरल बातेंभी तेरे ध्यान ना आती
शायद, ‘निरा पांडित्य’ तुमको मोह लेता हो
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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स्वत:च्या आंत-बाहेर जगत-दर्शन शक्य असताना ही
माणसाला अज्ञानापोटी ‘आध्यात्मात’ शिरण्याचा मोह होतो
- अरुण
एक शेर
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आदतें तो आदतें अच्छी बुरी... संस्कार-बंधन
इनकी पकड से मुक्त होनाही समझदारी चरम
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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समाजाचे स्व-संरक्षणा चे भानच सरल जीवनाला कठिन करते
पण माणसातली समज-दृष्टीच केवळ...हे काठिन्य विरवू शकते
- अरुण
एक शेर
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न है मौजूद...........उसका ख़्याल ही मौजूद है हरदम
हटाना ‘मै’ बड़ा तिकडम जो बन जाए ये ‘मै’ हमदम
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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‘मी’ पासुन मुक्त होणे कठीनच, कारण
जो न ‘होता’ कधीच त्याला नाहीसा करणे कसे शक्य?
- अरुण
एक शेर
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फ़र्क़ तो है जमीं आसमांका, एक देखे उसेही कहे
और दुजा बस कहे कहे कहे........... बिना देखे
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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दृष्टांत बोलतात तेंव्हा........ सत्य उमजतं
सत्या बद्दल किती ही बोला, बोलणे व्यर्थ
- अरुण

एक शेर
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शब्दों से जो परे है...... गीता ने है कहा
फ़ितरत युगों युगों की, शब्दोंको ही पढ़ा
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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जगात, सत्य लाख वेळा सांगितले गेले तरी
ऐकणाऱ्यांचे कान असत्याकडेच लागून होते
- अरुण









Thursday, June 30, 2016

१ जून से ३० जून २०१६

एक शेर
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जिंदगी खुद चलके आती है जीती है हर सांस में अपने
हम समझते हैं के ये हमारी है.........हम जी रहे हैं उसे
- अरुण

एक शेर- २ जून २०१६
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न यादों का सिलसिला होता न होती खाबों की ज़रूरत
हर साँस आदमी की बन जाती एक मुकम्मल जिंदगी
- अरुण

एक शेर- ४ जून २०१६
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दूर की शुरुवात होती अपने घर से ही, मगर
घर को तो देखा नही... ब्रह्मांड की बातें करें
- अरुण


एक शेर
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गहरा, धूसर, फीका अंधेरा..बंद आँखों में है तीनों का बसर
रौशनी छेडती है पलकों को ..पलके हैं...... बेख़बर बेअसर
- अरुण
एक शेर
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खेल के वास्ते खींची लकीरें थी......... यहाँपर
बिगड़ते मेल दिल का बँट गये सब लोग पालों में
- अरुण
एक शेर
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रोना-हँसना एक जैसा ही दिखे फिर भी समझ के
भीड़ में... हर शख़्स की है दास्ताँ बिलकुल अलग
- अरुण

एक शेर
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सारी दुनिया का होवे एक ही दिल एक ही सांस
बंदा समझे के....... दुनिया उसके लिए जीती है
- अरुण
एक शेर
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जिन रास्तों से थे गुज़रकर आ गये
उन्हींको खींच लाते और बनाते हो नये?
कहींभी चलके जाओ इन बनाये रास्तोंपर
मिलेंगे जो तजुरबे वे नही होंगे नये
- अरुण
एक शेर
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डिब्बा AC हो के होवे General, रेलका
रफ़्तार सबको एकजैसी ही हुई हासिल
- अरुण
एक शेर
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क्षितिज की खोज में निकलूँ ......यही था बारहा ठाना
मगर हरबार मुश्किल बन गया ‘खुद’ से निकल पाना
- अरुण
एक शेर
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जो बात बयां हो न सके क्यों करे बयां ?
लफ़्ज़ों में ढल सके न कभी नूर-ए-जहाँ
- अरुण
एक शेर
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लगी हो आग तो फिर..... आग पे डले पानी
लगी है घरको तो खलिहान क्यों भिगोते हो?
- अरुण
एक शेर
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ढूंढने निकलो तो ‘वो’ कैसे मिले?
‘वो’ मिला ही है उसे बस देखना काफ़ी
- अरुण
एक शेर
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परछाई कहो या कहो ढकी हुई रौशनी का अन्जाम
मस्तिष्क तो है इन्हीं परछाईयों के खेलने का मैदान
- अरुण
जिंदगी क्या चीज है ?...
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जिंदगी चखने की चीज है ..बकने की नहीं
देखने की चीज है .............पढ़ने की नहीं
सुनने की चीज है ............सुनाने की नहीं
फिजा को महकाती है ........बहकाती नहीं
और जब निर्मन हो तो
छूती है सारे अस्तित्व को
-अरुण

हिंदी
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ब्रह्मांड का ही जीवमय इक पिंड मानव देह भी
इस तथ्य को जी रहा....... ‘योगी’ उसीको जानिए
- अरुण
एक शेर
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भटककर मँझधार से मै जो किनारे आ गया हूँ
अब, घाट घाटों दरमियाँ ही राह मंजिल और सफ़र
- अरुण
एक शेर
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जैसा चाहो वैसा दिख जाता यहाँ, हर कोई जिंदाभी और मुरदा यहाँ
प्राण ऊर्जा भर रहे निरजीव में या जीव भरता प्राण में ऊर्जा यहाँ ?
- अरुण

एक शेर
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हज़ारों खिड़कियों से सूर्य धरतीपर उतरता है
लगे प्रत्येक खिड़की को अलग ही सूर्य है उसका
- अरुणl

एक शेर
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हो धूलभरी बुहारी तो धूल कैसे झाड़ना
है मुश्किल मन से मन को मिटा पाना
- अरुण
एक शेर
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लगता है ‘मै हूँ’ का मतलब ये नही ‘मै हूँ’
बना जाता है ‘होने का’ एहसास.... ‘लगना’
- अरुण
एक शेर
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न कोई चीज़.......... और न खरीदनेवाला
मन है इक बाज़ार जहाँ बिक्ता बेचनेवाला
- अरुण
एक शेर
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‘देखने में भूल’ केवल एक ही वह भूल
जिससे जिंदगी की राह बन जाए दुश्कर
- अरुण
एक शेर
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हजारों दूर चलकर भी जहाँ था हूँ वहींपर
खुली आँखें तो पाया पैर केवल चल रहे थे
- अरुण
एक शेर
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इस झूठी जिंदगी को चाहिए एक झूठ अहं का
इसके परे न होवे....... किसी काम का ये झूठ
- अरुण
एक शेर
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है वहाँ भी कुछ जहाँ लगता नही....कुछ होगा
उसी कुछ से उभर आता है सबकुछ नामधारी
- अरुण
एक शेर
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मै, खुद, खुदा, परमात्मा... ये लफ़्ज़ केवल हादसे हैं
ये नही होते तो कुदरत.............. सोवे रहती चैन से
- अरुण
एक शेर
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दिल की बात जबां पर जस की तस नही आती
है यही वजह शायद के....... सच बयां नही होता
- अरुण




Wednesday, June 1, 2016

मई २०१६

एक मुक्तक
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गुजरता है जहां जहां से अपना होना,
वहां वहां की शक्ल ओढ लेता है
कभी सांस, कभी दर्द, कभी एहसासे जिगर
ज़हन के पास मगर पूरी तरह खोता है
- अरुण
एक शेर
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हवा तो छू रही है पर कभी देखी नही
है दिखता आसमां फिर भी कभी छूता नही
- अरुण
एक शेर
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क्या मिलेगा सोचे रख्खे..... खोजने के पूर्व ही
सत्य उसकी खोज में आये तो आये किसतरह?
- अरुण
एक शेर
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आदमी न किसी बंधन या कारागार में हुआ
बंधन या कारागार का ही नाम.....आदमी
- अरुण
एक शेर
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जिंदगी तो जी रही है खुदको अपने ढंग में
मगर अफ़सोस के बंदा चाहे उसे अपने रंग में
- अरुण

एक शेर
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एक ही चीज़ के हों सौ नाम, चीज़ बँट नही जाती
हो नज़रिए हज़ार भले ही... दुनिया टूट नही जाती
- अरुण
एक शेर
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दरो दीवार........ इसको रोक पाती है नही
यही सच्ची मुहब्बत है, नही कुई राजनीती
- अरुण




एक शेर
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एक ही वक्त कई वक्तों में रहता जो है
बंदा, बीता हुआ, जीता हुआ, अजन्मा है
- अरुण


एक शेर
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ज़मीं पे रख्खे आड़ी.. अपने ज्ञान की सीढी
नही पाया पकड कोई समझ का आसमां
- अरुण

एक शेर
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सामने है जो धरी तस्वीर है जिसमें..
जानी पहचानी हुई एक शक्ल है
जबभी उसको ग़ौर से देखा...
सिवा बस रंग रेखा बिंदुओं के कुछ न था उसमें
- अरुण
एक शेर
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काग़ज़ पे लिख रही है क़लम ख़्याल-ए-ज़हन
काग़ज़ को सिर्फ स्याही का मिलता सवाद है
- अरुण
एक शेर
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उड़ना हो आसमां में पंखों की हो ज़रूरत
ऐसे भी हैं कि जिनको धरती न खींच पाती
- अरुण
एक शेर
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अपनी ख्वाहिशों को जिंदगी में ढालने के बजाय
जी लेने दो ख़ुद जिंदगी को....... उसकी धुन में
- अरुण
एक शेर
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बने बनाये रास्तों की बनी बनाई मंज़िलें
कहो तो, सच मंजिल भी और रास्ता भी
- अरुण







एक शेर
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अपने बनाये पिंजड़े में बंदा फँस गया है
भीतर ही इस जाल के अवारा उड़ रहा है
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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माणूस बंधनात आहे........असे न म्हणतां
बंधने म्हणजेच माणूस.......हेच कथन खरे
स्वातंत्र्याच्या सर्व बाता....लागू नाही त्यास
कारण बांधलेल्या आकाशातच तो ‘मुक्त’ उडे
- अरुण
एक शेर
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मिट्टी को बू नही है किसी मुल्क जात की
ये तुम बंधे हुए हो उसे...........वो अजाद है
- अरुण
एक शेर
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सामने छोर पे जैसीभी होती दिख रही हलचल
उसी को देखकर इस छोर की तस्वीर बनती है
- अरुण
एक शेर
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मै नही हूँ...... है मेरी बस याद भीतर
भूल जाना सत्य को इस, मेरी फ़ितरत
- अरुण



एक शेर
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पाँव ठीक हैं आँखें भी हैं ठीक फिर भी लड़खड़ाता है?
भूत का हांथ पकड........ जो वह आगे बढ़ा जाता है
- अरुण
एक शेर
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असलियत को देख सकने का हुनर होते हुए भी
झूठ से ही दिल लगाने में बड़ा आता मज़ा है
- अरुण
एक शेर
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उस किनारे हो रहा है.........इस किनारे हो रहा
कोई कुछ करता नही है, सब यहाँ बस हो रहा
- अरुण
बनारस के मित्रों को याद करते हुए लिखी यह रचना
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रास्ते उनकी तरफ़ खुलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

अब भी उनका ज़िक्र छूता है जुबां
अब भी बाकी रूह पर उनके निशां
जिनके साये खाब से हटते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

हो अचानक ख़्याल में उनका दीदार
है दबा सा ज़हन में इक इंतज़ार
फिर भी जो हैं फ़ासले, मिटते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

क्या पता बिसरे या रखते मुझको याद
दिल में उनके मेरी जैसी ही मुराद
इन सवालातों के हल मिलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

रास्ते उनकी तरफ़ खुलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही
- अरुण




एक शेर
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मन में, सामने का चित्र बदले जा रहा रफ़्तार में
पर मुझे लगता के बदले जा रहा है स्थान मेरा
- अरुण
एक शेर
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नज़र के दायरे में जो भी आते......एक हैं
नज़र गर आसमां हो रात दिन भी एक हैं
- अरुण

Sunday, May 1, 2016

१५ अप्रैल हिंदी

15 April 2016
एक शेर
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जिसके लिए बदन हो किरायेका इक मकान
उसको न चाहिए कुई चादर मज़ार पर
-अरुण
एक शेर
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मौज उठती ओ उठाती है........ कई मौजों को
आदमी उठ्ठी लहर.. इसके सिवा कुछभी नही
- अरुण
एक शेर
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जैसी लगती वैसी होती है नही ये जिन्दगी
है यही कारण के सच कभी नही देखा गया
- अरुण
एक शेर
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जो जी ली जिंदगी उसीको नये से जीना
फिर कहना कि है ये नई .... सच नही
- अरुण
एक शेर
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एक पल ही जिंदगी है मगर हमको क्या पता
हमने तो याद-ओ-खाब से रिश्ता बना लिया
- अरुण
एक शेर
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अपने ही जहन्नुम में साँस लेते हुए
देखते खाब तो जन्नत के ख़्यालमें डूबे
- अरुण
एक शेर
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रुक न सके... तन-मन से.. जिंदगी का धुआँधार बहाव
एक दिन तो टूटेंगे ही.... ये किनारे, ये बाँध और पड़ाव
- अरुण
एक मुक्तक
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पूरीतरह से साँस लो पूरीतरह से छोड
आधीअधुरी जिंदगानी काम की नही
- अरुण
बेहतर है नज़ारों से नज़ारों को देखना
आधीअधुरी नज़र किसी काम की नही
- अरुण
एक शेर
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देखना और दिखना एक ही काम के दो नाम
साकारना यह सत्य जीवन में...है सत्यकाम
- अरुण
एक शेर
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मन में अपने जैसे झांका.....दिख पड़ा सारा जहाँ
सब तरफ़ जा जाके देखा अपना ही मन है वहाँ
- अरुण
एक शेर
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आसमान में पंछी होता या पंछीमें आसमान
जो जैसा है वैसा है जिसको जैसा भाए मान
- अरुण
एक शेर
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पढ़ेपढाये सवालों के उत्तर भी पढेपढाये
कठनाई में.......... किसी काम न आये
- अरुण
एक शेर
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सारा बीता इकट्ठा ही... जी उठता
और हर नये पल को खाता रहता
- अरुण
एक शेर
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‘बिन बोये मिलता नही’ नही कथन यह झूठ
‘बोने से निश्चित मिले’.. यह भी कहना झूठ
- अरुण
एक शेर
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जहांतक ध्यान है तेरा वहांतक स्थान है तेरा
जो केवल खोपड़ी में जी रहा जीवित नही है
- अरुण







Thursday, April 14, 2016

14 April 2016

एक शेर
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पीठ पीछे जो हुआ....... वोही दिखे है सामने
असलियत जिस हाल में हो एक जैसी ही हुई
- अरुण
एक शेर
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खोजने को कुछ नही..........सब खुल्ले रख्खा  
खोज जिसकी भी करो.........स्व-पल्ले दिख्खा
- अरुण
एक शेर
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यह यहाँ अभी हुआ.......... वोही हमेशा हर तरफ
खोजते हो क्यों समय के चाक चढ़कर सब तरफ़
- अरुण
एक शेर
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अबतक तो जी रहे हो ढली ढलती जिंदगी
जाना न ……..जिंदगीकी हुआ करती जिंदगी
- अरुण
एक शेर
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नाटकों में, किरदार निभाये जाते हैं
जिंदगी में मगर निभा लिए जाते हैं
- अरुण
एक शेर
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मिची आँखों के सामने सपने, खुली आँखों के सामने भी
यही वो हकीकत है शायद जो किसी नींद से गुज़रती रहती
- अरुण
एक शेर
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हर वक्त रुका ठहरा, लगता के चले हरदम
आंखों में न जो आये....पूरी कुदरत एकदम
- अरुण




एक शेर
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जटिलता ही बनी आदत, कठिनता अब भली लगती
सहज सीधा सरल जीवन बिताना बन गया मुश्किल
- अरुण
एक शेर
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न है अंधेरे का कोई वजूद और न कोई चिराग़ जलाना है
समझ की ज्योत जले........................पूरी धुंध हट जाए
- अरुण
एक शेर
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जिंदगी… जीकर मरने और मरकर जीने का नाम नही
जिंदगी है.............. हर वजूद का वजूद में बने रहना
- अरुण
एक शेर
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कुदरत में सबकुछ एक का एक.. दुनिया में जुदा जुदा
रिश्तों ने बनाई दुनिया...........जहाँ सारी झंझटें बेवजह
- अरुण
एक शेर
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उजाले रह के भी अंधों से बदतर हो गई हालत
दिखाते रास्ता जो ख़ुद किसी सपने में उलझे हैं
- अरुण
एक शेर
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जो नया पूरी तरह पहचान में क्या आ सके?
पहचानने का काम माजी ही करे हर हाल में
- अरुण
एक शेर
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जो हैं हम...... वही फिर होना है हमें
जो थे ही नही उसे फिर खोना है हमें
- अरुण
एक शेर
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‘जानने’ से जान बन जाएहै जो जाना गया
दूर रख जाना हुआ तो सिर्फ पहचाना गया
- अरुण


Thursday, March 31, 2016

31 March 2016

एक शेर
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जो नही पाया जनम.........मरने का उसके इंतजार
जिसका होना सच नही उस ‘मै’ को क्योंकर मारते
- अरुण
एक शेर
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जो बिलकुलI साफ़ होता है नही आता नज़र
हवा छूकर निकल जाये.... नही आती नज़र
- अरुण
एक शेर
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अपनी ख्वाहिशों को जिंदगी में ढालने के बजाय
जी लेने दो ख़ुद जिंदगी को....... उसकी धुन में
- अरुण
मुक्तक
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कमाना ज्ञान हो तो कोशिशें करनी पड़ें
धरा है सामने बस बूझना काफ़ी हुआ
जिनको मिला ऐसेही सस्ते में मिला है
जिनको नही..... वे जूझते ही रह गये
- अरुण
एक शेर
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बदल रही है जगह या बदल रहा है स्वरूप
खड़ी है वस्तु सगर...... राह पे चलते चलते
- अरुण
सगर=सभी
एक शेर
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जो बीत गई वो बीत गई.. जिंदा नही है
याद में आना किसीका..कोई आना नही है
- अरुण
एक शेर
********
हर कदम पे असलियत को भूलना चाहे
मगर, उसकी चर्चा उम्रभर करता रहे
- अरुण


एक शेर
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जबतलक आदमी... आदमी से मुख़ातिब न था
झंझटें रिश्तों की बसा करती थी........कोसों दूर
- अरुण

एक शेर
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जी लेना जिंदगी को..न जाने क्या होता है?
अबतक तो जिंदगी ने ही जिया है मुझको
- अरुण
एक शेर
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जो जैसा है ठीक वैसा ही नही लगता
है यही वजह.......सारे शोरो शराबे की
- अरुण

 एक मुक्तक
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न होगी कुई चाह
न होगी साँसों में कुई उमंग या आह
मगर अफ़सोस, जिंदगी बन चुकी है
चाहत का ही इक सिलसिला
- अरुण
एक मुक्तक
*********
जहाँ सच पड़ा हो झूठों के हांथ और
झूठ ढल चुका हो अच्छे नारों में
ऐसी विसंगत स्थिती को
कह लीजिए
रा-ज-नी-ति
- अरुण
मुक्तक
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मै चलता हूँ तभी
नीचे बनती जाती है जगह
और तभी समय भी निकल पड़ता है
उस जगह पर घटनेवाले
मेरे चलन या मेरी गति को आँकने के लिए....
जगह और समय के संपर्क में
जगह और समय से जुडी सारी बातें/चीज़ें
जगा देती हैं
एक ‘मै’ और अनेकों ‘वो’......
इसतरह द्वैत उभरते ही
एक जगत उभरता है...
और फिर मै और मेरा जगत टिके रहते हैं एक दूसरे पर
एक अविरत भ्रमजाल के रूप में
- अरुण
एक शेर
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जो चल पड़े.. है खयाल उसमें..वक्त-ओ-फ़ासले का
जो दिख पड़े है उसे..... उस नज़र- ओ- नज़ारे का
- अरुण
एक शेर
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गुबारे में हवा भर दो अकड़कर वो उड़ा जाए
दिवारों को भी ललकारे मगर काटों से कतराए
- अरुण
एक शेर
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जिनका नही वजूद कोई..... फिर भी है एक जहान जिनका
ये मन-परछाइयाँ, जो रिश्ता बनाती चलाती और निभाती हैं
- अरुण

एक मुक्तक
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यह जिंदगी है या सिनेमा हॅाल, जहाँ
रोशनी जगाती नही सुलाती है
हॉल में तो अंधेरा ही मगर रोशनी स्क्रीनपर
कल्पनाओं के चलचित्र बनाती है
- अरुण
एक मुक्तक
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क्या नही ‘मै’.... जानना मुश्किल नही
क्या हुआ ‘मै’......कौन कैसे जान पाए?
फ़ासला हो बीच...... तब ही जान सकते
हो सकल एकत्व वह क्या जान पाए?
- अरुण

















   

Monday, March 14, 2016

14 March 2016

एक शेर
********
कुदरत की कोख है......कुदरत निकल रही
हमने समझ लिया के....... बेटा जनम रहा
अरुण


है समंदर ही उछाल लेता हुआ
न मौजों से मौज...... टकराए
पूरे ज़हन का मथना... ख़ुद में
कोई  न मन को .......चलवाए
- अरुण

रुबाई
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जिंदगी द्वार खटखटाती है.... हाजिर नही है
टहलता है घर से दूऽऽऽर..... हाज़िर नही है
ख़याली शहर गलियों में.. भटकता चित्त यह
जहांपर पाँव रख्खा है वहाँ ...हाज़िर नही है
अरुण
एक शेर
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बहका मन फिर मन से ना वो राजी होता है
क़ाबू करनेवाला ही......... बेकाबू होता है
अरुण
एक शेर
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उजाला हो दिखे अंधियार में दिखता नही
नज़र में रौशनी हो तो.....सबब कोई नही
अरुण
एक शेर
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साया दिख रहा हो.. पर कभी छूता नही
मतलब शब्द को छूता मगर दिखता नही
- अरुण

एक शेर
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हवा ही बात करती है हवा से आती-जाती है
हकीकत तो जमीनी थी यहींपर और यहीं है
अरुण

एक शेर
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नही हैं रास्ते दो ज्ञान भक्ती....... ........दो अदाये हैं
हिलाकर सर कोई तो सर झुकाकर दाद देता है कोई
अरुण
एक शेर
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आग से उठ्ठे धुएँ में... एक निश्चय आ बसा
खोज लूँ अंगार वह जिसने ऊगाई आग थी
अरुण

एक शेर
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रास्ते की हर खरी बाधा का होते ज्ञान भी
चूक जाती है नज़र और पाँव गिरते खड्ड में
- अरुण

एक शेर
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सामने से जो भी गुज़रे अपनी यादें छोड़कर
उन तजुर्बों के बदौलत.... जी रहा हूँ उम्रभर
- अरुण
एक शेर
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जान जी रही है ....अभी इसी धड़कन में
हम तो जी रहे हैं बेजान.. किसी माजी में
अरुण
एक शेर
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जिसे शुरुवात कहते हम किसी का अंत है
यहाँ जो भी हुआ होता रहे.... बस अनंत है
अरुण
एक शेर
********
नज़र है सामने पीछे मगर वह देखती रहती
क़दम चलते डगर हर वक्त, जो सहमें हुए
अरुण
एक शेर
********
अपने साये से परेशां हो चुका हूँ
भागना चाहूँ तो भागूँ किसतरफ
- अरुण




Tuesday, March 1, 2016

१ मार्च २०१६

एक शेर
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बहते पानी से निकल आते हैं किनारे दो
सोच बहती तो.. सोच-ओ-सोचनेवाला
अरुण
एक शेर
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रफ्तार से दौडती गाडी...उठता है बवंडर जिससे
सोचता....ये जो रफ़्तार है गाडी में.. ...है उसीसे
अरुण
एक शेर
*********
खुदमें में बैठे  देखूँ दुनिया.....ख़ुद को देखूँ
दुनिया बैठे देखूँ............तबतो दिखे खुदा
अरुण
एक शेर
*******
गीता और क़ुरान में जो भी लिख्खा ग़ौर करो
किस काग़ज़ पर लिख्खा इसका ख़्याल न कर
अरुण
एक शेर
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अपना ये.. पराया वो...यही इंसान की फ़ितरत
भला है के.. नही कुदरत ने थामा...... ये रव्वैया
अरुण
एक शेर
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अपनी सूरत आइने में हूबहू...लगती भले
पर सभी अपने ही चेहरे पर लगाते पावडर
अरुण
एक मुक्तक
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नही जबतक जगा हो चित्त 'अर्जुन' का
उसे हर 'कृष्ण' की बातें लगें बेबुझ, कठिन अचरन
हज़ारों प्रश्न पूछे सुलझने के वास्ते, मुर्छा
मगर जागे हुए की बात तो.....उसके लिए  उलझन
अरुण







एक शेर
*******
चकाचौंध है मन-प्रकाश की इतनी गहरी
भरी दुपहरी भी.....अँधियारासा लगता है
अरुण
एक शेर
*********
मै, मेरे, मेरों के मेरे.....और क्या इस ज़हन में ?
वो जगह बतला जहाँ ये सब के सब हों लापता
- अरुण
एक मुक्तक
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छोटे से ज्ञानकी....... छोटेसी अँखियाँ
कैसे निहारेंगीं ...... दुनिया की दुनिया?
जबसे ये बात...........असर कर गै है
ज्ञान छोड ध्यान से.... देखता हूँ दुनिया
अरुण
एक शेर
********
इस दुकां से उस दुकां तक..... घूमती मेरी नज़र
और 'उसको' एक ही पल....दिख पड़े पूरा बझार
अरुण
एक शेर
*******
जिनके सहारे से...............  'उन्हे' दर्शन हुए सत के
थी 'उनकी' साफ़ नज़रें और ज़हन भी.... साफ़ सुथरा
अरुण
एक शेर
*****
निकलते आंख से आंसू कभी तेरे कभी मेरे
अलहिदा है नही ये गम, ये तेरा हो के मेरा हो
-अरुण

रुबाई
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पहनावा शख़्सियत का पहनो...उतार दो
आदम से जो मिला है.. उसको सँवार लो
अपने लिबास में ही.... जकड़ा है आदमी
तोड़ों न बेड़ियों को ........ बंधन उतार दो
अरुण

एक शेर
*********
आदमी में आदमी है.....चीज़ तो बेजान है
चीज़ है जो काम आवे... आदमी अरमान है
अरुण
एक मुक्तक
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नद धार बहे, सट घाट बहे, बहना ही जीवन का स्वभाव
जाना ना रुकना, बहते ने, स्थिरता ढूंढे वह......मूढ़ भाव
-अरुण
एक शेर
********
मरना ही जिंदगी है.... माजी को होगा मरनाू
हम, मुर्दा जिंदगीके ....... कपड़े बदल रहे हैं
- अरुण

समंदर में मिलाए रखिए
***********************
हो पता सुबह को, कहाँ पे आना है?
अंधेरे में दिया जलाए रखिए
***
परछाइयाँ गर आँखों को सताने लगें
रौशनी पे आँखें गड़ाए रखिए
***
आसमां भी इसमें सिमटना चाह्ता है
मुहब्बत को ऊपर उठाए रखिए
***
किनारे भी टूटेंगे किसी रोज़, आख़िर
तूफ़ाँ को अपना बनाए रखिए
***
आसमां से जो टूटा, नही लौटा, तारा
ये मौज है, समंदर में मिलाए रखिए
- अरुण
२/१२/२००४
एक शेर
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बैठकर किनारे न जानो रवानी नदीकी
जो उतर जाए नदी में.... नदी बन जाए
अरुण




रुबाई
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पांवके नीचे दबा क्या......मैने देखा ही कहाँ
दर्द को..भीतर उतरकर.... मैने देखा ही कहाँ
मै तो दौडे जा रहा.. बस वक्त का रहगीर बन
हर कदम आलम मुसल्लम,मैने देखा ही कहाँ
अरुण
एक शेर
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है रास्ता एक ही ..... रौशनी जगाने का
चिराग जलाना और सामने से हट जाना
अरुण
एक शेर
*********
यह जगत टूटा हुआ तो है नही...लगता ज़रूर
और फिर आते निकल.. स्वार्थ,भय,इर्षा,ग़रूर
अरुण
एक शेर
*********
जो सवाल हल करने बैठा मै मुद्दत से
खुदही हूँ............. वो सवाल पेचीदा
अरुण
एक शेर
********
वैसे, धरती और आकाश..... मुझसे कहां जुदा है?
ये फ़ितरत मेरी.........मैंने खुदको जकड लिया है
अरुण


ग़ज़ल
**************************
हज़ारों हैं ...करोड़ों जीव हैं....  पर  आदमी जो
समझता है..ये दुनिया है....तो केवल आदमी ही

कहीं से भी कहीं पर .....जा के बसता है परिंदा
मगर पाबंद कोई है..........तो कोई  आदमी ही

जभी हो प्यास पानी खोज लेना.. जानती क़ुदरत
इकट्ठा करके रखने की हवस.......तो आदमी ही

बचाना ख़ुद को उलझन से सहजता है यही लेकिन
फँसाता खुद को....बुनता जाल अपना आदमी ही

बदन हर जीव को देता ज़हन..... जीवन चलाने को
चलाता है ज़हन केवल .........तो केवल आदमी ही

खुदा से बच निकलने की ....कई तरकीब का माहिर
खुदा के नाम से जीता ..... .....तो केवल आदमी ही

अरुण

सपनों भरी है जिंदगी
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दिन के सपने
रात के सपनों पे हंसते हैं...और फिर
कब नींद से जा मिलेते हैं -
इसका उन्हें पता ही नही....
रात और दिन की
इस सपनों भरी जिन्दगी ने..
सपनों के बाहर क्या है
इसे कभी जाना ही नही है
-अरुण  

Sunday, January 31, 2016

३१ जनवरी २०१६

रुबाई
******
दिल की धड़कन ..मन की मन मन... धमनियाँ हैं तर
देख चलती जिंदगानी और ...........उसका हर असर
अपने भीतर और बाहर.. .........जिंदगी जिंदा सबक़
व्यर्थ के प्रवचन सभी सब ........... और चर्चा बेअसर
- अरुण