Wednesday, April 12, 2017

पंछी और पिंजड़ा

पंछी चाहे
पिंजड़े की पकड से छूटना,
यह बात सही सहज स्वाभाविक है, परंतु
जिस क्षण पंछी का अपने भीतर फड़फड़ाना
पिंजड़े के लिए कष्टदायी बने, आदमी
उसी क्षण की तलाश में बेचैन है
क्योंकि
आदमी अपने को
कभी पंछी समझता है तो
कभी पिंजड़ा..
यह देख ही नही पाता कि
वह स्वयं पंछी भी है
और पिंजड़ा भी....
-अरुण

Tuesday, April 11, 2017

मुक्तक

मुक्तक
******
आकार देख पाया नही .........निराकार को
नाम दे सको न कभी तुम.........अनाम को
धुरी नही हो ऐसा कोई...... चक्र भी कहाँ
इच्छा करे ना.. ऐसा कोई मन नही कहीं
-अरुण

Sunday, April 9, 2017

मुक्तक

मुक्तक
*******
डूबजाना समंदर में... है लहर की फ़ितरत
'आगे क्या?'- यह सवाल भी साथ में डूबे

मोक्ष मुक्ती की करो ना बात अभ्भी
बंध बंधन का...समझ लो...बस बहोत है

न ही उम्मीद कुई और न ही मै हारा हूँ
पल पल की जिंदगी ही.. अब जिंदगी है
-अरुण

Saturday, April 8, 2017

March 2017

मुक्तक
*******
हाँ..ना.. में दिया जा सके.... जिंदगी ऐसा जवाब नही
कोई रखे हिसाब इसका.... जिंदगी ऐसा हिसाब नही
अनगिनत हैं अक्षर यहाँ  ............. अनगिनत तजुर्बे हैं
जिंदगी कुछ जाने पहचाने अक्षरों की..... किताब नही
-अरुण

मुक्तक
********
जीने की तमन्ना ने बाँटी सारी दुनिया दो हिस्सों में
जो इधर हुआ अपना हिस्सा जो उधर बचा सारा जहान
-अरुण

अभी यहाँ कल ही कल
**********************
अभी यहाँ जो भी है.... आँखों के सामने
देखता उसको तो.. जो कल है बीत चुका
अभी यहाँ सपने भी..... आनेवाले.. कल के
कल तो बस कल ही है.. आये या ना आये
-अरुण

एक शेर
********
इधर इसका जले इतिहास....... तो जलता उधर उसका
धुआँ और आग तो सबकी..... नही इसकी नही उसकी
-अरुण

चेतना का काम है चे.त.ना ..जब चेतती है हर एक के बीते हुए अनुभवों को,  याद के रूप में चेताती है।अनुभवों में व्यक्तिगत भिन्नता होने के कारण, लगता यूँ है कि हरेक के भीतर जलती चेताग्नि ..
दूसरों के चेताग्नि से भिन्न है..।  सच तो यह है कि सबकी चेतना की आग और यादों का धुआँ तो common ही है।

जबतक अंतरदृष्टि न चौंधे
************************
आकाश में बिजली चौंधनेपर
पसर जाती है अचानक सर्वव्यापक रौशनी
और मिट जाता है सारा का सारा पसरा अंधेरा

हमारे इस रोज़ाना जिंदगी में
मन में.. अंतर्दृष्टि की चकाचौंध
जबतक नही होगी
सर्वव्यापक अवधान भी न पसरेगा....
हम विचारों के आभासित प्रकाश में ही
अपना रास्ता बनाते हुए
नज़र आते रहेंगे
फिर भी
रहेंगे तो हम तमस में ही....
इच्छाओं के भ्रम में उलझे
और भ्रम-जाल से निकलने के
मिथ्या प्रयासों में
डूबे हुए
-अरुण
मनुष्य में सकलता का अभाव
**************************
आमतौर पर,
 उसकी विचारशीलता को
आधार मानकर
मनुष्य को विवेकधारी पशु या
Rational Animal) कहा गया
परंतु दुनिया का परिदृश्य तो कुछ अलग ही कहानी कहता है
सच्ची बात तो यह है कि
मनुष्य से जादा विवेकशून्यता और कहीं भी नही
और जगत में मनुष्य से अधिक स्व-केंद्रित भी कोई नही
उसकी स्व-केंद्रितता उसे प्रकृति से जुदा कर रही है

प्रकृति से समरसता के मामले में भी
पशु मनुष्य से आगे है
दुसरी ओर,  अपने समूह में भी
मनुष्य पूरीतरह से घुलमिल नही पाता

क्योंकि उसके विचारों में स्वरसता का प्रभाव है
और सकलता का अभाव
-अरुण
रिश्ता तर्क और समझ का
***********************
तर्कपूर्ण समझ ही विज्ञान है
समझपूर्ण तर्क को ही प्रज्ञान कहिए
तर्कहीन समझ है.....एक जानकारी या ज्ञान
समझहीन तर्क को अज्ञान कहिए
-अरुण
मानवता का सागर
****************
मानवता के
इस विस्तीर्ण सागर में
हज़ारों लाखों करोड़ों घडे तैर रहे हैं
हर घड़ा लहरों पर सवार होकर
जिधर लहरें ले जाएँ उधर बढ़ रहा है
लहरों से छलकता जल अपने में समेटते हुए
आगे बढ़ रहा है अपनी उम्र की राह पर

घडा अपने को दूसरे घड़ों से अलग
समझते हुए अपने भीतर
संकलित जल को भी अपना मान लेता है

क्योंकि वह बेख़बर है कि ...
न तो वह जल उसका है और न ही वह मिट्टी
जिससे वह बना है
-अरुण

“व्यक्तिपन”
***********
जंगल में खड़ा पेड खड़ा
और जंगल के बाहर बस्ती में
अकेला खड़ा वृक्ष.....दोनों ही
न तो अकेलापन महसूस करते हैं
और न ही कोई सामुहिकता, क्योंकि....
भीतर दोनों के ही
कोई भी “व्यक्तिपन” नही पनपता

“व्यक्तिपन” की भूल तो
आदमी के साथ ही घटती रही है
और शायद घटती रहेगी
आदमी ही महसूस करता रहेगा
या तो अकेलापन
या सामुहिकता का दंभ
-अरुण
वसुधैव कुटुंबकम्
****************
पेड के पत्ते ने कभी नही कहा
“पेड ही मेरा कुटुंब है”
ज़िंदा सांसे हर लहर की अपने को
सागर ही समझती हैं.....लहर नही

परंतु क्या यह अजीब नही कि हम इंसान
जो भीतर में दूसरों से डरे डरे हैं....
इस पढ़ी पढ़ाई शब्दावली को
रुक रुककर दुहराते रहते हैं...
सारी वसुधा ही हमारा कुटुंब है...
वसुधैव कुटुंबकम्
-अरुण
विचार
*******
हँसाते हैं विचार...विचार ही रुलाते हैं
विचार ही रखते हैं सजग गंभीर और निष्पक्ष
विचारों में बदल होते बदल जाता विचारक
विचारों और विचारक में कहाँ है भेद कोई?

स्थिती को देखना सुनना सभी का एक जैसा
मगर उस देखने-सुनने में घुस जाते विचार
किसी के वास्ते है वह स्थिती सुखमय सुखद
किसी पे आ गिरा हो दु:ख का कोई पहाड़

सभी ये वेदना-संवेदनाएँ शांत निर्मल
और सजग होते हुए भी,
आदमी बेहोश और अस्वस्थ है
बस...विचारों की वजह से
-अरुण
मन का घना वन
***************
बीज पसरे तो............. पेड और जंगल पसरे
जंगल में फँसे हुए तो निकल भी सकते हैं बाहर
कल्पना के बीज से ही पसरता है मन का घना वन
इस वन में खोया हुआ न कोई बाहर आया है अबतक
-अरुण

आभासमय है जीवन
*****************
पेड की परछाई को छूने से....
पेड का स्पर्श नही होता..
यह बात सबको मालूम है अच्छे से.....फिरभी
असत्य को ही सत्य समझने की भूल सभी कर रहे होते हैं

अस्तित्व गतिशील है सर्वत्र..देह के बाहर और भीतर भी
इस गति से मनुष्य की दृष्टि-गति एवं समझ-गति...
दोनों ही मेल नही खाती और..... इसकारण
सीधे अस्तित्वगति को देखने की जगह
उसके आभास को ही.....अस्तित्व समझकर...
आदमी जीवन जी रहा है
-अरुण
होता कुछ और..लगता कुछ और
*************************
अंधेरे में ज़मीन पर पड़ी हुई रस्सी
देखते ही
भय और असुरक्षा महसूस हुई
वजह इसकी साफ़ थी
देखनेवालेको... रस्सी.. रस्सी न लगकर.... साँप लगी

कहने का मतलब....होता कुछ और है
और लगता कुछ और

अस्तित्व है....”कुछ होते रहना”
मगर मन है.....”कुछ और ही लगते रहना”

‘‘होने’ और ‘लगने’ के भेद को....भेद सकता है
केवल ध्यान
न कोई मन.. न कोई ज्ञान
-अरुण
अस्तित्व का धर्म
**************
हो रहा दिन.. हो रही है रात
पर ये बात...
हरदम ख़्याल में रखे रहो के

सिर्फ पल पल में बदल
बदलाव ही
अस्तित्व का है धर्म

इसे दिन कहें या रात?
सिर्फ अपने चयन की बात
-अरुण
जीवन सारा प्रतिबिंबों का, बिंब बिंब से खेल रहे हैं
***************************************
प्रतिबिंबों के रूप बदलते, नये चित्र प्रतिमाएँ रचते
उन्हे हिलाते उन्हे मिलाते, नया रूप धर बोल रहे हैं

प्रतिबिंबों के बिंब बन रहे, बिंबों के नव बिंब बन रहे
इस बिंबात्मक मन में हरदम, बिंब सजग लग रेल रहे हैं

बिंब कणों की यात्रा चलती, विचार गढ़ती विचार करती
आती बीती की बातों से........ भूतभावि को ठेल रहे हैं

प्रतिबिंबों की पूरी रचना..........जब चेते यह पूरी रचना
अपना व्यर्थ स्वरूप निहारे, सत-स्वरूप पा डोल रहे हैं
-अरुण
सारी कायनातही नज़रों में....
*********************
वैसे तो, सारी कायनातही नज़रों में बसी रहती है
ये ज़रूरतें हैं........... जो नज़रों को सिकुडती रहती
वैसे तो देख सकता है ये इंसान... सभीकुछ लेकिन
नज़रों को सिर्फ...................उसकी जरूरत दिखती

जो कुछ हो रहा है इर्द गिर्द............. औ  ख़ुद में
छोटासा हिस्साही......... उसकी पकड का है हिस्सा
ये ज़मीं आसमान...................बंदा है सारी दुनिया
फिर भी उसकी समझ में वो तो सिर्फ इक क़िस्सा
-अरुण
जीवन-कला
***********
न ये दुनिया और न ही यह जिंदगी...
किसी मक्सद की ओर दौड़ रही है
केवल चलते रहना ही इसका काम है
इसी चलते रहने या जीवनगति के
आनंद में डूबे रहना ही है...
जीवन की कला
-अरुण
स्वामित्व
*********
हर वस्तु, पदार्थ और जीव ही
स्वयं का मालिक है
कोई अन्य उसका स्वामी नही,

वैसे तो स्वामी या स्वामित्व
केवल एक विचार या संकल्पना मात्र है
यह संकल्पना जब किसी चीज आदि से
जुड जाती है या उससे
तादात्म स्थापित करती है
मन में स्वामित्व का भाव जाग जाता है
-अरुण
किताबी जीवन
**************
अगर आध्यात्मिक किताबें न होती..
न होती दार्शनिक नसीहतें
तो शायद आदमी
अपनी मौलिक मनवेदनाओं का हल
स्वयं में ओर स्वयं से ढूँढता
अपने को समझते समझते पूरी मानवता के
स्वभाव को देख लेता

पर ऐसा हुआ नही
कुछ अपवादों के साथ..
आदमी आँखें बंद किए हुए
दूसरों की नज़रों से दुनिया को
जानने के लिए प्रवृत्त हुआ
अपना जीवन जीने की जगह
किताबी जीवन जीने लगा
-अरुण
अजब यह व्याकरण और गणित
**************************
जानना ही जानता है...जो जना(जाना) जाए
अजब है व्याकरण इस जिंदगी का,
कर्ता क्रिया और कर्म सबकुछ
एक क्षण और एक स्थल में ही सिमट जाए

पेड ही जड़ और पत्ता, दृश्य दर्शन और द्रष्टा
एक ही ह्रद-श्वांस में सबकुछ गना जाए
अजब है यह गणित इस जिंदगी का
-अरुण

मोटेतौर पर तीन तरह के लोग
*************************
मोटेतौर पर तीन तरह के लोग इस दुनिया में रहते हैं
एक वह जो देखे बिना ही किसी बात को मान लेते हैं
दूसरे वह जो बात को देखते और उसपर सोचते रहते हैं
तीसरे वह जो बात को देखते.. सोचते और
ख़ुद में, उसे पूरी तरह स्पष्टता से समझ लेते हैं

पहलेवाले बंधन में रहते हुए भी नही जानते कि वे बंधन में हैं
दूसरेवाले बंधन के दर्द को महसूस करते हुए
या तो उससे समझौता करते हैं या संघर्ष

तीसरे वे जिनकी स्पष्ट एवं समुचित समझ उन्हे
बंधन में फंसने ही नही देती
-अरुण
सत में रहते सत ना जाने
**********************
केवल रात ही रात होती जीवनभर तो
रात को ही आदमी दिन समझ लेता
दिन में भी अगर होता वह बंद कमरों में
आशय दिन का किताबों में ही रहता

असत ही है जब जीवन का तानाबाना
लगता आदमी को यही है असली जीना
अपनी साँस ओ धड़कन को किए नज़रअंदाज़ै
पूछे संतों से..कहाँ है मेरी धड़कन मेरी साँस?
-अरुण
दिखता है वही...
*************
जब भी देखता हूँ...बाहर या भीतर
दिखता वही है जो अबतक देखा है
वैसा का वैसा या.. थोडासा बदलासा
वही बने नया जो पहले से सीखा है
-अरुण
तन के बोल मन की मनमन
**************************
एक दूसरे के सामने खडे हुए,
हम एक दूसरे से बात करते हुए दिखते हों भले ही,
पर सच तो यह है कि
मेरा मन मेरे मन से और तुम्हारा मन तुम्हारे मन से,
इस तरह दोनों ही, अलग अलग, अपने स्वयं से ही बोल रहे हैं

बोलना और सुनना, चुंकि, एक दूसरे की ओर निशाना साधे,
खुलकर चल रहा है, मान लिया जाता है हम दोनों
एक दूसरे से वार्तालाप कर रहे हैं।

सामुदायिक रूप से चल रहा यह सारा शोरशराबा
आदमीयों के मनों के भीतर चल रही
मनमन का ही परिणाम है
-अरुण
क्षितिज और मन
**************
क्षितिज धरती ही नही आकाश से भी दूर है
होता नही है जो मगर.. फिरभी नज़र आता
आदमी का मन क्षितिज जैसा....निरा आभास
होता नही है फिरभी जग...इसमें समा जाता
-अरुण
‘उसे’ निर्गुण निराकार क्यों कहते हैं?
*****************************
हवा पर तैरते बादल नही आकार उनको
हमें जो चाहिए आकार हम वह देख लेते
हमें जो चाहिए वैसीही दिखती है ये दुनिया
नही आकार गुण और नाम लेकर यह उगी है
-अरुण
मन का उजाला.. अंधेरे ही जैसा
**************************
मन हमें अपने ही उजालों में भटकाये रखता है
और फिर हम हो जाते हैं
प्रकाश की संभावना से कोसों दूर

कोसों दूर.. इसलिए
क्योंकि मन ही हमें प्रकाश जैसा लगने लगता है
अपनी तमाम परेशानियों का समाधान
हम मन में ही खोजने लगते हैं.. और फिर
जिसे समाधान समझते हैं वही उभरकर
बन जाता है एक नई परेशानी

“परेशानी... समाधान और फिर परेशानी”
इस शृंखला से तभी मुक्ति संभव है
जब आदमी मन के उजालों से
चिपके रहने के बजाय
मन को ही प्रकाशित हुआ देख ले
-अरुण

बोधिवृक्ष

बोधिवृक्ष
*******
“आँगन में यहाँ जो वृक्ष खड़ा है
कहना गलत नही कि वह इस सूबे.. पृथ्वी..
सारे ब्रह्म में खडा है”

यह तथ्य
एक सत्यबोध बनकर
जिनके ह्रदय में उतरा होगा
उनके लिए वह वृक्ष... केवल वृक्ष नही
एक बोधिवृक्ष बन गया होगा
-अरुण

Sunday, April 2, 2017

March 2017

मुक्तक
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हाँ..ना.. में दिया जा सके.... जिंदगी ऐसा जवाब नही
कोई रखे हिसाब इसका.... जिंदगी ऐसा हिसाब नही
अनगिनत हैं अक्षर यहाँ  ............. अनगिनत तजुर्बे हैं
जिंदगी कुछ जाने पहचाने अक्षरों की..... किताब नही
-अरुण

मुक्तक
********
जीने की तमन्ना ने बाँटी सारी दुनिया दो हिस्सों में
जो इधर हुआ अपना हिस्सा जो उधर बचा सारा जहान
-अरुण

अभी यहाँ कल ही कल
**********************
अभी यहाँ जो भी है.... आँखों के सामने
देखता उसको तो.. जो कल है बीत चुका
अभी यहाँ सपने भी..... आनेवाले.. कल के
कल तो बस कल ही है.. आये या ना आये
-अरुण

एक शेर
********
इधर इसका जले इतिहास....... तो जलता उधर उसका
धुआँ और आग तो सबकी..... नही इसकी नही उसकी
-अरुण

चेतना का काम है चे.त.ना ..जब चेतती है हर एक के बीते हुए अनुभवों को,  याद के रूप में चेताती है।अनुभवों में व्यक्तिगत भिन्नता होने के कारण, लगता यूँ है कि हरेक के भीतर जलती चेताग्नि ..
दूसरों के चेताग्नि से भिन्न है..।  सच तो यह है कि सबकी चेतना की आग और यादों का धुआँ तो common ही है।

जबतक अंतरदृष्टि न चौंधे
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आकाश में बिजली चौंधनेपर
पसर जाती है अचानक सर्वव्यापक रौशनी
और मिट जाता है सारा का सारा पसरा अंधेरा

हमारे इस रोज़ाना जिंदगी में
मन में.. अंतर्दृष्टि की चकाचौंध
जबतक नही होगी
सर्वव्यापक अवधान भी न पसरेगा....
हम विचारों के आभासित प्रकाश में ही
अपना रास्ता बनाते हुए
नज़र आते रहेंगे
फिर भी
रहेंगे तो हम तमस में ही....
इच्छाओं के भ्रम में उलझे
और भ्रम-जाल से निकलने के
मिथ्या प्रयासों में
डूबे हुए
-अरुण
मनुष्य में सकलता का अभाव
**************************
आमतौर पर,
 उसकी विचारशीलता को
आधार मानकर
मनुष्य को विवेकधारी पशु या
Rational Animal) कहा गया
परंतु दुनिया का परिदृश्य तो कुछ अलग ही कहानी कहता है
सच्ची बात तो यह है कि
मनुष्य से जादा विवेकशून्यता और कहीं भी नही
और जगत में मनुष्य से अधिक स्व-केंद्रित भी कोई नही
उसकी स्व-केंद्रितता उसे प्रकृति से जुदा कर रही है

प्रकृति से समरसता के मामले में भी
पशु मनुष्य से आगे है
दुसरी ओर,  अपने समूह में भी
मनुष्य पूरीतरह से घुलमिल नही पाता

क्योंकि उसके विचारों में स्वरसता का प्रभाव है
और सकलता का अभाव
-अरुण
रिश्ता तर्क और समझ का
***********************
तर्कपूर्ण समझ ही विज्ञान है
समझपूर्ण तर्क को ही प्रज्ञान कहिए
तर्कहीन समझ है.....एक जानकारी या ज्ञान
समझहीन तर्क को अज्ञान कहिए
-अरुण
मानवता का सागर
****************
मानवता के
इस विस्तीर्ण सागर में
हज़ारों लाखों करोड़ों घडे तैर रहे हैं
हर घड़ा लहरों पर सवार होकर
जिधर लहरें ले जाएँ उधर बढ़ रहा है
लहरों से छलकता जल अपने में समेटते हुए
आगे बढ़ रहा है अपनी उम्र की राह पर

घडा अपने को दूसरे घड़ों से अलग
समझते हुए अपने भीतर
संकलित जल को भी अपना मान लेता है

क्योंकि वह बेख़बर है कि ...
न तो वह जल उसका है और न ही वह मिट्टी
जिससे वह बना है
-अरुण

“व्यक्तिपन”
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जंगल में खड़ा पेड खड़ा
और जंगल के बाहर बस्ती में
अकेला खड़ा वृक्ष.....दोनों ही
न तो अकेलापन महसूस करते हैं
और न ही कोई सामुहिकता, क्योंकि....
भीतर दोनों के ही
कोई भी “व्यक्तिपन” नही पनपता

“व्यक्तिपन” की भूल तो
आदमी के साथ ही घटती रही है
और शायद घटती रहेगी
आदमी ही महसूस करता रहेगा
या तो अकेलापन
या सामुहिकता का दंभ
-अरुण
वसुधैव कुटुंबकम्
****************
पेड के पत्ते ने कभी नही कहा
“पेड ही मेरा कुटुंब है”
ज़िंदा सांसे हर लहर की अपने को
सागर ही समझती हैं.....लहर नही

परंतु क्या यह अजीब नही कि हम इंसान
जो भीतर में दूसरों से डरे डरे हैं....
इस पढ़ी पढ़ाई शब्दावली को
रुक रुककर दुहराते रहते हैं...
सारी वसुधा ही हमारा कुटुंब है...
वसुधैव कुटुंबकम्
-अरुण
विचार
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हँसाते हैं विचार...विचार ही रुलाते हैं
विचार ही रखते हैं सजग गंभीर और निष्पक्ष
विचारों में बदल होते बदल जाता विचारक
विचारों और विचारक में कहाँ है भेद कोई?

स्थिती को देखना सुनना सभी का एक जैसा
मगर उस देखने-सुनने में घुस जाते विचार
किसी के वास्ते है वह स्थिती सुखमय सुखद
किसी पे आ गिरा हो दु:ख का कोई पहाड़

सभी ये वेदना-संवेदनाएँ शांत निर्मल
और सजग होते हुए भी,
आदमी बेहोश और अस्वस्थ है
बस...विचारों की वजह से
-अरुण
मन का घना वन
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बीज पसरे तो............. पेड और जंगल पसरे
जंगल में फँसे हुए तो निकल भी सकते हैं बाहर
कल्पना के बीज से ही पसरता है मन का घना वन
इस वन में खोया हुआ न कोई बाहर आया है अबतक
-अरुण

आभासमय है जीवन
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पेड की परछाई को छूने से....
पेड का स्पर्श नही होता..
यह बात सबको मालूम है अच्छे से.....फिरभी
असत्य को ही सत्य समझने की भूल सभी कर रहे होते हैं

अस्तित्व गतिशील है सर्वत्र..देह के बाहर और भीतर भी
इस गति से मनुष्य की दृष्टि-गति एवं समझ-गति...
दोनों ही मेल नही खाती और..... इसकारण
सीधे अस्तित्वगति को देखने की जगह
उसके आभास को ही.....अस्तित्व समझकर...
आदमी जीवन जी रहा है
-अरुण
होता कुछ और..लगता कुछ और
*************************
अंधेरे में ज़मीन पर पड़ी हुई रस्सी
देखते ही
भय और असुरक्षा महसूस हुई
वजह इसकी साफ़ थी
देखनेवालेको... रस्सी.. रस्सी न लगकर.... साँप लगी

कहने का मतलब....होता कुछ और है
और लगता कुछ और

अस्तित्व है....”कुछ होते रहना”
मगर मन है.....”कुछ और ही लगते रहना”

‘‘होने’ और ‘लगने’ के भेद को....भेद सकता है
केवल ध्यान
न कोई मन.. न कोई ज्ञान
-अरुण
अस्तित्व का धर्म
**************
हो रहा दिन.. हो रही है रात
पर ये बात...
हरदम ख़्याल में रखे रहो के

सिर्फ पल पल में बदल
बदलाव ही
अस्तित्व का है धर्म

इसे दिन कहें या रात?
सिर्फ अपने चयन की बात
-अरुण
जीवन सारा प्रतिबिंबों का, बिंब बिंब से खेल रहे हैं
***************************************
प्रतिबिंबों के रूप बदलते, नये चित्र प्रतिमाएँ रचते
उन्हे हिलाते उन्हे मिलाते, नया रूप धर बोल रहे हैं

प्रतिबिंबों के बिंब बन रहे, बिंबों के नव बिंब बन रहे
इस बिंबात्मक मन में हरदम, बिंब सजग लग रेल रहे हैं

बिंब कणों की यात्रा चलती, विचार गढ़ती विचार करती
आती बीती की बातों से........ भूतभावि को ठेल रहे हैं

प्रतिबिंबों की पूरी रचना..........जब चेते यह पूरी रचना
अपना व्यर्थ स्वरूप निहारे, सत-स्वरूप पा डोल रहे हैं
-अरुण
सारी कायनातही नज़रों में....
*********************
वैसे तो, सारी कायनातही नज़रों में बसी रहती है
ये ज़रूरतें हैं........... जो नज़रों को सिकुडती रहती
वैसे तो देख सकता है ये इंसान... सभीकुछ लेकिन
नज़रों को सिर्फ...................उसकी जरूरत दिखती

जो कुछ हो रहा है इर्द गिर्द............. औ  ख़ुद में
छोटासा हिस्साही......... उसकी पकड का है हिस्सा
ये ज़मीं आसमान...................बंदा है सारी दुनिया
फिर भी उसकी समझ में वो तो सिर्फ इक क़िस्सा
-अरुण
जीवन-कला
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न ये दुनिया और न ही यह जिंदगी...
किसी मक्सद की ओर दौड़ रही है
केवल चलते रहना ही इसका काम है
इसी चलते रहने या जीवनगति के
आनंद में डूबे रहना ही है...
जीवन की कला
-अरुण
स्वामित्व
*********
हर वस्तु, पदार्थ और जीव ही
स्वयं का मालिक है
कोई अन्य उसका स्वामी नही,

वैसे तो स्वामी या स्वामित्व
केवल एक विचार या संकल्पना मात्र है
यह संकल्पना जब किसी चीज आदि से
जुड जाती है या उससे
तादात्म स्थापित करती है
मन में स्वामित्व का भाव जाग जाता है
-अरुण
किताबी जीवन
**************
अगर आध्यात्मिक किताबें न होती..
न होती दार्शनिक नसीहतें
तो शायद आदमी
अपनी मौलिक मनवेदनाओं का हल
स्वयं में ओर स्वयं से ढूँढता
अपने को समझते समझते पूरी मानवता के
स्वभाव को देख लेता

पर ऐसा हुआ नही
कुछ अपवादों के साथ..
आदमी आँखें बंद किए हुए
दूसरों की नज़रों से दुनिया को
जानने के लिए प्रवृत्त हुआ
अपना जीवन जीने की जगह
किताबी जीवन जीने लगा
-अरुण
अजब यह व्याकरण और गणित
**************************
जानना ही जानता है...जो जना(जाना) जाए
अजब है व्याकरण इस जिंदगी का,
कर्ता क्रिया और कर्म सबकुछ
एक क्षण और एक स्थल में ही सिमट जाए

पेड ही जड़ और पत्ता, दृश्य दर्शन और द्रष्टा
एक ही ह्रद-श्वांस में सबकुछ गना जाए
अजब है यह गणित इस जिंदगी का
-अरुण

मोटेतौर पर तीन तरह के लोग
*************************
मोटेतौर पर तीन तरह के लोग इस दुनिया में रहते हैं
एक वह जो देखे बिना ही किसी बात को मान लेते हैं
दूसरे वह जो बात को देखते और उसपर सोचते रहते हैं
तीसरे वह जो बात को देखते.. सोचते और
ख़ुद में, उसे पूरी तरह स्पष्टता से समझ लेते हैं

पहलेवाले बंधन में रहते हुए भी नही जानते कि वे बंधन में हैं
दूसरेवाले बंधन के दर्द को महसूस करते हुए
या तो उससे समझौता करते हैं या संघर्ष
 
तीसरे वे जिनकी स्पष्ट एवं समुचित समझ उन्हे
बंधन में फंसने ही नही देती
-अरुण
सत में रहते सत ना जाने
**********************
केवल रात ही रात होती जीवनभर तो
रात को ही आदमी दिन समझ लेता
दिन में भी अगर होता वह बंद कमरों में
आशय दिन का किताबों में ही रहता

असत ही है जब जीवन का तानाबाना
लगता आदमी को यही है असली जीना
अपनी साँस ओ धड़कन को किए नज़रअंदाज़ै
पूछे संतों से..कहाँ है मेरी धड़कन मेरी साँस?
-अरुण
दिखता है वही...
*************
जब भी देखता हूँ...बाहर या भीतर
दिखता वही है जो अबतक देखा है
वैसा का वैसा या.. थोडासा बदलासा
वही बने नया जो पहले से सीखा है
-अरुण
तन के बोल मन की मनमन
**************************
एक दूसरे के सामने खडे हुए,
हम एक दूसरे से बात करते हुए दिखते हों भले ही,
पर सच तो यह है कि
मेरा मन मेरे मन से और तुम्हारा मन तुम्हारे मन से,
इस तरह दोनों ही, अलग अलग, अपने स्वयं से ही बोल रहे हैं

बोलना और सुनना, चुंकि, एक दूसरे की ओर निशाना साधे,
खुलकर चल रहा है, मान लिया जाता है हम दोनों
एक दूसरे से वार्तालाप कर रहे हैं।

सामुदायिक रूप से चल रहा यह सारा शोरशराबा
आदमीयों के मनों के भीतर चल रही
मनमन का ही परिणाम है
-अरुण
क्षितिज और मन
**************
क्षितिज धरती ही नही आकाश से भी दूर है
होता नही है जो मगर.. फिरभी नज़र आता
आदमी का मन क्षितिज जैसा....निरा आभास
होता नही है फिरभी जग...इसमें समा जाता
-अरुण
‘उसे’ निर्गुण निराकार क्यों कहते हैं?
*****************************
हवा पर तैरते बादल नही आकार उनको
हमें जो चाहिए आकार हम वह देख लेते
हमें जो चाहिए वैसीही दिखती है ये दुनिया
नही आकार गुण और नाम लेकर यह उगी है
-अरुण
मन का उजाला.. अंधेरे ही जैसा
**************************
मन हमें अपने ही उजालों में भटकाये रखता है
और फिर हम हो जाते हैं
प्रकाश की संभावना से कोसों दूर

कोसों दूर.. इसलिए
क्योंकि मन ही हमें प्रकाश जैसा लगने लगता है
अपनी तमाम परेशानियों का समाधान
हम मन में ही खोजने लगते हैं.. और फिर
जिसे समाधान समझते हैं वही उभरकर
बन जाता है एक नई परेशानी

“परेशानी... समाधान और फिर परेशानी”
इस शृंखला से तभी मुक्ति संभव है
जब आदमी मन के उजालों से
चिपके रहने के बजाय
मन को ही प्रकाशित हुआ देख ले
-अरुण

Wednesday, March 1, 2017

फ़रवरी २०१७ में लिखी रचनाएँ

१ फ़रवरी से २८ फ़रवरी २०१७ तक
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क्रांतिमय सही स्वर
****************
आदमी ने ही आदमी को बिगाड़ा है
जिसे जैसा लगा वैसा उसे मोड़ा है
उसे सीधा कर सकने के दावेदार कई
एक भी नही जिस्ने सीधा कर छोड़ा है

सीधा करनेवालों की कोशिशें बाहर बाहर
पर मुडावट तो घटी है अंतस्थ के भीतर
स्वयं के अंतस्थ में जो झाँक सका अपने से
उसके ही भीतर बज पाया क्रांतिमय सही स्वर
-अरुण

दिल सुकून.. मन ख़ुराफ़ात
*********************
खिडकी से बाहर
केवल झांकना ही झांकना हो
तो दिल में है सुकून ही सुकून
पर अगर झांकती आँखों में
भापने, जांचने, नापने, बूझने जैसी
शैतानियत का अंजन लगा हो...
तो कई खुराफातें सताने लगती हैं मन को

दरअसल,
दिल का मतलब ही है सुकून और
मन का सिरफ ख़ुराफ़ात
-अरुण

वैज्ञानिक एवं ज्ञानिक
******************
अवास्तविकता से सत्य तक का सफ़र
वास्तव से होकर गुज़रता है...

वैज्ञानिक किसी वैज्ञानिक निचोड़ के साथ
वास्तव पर ही ठहर जाता है

ज्ञानिक को वास्तव में भी
छुपी-अवास्तविकता के दर्शन होते रहते हैं
और इसकारण उसका खोज-सफर
तबतक ठहरता नही जबतक वह स्वयं की
अवास्तविकता को भी देख नही लेता
-अरुण
कैसे संभव है?
***********
परछाई हाँथों की अपने
पकड़ी न गई हाँथों से
ख़ुद को ख़ुद से पकड़ूँ ?
कैसे संभव है?
आंखों में ही घने बादल
भले सामने हो सूरज
आँखों को दिख जाए?
कैसे संभव है?
-अरुण
समय और आसमां
***************
यादें कहती है
वक्त पीछे निकल गया है
इरादों को लगता है
समय तो आगे खड़ा है
समय तो वही और वहींपर है
कल आज और कलभी
और आसमां भी है वही का वही
ऊपर नीचे बाहर भीतर कहींभी
-अरुण

रंगीनीयत और पानीपन
*******************
पानी में घुल गये हैं रंग कई
रंगीनीयत को पानी नज़र नही आता
पानीपन मगर बरक़रार रहे जल का
पानीपन को कोई भी रंग हटा नही पाता
-अरुण

गड़बड़ी है नज़र में
***************
गड़बड़ी है देखनेवाले की नज़र में
जिंदगी हर हाल में दुरुस्त है
नोचते हुए दिखते हों लहरों को तूफ़ान... मगर
समंदर तो हर हाल में मस्त है
-अरुण

भागे जा रहा है....
****************
भागे जा रहा है हर कोई, नही है कहींभी पहुँचना उसे
बस जहाँ है वहाँ से तुरत निकल पड़ना उसे

पूछता ही रहता है कई ठिकानों का पता
बग़ैर जाने कि अभी कहाँ है वह...किस ठिकाने

सवालों पर सवाल पूछे जाता है इसलिए नही कि उसे कुछ जानना है
बल्कि इसलिए कि उसने क्या जाना अबतक..... वह उसे जतलाना है
-अरुण

लगना और होना
***************
जैसा लगता है वैसा होता नही है
जैसा होता है वैसा लगता नही है
ध्यान से देखो तो सच्चाई समझ आती है
ध्यान अगर देखकर हो.. तो सच्चाई खो जाती है
-अरुण


अंतर-सुसंगती
***********
सितार से
संगीत अवतरित होता है
यह केवल सितार के तारों की कमाल नही,
केवल उन उँगलियों की भी देन नही जो तारों को छूती हुई
गतिशील होती हैं
न ही सारा श्रेय बजानेवाले के अंतरंग में
गूँजनेवाली स्वररचना को दिया जा सकता है

तीनों की आपसी अंतर-सुसंगती से ही सितार
बोल उठती है
-अरुण

मै वास्तविक हूँ
*************
“मै न आस्तिक हूँ, न नास्तिक हूँ,मै वास्तविक हूँ”
यह बात देश के एक महान रामकथा वाचक
के मुख से जब सुनी तो मन प्रसन्न हो गया।
ओशो के बारे में, मुरारी बापूजी महाराज
अपनी सोच को अभिव्यक्त कर रहे थे,
यह बात उन्होंने उसी समय कही
-अरुण

तन या मन
***********
तन, मन को चलाय
या मन, तन को...समझ न आय
न रह जाए दोनों में अंतर तो..
सवाल सुलझ जाय
-अरुण
वही बेसुर लगे
****************
झूठ सबके जिंदगी का प्राण है
सच की नज़दीकी से मन को डर लगे
मौत की आहट निकट से जब सुनी
जो रमाती धुन... वही बेसुर लगे
-अरुण
आमने-सामने और एकांत
*********************
सामने से ही फले है आमने
आमने के सामने अरि-मीत है
भीड़ में हर आदमी एकांत होवे
जगत तो एकांत का ही गीत है
-अरुण
तात्पर्य
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‘तू’ की कल्पना में ही ‘मै’ की कल्पना जन्मती है। ‘मै’ के सामने कोई न कोई होता ही है-शत्रु या मित्र। ये आमने-सामने वाले संबंध अस्तित्व में होते ही नही। अस्तित्व में हर कोई एकांत में है (अकेला नही)। अस्तित्व तो एकांतमयी है।
-अरुण

क्या यह सच नही कि-
*******************
छोटे छोटे बच्चों के साथ बैठकर गुड्डीगुड़िया जैसे बच्चों के खेल खेलनेवाले अभिभावक,
खेल में रमते हुए भी खेल से बाहर रहते हैं। परंतु अपनी निजी जिंदगी में अपने सांसारिकता के खेल से बाहर निकल नही पाते.....खेल में रमते हुए उसी में डूब जाते हैं।
-अरुण

मन संरक्षक या भक्षक
*******************
हज़ारों वर्षों से गुजरकर शायद
उत्क्रांति ने
आत्मरक्षा के लिए आदमी के भीतर
मन को जन्माया है
मगर संरक्षण के नाम पर
मन के भीतर से
सृष्टि-संहार का ही दौर चल आया है

मन ने जंगल उजाड़े, प्राणियों और पक्षियों को
नष्ट किया और अब
सारी मानवता को ही बर्बाद करने का
इरादा रखते हुए
कई न्यूक्लिअर हथियार
इजाद कर रखे हैं
-अरुण


मन ले जाता है असलियत से दूर
**************************
यादें ही याद करती हैं
यादें ही याद आती हैं
याद करना भी
और याद आना भी
दोनों ही साथ साथ
एक ही वक्त एक ही जगह
यादों के द्वारा ही

फिर भी आदमी समझता है
कि वही है जो याद करता है यादों को

समझ की उसकी इस
मूलभूत नादानी ने ही
उसके जीवन को
कई अन्य नादानियाँ से भर दिया है
कई परेशानियों में उलझा दिया है

ऐसे में,
अंतर-जागरण ही असलियत को
उजागर करता है
-अरुण

जानकार तो आदमी ही
*******************
पीपल का पेड नही जानता
कि उसका नाम पीपल है
न ही बरगद अपनी विशेषता
को जानता है

अपनी अलग पहचान या जानकारी
तो आदमी की मजबूरी है
किसी और की नही

औरों को जीवन चलाने के लिए
कुदरत से बना हुआ उनका एकत्व ही
काफ़ी है
इसी एकत्व से दूर हो चुके आदमी को ही
जानकारी की जरूरत है
-अरुण
नया ही नये के काम आता है
***********************
पुरखों ने दी है हमें
हमारी अपनी दुनिया
इस दुनिया की समस्याएँ भी हमारी अपनी हैं
और इसालिए समाधान भी होने चाहिए हमारे अपने....
इतना ही नही....आगे आनेवाली संतानों को भी
मिलने चाहिए जीवन जीने के ऐसे मौके,
जो हों उनकी अपनी परिस्थिति और समझ के अनुसार
नया ही नये के काम आता है
पुराना उसे आगे बढ़ने से रोक देता है
-अरुण
क्या है मेरा?
***********
“क्या है मेरा
और क्या मेरा नही है?”

इस बात पर सोचने से पहले
मुझे यह सोचना पड़ रहा है कि
मै क्या हूँ और मै क्या नही हूँ?
हूँ भी या नही?
गर हूँ तो कहाँ से कहाँ तक हूँ?

इन सवालों पर ही सोचते सोचते
जिंदगी कट जाए शायद!!!
-अरुण
देखना या घुलमिल जाना
*********************
देखने के लिए जो देखना हो उससे कुछ दूर रहकर ही देखा जाता है
अगर उसमें घुलमिल जाओ तो फिर कौन किसको देखे?

जिंदगी को देखकर जीना है.....एक तजुर्बा... जो बयां हो सके
जिंदगी में घुलमिल जाना है.... एक एहसास.... जो बयां न हो सके
-अरुण



सफ़र एक ही मगर सोच अलग
*************************
जिंदगी का सफ़र तो
एक ही है हमसब का.....
एक ही रास्ते से हम सब गुज़र रहे हैं
परंतु ‘चलना’ उस रास्ते पर हर किसी का
है अलग अलग
हरेक का ज़हन उसकी अपनी
‘चलने की अनुभूति’
का ही संचय होने के कारण
वह सोचता है कि वह और उसका सफ़र
दूसरों से अलग है
-अरुण

मन तो है एक भीड़
***************
दो या दो से अधिक लोगों में संवाद चले...
यह कोई नई बात नही
परंतु मन के बाबत ...
बात कुछ अजीबसी है

हरेक का मन उसका अपना एक निजी मामला होते हुए भी
वह मन...कभी भी एक या अकेला नहीं होता
एक ही समय..
मन कई भूमिकाओं में
बँटा हुआ रहता है
बोलनेवाला भी वही....सुनने वाला भी वही
दोनों को आपस में बोलते-सुनते हुए
देखनेवाला भी वही....
वही बहकता भी है और वही उसे बहकने से
रोकता भी है...
ग़ुस्सा भी करे वही और ग़ुस्से को
शांत भी करे वही...

बहुभूमिकाओं में उलझा हुआ यह
मनुष्य का निजी मन
कभी भी चुप नही रह पाता
वह अशांत है... वह अकेला नहीं
हमेशा एक भीड़ का रूप लिए हुए है
-अरुण


दुनिया होते रहने.. चलते रहने का नाम
******************************
आकाश में, धरतीपर और ज़मीन की गहराई में
हरपल हरक्षण कुछ न कुछ होता ही रहता है

आदमी के संदर्भ में भी बात अलग नही, वही है।
उसके बाहर भीतर और सतह पर
किसी न किसी बदलाव का दौर
चलता ही रहता है
ऐसे ही होते रहने... चलते रहने
से ही दुनिया चल रही है

जब आदमी अपने होते रहने या चलते रहने से
ध्यान हटाकर बाहर देखता है तो उसे लगता है कि
दुनिया एक ठहरे हुई वस्तु या आकार के रूप में है

जब अपने में होते बदलावों को भुलाकर
ख़ुद को देखता है उसे लगता है
वह किसी अहंकार के रूप में है
-अरुण









































Monday, August 1, 2016

1-31 July Hindi Sher with Marathi version

1 -31 July Sher and Bodhsprshika
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एक शेर
*******
एक से ही टूटकर ‘उस’.. अनगिनत टुकड़े बने हैं
बस समाओ एक में ‘उस’..... छोड दो गनना उसे
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
नसणे किंवा असणे.. याच दोन शक्यता
मोजत बसणे............. हा गणिती प्रपंच
- अरुण
एक शेर
********
व्यर्थ में सदियों न करना इंतज़ार, सच कह रहा
ठीक पीछे मै खड़ा हूँ बस पलटकर देख लो
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
खुद्द प्रकाश शोधणाराच ज़र अडसर असेल
तर मग उजेड त्याचे पर्यंत पोहचणार कसा?
- अरुण
एक शेर
********
जन्म, मृत्यु, आयुरेखा, आपदाएँ,  ये नही अपने चयन
फिर किस चयन की बात करते हैं सभी दुनियाई बंदे?
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
अंगण निवडलेले असले आणि खेळ ही आवडी चा असला, तरीही
निवड करणाऱ्याचा जन्म किंवा मरण त्याला विचारून घडत नाही
- अरुण
एक शेर
*******
डोर जीवन की इसे सुलझी उसे उलझी लगे
डोर तो डोर ही रहे....जो भी लगे जैसी लगे
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
***************
जगणे नेहमीच असते सरळ साधे
जगणाऱ्याची नजरच जाते वेडी वाकडी
- अरुण
एक शेर
********
लहरें भटकाती हैं........निज सपाट पर
सागर से मिलना हुआ?....डूबकर ही जानो
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
वरवरचे जगणे राहते............ वरवरचेच
पोकळीत शिरल्या शिवाय ‘जगणे’ नाही
- अरुण
एक शेर
********
सिर्फ साहिल तक पहुँचना है सरल
असली जोखिम है समंदर में छलाँग
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
नदीत डुंबण्याचा आनंद पाहिजे असणारे
नदीत डुंबण्याचे साहस न करता
घाटावरच थांबुन नदी चे गुणगान करत राहतात
- अरुण
एक शेर
*********
एक ही वह साँस जिसमें दुनिया जीती है
मेरी तेरी उसकी कहकर जी रहे हैं हम सभी
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
***************
एकच वारा एकच प्रकाश
प्रत्येकाचे एकच आकाश
तरी ही प्रत्येकाला वाटे, माझेच खास?
असे कां ?
- अरुण
एक शेर
*******
जिसे मै ‘मै’ कहूँ ऐसा न ‘मै’ जीआ कभी भी
जिलाए जा रही बस याद उसकी याद की यादें
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
जे सर्वांचे ते कोणाचेच नाही
कारण ‘कोणी’ असा जगतात
न कधी होता न कधी राही
- अरुण
एक शेर
*******
खुद को देखना बाकी रहा और देख ली दुनिया
इसी दुनिया से, अब हम दरबदर अपना पता पूछें
- अरुण

मराठी बोधस्पर्शिका
***************
चश्मा लावून कांही ही शोधा, शिवाय
नाकावरल्या चश्म्याच्या
- अरुण
एक शेर
*******
सुख का नही है कोई दुख से अलग ठिकाना
ऊपर उठे तो छत है...........नीचे रहे तो फ़र्श
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
***************
सृष्टी म्हणजे जणु अख्ख् एकच झाड़
ज्याची प्रत्येक फाँदी प्रत्येक पान वेगळ्या रंगरूपाचे....
ज्यांना रंगरुपातील हे वेगळेपण दिसते
ते भेदबुद्धीने ग्रासतात
ज्यांना ते सर्व एकूण एकच झाड आहे असे दिसते
ते सृष्टीच्या एकत्वात रमतात
- अरुण
एक शेर
********






मराठी बोधस्पर्शिका
****************
हा गोड़ समज की
शरीरावर असते मनाचे नियंत्रण,
तोवर कायम होता जोवर
ध्यानात न आले की
मन सुद्धा आहे शरीराच्याच आधीन
- अरुण
एक शेर
*******
जैसा देखा सुना बयां वही नही होता
समझनेवाले का भी अनुमान ही सहारा है
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
जसेचे तसे सांगता येत नाही शब्दांतुन
समजणाऱ्याने ही शेवटी अंदाजानेच ओळखावे
- अरुण
एक शेर
********

अब और अभी ..
********************
जो गुजर चुका उसे पकड़कर रख्खे
जो आया ही नही, उसे बांधकर रख्खे
- ऐसी नादानीवाला यह आदमी का दिमाग
कैसे देख पाए ?
जिंदगी का अब और अभी..
-अरुण
एक शेर
*******
जो गुज़र चुका उसे थामकर जो हुआ नही उसे देख ले
मौजूदगी सोयी हुई....................हर वक्त इंसा बेख़बर
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
दिवसा विचारांची गड़बड़ रात्री स्वप्नांची दगदग
जगण्या साठी पाहिजे तशी वेळ अजुन सापडत नाही
- अरुण
एक शेर
*******
दिखाया किसीने रास्ता और हम चल पड़े उसपर मगर
न यह सवाल उठा के क्या कहीं कोई रास्ता होता भी है?
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
ज्या प्रांतात..... निघणे, चालणे, पोहचणे अशा क्रिया नाहीतच
तिथे गंतव्य, मंजिल किंवा मुक्काम या शब्दांचेही काय औचित्य?
- अरुण
एक शेर
********
सामने जो भी तमाशा.. है तुम्हाराही तमाशा
बात दुनियाकी करो या खुदकी, दोनों एक ही
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
***************
समोरच्यात जे जे दिसते ते बघणाऱ्यात ही असते
समोर आरसा आहे हे बघणाऱ्याने विसरायचे नसते
- अरुण
एक शेर
*******
उड़ी जो धूल चमकते कणोंपे जो उभरा
वही है चित्र हमारा हमारी दुनिया का
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
माणसातला ‘मी’ म्हणजे उडणाऱ्या धुळीच्या कणांवर चमकणाऱ्या
चित्रा सारखा. या चित्रालाच काल्पनिक जीवन मिळते
आणि तेच वाटते या ‘मी’ ला त्याचे जीवन
- अरुण
एक शेर
*******
अजीब है व्याकरण जिंदगीका चीज़ें हैं नही,लगती हैं
वक्त भी होता कहाँ है मगर सुईयां उसकी चुभती हैं
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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नसून ही कांहीही इथे जग आहेच आहे
काळ नसला तरी काल आज उद्या आहे
- अरुण
एक शेर
*********
बँट जाए जो भीतर वही तो बड़बड़ाए
एकही बनके रहे उसमें मौन बस जाए
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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माणसाच्या जाणीवेचे अनेक तुकडे
एकमेंकांशी बडबडत असतात
आणि म्हणुनच माणुस अस्वस्थ असतो
- अरुण
एक शेर
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ख़्वाहिशों ने ही मचाया है बवाल बेतहाशा
और ख़्वाहिशों ने ही की उम्मीद के सुकून आ जाए
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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हे हवे ते हवे ह्या हव्यासालाच
आता हवी आहे शांतता आणि मुक्तता
- अरुण

एक शेर
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मसला ये है के मसलोंसे मुंह चुराता हूँ
शिकायत भी करूँ के ये हमें जीने नही देते
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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सामोरे जाई त्याच्यासंगे जीवन नाचे
भित्यापाठी मात्र ब्रह्मराक्षस
- अरुण
एक शेर
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हरकोई सवालात सवालात नही होते
कुछ सुलझी हुई बातें भी उलझा देतीं
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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धाग्यात धागा गुंतला की झालेला गुंता सोडवण्यासाठी प्रयत्न करावे लागतात,
परंतु मनातला गुंता किंवा confusion , त्याचे गुंतलेपण स्पष्ट दिसुन येताच सुटतो.
मानसिक गुंत्यांबाबत स्पष्टपणे बघणे हीच एक कृती ठरते, वेगळी कोणती
कृती करण्याची गरजच नसते.
- अरुण
एक शेर
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सब अपने अपने इतिहासों से मेरी बात समझते हैं
कोई इसतरह, कोई उसतरह, तो कोई कुछ और समझता है
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
प्रत्येका समोर असतो तो एकच देखावा
मग बघणाऱ्यांना वेगवेगळा कां दिसतो?
- अरुण
एक शेर
*******
वैसे तो मै ही हूँ अपना परिचय अपनी सोहबत-ओ-परेशानी
वरना कौन है इस जहान में अपना या के पराया ?
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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म्हटले तर.... सारेच इथे आपले... म्हटले तर... कोणीच कुणाचा नाही
- अरुण

एक शेर
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कोशिशों से न कोई नम्र हुआ करता है
कोशिशें नम्रता विनम्रता के ठीक ख़िलाफ़
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
***************
इथे नम्रतेचे पारितोषिक इच्छिणारेच सारे
पण नम्र कुणी ‘इक्का दुक्का’च
- अरुण



एक शेर
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तुम्हें लगती मेरी बातें कठिन उलझी जटिल क्यों?
शायद, तुम्हें अच्छा लगे.... वह कह न पाऊँ मै
- अरुण
एक शेर
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सीधी सरल बातेंभी तेरे ध्यान ना आती
शायद, ‘निरा पांडित्य’ तुमको मोह लेता हो
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
स्वत:च्या आंत-बाहेर जगत-दर्शन शक्य असताना ही
माणसाला अज्ञानापोटी ‘आध्यात्मात’ शिरण्याचा मोह होतो
- अरुण
एक शेर
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आदतें तो आदतें अच्छी बुरी... संस्कार-बंधन
इनकी पकड से मुक्त होनाही समझदारी चरम
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
***************
समाजाचे स्व-संरक्षणा चे भानच सरल जीवनाला कठिन करते
पण माणसातली समज-दृष्टीच केवळ...हे काठिन्य विरवू शकते
- अरुण
एक शेर
********
न है मौजूद...........उसका ख़्याल ही मौजूद है हरदम
हटाना ‘मै’ बड़ा तिकडम जो बन जाए ये ‘मै’ हमदम
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
*****************
‘मी’ पासुन मुक्त होणे कठीनच, कारण
जो न ‘होता’ कधीच त्याला नाहीसा करणे कसे शक्य?
- अरुण
एक शेर
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फ़र्क़ तो है जमीं आसमांका, एक देखे उसेही कहे
और दुजा बस कहे कहे कहे........... बिना देखे
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
दृष्टांत बोलतात तेंव्हा........ सत्य उमजतं
सत्या बद्दल किती ही बोला, बोलणे व्यर्थ
- अरुण

एक शेर
********
शब्दों से जो परे है...... गीता ने है कहा
फ़ितरत युगों युगों की, शब्दोंको ही पढ़ा
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
****************
जगात, सत्य लाख वेळा सांगितले गेले तरी
ऐकणाऱ्यांचे कान असत्याकडेच लागून होते
- अरुण









Thursday, June 30, 2016

१ जून से ३० जून २०१६

एक शेर
********
जिंदगी खुद चलके आती है जीती है हर सांस में अपने
हम समझते हैं के ये हमारी है.........हम जी रहे हैं उसे
- अरुण

एक शेर- २ जून २०१६
*********************
न यादों का सिलसिला होता न होती खाबों की ज़रूरत
हर साँस आदमी की बन जाती एक मुकम्मल जिंदगी
- अरुण

एक शेर- ४ जून २०१६
*********************
दूर की शुरुवात होती अपने घर से ही, मगर
घर को तो देखा नही... ब्रह्मांड की बातें करें
- अरुण


एक शेर
*******
गहरा, धूसर, फीका अंधेरा..बंद आँखों में है तीनों का बसर
रौशनी छेडती है पलकों को ..पलके हैं...... बेख़बर बेअसर
- अरुण
एक शेर
********
खेल के वास्ते खींची लकीरें थी......... यहाँपर
बिगड़ते मेल दिल का बँट गये सब लोग पालों में
- अरुण
एक शेर
********
रोना-हँसना एक जैसा ही दिखे फिर भी समझ के
भीड़ में... हर शख़्स की है दास्ताँ बिलकुल अलग
- अरुण

एक शेर
********
सारी दुनिया का होवे एक ही दिल एक ही सांस
बंदा समझे के....... दुनिया उसके लिए जीती है
- अरुण
एक शेर
*******
जिन रास्तों से थे गुज़रकर आ गये
उन्हींको खींच लाते और बनाते हो नये?
कहींभी चलके जाओ इन बनाये रास्तोंपर
मिलेंगे जो तजुरबे वे नही होंगे नये
- अरुण
एक शेर
*********
डिब्बा AC हो के होवे General, रेलका
रफ़्तार सबको एकजैसी ही हुई हासिल
- अरुण
एक शेर
*********
क्षितिज की खोज में निकलूँ ......यही था बारहा ठाना
मगर हरबार मुश्किल बन गया ‘खुद’ से निकल पाना
- अरुण
एक शेर
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जो बात बयां हो न सके क्यों करे बयां ?
लफ़्ज़ों में ढल सके न कभी नूर-ए-जहाँ
- अरुण
एक शेर
******
लगी हो आग तो फिर..... आग पे डले पानी
लगी है घरको तो खलिहान क्यों भिगोते हो?
- अरुण
एक शेर
********
ढूंढने निकलो तो ‘वो’ कैसे मिले?
‘वो’ मिला ही है उसे बस देखना काफ़ी
- अरुण
एक शेर
*******
परछाई कहो या कहो ढकी हुई रौशनी का अन्जाम
मस्तिष्क तो है इन्हीं परछाईयों के खेलने का मैदान
- अरुण
जिंदगी क्या चीज है ?...
---
जिंदगी चखने की चीज है ..बकने की नहीं
देखने की चीज है .............पढ़ने की नहीं
सुनने की चीज है ............सुनाने की नहीं
फिजा को महकाती है ........बहकाती नहीं
और जब निर्मन हो तो
छूती है सारे अस्तित्व को
-अरुण

हिंदी
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ब्रह्मांड का ही जीवमय इक पिंड मानव देह भी
इस तथ्य को जी रहा....... ‘योगी’ उसीको जानिए
- अरुण
एक शेर
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भटककर मँझधार से मै जो किनारे आ गया हूँ
अब, घाट घाटों दरमियाँ ही राह मंजिल और सफ़र
- अरुण
एक शेर
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जैसा चाहो वैसा दिख जाता यहाँ, हर कोई जिंदाभी और मुरदा यहाँ
प्राण ऊर्जा भर रहे निरजीव में या जीव भरता प्राण में ऊर्जा यहाँ ?
- अरुण

एक शेर
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हज़ारों खिड़कियों से सूर्य धरतीपर उतरता है
लगे प्रत्येक खिड़की को अलग ही सूर्य है उसका
- अरुणl

एक शेर
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हो धूलभरी बुहारी तो धूल कैसे झाड़ना
है मुश्किल मन से मन को मिटा पाना
- अरुण
एक शेर
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लगता है ‘मै हूँ’ का मतलब ये नही ‘मै हूँ’
बना जाता है ‘होने का’ एहसास.... ‘लगना’
- अरुण
एक शेर
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न कोई चीज़.......... और न खरीदनेवाला
मन है इक बाज़ार जहाँ बिक्ता बेचनेवाला
- अरुण
एक शेर
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‘देखने में भूल’ केवल एक ही वह भूल
जिससे जिंदगी की राह बन जाए दुश्कर
- अरुण
एक शेर
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हजारों दूर चलकर भी जहाँ था हूँ वहींपर
खुली आँखें तो पाया पैर केवल चल रहे थे
- अरुण
एक शेर
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इस झूठी जिंदगी को चाहिए एक झूठ अहं का
इसके परे न होवे....... किसी काम का ये झूठ
- अरुण
एक शेर
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है वहाँ भी कुछ जहाँ लगता नही....कुछ होगा
उसी कुछ से उभर आता है सबकुछ नामधारी
- अरुण
एक शेर
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मै, खुद, खुदा, परमात्मा... ये लफ़्ज़ केवल हादसे हैं
ये नही होते तो कुदरत.............. सोवे रहती चैन से
- अरुण
एक शेर
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दिल की बात जबां पर जस की तस नही आती
है यही वजह शायद के....... सच बयां नही होता
- अरुण




Wednesday, June 1, 2016

मई २०१६

एक मुक्तक
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गुजरता है जहां जहां से अपना होना,
वहां वहां की शक्ल ओढ लेता है
कभी सांस, कभी दर्द, कभी एहसासे जिगर
ज़हन के पास मगर पूरी तरह खोता है
- अरुण
एक शेर
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हवा तो छू रही है पर कभी देखी नही
है दिखता आसमां फिर भी कभी छूता नही
- अरुण
एक शेर
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क्या मिलेगा सोचे रख्खे..... खोजने के पूर्व ही
सत्य उसकी खोज में आये तो आये किसतरह?
- अरुण
एक शेर
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आदमी न किसी बंधन या कारागार में हुआ
बंधन या कारागार का ही नाम.....आदमी
- अरुण
एक शेर
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जिंदगी तो जी रही है खुदको अपने ढंग में
मगर अफ़सोस के बंदा चाहे उसे अपने रंग में
- अरुण

एक शेर
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एक ही चीज़ के हों सौ नाम, चीज़ बँट नही जाती
हो नज़रिए हज़ार भले ही... दुनिया टूट नही जाती
- अरुण
एक शेर
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दरो दीवार........ इसको रोक पाती है नही
यही सच्ची मुहब्बत है, नही कुई राजनीती
- अरुण




एक शेर
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एक ही वक्त कई वक्तों में रहता जो है
बंदा, बीता हुआ, जीता हुआ, अजन्मा है
- अरुण


एक शेर
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ज़मीं पे रख्खे आड़ी.. अपने ज्ञान की सीढी
नही पाया पकड कोई समझ का आसमां
- अरुण

एक शेर
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सामने है जो धरी तस्वीर है जिसमें..
जानी पहचानी हुई एक शक्ल है
जबभी उसको ग़ौर से देखा...
सिवा बस रंग रेखा बिंदुओं के कुछ न था उसमें
- अरुण
एक शेर
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काग़ज़ पे लिख रही है क़लम ख़्याल-ए-ज़हन
काग़ज़ को सिर्फ स्याही का मिलता सवाद है
- अरुण
एक शेर
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उड़ना हो आसमां में पंखों की हो ज़रूरत
ऐसे भी हैं कि जिनको धरती न खींच पाती
- अरुण
एक शेर
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अपनी ख्वाहिशों को जिंदगी में ढालने के बजाय
जी लेने दो ख़ुद जिंदगी को....... उसकी धुन में
- अरुण
एक शेर
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बने बनाये रास्तों की बनी बनाई मंज़िलें
कहो तो, सच मंजिल भी और रास्ता भी
- अरुण







एक शेर
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अपने बनाये पिंजड़े में बंदा फँस गया है
भीतर ही इस जाल के अवारा उड़ रहा है
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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माणूस बंधनात आहे........असे न म्हणतां
बंधने म्हणजेच माणूस.......हेच कथन खरे
स्वातंत्र्याच्या सर्व बाता....लागू नाही त्यास
कारण बांधलेल्या आकाशातच तो ‘मुक्त’ उडे
- अरुण
एक शेर
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मिट्टी को बू नही है किसी मुल्क जात की
ये तुम बंधे हुए हो उसे...........वो अजाद है
- अरुण
एक शेर
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सामने छोर पे जैसीभी होती दिख रही हलचल
उसी को देखकर इस छोर की तस्वीर बनती है
- अरुण
एक शेर
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मै नही हूँ...... है मेरी बस याद भीतर
भूल जाना सत्य को इस, मेरी फ़ितरत
- अरुण



एक शेर
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पाँव ठीक हैं आँखें भी हैं ठीक फिर भी लड़खड़ाता है?
भूत का हांथ पकड........ जो वह आगे बढ़ा जाता है
- अरुण
एक शेर
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असलियत को देख सकने का हुनर होते हुए भी
झूठ से ही दिल लगाने में बड़ा आता मज़ा है
- अरुण
एक शेर
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उस किनारे हो रहा है.........इस किनारे हो रहा
कोई कुछ करता नही है, सब यहाँ बस हो रहा
- अरुण
बनारस के मित्रों को याद करते हुए लिखी यह रचना
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रास्ते उनकी तरफ़ खुलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

अब भी उनका ज़िक्र छूता है जुबां
अब भी बाकी रूह पर उनके निशां
जिनके साये खाब से हटते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

हो अचानक ख़्याल में उनका दीदार
है दबा सा ज़हन में इक इंतज़ार
फिर भी जो हैं फ़ासले, मिटते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

क्या पता बिसरे या रखते मुझको याद
दिल में उनके मेरी जैसी ही मुराद
इन सवालातों के हल मिलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

रास्ते उनकी तरफ़ खुलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही
- अरुण




एक शेर
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मन में, सामने का चित्र बदले जा रहा रफ़्तार में
पर मुझे लगता के बदले जा रहा है स्थान मेरा
- अरुण
एक शेर
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नज़र के दायरे में जो भी आते......एक हैं
नज़र गर आसमां हो रात दिन भी एक हैं
- अरुण