Tuesday, January 31, 2012

आनंद और रंजन


सृष्टि के सोंदर्य का
प्रत्यक्ष दर्शन
दृदय को आनंद से भर देता है
परन्तु प्रत्यक्ष दर्शन की
स्मृति या कल्पना या विवेचन
केवल मन को रंजित करता है
आनंद नही देता
- अरुण

Monday, January 30, 2012

दुःख और चिंता


जब मनुष्य का ध्यान
भविष्य और बीती घटनाओं से जुड़े  
विचारों में उलझ जाता है,     
मनुष्य का मनोवैज्ञानिक धरातल
दुःख और चिंता से कम्पित हो उठता है
- अरुण 

Friday, January 27, 2012

चली आओ ...


(पुराने फिल्मी गीतों की याद दिलाने के लिए)

सुलाने धडकनों को तुम चली आओ
समाने मेरी बाँहों में चली आओ

अभी अरमान प्यासे हैं अभी ये रात फीकी है
तुम्हे नजदीक लाने की जिगर में आस तीखी है

सजाने जिंदगी को तुम चली आओ
समाने मेरी बाँहों में चली आओ

ये दिल का साज चुप चुप है अभी मेहेफिल भी सुनी है
ये सजे इश्क सुनने की तमन्ना आज दूनी है

बजाने तार दिल का तुम चली आओ
समाने मेरी बाँहों में चली आओ

घटाएँ आज थमके हैं नज़ारे नही अभी गुम हैं
चली आओ चली आओ ये धीरज भी बहुत कम है

जगाने सब नज़ारे तुम चली आओ
सामने मेरी बाँहों में चली आओ

- अरुण


Thursday, January 26, 2012

नींद टूटी तो....


नींद टूटी तो स्वप्न-कांच महल टूट गये
हुआ पानी नसीब प्यासे अधर रूठ गये

होश में आने का है सिलसिला घडी हर घडी
इक घडी पूरे भरे दूसरी में फूट गये

वो हंसी झोंके थे नैया को बहाने वाले
थे हकीकत के बवंडर जो उन्हें लूट गये

बाद संयोग के चल आये किसी उपवन में
हम इधर आये मगर नैन उधर छूट गये

हर बनी आस तो सपने का ही एक रूप है दोस्त
जागकर देखनेवालों के साँस टूट गये

-अरुण  

Wednesday, January 25, 2012

मंजिल वही है


वक्त की हर बूंद जिसकी जिंदगी हो
जिस जगह भी हो खड़ा, मंजिल वही है
- अरुण

Tuesday, January 24, 2012

चुनाव के इस माहोल में


सभी राजनेता या राजनैतिक पार्टियां एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रही हैं.अपनी अच्छाइयों का बखान कर रही हैं.आश्वासनों से वोटरों का मन लुभाने में जुटी हैं.अपने किये पाप की गंभीरता कम करने के लिए दूसरों के पापों का पहाडा पढ़ रही हैं.जनता के नजर में अपनी छबि बनाने की होड में सभी पक्ष मशगूल हैं. चुंकि जनता उनकी ग्राहक है. उनके जुबान पर जनता की भलाई की बातें तो मन में वोट बटोरने की मन्शा दबी है. सभी पार्टियां और उनके नेता भयभीत हैं इस बात से कि कहीं जनता, कम से कम इस वक्त तो. नाराज न हो जाए.
अभी तक एक भी नेता ऐसा नही देखा जो कहे कि सारा भ्रष्टाचार तो जनता में ही व्याप्त है और हम तो उसी जनता के एक प्रतिनिधि मात्र हैं. ऐसी सच्ची बात कहने का साहस वही कर सकते हैं जिन्हें वोट की या भीड़ जुटाने की दरकार नही.
- अरुण

Monday, January 23, 2012

स्मरण


स्मरण शब्द के द्वयार्थ को समझ लेना होगा
स्मरण यानी होश और स्मरण यानी स्मृति
जो होश में है जागृत है
जो स्मृति में अटका - सोया हुआ है
भगवान का स्मरण करना
यानी भगवान या सत्य के प्रति होश रखते हुए जीना.
जिन्होंने स्मरण को  स्मृति समझा वे सब
अपने समझे हुए भगवान की स्मृति में बेहोश हैं

-अरुण    

Saturday, January 21, 2012

संगीत और जीवन-गीत में बहुत समानता है


शास्त्रीय संगीत में हरेक थाट के स्वरों में से
कुछ को चुनकर उनके उलट फेरों से
रागों का अविष्कार किया गया है
और अब उनमें से हरेक राग के आधार पर
अलग अलग भाव अभिव्यक्तियाँ
वाले गीत बनाये दिखते हैं
................
शुद्ध चेतना की उर्जा के
अलग अलग स्वभाव हैं (थाट)
अनुभूति के माध्यम से
विषयों की निर्मिति हुई है
एक ही विषय को अलग अलग भावनाओं से
अभिव्यक्त किया जाता है
संगीत और जीवन-गीत में बहुत समानता है
........................................... अरुण
  

Friday, January 20, 2012

उस दिन का इंतजार है


मन लिखता तो बहुत है अपने बाबत
पर हर बार शरीर को ही लिखते देखा है
ग़मों का बोझ कितना भी हो मन पर
हर बार शरीर को ही थकते देखा है
कौन लिखता है, कौन सहता है ग़मों का बोझ?
ऐसे सवालात मन ही उठाता है
और मन ही देता है इसका उत्तर 
जिस दिन शरीर इस बारे में कुछ कह सके
उस दिन का इंतजार है
............................................... अरुण  

Thursday, January 19, 2012

स्वेच्छा का माहोल और सक्ती का संतुलन


जड़ों को और तनों को, दोनों को
सुरक्षित वातावरण और पोषण मिले
तभी पेड पौधे खुशीसे बहरते,लहराते हैं
व्यक्ति और उसके वातावरण
दोनों में अनुकूल बदलाव जरुरी है
और यह बदलाव स्वैच्छिक हो.
और स्वेच्छा का माहोल बनाने के लिए 
जितनी सक्ति (आग्रह) चाहिए
उतनी ही हो, न अधिक और न कम 
.............................................. अरुण

Wednesday, January 18, 2012

प्रतिनिधि से दिल लगाते हैं


भगवान में नही, उसके ख्याल में ही रम जाते हैं
निधी से नही, प्रतिनिधि से दिल लगाते हैं
...................................................... अरुण
 

Tuesday, January 17, 2012

सारा अस्तित्व ज्ञानशून्य हैं


सामने उगा सूर्य सच है
बदन को छूती ये मंद हवा सच है
पर सूर्य को सूर्य कह कर पुकारो,
कहीं कोई प्रतिक्रिया न होगी
हवा की कितनी भी तारीफ या निंदा करो
उस पर कोई असर न होगा.......
सारा अस्तित्व ज्ञानशून्य हैं 
......................................... अरुण

Monday, January 16, 2012

पागल लगते हैं


यहाँ झूठ ही सच का किरदार निभाता है,
अँधेरे पर सफेदी चढाकर
फिर इसी सफेदी की वजह से दुनिया उजली दिखती है
और ऐसे ही बनावटी उजाले में
चल रहा है दुनिया का सारा कारोबार
इस कारोबार में,
जो निपुण है अच्छे लगते है,
जो अकुशल है कच्चे लगते है
और जो इस कारोबार में नही हैं
पागल लगते हैं
........................................ अरुण      

Sunday, January 15, 2012

देखना

देखना हर चीज को बनते हुए
देखना हर वक्त को ढलते हुए
देखना हर वाकिए का तार तार
देखने का वाकिअः घटते हुए   

देखने को देखता है जब समां
उस समां में ही समाकर देख लो
इस तरह से देखना ही जिंदगी
घर से बाहर आ, निकलकर देख लो
.......................................... अरुण 

Saturday, January 14, 2012

मन से मुक्त


मन में डूबा चित्त
इस छोर पर घबराए
तो उस छोर पे जाए
वहाँ पर समाधान न हो
तो इधर फिर लौट आए
इस रोग से उस रोग पर
इस मूर्छा से उस मूर्छा तक दौड लगाते
चित्त से ही हम जीते हैं
जो चित्त मन से मुक्त हुआ वह
न सुखी है और न ही दुखी
हर अवस्था में आनंद से भरा है
............................................. अरुण    

Friday, January 13, 2012

सही ख़ामोशी


ख़ामोशी सही हो तो तूफान उठे जाते हैं
जो तूफान खामोश हैं दिल मे
ख़ामोशी से घबराते हैं
....................................... अरुण

Thursday, January 12, 2012

धरम अनुशासन


भटकन से बचाता है धरम अनुशासन
मगर सच से कहीं दूर भगा जाता है
जिसकी आँखों में पट्टियाँ न बंधी
न भटकता है न भगा जाता है  
........................................... अरुण

Wednesday, January 11, 2012

अब भी सपने आते क्यों हैं ?

पहले तो किया करते थे सपनो पे भरोसा

दिल से हर बोझ उतर जाता था

जब से समझी है सपनो की हकीकत

दिल का हर बोझ बढ़ा जाता है

फिर भी ये बात समझ में आती नही कि

अब भी सपने आते क्यों हैं ?

............................................. अरुण

Tuesday, January 10, 2012

अपने माजी से ही चिपके हुए, लिपटे हुए

मेरा माजी ही- मेरा वजूद है शायद

मेरे जाने के बाद कुछ न बचेगा शायद

जो भी है - अब है यहाँ, जिन्दा है

कल की बस याद यहाँ जिन्दा है

जिंदगी साँस और एहसास का मिलन

हर साँस में एहसास यहाँ जिन्दा है

साँसभर है जिंदगानी सफर

इतना लंबा लगे तो कैसे लगे

सिर्फ लम्हे का फासला है मगर

वक्ते एहसासे सफर लंबा लगे

जिंदगी छोटी, बहुत छोटी, बहुत छोटी मगर

छोटे टुकड़ों से उभर आता एहसासे सफर

इसी एहसास में डूबी तमाम जिंदगी

अपने माजी से ही चिपके हुए, लिपटे हुए

...................................................... अरुण

Monday, January 9, 2012

जिंदगी लेनी तो देनी भी है

इंसान बस अपनी ही सोचता है

अपने सुखदुख के लिए खुदा को कोसता है

आंधियां चल पड़ें तो कहे बचाओ हमें

रोग पकड़ ले तो कहे छुडाओ हमें

भूल जाता है के आंधियां उसकी ही हैं

हर रोग को जिंदगी उसने ही दी है

यहाँ तुम ही अकेले नही जिंदगी के हक़दार

कुदरत पे जी रहे कई और भी हैं

बेहतर यही कि खुदा से कुछ न कहो

अपना सोचो और सभी का ख्याल करो

जिंदगी सिर्फ जीने की कहानी नही

जीने और जिलाने की रवानी है

अपना ही सोचने वाले, ख्याल रहे

जिंदगी लेनी तो देनी भी है

............................................................. अरुण

Sunday, January 8, 2012

समय

समय की धार पे बहता है जिंदगी का जहाज

कई अरमान गम समेटे हुए

कभी सुबह तो कभी अंधकारमय रातें

सभी दिशा से साँस लेते हुए

समय की धार को कोई नही बदल पाए

आएँ जाएँ भले ही कितने जहाज

सुबह हो रात हो कैसा भी हो समां मंजर

समय का सबसे एक जैसा मिजाज

.................................................... अरुण

Saturday, January 7, 2012

सारे मेरे रिश्ते, मेरी दुनिया है

सारे मेरे रिश्ते, मेरी दुनिया है

मेरी दुनिया ही - मै हूँ

अगर न जानते हुए इस मै को

कुछ भी करूँ

तो वह कुछ न करने के बराबर ही है

.............................................. अरुण

Friday, January 6, 2012

खुशी से दूर कहीं ......

कभी मंदिर कभी पूजा,

स्वयं भुलाए हुए

खुशी से दूर कहीं

हम खुशी को ढूंढते है

........................................................ अरुण

Thursday, January 5, 2012

अपना लगता है

जेब में धरा हुआ, अपना लगता है

पर जिस धरा पे खड़ा हूँ,

वह अपनी नही लगती

.................................................. अरुण

Wednesday, January 4, 2012

एहसास

हर बात के एहसास को एहसास होता है

नही है पास कुछ भी मगर वह पास होता है

......................................... अरुण