Thursday, December 10, 2015

१० दिसम्बर

एक शेर
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चित्र बनते दिख रहे हों आइने में... ......वे नही बनते न होते हैं वहाँ
खोपड़ी में सिर्फ उर्जा का बहाव... मन विचारों की महज़ छाया वहाँ
-अरुण
एक शेर
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जानने की कोशिशें..... नाकाम हैं
सुनके पढ़के बस बने है जानकारी
-अरुण

सत्यदर्शन
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हम सब असत्य
या झूठ ही हैं...
हमारे इस सार्वजनिक
झूठ के झूठत्व का
स्पष्ट दर्शन ही है
सत्यदर्शन
-अरुण

एक शेर
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हर किसी के ग़म-ख़ुशी का है अलग तप्सील
दिल में सबके रंग उसका .......एक ही जैसा
अरुण

एक शेर
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आतंकियों के बम मिसाइल रूस की हो
धर्म ऊर्जाका ....अधार्मिक बन गया  है
अरुण
एक शेर
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उभर आते  हैं वेद सारे.....कोरे काग़ज़ पर
चितका कोरापन ही..... उनको पढ़ पाता है
अरुण
एक शेर
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कहने को कुछ न होता तो न होती भाषा
पाने को कुछ न होता तो न होती आशा
अरुण





एक शेर
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सतह पर गिरती-ओ- उठती है लहर
है नतीजा भी वजह भी.... ये लहर
अरुण
एक शेर
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लाख पोछो या के झाड़ो तुम उसे...
दीवारे पत्थर है न कुछभी दिख सके उसपारका
अरुण
एक शेर
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जो है नही जिंदा..... ....मरा सा भी नही लगता
ये माजी है.. बडा ज़ालिम.. हटाने से नही हटता
अरुण
एक शेर
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जो ख़ुद हो प्रज्वलित..... उसके लिए तो रौशनी शाश्वत
पराई रौशनी का क्या भरोसा ? चल सको कुछ ही क़दम
- अरुण
एक शेर
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इक घर मिला था मुझको रहन वास्ते मगर
आँगन से दिल लगा तो.. बाहर ही रह गया
- अरुण

आज की यह ताज़ा ग़ज़ल
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हज़ारों हैं ...करोड़ों जीव हैं....  पर  आदमी जो
समझता है..ये दुनिया है....तो केवल आदमी ही

कहीं से भी कहीं पर .....जा के बसता है परिंदा
मगर पाबंद कोई है..........तो कोई  आदमी ही

जभी हो प्यास पानी खोज लेना.. जानती क़ुदरत
इकट्ठा करके रखने की हवस.......तो आदमी ही

बचाना ख़ुद को उलझन से सहजता है यही लेकिन
फँसाता खुद को....बुनता जाल अपना आदमी ही

बदन हर जीव को देता ज़हन..... जीवन चलाने को
चलाता है ज़हन केवल .........तो केवल आदमी ही

खुदा से बच निकलने की ....कई तरकीब का माहिर
खुदा के नाम से जीता ..... .....तो केवल आदमी ही

- अरुण

Tuesday, December 1, 2015

१ दिसम्बर

एक शेर
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पल पल बदलती है.. ये कायनात....अपना पैतरा
मेरी मन दौड़ इस बदलाव से रखती मुझे गाफ़िल
अरुण

इसपर ग़ौर करें
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लगाव भी है अलगाव भी है एक ही वक़्त
अभाव भी है और भाव भी है एक ही वक़्त
मगर इंसान को.... इसका न कोई होश है
वह अच्छा और बीमार भी है एक ही वक़्त
अरुण

एक शेर
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यादों को ही भूत कहो........कहो भूत को याद
याद बनी है जीवन सबका.. भूत जगत अवतार
अरुण

एक शेर
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हवा पे उड़ रहे बादल को.... कुछ भी है नहीं कहना
मगर उसमें भी अपने मन मुताबिक़ चित्र देखे आदमी
अरुण
एक शेर
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साँस के चलने से पहले जो जैसा था
वैसी ही है दुनिया साँस के चलते भी
अरुण


मुहब्बत क्या है?
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मुहब्बत ऐसी नजदीकी का नाम है
जिसमें न दूरी है, न मजबूरी है,
न मिलकियत है और न है कोई नीयत...  
जिसमें दो नहीं होते और
न ही गिना जा सके
ऐसा कोई एक ही होता है...
मुहब्बत में न कोई लगाव है
और न ही कोई अलगाव,
न कोई उलझाव
और न ही है कोई सुलझाव
केवल होता है
भाव ही भाव
-अरुण  







दो बातें
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मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती
००००००००००००००००००००००००००००००००००००
फ़िल्म के इस गीत में गीतकार ने प्रेम-भाव को
बखूबी अभिव्यक्त किया है,
दरअसल, दिल की धडकनों को....धड़कने ही समझ पातीं हैं.
समझने का काम भले ही मन-बुद्धि करते हों... पर वे
धडकनों को महसूस करने और उन्हें समझने में असमर्थ हैं,
ठीक वैसे ही जैसे कान..... सामने धरी चीज को देख नहीं पाते
-अरुण

मन के अंदर ही है
०००००००००००००
क्यों न हों  समंदर में हज़ारों लहरें ?
हर लहर तो समंदर ही है....
जो गिनने बैठ गया- लहरों को..
वह समंदर के साथ नही..मन के अंदर ही है
अरुण
एक शेर
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ज़मीं पे छा के भी छाया ज़मीं को कुछ नही करती
मगर इंसान का मन.......खोपड़ी को है हिला देता
- अरुण

एक शेर
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युग युगों शिक्षा प्रणाली है अजब ही किस्म की
ना जगाये प्यास... केवल जल पिलाये जा रही
अरुण
एक शेर
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आँख का है काम केवल देखना ही देखना
पहचानने का काम मन का भूत करता है
अरुण
एक शेर
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चल रहा था...रुक गया.. .........थककर नही
हर क़दम अपनी जगह पे ही चले..यह देखकर
अरुण

एक शेर
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मस्तिष्क ही निहारे भीतर बाहर
आँख तो है महज़ एक झरोखा
अरुण
एक शेर
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बिंदु का होता नही आकार, फिर भी
चित्र दिखता बिंदुओं को जोड़ते ही
अरुण
एक शेर
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आँखे पुरानी हो चुकी अब कुछ नया दिखना कहां
जब तक नया बन जी न लूँ.....होगा नया कैसे जहां
अरुण

एक शेर
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हर रवैये में छुपा हो अहं जबतक
नम्रता भी खिल पडेगी अकड़ साधे
- अरुण
एक शेर
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रौशनी को छेककर... जो भी खड़ा हो
लाख चाहे.. छांव उससे हट नही सकती
अरुण
एक शेर
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खाद की दुर्गंध ने ही फूल में ख़ुशबू जगायी
जो बुरा होता वही... अच्छा बनाया जा सके
- अरुण

एक अवलोकन
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श्वांस पर जो भी खड़ा हो
देखता है वह तमाशा आस का
आस की उलझन जिसे है खा रही,
क्या पता हो उसको अपनी श्वांस का?.
अरुण



कोई ऊँचा है तो कोई नीचा
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उपवन में सभी फूल
अपने एक जैसे ही....
जीवंत वातावरण में
जी रहे हैं....
परन्तु बाजार नहीं पहचानता
उनके इस
सम-समान सहस्तित्व को,
मूल्य-जगत में,
गुलाब महंगा है और
गेंदा सस्ता...

इसीतरह,
परमात्म जगत में
सभी एक जैसे होते हुए भी ..
समाज में....
कोई ऊँचा है तो कोई नीचा
-अरुण

एक शेर
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हर किसी के ग़म-ख़ुशी का है अलग तप्सील
दिल में सबके रंग उसका .......एक ही जैसा
अरुण

असहिष्णुता - एक शेर
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मैं तुम्हें अच्छा न कहूँ...... .....तो नाराज़ होते हो
और फिर जो भी कहते हो मुझे बर्दाश्त नहीं होता
अरुण
एक शेर-
असहनशीलता
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इतना भी कहने की जुर्रत न करें के.....दिन ये अच्छे नहीं
वरना, वे एक भीड़ ख़रीद लाएंगे........आपपर थूकने को
अरुण
एक शेर
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जहाँ बादल बोझिल हुआ....... बरस जाता है
बादल न पूछे भगवान से और न ही किसान से
अरुण
एक शेर
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एक ही वक्त ...सभी खेल तमाशों का यहाँ
कुछ अभी कुछ तभी... बस, मन का ख़याल
अरुण
एक शेर
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बहता पानी नदी का हर पल...नया का नया है
मगर बहती चेतना को....पुरातन निगल गया है
अरुण
एक शेर
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चल पड़ा था निजता लेकर.... ढल गया हूँ संस्कारों में
संस्कारों में रमकर अब तो...निजता सारी भूल चुका हूँ
-अरुण

Sunday, November 1, 2015

1 November

प्रेममय है ज़िंदगी फिर...
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जो है ही नहीं... अस्तित्व में..आँख उसकी
देखती रहती...जो भी घट रहा है इस देह के सम्पर्क में..
इस देह के भीतर ओ बाहर..

सुझाई दे रहा जो भी फिर...
है इक तजुरबा ही महज़.. इक हक़ीक़त ही महज़..पर
है नहीं यह सत्य..
ऐसा बोध सकना हो सका गर......

आनंदविभोर आनंदभिंगी
प्रेममय है
ज़िंदगी फिर....
अरुण

आदमी और पल
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आदमी को
पल पल,
पल बनकर
जीना है..पर
आदमी का
हर पल,
आदमी बनकर
जी रहा है
-अरुण

Thursday, October 29, 2015

29 0ctober

अपने चित्तपर व्यापक ध्यान जाते दिखे
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चित्त है....... चित्र की तरह विचित्र
अलग अलग प्रतिमाएँ...
एकही स्याही है।
एकही धरातल पर चित्र बने..
दिखे कहीं पर्वत तो
दिखे कहीं खाई है।
अरुण
कुछ शेर
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हटा जब मोह बाहर का, खुले इक द्वार भीतर में
पुकारे खोज को कहकर- यहाँ से बढ़, यहाँ से बढ़

भरी ज्वानी में जिसको जानना हो मौत का बरहक*
उसी को सत्य जीवन का समझना हो सके आसाँ

जिसम पूरी तरह से जानने पर रूह खिलती है
'कमल खिलता है कीचड में' - कहावत का यही मतलब

ख़याल भरी आँखों से............. मै दुनिया देखूं
तो दुनिया दिखे ......................ख़यालों जैसी

अँधेरे से नहीं है.............. बैर रौशनी का कुई
दोनों मिलते हैं तो रौनक सी पसर जाती है

बरहक = सत्य, * सिद्धार्थ (भगवान बुद्ध) के बारे में
- अरुण
एक शेर
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एकही वक़्त.. कई सतह पे जीनेवाला
आदमी ख़ुद में खुदा और खुदाई भी है
- अरुण

ग़ौर करें
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किसी को याद  करना फिर उसीको भूल जाना
वजह येके.......नयीही सोचका दिल में उभरना
कोई भी सोच..........अपनेआप में पूरी नही है
यही वो सत्य जिसको दिल की गहराई से छूना
- अरुण

Monday, October 26, 2015

26 अक्तूबर

वे भी भरोसेमंद नही...
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वे लोग जिनकी राष्ट्रनिष्ठा पर शक हो उन्हे
भरोसे लायक न समझना वैसे तो ठीक ही है ।

पर क्या वे लोग या संगठन
जो देश के संविधान की मूलभूत आत्मा को ही सिरे से नकारते हैं ..
और फिर भी अपनी इस सोच और इरादे को
आदर्शवादी शब्दों एवं धारणाओं में छुपाकर रखते हैं....
भरोसेमंद हो सकते हैं?
अरुण

एक शेर
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अल्फ़ाज़ हैं इशारें महज़.. ..हकीकत नही
पर उसे ही मान लेते सच.....ऐसे कम नही
अरुण

यह जीवन केवल एक संचार है
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जीवन सिर्फ है एक संचार...न कोई आकार न प्रकार
न कोई नाम न उच्चार
न किसी काल-पट्टी के खांचो से कट सके ....
न भूत, भविष्य और वर्तमान में बट सके
न बिंदु है सो न है रेखा..
दिखे... जैसा जिसने देखा
जब देखो तभी है ....न कल था न अभी है ....और इसीलिए
इसे नया या पुराना कहना भी ठीक नहीं
न पुराना था कभी सो ............नया कहना भी सटीक नहीं
अज्ञानवश निरंतरता का आभास जगाने वाला
स्थाई या कि अस्थाई....
इन जैसे सवालों को उठानेवाला...
यह जीवन केवल एक संचार है
-अरुण    
एक शेर
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अपने रिश्तों के धरातल का नाम है दुनिया
दुनिया वो नही जो .......दूर कहीं रखी हो
अरुण

एक शेर
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मसलों से हैं निपटते.....कुछ इसतरह सभी
पेड़ों की ना ख़बर लें,  पत्तों का बस ख़याल
- अरुण

एक शेर
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अपना ही रूप दुनिया.. दुनिया में.. फिरभी हम
अपने को दूर रखकर.......दुनिया की सोचते हैं
- अरुण

एक शेर
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भीतर में इक ख़याली.... है पेड़ उग गया
छाया में जिसकी ढलते....मेरे तमाम रिश्ते
अरुण

एक शेर
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'नींद से बाहर निकल आना' नही है जागना, क्योंके
जागने पर... .....जागनेवाला न बचता.....अलहिदा
अरुण
एक शेर
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नही कथन.. न कोई कहने-सुननेवाला है
कई तरह की... सर में हो रही हैं आवाज़ें
अरुण
एक शेर
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एक ही आदमी जीता है हर ज़माने में
कई तरह के रूप रंग और क़िस्से लिए
अरुण
एक शेर
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जबसे स्वीकारी मुल्क जात की पहचान
ज़मीन एक मगर आदमी के टुकड़े हुए
अरुण
एक शेर
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हरपल निराला है...निराली जिंदगी है
जाने वही के जिसका न हो कोई नाम
- अरुण

Wednesday, October 21, 2015

21 0ctober

एक शेर
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हालात-ओ-तजुरबात के चेहरे.... अलग अलग
आदमी तो एक ही है जो लगता....  जुदा जुदा
अरुण


फूल और प्रेम
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भले ही फूल किसी खास टहनी से
जुड़ा लगता हो,
उसकी सुगंध
परिसर के कण कण में घुल जाती है..
मगर आदमी का प्रेम
अपनों तक ही
सिमटकर रह जाता है
-अरुण

मुक्ति
************
पिंजड़े का पंछी
खुले आकाश में आते
मुक्ति महसूस करे
यह तो ठीक ही है
परन्तु अगर
पिंजड़े का दरवाजा
खुला होते हुए भी
वह पिंजड़े में ही बना रहे और
आजादी के लिए प्रार्थना करता रहे तो
मतलब साफ है....
आजादी के द्वार के प्रति वह
सजग नही है
वह कैद है
अपनी ही सोच में
अरुण


मृत्यु
*******
मृत्यु को लेकर
बहुत अधिक गूढगुंजन करना
व्यर्थ है।मृत्यु भी एक प्रकार की
गाढ़ी नींद ही है।

गाढ़ी नींद हो या पूरी बेहोशी ...
अगर प्राणी प्राणडोर से बँधा हो तो
उसके जागने की संभावना बनी रहती है।
प्राण निकल गये हों तो अन्य उसे
मृत हुआ जान लेते हैं।

मतलब यह कि...
गाढ़ी नींद या पूरी बेहोशी...दोनोंही,
पुन: जागने की संभावना से युक्त,
मृत्यु की ही अवस्थाएँ हैं।
अरुण

अस्तित्व की अस्तित्वता
***********************
अस्तित्व की क्षमताएं एवं
अंतर-व्यवस्था हर हाल में ,
एक जैसी ही रहती है,
चाहे मनुष्य अस्तित्व को
मायावी ढंग से उपयोग में लाए या
स्वयं अमायावी अवस्था में रहकर
उसमें रम जाए।
फूल चाहे जंगल में डोले
या छत के गमले में
उसकी महक एक जैसी ही
फूलती-बहरती है।
अरुण

एक शेर
*******
बला का वक़्त है ये... बक रहे सब जो जुबां चाहे
सभी खिलवाड़ करते दिख रहे हैं.... राष्ट्र गरिमासे
अरुण

एक शेर
*********
ध्यान चूका.. ढल गई इक नींद..मैं वह नींद हूँ
जागने के देखता हूँ खाब............सारी उम्रभर
- अरुण

14 0ctober

सच्ची बात
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गर नदी होती नहीं... फिर तट न होते
दृश्य - दर्शक,...दृष्टि के ही दो किनारे
अरुण
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'अंतिम यात्रा'
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क्यों न शुरू की मेरी 'अंतिम यात्रा' की तैयारी... उसी दिन
जिस दिन......... मैं इस धरती पर आया
***
उसी दिन से तो शुरू कर दिया आपने गला घोटना मेरी कुदरती आजादी का..
उसी दिन तो शुरू किया आपने.....मेरे निरंग श्वांसों में.....
अपनी जूठी साँस भरकर...उसमें अपना जहर उतारना......
उसी दिन से तो सही माने में मेरी क़ैद शुरू हुई,
*****
आपके विचारों, विश्वासों और आस्थाओं ने मेरी सोच को रंगते हुए .......
मुझे बड़ा किया...मुझे पाला पोसा बढ़ाया....आप जैसे 'अच्छे-भलों' के बीच में लाया....
आपने जिसे अच्छा समझा वैसा ही जीना सिखाया.....पर कभी न समझा कि......
आप फूल को ......उसकी अपनी ज़िंदगी नही,  समाज को जो भाए , ऐसी मौत दे रहे हो,
***
अब तो मै बस ....सामाजिक प्रतिष्ठा और उपयोग का सामान बनकर रह गया हूँ ...
अब पहुँचने जा रहा हूँ अंतिम छोर पर.......
उस राह के...जिसका आरम्भ ही न हो पाया कभी ....
अरुण
साँस
********
जीने जिलाने की ही दुनिया हो तो
बस,  हलकी सी  साँस बहुत है

दुनिया मिलने मिलाने की हो तो फिर
हर साँस के साथ..
पास और दूर वाले रिश्तों की निर्भरता जुड जाती है.....

पाने-खोने, कमाने-गँवाने वाली दुनिया में
जी रही साँसों से
हिसाबों की भारी भारी तख़्तियाँ
लटक कर साँसों को बोझिल बना देतीं हैं

ऐसे बोझिल साँस वालों को ही ' आलोम विलोम' वाले
आसानी से अपना ग्राहक बना लेते हैं
पर कुछ नही होता...

कोई नही बताता ऐंसों को कि
अपनी साँसों से बस
रिश्तों की निर्भरता हटाओ
हिसाबी तख़्तियाँ उतार लो...
साँस फिर से हलकी होकर बहने लगेगी...
एक मधुर..मृदुल.. पवन-झोंके की तरह
- अरुण

Monday, October 12, 2015

तारीख़ १२ अक्तूबर २०१५ तक

एक शेर
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कोई नही इरादा..... कोई नही डिज़ाइन
इंसा का मन ज़हन ही इस सोंच से परेशां
-------------
सारी क़ुदरत किसी मक्सद से नही और न ही किसी योजना का हिस्सा है।
ये आदमी ही है केवल जो मक्सद की सोचता है।
अरुण

सच्ची बातें
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हर मंजिल........ कोशिश के चलते पायी जाती है
इक ऐसी भी, कोशिश के थमते... पास चली आती
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चेहरे देखकर ही दिल से दिल जुड़ते नही हैं
फकत पढ़ शब्द गीता के प्रभु मिलते नही हैं
अरुण
एक शेर
*********
है यादों के परे जो, बस उसका भान हो जाए
प्रभु को याद करने से ....प्रभु मिलते कहाँ हैं?
अरुण





प्रेमपत्र
*******
सभी लिख रहे हैं अपने भीतर
अपनी अपनी कहानियाँ,
अपनी अपनी सोच और मंसूबे.......
जिसपर लिखा जा रहा है
वह काग़ज़, पत्र या प्रेमपत्र तो
सब का एक ही है
अरुण
यह 'प्यास' तो निजी ही है
*************************
यह भीड़ उन लोगों की ही
जो अपनी निजी 'प्यास' का समाधान ढूंढ़ नही पाए पर
यह जान कर कि इर्दगिर्द भी लोगों में ऐसी ही 'प्यास' है,
वे इकठ्ठा हुए,'प्यास' का उपाय ढूँढने में जुट गए,
कई सार्वजानिक तरकीबें इजाद की,
मंदिर मस्जिद बने, पोथियाँ लिखी- पढ़ी गईं , पूजा पाठ,नमाज़
प्रवचन,भजन पूजन ऐसा ही सबकुछ......
और अब भी यही सब.....
मानो 'प्यास' बुझाने के तरीकें मिल गएँ हों
पर सच तो यह है कि
निजी 'प्यास' अभी भी बनी ही हुई है
और फिर भी संगठित धर्मों को ही प्यास बुझाने का उपाय
माना जा रहा है,
इसी सार्वजनिक भूल की वजह
'निजी समाधान' खोजने की दिशा में
आदमी आमतौर पर  प्रवृत्त नही हो पा रहा
अरुण

विचारणीय
**********
प्यासे सभी इकट्ठा होते रहे
पानी पे ख़ूब चर्चा करते रहे
अनुभूत हो न पाया इक बूँद भी
अनुभूतियों के क़िस्से पढ़ते रहे
अरुण
एक शेर
*********
जानना हो...अंश केवल जान पाओगे
जागने पर ...कुछ न बचता जानने को
अरुण
विचारणीय
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परछाइयाँ अपनी बनाती जा रही परछाइयाँ
मन में झाँका तो नज़ारा इसतरह का ही दिखा
अरुण




स्वप्न और भूत
**************
सजेधजे भूतों को
कहते हैं – स्वप्न
और
मिलेमिटे स्वप्नों को
कहते हैं – भूत
-अरुण

ज्ञान नहीं सिर्फ परिचय
***********************
अपना लिबास देखकर अपने को जानना
यह जानना नहीं है, सिरफ ऊपरी झलक
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मुझे मेरे स्वयं का ज्ञान नहीं है, सिर्फ परिचय है
इस परिचयभर से मेरा काम चल जाता है।
इस परिचय से परे जाना हो तो
परिचय के अंतर्गत निहित सभी भूलों (अज्ञान)
को सही सही जान लेना होगा और यह बात
तभी संभव है जब जो सामने दिखे उसे देखने का
साहस जुटा लिया गया हो
-अरुण        
एक शेर
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सामने आया... नहीं देखा लगाकर ध्यान पूरा
ध्यान धारा टूटकर भागे विगत के अनुभवों पर
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जो सामने आए उसपर ध्यान पूरी तरह नहीं ठहर पाता।
मन उसे पिछले अनुभवों की ओर खींचकर ले जाता है।
- अरुण
आज के लिए ये तीन शेर
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आदम से न देखी शक्ल आदमी ने अपनी
अपने अक्स से काम चला लेता है

चर्चा-ए- रौशनी किसी काम का नही
दरवाजा खुला हो यही काफी है

बंद आँखों में अँधेरा, खुलते ही सबेरा
न फासला है और न है चल के जाना
अरुण

अहंता
******
मन की धारा पर चढ़ा कुछ इस तरह
अहंता का भ्रांत भाव
बहता पानी... और नदी का नाम मिलते
रूप ले लेता बहाव
अरुण

एक शेर
*********
आदतें अच्छी बुरी हों.....मुक्त होना है ज़रूरी
गहनता ही देख पाती... मन पे दोनों ही सवार
अरुण

मन तो है प्रतिबिम्ब
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मन तो है
जीवन का प्रतिबिम्ब,
अहंकार है इसी प्रतिबिम्ब का एक
चलायमान केंद्र,
यही केंद्र मन को चलाता रहता है,
मन की इस गतिशीलता को ही
मनुष्य
असली जीवन समझते हुए जीने की
भूल करता है।
जो मन के परे जागा
वही जीवन से परिचित हो सका।
अरुण
एक शेर
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आग है.. उसका धुआँ भी और....पूरा आसमां
आदमी के रूप तीनों ... देह, मन, मानव जगत
अरुण
सच्ची बात
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एक छोटी चुभन से ही .....ज़िन्दगी बनती बवाल
एक क़तरा तजुरबा ही ...समय ले बनता ख़याल
ज़िन्दगी हर साँस में जो ......जिसने पूरी देख ली
मौत के उपरांत क्या?  उसको न खाये यह सवाल
अरुण


एक शेर
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पढके धार्मिक ग्रंथ.......इतना ही समझ पाया
ज़िन्दगी ही ख़ुद को पढ़ ले, पढ़नेवाले के बग़ैर
अरुण


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सच्ची बात
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गर नदी होती नहीं... फिर तट न होते
दृश्य - दर्शक,...दृष्टि के ही दो किनारे
- अरुण













Monday, September 28, 2015

पेज ७२ तक

एक गजल
**********
क्योंकर सज़ा रहे हो परछाईयों के घर?
जागोगे जान जाओगे सपने के तू असर

कुछ साँस ले रहे हैं .,ज़माने के वास्ते
कुछ मेहरबाँ बने हैं ज़माने से सीखकर

जो ख़ुद को देखता है..दूजों की आँख से
दूजों को जान देता है अपनी निकालकर

उसको ही लोग कहते खरा साधु खरा संत
जिस 'संत' का है मोल किसी राजद्वार पर

जिसके लिए बदन हो किराये का इक मकान
उसको न चाहिए.......कोई दीपक मज़ार पर
अरुण


Please meditate on this –
-------------------------------------
Mind cannot be total awareness only because it is a byproduct of unawareness. Yes, mind can be aware of itself (within) and others (without).

Awareness is not being ‘aware of’. Awareness is a state which is off (or beyond) the mind.

‘Being aware of’ is a focusing by a subject on an object, whereas, awareness is beyond subject-object duality
Arun

मेरी बातें....
*************
मेरी बातें सुनके शायद तुम बदल जाओ
मै बदल पाऊँ न पाऊँ कह नही सकता

रास्ते होते नही मंजिल अजब ऐसी
ऐसी मंजिल को बयां मै कर नही सकता

भीड़ बाहर भीड़ भीतर पर अकेलापन
ऐसा ख़ालीपन कि जिसको भर नही सकता

जीना मरना अलहिदा जाने जो ये बंदा
साँस लेते चरते फिरते मर नही सकता

कायनातें जी रही हैं चलती साँसों में
साँस थमते कुछ भी बाकी रह नही सकता

चाहतों से दिल लगा तो ग़म का ना कर ग़म
रिश्ता ग़म और चाहतों का टल नही सकता
- अरुण




इसपर ग़ौर करें
****************
हम... रूप रंग ढंग देखे जानते सिर्फ... ......शख़्सियत
बुद्ध.. स्वयं पर एक्सरे-दृष्टि डाल.. बूझ लेते आदमीयत
अरुण
एक शेर
*********
अल्फ़ाज़ों को रट लेने से बात नही बनती
अल्फ़ाज़ जो दिखलाते हैं वही देखना होगा
अरुण





********
एक शेर
*********
साथ चलता  है साया मगर साथ नही देता
अंधेरे की आहट सुनते ..भाग निकलता है
अरुण

एक शेर
*********
दूसरों की बनाई लकीरों पर चलकर क्या जाना?
मै.. मै नही हूँ , है कोई और ही........यही जाना
अरुण

एक शेर
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अंधेरे को रौशनी... और मौत को जिंदगी कह दो
फिर न बचती जूस्तजू... ..फिर न कोई भी तलाश
अरुण


समय को विश्राम दो.........
********************
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर
आस में जो थक गया उस रूप का श्रृंगारकर

नयन में बन ढल गये जलकण तुम्हारे धीर के
ओंठ पर अब सो रहे हैं ......गीत लंबे पीर के
तपन में जो जल रहा सौंदर्य उसका ख्यालकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

धडकनों में भय समाया है गमक न प्रीत की
वेदना की गूँज है.. अब गूँज ना मधु-गीत की
शुभ स्वरों को जन्म दो इस रुदन का संहारकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

असहायता का बिम्ब अब मुखपर चमकता जा रहा
नैराश्य का ही भाव अब दिल में सुलगता जा रहा
लो आसमय दुनिया इन्ही हांथो का लो आधारधर
समय को विश्राम दो ......इस बाह में तन डालकर
अरुण
एक शेर
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ओढ़ लेते तंग दिल भी शराफ़त का चोला
अच्छा वही लिबाज जो न हो तंग, न ढीला
अरुण
एक शेर
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सलीक़ा आ गया जिसमें पका वो ही बुढ़ा वो ही
बुढ़ापा वैसे तो, नादान को भी है हुआ हासिल
अरुण












एक शेर
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चाहत के मुताबिक करने की आज़ादी है .....पर बंधन में
संस्कारों में जकड़ी बैठी चाहत खुद ही है..........बंधन में
अरुण
एक शेर
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ज़ाहिर है के ये ज़मीं सबकी आसमां सबका,
फिर लफ़्ज़ मेरा या तेरा कहाँ से आ टपका ?
अरुण

तीन शेर
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ख़्यालों में, नामों में, ज़हन में.. अलग हैं सब
ख़्याल थमे, नाम छुपे... सब के सब एक हैं
*********
तमन्ना से बच निकलने का ख़याल
क्या किसी तमन्ना से कम है?
*********
मुझसे पहले जो भी आये अप्नी कहानी छोड गये
उसी कहानी की धरती पर मेरी कहानी खड़ी हुई
अरुण
एक शेर
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उठा सकता अगर लहर समंदर से तो
सतहे समंदर हो जाती टुकड़ा टुकड़ा
अरुण
एक शेर
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कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण











मानवता चहुँओर
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गंध का काम है फैलना चहुँओर, .............'अपने पराये' का कोई नही ठोर
जिसको सुगंध लगे पास हो आवेगा, .......जिसको सतायेगी दूर भग जावेगा
गंध तो गंध है... होती निर्दोष,  ...................चुनने में दोष है, चुनना बेहोश
मानव में मानवता हरपल महकती है, करुणा को भाये वो स्वारथ को डसती है
अरुण

एक शेर
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कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण

एक शेर
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कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण

एक शेर
*********
कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण

एक शेर
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गिनते गिनते मौजों को कट गई जिंदगी पूरी
एक बार भी इन आँखों ने देखा न समंदर पूरा
अरुण

एक ऐसी बात ......
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एक ऐसी बात है जो ध्यान में उतर आये तो बहुत कुछ कह जाती है
बात यूँ है-
आदमी अंधेरा भी देखता है और प्रकाश भी और इसीवजह अंधेरे में प्रकाश की और प्रकाश में अंधेरे की कल्पना करता  हुआ...अंधेरा या प्रकाश देखता रहता है। परंतु प्रकाश का मूल स्रोत - सूर्य,..न तो अंधेरा देखता है ओर न ही प्रकाश क्योंकि वह स्वयं प्रकाश ही है।

वास्तविकता में जीनेवाले हमसब अज्ञानयुक्त ज्ञान से काम चला रहे हैं।मगर सत्यप्रकाशी न तो अज्ञानी है और न ही ज्ञानी...क्योंकि वह स्वयं ज्ञान ही है
अरुण
एक शेर
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असलियत देखे बिना ही....कुचलते हो चाहतें
डोर को ही साँप समझे.. जड़ रहे हो लाठियाँ
अरुण

एक शेर
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धरती से हटकर... आसमां दिखता नही है
देह से ही झांक सकते रूह का फैला गगन
अरुण

कुछ शेर
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जो नही है सामने, होता बयाँ
नजर को ना चाहिए कोई जुबाँ

इन्सान के जेहन ने जो भी रची है दुनिया
भगवान दब चुका है उसके वजन के नीचे

घडे में भर गया पानी जगह कोई नही खाली
कहाँ से साँस लेगा अब घडे का अपना खालीपन

- अरुण

दो दोहे
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आदमी द्वारा होनेवाला चुनाव उसके संस्कारों से बँधा हुआ है

पहले मिर्ची खाय दे सो फिर जले जुबान
मीठा तीता सामने .........चुन मेरे मेहमान

मन को साधन बना कर जो जी पाए, वे आनंदित हैं.
जो मन द्वारा चलाए जा रहे हैं, वे त्रस्त हैं

चढ़ चक्के पर होत है दुनिया भर की सैर
जो चक्के में खो गया उसकी ना कुई खैर
अरुण
एक शेर
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है वही दिखता, वही देखनेवाला भी है
एक ही वक़्त आदमी के हैं दो दो चेहरे
अरुण

एक शेर
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वक्त तो होता नही अस्तित्व में, पर
मन चले तो... वक्त को गिनता चले
अरुण

वास्तव पर माया का परदा
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परदा आँखों पर पसरा हो या
वास्तव को ढकता हो, दोनों ही स्थितियों में वह हमें
माया में
(यानि सत्य का आभास पैदा करने वाला असत्य)
उलझाये रखता है.
इस परदे का वास्तव दिख जाते ही
आँखें और वास्तव
दोनों ही स्पष्ट हो जाते हैं
-अरुण

ज़िन्दगी रूहानी
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देखना... सबकुछ बराबर की नज़र से
ज़िन्दगी होगी तभी .....असली रूहानी
कुछ पे ज़्यादा ध्यान देना कुछ बिसरना
व्यर्थ में ही मोल लेते ...........परेशानी
अरुण


खोज रुहानी
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है जाना या नहीं गूढ़, शंका जिसको भी
खोज बनाए रखता है ....होते विनीत वह
जिसको हो अभिमान कि उसने जान लिया है
जिज्ञासा और खोज त्याज रहता भ्रमीत वह
अरुण

एक शेर
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शिकायत है के दुनिया मतलबी है
शिकायत भी तो मतलब से बनी है
अरुण
एक शेर
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दो साँस का ही फ़ासला है ज़िन्दगी
साल सालों लग गए....यह बूझने को
अरुण

६५ पेज तक का संकलन

वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
अरुण

हिंदी
ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
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मराठी
आकाश नसते तर धरणी नसती
भिंती नसत्या तर मने ही नसती
अरुण





मराठी- बोध-स्पर्शिका
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व्यक्ति आणि व्यक्तिमत्व
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कोणती भाषा लिहिणे आहे, यावर
कागदा चा पोत ठरत नसतो
कसे ही असो व्यक्तिमत्व
व्यक्ति मात्र एकच असतो
............................
तहानल्यां चे गोत
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तहान केवळ माझीच...
ओलावतो माझेच मी ओठ
असती जर ती सामुहिक.. तर
बनले असते 'तहानल्यांचे' ही गोत
...............................
अरुण

हिंदी - चिंतन
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विज्ञान और आध्यात्म का आपसी सहयोग
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विज्ञान और आध्यात्म आपस में एक दूसरे से सहयोग करते हुए ही... सृष्टि और उसके जीवन संबंधी सत्य को समझ सकते हैं। विज्ञान के पास सही explanations हैं तो आध्यात्म के पास सही समझ । वैज्ञानिक Explanations के सही आकलन के लिए आध्यात्मिक स्पष्टता चाहिए और आध्यात्मिक स्पष्टता के लिए वैज्ञानिक दृष्टि । विज्ञान.... ज्ञान का (यानि बोध का.. जानकारी का नही) यंत्र है तो ज्ञान या आध्यात्म...... विज्ञान का अंतिम प्रतिफल । वैज्ञानिकों की अहंता (egoism) केवल तथ्य को सामने लाती है....सत्य को नही,  तो दार्शनिकों का गूढगुंजन ( mysticism)  सत्य को केवल विभूतित करता है... अनुभूतित नही । सत्य है मनोत्तर (Beyond mind) स्पष्ट समझ.... जिसके लिए दोनों ही  ज़रूरी हैं.... वैज्ञानिक तथ्यों का स्पर्श और चित्त का उत्कर्ष ।
अरुण

हिंदी
अपनी बनाई क़ैद में जकड़ा है आदमी
न आसमां न ज़मीं कुछ भी नही क़ैद है यहाँ
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मराठी
पाहिजे ते घडत नाही, घडले ते नको आहे,
घडण्याला फक्त घडणेच माहीत, 'हवे नको' नको आहे
अरुण






.....अन्यथा सबकुछ निरर्थक
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हालाँकि बचपन से ही एक बात सुनते-पढ़ते आया हूँ ।
Health is wealth, मनुष्य भले ही यह बात स्वीकार करे,
उसके ह्रदय की गहराई को यह बात छू नही पाती, क्योंकि
उसका मन अनेक अनेक विषयों को महत्व देने लगता है।
देश, धर्म, चरित्र, पारंपरिक संपदा, विकास,शिक्षा....... एेसी कई बातें....
इधर कुछ दिनों से अस्वस्थ हूँ ।
और इस बात का अब पूरा एहसास ( या कहें की तत्व से ज्ञान हुआ है।)
हो चुका है के कि अगर स्वास्थ्य ठीक हो तो ही आदमी दुसरी बातें सोचे
अन्यथा सबकुछ निरर्थक।
अरुण

गति तो हो पर दुर्गति नहीं
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हमारी रोजाना की जिंदगी किन्ही
तात्कालिक इच्छाओं या/और लम्बे स्पष्ट -अस्पष्ट इरादों की
दिशा में बढती रहती है, या यूँ कहें उस दिशा में
खिंची जा रही होती है.
इसतरह से धकेली गई या खिंची जा रही जिंदगी
में तनाव, चिंता, भय, स्पर्धा, इर्षा, संघर्ष, द्वेष,
मतलबी नजदीकी आदि बातों का होना स्वाभाविक ही है.
इच्छाओं और इरादों की पूरी की पूरी प्रक्रिया
को साक्षीभावसे  (बिना स्वीकार या नकार के) जो देख रहा होता है
उसकी जिंदगी में गति तो है पर कोई दुर्गति नहीं
-अरुण    

गौर करें !
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ध्यान चला जाता है हमेशा अभाव की तरफ
'जो है'- उसका ध्यान ही नही रहता
- अरुण
सच्ची बात
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सकल चेतना एक ही है,
सभी की एक ही एक,
एक ही सर्वव्याप्त प्रवाह है
जो सब में से होकर
सभी दिशाओं में बहता रहता है
परंतु हरेक व्यक्ति
उसके अपने मस्तिष्क से होकर  जो मिक्शचर बह रहा है
उस मिक्शचर को अपनी व्यक्तिगत सत्ता मान बैठा है
अरुण

स्पष्ट अभिव्यक्ति  के लिए ही अधिकाधिक शब्दों
बनते जाते होती हैं।
जब कि अनुभूति के स्तर पर शब्दोंकी आवश्यकता ही नही होती।
'इच्छा' की प्रतीति में  स्व का भाव है, भय है,
विश्वास करने की वृत्ति है, संघर्ष की संभावना है,
द्वैत से जन्में सभी विकारों को दर्शाने वाले शब्दानुभव हैं ।
जिस मस्तिष्क  को केवल आवश्यकता का बोध हो, इच्छा का मोह नही,
वह मस्तिष्क भ्रममुक्त होगा।
अरुण
एक शेर
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झूठ के साये ही.... अच्छे लग रहे हैं जिंदगी को
सच की बातें मन को बहलाने में काम आती यहाँ
अरुण

यह बात तो अब टीवी चेनल्स भी समझ गए हैं
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संकट  निवारण या  टालन के या सफलता का आश्वासन  देनेवाले
मन- समझाऊ उपायों का बाजार  हमेशा ही गरम रहता आया है और रहेगा ।
जबतक  सांसारिक प्रपंच  में उलझा चित्त  पृथ्वीतल पर जिंदा है,
इन उपायों के लिए ग्राहकों की कोई कमी नहीं रहनेवाली,
यह बात तो अब टीवी चेनल्स भी समझ गए हैं
ज्योतिष्य, ग्रहमान,  टोटके व निर्मल बाबा ब्रैंड वाले कई कमर्शियल्स में
चैनलों की रुचि दिनोंदिन बढ़ रही है।
अरुण

एक जीवनोपयोगी दृष्टान्त
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किसीने सूचित किया
 “सेठजी घोडागाडी पर सवार होकर बाजार जा रहे थे.”
इस सूचना में निहित तथ्य हैं –
सेठजी का प्रयोजन बाजार जाने का था
गाडीवान सेठजी के आदेश का पालन कर रहा था
घोडा गाडीवान के लगाम-सकेतों के अनुसार अपनी दिशा और गति संवार रहा था
घोड़े के कदम घोड़े की मस्तिष्क के आधीन होकर काम कर रहे थे
इसतरह सेठजी अपने प्रयोजन से, गाडीवान मिले आदेश से, घोडा लगाम से और घोड़े के कदम घोड़े के मस्तिष्क से संचालित थे. हरेक का संचालक अलग होते हुए भी देखनेवाले की दृष्टि और समझ में सभी – गाडीवान, घोडा और घोड़े के कदम – मिलकर एक ही प्रयोजन की दिशा में संचलित लग रहे थे.
इसीतरह, अहंकार, मन, मस्तिष्क और शरीर मिलकर संचलित होते दिखते हैं, किसी बाजार या काल्पनिक प्रयोजन की दिशा में.
-अरुण





एक शेर
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नादानियों को देखो भागो न जिंदगी से
जन्नत हो जहन्नुम दोनों ही इस ज़मीं पे
अरुण

एक शेर
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परेशानियों की जड़ है मन का जला चिराग़
ख़ुद को ही रौशनी दे  .. ..बाहर न देख पाए
अरुण


एक शेर
**********
गिन गिन के थक रहा हूँ सागर से उठती लहरें
सागर को सब बराबर क्या लहर क्या समंदर
- अरुण
It is the individual, who is eager to understand the Universe. Universe is not aware of any individual or individuality
अरुण

भ्रमित, संभ्रमित, पंडित और तत्व-स्पर्शी
************************************
जो भ्रमवश अज्ञानी हैं.....
डोरी को साँप  समझते हैं और भयभीत हैं ।
कुछ ऐसे हैं जो देख रहे हैं कि
यह डोरी ही है, फिरभी संभ्रमवश साँप होने की आशंका से भयभीत हैं,
कुछ साँप  और डोरी के भेद का सही सही विश्लेषण कर सकते है –
वे वैज्ञानिक, पंडित या दार्शनिक हैं
और जो यथार्थ से जुड़े रहकर डोरीपनही में डूबे हुए
डोरी को देख पा रहे हैं - वे तत्व-स्पर्शी हैं
-अरुण

एक शेर
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पत्ते का पेड से क्या रिश्ता हुआ, वे सोचें
जिनको ख़बर नही के पत्ता भी पेड़ ही है
अरुण









अस्तित्व –
खयाल-ए-इन्सा की अमानत नहीं
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जगत या अस्तित्व मनुष्य की व्याख्याओं,
उसकी गढ़ी परिभाषाओं से नहीं चलता
और न ही (जैसा की आदमी सोचता है)
अस्तित्व कहीं से आता है और
न ही कहीं जाता है, वह न बढ़ता है और
न घटता है।
मनुष्य की अपनी समझ ने
अस्तित्व को बढ़ते –घटते, आते जाते,
बदलते हुए देखा है
पर अस्तित्व हमेशा ही इन सब बातों से परे
अपने में ही स्थित है, अपने में है चालित है,
अपने में ही बढ़घट या बदल रहा है
न उसे किसी अवकाश का पता है
और किसी काल का
-अरुण

जब दीवार ढहेगी तब ...
***********************
भीतर प्रकाश कायम है, लाना नहीं है,
फिर भी आदमी अदिव्य (unenlightened) क्यों है?
क्योंकि कल्प-सामग्री (image-material) से बने ज्ञान-समझ-अहंकार की
दीवार ने प्रकाश को उसतक पहुँचने से रोक रख्खा है,
जब दीवार ढहेगी तब ....
दिव्यत्व जागेगा
-अरुण  
एक शेर
*********
है ख़ुदही एक उलझन दुनिया को कोसता है
ये आदमी है.............. आदम से रो रहा है
अरुण














एक शेर
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पेड़ की छांव को लटके हुए फल खा खा कर
क्या कभी भूक जिंदगी की मिटा पाया कुई?
अरुण

एक शेर
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बह जाना चाहता हूँ सहज जिंदगी की धार में
ये वज़न मेरा मुझे साहिल तक आने नही देता
- अरुण

एक शेर
**********
सोच छोटी है, टूटी हुई है, है मालूम,
फिरभी, आदमी पूरा समझना चाहता है

(सत्य को जानने में एक परेशानी है ।
शेर उसी को बयां करता है।)
अरुण

धरा सत्य आकाश एक कल्पना सी.....
***********************************
धरा सत्य आकाश एक कल्पना सी
क्षितिज तो अनूठा मिलन नभ धरा का
**
यहाँ साँस जीना मगर आस माया
मनु से उसीकी लिपटती है छाया
खुले नैन जिनमे सपन हैं प्रवासी
धरा सत्य ..........
**
उठो पंख लेकर धरो ध्यान धारा
क्षितिज से भ्रमों पर भ्रमण हो तुम्हारा
धरो नित्य अवधान जो साधना सी
**
धरा सत्य आकाश एक कल्पना सी
क्षितिज तो अनूठा मिलन नभ धरा का
-अरुण
एक शेर
*********
कोशिशों में शोर है.. ना शांति की कोई उमीद
फेंक कंकड़ झील में .....ना रोक पाओगे तरंग
अरुण


एक शेर
*********
खुदा होगा अगर कहीं हंस रहा होगा
इंसान की सोच पर तरस रहा होगा
अरुण
एक शेर
***********
हांथ छोटे, पांव छोटे, कुल पकड सकता नही
समझ में यह आ गया है,अब नही कोई गिला
अरुण

गुरू
****
अँखियाँ अंदर जोड़ दे.... वह तेरा गुरू होय ।
गर अँखियाँ गुरू से जुड़ीं अंदर का सत खोय ।।
अरुण

एक शेर
*********
ख़ुशी जागी.. न बतलाए....वजह क्या है
ख़ुशी में डूबने वाला ख़ुशी ही बन चुका है
अरुण

एक शेर
********
एक ही साँस में सच चल पड़े...और माया भी
जिस्म का पेड़... तो मन की तिलस्म छाया भी
अरुण
दोस्त
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सारे अपनों में ये अधिक अपना
दिल के पास है एक भरोसा सा
अरुण

एक दोहा
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आँखों से ना सुन सको, कानों से ना देख
शब्दों से क्या जानना, परम मौन आवेग
अरुण

एक शेर
*********
अंधेरे की चमक में ही, जी रही ये जिंदगी
हकीकत और सच्चाई से ......कोसो दूर है
अरुण


एक दोहा
**********
जड, पत,डाली और फल- ..सभी पेड़ ही पेड़
अलग अलग कर जानते, सभी, सिवा बस पेड़
अरुण

एक शेर
**********
काग़ज़ की नाव चाहे समंदर पे सैर करना
कुछ ऐसी ही...... बंदे के ज़हन में उमंग है
अरुण
समझने जानने की ....
**********************
समझने जानने की
आदत-ओ-हवस ने
रोक रख्खा है हमें
यह देखने से कि
हम भी तो एक चीज हैं, बीज हैं,
पल पल घटती घटना की एक तसबीर हैं
जिसे बाहर झांकने और जानकारी बटोरने
में ही मजा आता है
अरुण
आदमी और उसका भीडपन
*************************
आदमी अपनी सुरक्षा के लिए
अपनी भीड़ बनाकर रहने लगा,
उस भीड़ ने अपना ‘भीड़पन’
सुरक्षित रखने के लिए आदमी में से
उसका ‘आदमीपन’ निकालकर
उसे एक मशीनी पुर्जा बना डाला.
अब दोनों, आदमी और उसकी भीड़,
एक दूसरे का इस्तेमाल करते
दिखते हैं
-अरुण

एक सच
*********
हवा पर खिंची हैं हवा की लकीरें
ये मुद्दत गँवाई मगर मिट न पाई
नज़र भर के देखो ये सारा तमाशा
ये किसने बनाई और किसने मिटाई ?
- अरुण















जहाँ से चल पड़ा वही था ठिकाना मंजिल
**************************************
जहाँ से चल पड़ा वही था ठिकाना मंजिल
भटक चुका है आदमी समाज में गिरते
नये नियम समाज ने जो उसको बांधे हैं  
वे नियम, दूर निकल जाने के ही काम आते

उन्ही नियम से आदमी, गर तलाशे मंजिल
कैसे पाएगा उसे दूर निकल जाएगा
उलट जो चल पड़े, जहाँ से चल पड़ा था कभी
वही मंजिल  पे सही हाल में लौट आएगा
-अरुण

एक शेर
*********
जब अचानक सामने ख़तरा उभर आये
तबही होती कारवाई, सोचना होता नही
अरुण

एक सच
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जहाँ धूप पहुँची नही.. वह छाया है
उसको सच मान लेना ही.. माया है
अरुण
एक सच
*********
जाननेवाला अधूरा जानता है
जागनेवाले को सारा दिख रहा
अरुण

एक शेर
*********
खुदा कहें तो कहें किसको?... संजीदा तलाश
इसी तलाश में शायद...... खुदा से हो पहचान
अरुण
एक शेर
********
दूसरे का क्या भरोसा सत्य अपने में ही देखो
इल्म ऐसा जो के ......सिखलाया नही जाता
अरुण




देश का बस नाम लेती
**********************
देश का बस नाम लेती
उल्लु  सीधा करती अपना
पार्टियाँ ये राजनीति की बडी चालाक हैं
अपने पापों को छुपाना
दोष रखना दूसरों पर
अपनी छबि को शुभ्र करने में बडी निष्णात हैं
अरुण

आज स्वतंत्रता दिवस.....
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
सभी देशवासियों को मुबारक....
इन शुभकामनाओं के साथ कि
देश का जनतंत्र ऐसी ऊंचाईंयों को छू ले
जहाँ सत्ताधारीययों को सत्ता का मद न हो
विपक्ष को मतलबी असहयोग का रोग न हो
लोग एक भीड़ का हिस्सा बनकर वोट न करें
मतदाताओं के पास अपना व्यक्तिगत
राजनैतिक मत रचने की क्षमता हो ताकि वे
किसी 'हवा' का शिकार न बन सकें
अरुण

एक विनम्र सुझाव
*****************
अब तक तो आप उनकी बेईमानियों का
ज़िक्र करते रहे क्योंकि आप को जीतना था
अब जीतकर भी आप......वही  सब दुहराए चले जा रहे हो.....
ये तो बेईमानी है
लोग आपकी कारगुज़ारीयों को देखना चाहते हैं
पहले जो भी हुआ....उसका जवाब तो वे ख़ुद ही दे चुकें हैं
आप अपना समय जाया न करें.. काम में लग जाएँ
अरुण



एक  शेर
*********
तमन्नाओं ने जिंदगी मुश्किल कर दी
चाह पे अड गई... हवस पैदा कर दी
अरुण
एक शेर
*********
जो तुम हो...... गर वही चाहते हो हो जाना
फिर किधर जाना, क्या पाना, क्या खो देना?
अरुण

एक शेर
*********
दिलासा दे नही पाई ख़ुशी क्या काम की वह
ख़ुशी के पार जाने पर मिला करती तसल्ली
अरुण

बिदाई की घड़ी आते .........
******************************
बिदाई की घड़ी आते.. तुम्हें ही रोना आता है ?
हमारे दिल ने भी हर दर्द का एहसास जाना है
शिकायत है अगर तुझको हमें रोना नही आया
तो मतलब तुझको मेरे दिल की गहराई को पाना है

मै जानता हूँ ......तुमने अश्कों को दबाया था
लबों पे मुस्कुराहट की लकीरें ही बनाई थी
तुम्हारे दिल में जो उभरी हुई थी सख़्त बेचैनी
छुपाओ लाख.. फिर भी तेरे चेहरे पर समाई थी

बेचारा दिल मुहब्बत की बडी उलझन सम्हाले था
के तेरी उलझनों को देखकर मुश्किल न हो जाए
के औरों से बचाकर जिसको ख़ामोशी में ढाला है
वही उल्फत कहीं अश्कों में ढल ज़ाहिर न हो जाए

गर कहती हो तो तेरे अश्क़ का हर्ज़ाना भर दूँगा
मगर ये शर्त है मुझको कभी भी याद ना लाना
अगर एहसास हो जाए कि तुमने याद लाया था
ख़ुशी से झूम अपने अश्क़ को अनजाना कर दूँगा
अरुण

एक शेर
*********
क़ुदरत को जो मिली है वैसी नज़र को चूके
इंसान अपनी हद से बाहर निकल न पाया
अरुण

एक शेर
********
जो बयां करते नज़ारा... लफ़्ज़ कहलाते मगर
आँख को जो खोल देते लफ़्ज़ से बढ़कर हुए
अरुण
एक शेर
*********
आदतें मजबूर हैं ..........झूठ को सच मान लेतीं
बंद आँखों को दिखा जो भी.. उसे सच मान लेतीं
अरुण

एक शेर
********
चाँद को भी .............खोज लेता है इरादा
यह इरादा जागे कैसे, खोज असली है यही
अरुण

एक प्रेम गीत
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न शरमाओ हमारे गीत पढ़कर
तुम्हारी साद इसमें है.. ..तुम्हारा प्रेम इसमें है
तुम्हारे रूप-मदिरा का मधुरतम जाम इसमें है
गवांता ही गया मै ख़ुद को ऐसे गीत गढ़कर
न शरमाओ....

तुम्हारी लाज को पाकर भरी हर आह इसमें है
तुम्हारे संग जीने की .....बनी हर चाह इसमें है
सजाये याद के मोती, इन्हीं गीतों में जड़कर
न शरमाओ ....


तुम्हारे और मेरे जज़्ब की ...........तस्वीर इसमें है
इन्हीं दो दिल को.. जो जकड़े वही ज़ंजीर इसमें है
हँसी-आँसू ..मोहब्बत के ......गिराये इसमें खुलकर
न शरमाओ हमारे गीत पढ़कर
अरुण

एक शेर
*********
नातों रिश्तों की ज़रूरत को निभाता.. ये दिमाग़
रुहानी सांस की वह पहली झलक भूल गया
अरुण
एक शेर
*********
नही है एहसास अपनी नाकाबिलियत का..सही माने में
यही वजह के .................उछलकूद अभी भी जारी है
अरुण

रुबाई
*******
जितनी हो कशिश तेरे मेरे दरमियाँ
अल्फ़ाज़ भी उतने ही गरम होते हैं
मिलन से ख़त्म हुई जाती है हर दूरी
दौर जज्बों के उतने ही नरम होते हैं
अरुण
एक शेर
*********
परसों क़रीब डेड घंटे general anaesthesia के प्रभाव में रहा।
बाद में यह सूझा कि.....
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जहां में रहते हुए भी न कुछ भी जान सका
यही तो मौत थी मेरी इसके सिवा और क्या था?
अरुण

एक शेर
**********
जिंदगी चलती है अपले आप, ......न चलाता कोई
यह सोच कि चलाता मै हूँ, सिरफ है इक सोच कोई
अरुण

एक शेर
*********
किसी भी बात का हो ज़िक्र या कोई याद आए
हम अपनी मौजूदगी को ......न कभी भुला पाए
अरुण

संत भी संसारिकताजन्य मनोविकारों के शिकार
**********************************************
सभी मनोविकार, माया-मोह (मूल-भ्रम) की ही संताने हैं।ये विकार संतत्व-प्राप्त लोगों को भी खा जाते हैं।उनका मोह दिखने में भले ही अलग दिखता हो पर स्वभावतः  मोह ही होता है......
संत के इर्दगिर्द जमा होनेवाली भीड़,बड़ी तादाद में आनेवाला चढ़ावा, मिलनेवाला राजशाही सन्मान, बढती संगठन शक्ति ....ऐसी कई बातें उनके संतत्व को खा जाती है, और वह भी छुपी तर्ज में अहं-गीत गाने लगता है।
जिन्हें ऐसे लोगों पर अपनी भक्ति जताना, एक सुरक्षा-उपाय या गौरवपूर्ण कार्य प्रतीत होता है,  वे उन संतों के अहं को खुराक देते रहते हैं
-अरुण
एक शेर
********
अपनी जगह से हटके सिरफ सोचना बना
अपनी जगह रहा......उसीसे देखना हुआ
(सोचना विकल्प नही है..देखने का )
अरुण
एक शेर
*********
( मंजिल एक फिर रास्ते अलग अलग क्यों?)

जो जहाँपर था वहीं से चल पड़ा फिर घाट पहुँचा
घाट जो नज़दीक..उसकी सीढ़ियाँ से उतर पाया
अरुण
इस कथन पर ग़ौर करें
*********************
आदमी मरता नही है ......आदमी के रूप में मरता भले हो
दूरियाँ होती नही हैं.. कालपथ धर आदमी चलता भले हो
- अरुण


इस कथन पर ग़ौर करें
*********************
आदमी स्वयं जिसकी गोद में है.. उसे ढूँढने के लिए वह
अपने से बाहर निकल पड़ता है और अपने ही रचे रास्तों पर
भटकता रहता है
अरुण

आजकल राजनीति के अखाड़े में ' विकास' (इस शब्द का) उच्चार/ घोषणा/दावा बड़े धड्डले से होता दिख रहा है । इस फॅशनेबल शब्द के जाल से मतदातागण को बचना होगा। इस शब्द का विस्तृत आशय हरेक के दिमाग़ में अलग अलग हो सकता है । किसी वर्ग या समूह विशेष की आज़ादी का शोषण करते हुए भी देश को बलशाली और तथाकथित रूप से विकसित किया जा सकता है। विकास का नाम लेकर जन-आज़ादी का बली देनेवाले और वोटों के लिए आरक्षण की पहल कर देश को कमज़ोर करनेवाले, दोनों ही एक ही श्रेणी के विचार हैं।

परंतु मीडिया अगर सशक्त व तटस्थ होगा तभी लोगों को विकास का सही आशय समझाने की प्रक्रिया चालू रह सकती है।

५० पेज तक का संकलन

सच्ची बात
***********
कोई तो क़रीबी होते हैं......कोई तो पराये होते हैं
ऐसे भी कई रिश्ते जोके  शिद्दत से भुलाये होते हैं
अरुण
सच्ची बात
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हर जगत की सहुलियत को रच दिया है सोच ने
सहुलियत ने सोचने की...रच दिया ईश्वर सहज
अरुण
सच्ची बात
***********
आदमी है जब..... आदमी से ही डरा हुआ
फिर अमन-ओ-चैन कहां और किधर से आएगा ?
अरुण
सच्ची बात
***********
इशारे करने वालों से न नजरें जोड़ के रखना
इशारा जिस तरफ़ हो उस तरफ़ ही देखना वाजिब
अरुण
सच्ची बातें
***********
रौशनी हो तो नज़ारा साफ़ दिखता है,
बात सही है पर....
न रौशनी न नजारा.. एक दूसरे पे निर्भर है
-------------------------------------------
भगवान रौशनी है ........ऐसी प्रखर प्रगाढ़
जिसमें सभी उजागर हैं दिल के कारोबार
अरुण
सच्ची बात
**********
शख़्स में हर- 'मै अलग हूँ' - ख़्याल आया
जहनियत हिलने लगी भूचाल आया
अरुण
सच्ची बात
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हज़ारों क़ायदे आये अमन-ओ-चैन के ख़ातिर
न होगा कुछ असर.....हर ज़हन में ही जंग जारी है
अरुण

सच्ची बात
************
क़ुदरत को क्या पता हो... के उसका क्या वजूद
जिसमें वजूद जागा वह  क़ुदरती नही
अरुण

सच्ची बात
************
ना जुडा मस्तिष्क से मन...
भिन्न दो बातें
'मै' नही होता तभी....
 यह समझ आए
अरुण

सच्ची बात
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मन तो कहता आ रहा यह जिस्म उसका ही हुआ
जिस्म का कोई नही इस जिस्म की मर्ज़ी सिवा
अरुण
सच्ची बात
**********
क़ुदरत को जो मिली है......वैसी निगाह दे दो
फिर देखना ही होगा सिरफ.......खोजना नही
- अरुण

सच्ची बात
**********
गली बाज़ार कूचे में जिसे मै ढूँढता था....घर से निकल
निकल आया के  मेरा  घर ही था वो, जहाँ मै रह रहा था
अरुण

सच्ची बातें
**********
छांव में छुपकर रहे.... ..होवे उजागर धूप में
छांव हो के धूप हो, सच हर जगह हर रूप में
******
अधजगा हूँ, सोचता या देखता सपना कोई ?
मुझ सवाली को जगा दे नींद से पूरा कोई
- अरुण


सच्ची बात
************
सूरज चमक रहा जब, तारे नज़र न आये
बुद्धों की आँख में तो दोनों सहज समाये
अरुण
सच्ची बात
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न उनमें डूबकर और न ही उनसे भागकर.....
सांस लेनी है....बवालों झंझटों के बीच रहकर
अरुण

सच्ची बात
***********
राह चुनने की लगन थी.....हौसला था
पर न थी मंजिल कोई ना फासला था
अरुण

सच्ची बात
***********
हर मंजिल कोशिश के चलते पायी जाती है
इक ऐसी भी, कोशिश के थमते... पास चली आती
अरुण
सच्ची बात
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चेहरे देखकर ही दिल से दिल जुड़ते नही हैं
फकत पढ़ शब्द गीता के प्रभु मिलते नही हैं
अरुण






















कुछ छुपी-खुली बातें
**********************
नदी पे थिरकते हुए पानी को.... है कौन रोक पाए
ख़ुद रुकना.. रोके रखना, ये इल्म... हवा से सीखें
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
आकाश ने कहा .....
आओ मेरी चादर को ओढ़कर उड़ते रहो....
परंतु अपनी मैली फटी पुरानी चादर लपेटे हुए ही
आकाश के सपने देखता रहा है.. इंसान







एक ही रखता क़दम  हर बार वो
सोचता रहता जो...मीलों दूर की
जिस जगह बैठे नही उसकी जगह
उभर आती  मिल्कियत मगरूरस
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
बाहर न था सुकून... सो अंदर निकल गया
अंदर वही थी भीड जिसे टालता था मै
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
क़दम बढ़ा तो घटा फ़ासला क़दम भर का
मिला तो कुछ भी नही हो गई कवायत बस
अरुण

जहाँ से देखता हूँ आदमी को
आदमी के नक़्श  के
परचम बदलते जान पड़ते हैं
कभी लगता तरक़्क़ी कर रही
है क़िस्म इक सब प्राणियों के बीच
कभी दिखता कि अपनी आँख पे पट्टी
लगाकर गुनहगारी कर रहा है आदमी
कभी हल जोतकर है

एक प्रासंगिक शेर (हिंदी)
************************
जब तक न कर सको तुम दुश्मन का रंग फीका
अच्छाइयाँ जो तुझमें ........रौशन न हो सकेंगी
अरुण




28-5-2015

आज के लिए चार शेर
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इक दबोचे एक भागे आसमां में सब उड़ें
है खुलापन आसमां यह, आसमां में सब जिएँ

तुमने तोहफ़ा दे दिया जो उसने झुककर ले लिया
क्यों दिए.. वह क्यों झुका, ये बात कहने की नही

बयां करने से तकलीफें घनी मज़बूत होती हैं
चुभन को देखते गहिरे चुभन का दम निकलता है

शिकायत ये कि हर मसले को वो पूरा निगल जाए
उसे मालूम ........हर मसले के भीतर हैं कई मसले

अरुण

































दोन शेर व त्यांचा मराठी आशय
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नज़र के दायरे में ...जो भी आते एक हैं
नज़र गर आसमां हो, रात दिन सब एक हैं

आशय-
दृष्टी जेवढी व्यापक मनातला अभेद किंवा समत्व भाव ही तेवढाच मोठा. आकाशा साठी दिवस आणि रात्र एकच असतात. आकाशा च्या नजरेत एकाच वेळी दोन्ही घटना एकत्वाने घडत असतात.
-------------------------
मंझधार तक  पहुंचकर स्वयं को भूल जाना
आसां नही है ............खुदा से रूबरू होना

आशय-
सत्य किंवा देव किंवा परम रहस्या चे दर्शन घेणे सोपे नाही..... नदी च्या अति वेगवान मध्यधारेत पोहचून त्या धारेत स्वत:ला मिसळून टाकण्या सारखी साहसी कृती आहे ही.
- अरुण







हर कोई आइने के सामने, हटना नही चाहता
जहाँ भी जाता उसे .......साथ साथ ले जाता

एहसास के जर्रों पे तजुर्बों की जमी धूल
जिंदगी.. खिदमत-ए- माज़ी में है मश्गूल
 - अरुण
चार शेर
~~~~~~~~~
बुझाई आग तो तूफ़ाँन ने है सर उठाया
जनतंत्र है,  इन्तेखाब तक रुकना होगा
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घरबार सबकुछ छोड बैठे हो मगर, साधो !
इस बात का करते जिकर क्यों बार बार
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जब किनारे पर डला लंगर समझ से दूर हो
पतवार हो, हो हौसला किस काम के दोनों हुए
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हवा मलीन हुई...... लोग भी हुए नादां
न कुछ भी हो सके ख़ुशबू के लौट आने तक
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- अरुण


वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
अरुण

ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
अरुण
हिंदी शेर
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वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
-------------------
ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
अरुण
किसीपर तो भरोसा करना होगा
जो घर से आ गया हूँ निकलकर
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एक ग़लती की वजह से इतनी सारी जहमतें
बूँद ने अपने को सागर से अलहिदा कर लिया
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दूर की शुरुवात होती अपने घर से ही, मगर
घर को तो देखा नही ब्रह्मांड की बातें करें
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बिना तोड़े दिवारों को मिले मुक्ती वही  मुक्ती
"दिवारें तोड़ने का ख़्याल" भी दीवार ही तो है
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हिंदी
पूरीतरह से जानना आनंददायी
आधा-अधुरापन महज़ मन की व्यथा
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मराठी
जर उरे काही अजुन जे जाणणे आहे
जाणले ते व्यर्थ..... नुसता ताप आहे
अरुण
हिंदी
सर पे बोझ ये जो है...हज़ारों साल का है
यही कारण यहाँ जो भी मिले पहचान का है
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मराठी
जग पुराणे भेटते जावे जिथे
जन्मतो मी... पण नवा ना जन्मतो
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अरुण
हिंदी
बीज को...पेड़ बनने में...समय लगता हो, मगर
पेड के अंतस्थ झांको... बीज जिंदा है वहाँ
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मराठी
जग केंव्हाही केवळ असते, काळा ची ओळख नसते
जग म्हणजे मन नाही कि ज्याला काल-आज-उद्या असते
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- अरुण

हिंदी
ब्रह्मांड का ही जीवमय इक पिंड मानव देह भी
इस तथ्य को जो जी रहा योगी उसी को जानिए
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मराठी
भ्रम द्वैताचा लोपताच तुकड्यां चा 'योग' होतो
'योग' शब्दाचा सध्या... वेगळाच उपयोग होतो
*****************
अरुण

हिंदी
गहरा, धूसर, फीका अंधेरा..बंद आँखों में है तीनों का बसर
रौशनी छेडती है पलकों को ..पलके हैं मगर बेख़बर बेअसर
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मराठी
कळते रात्र आणि दिवस ही दिसतो..पण सूर्य अवधाना चा उगत नाही
शहाणपण रेंगाळत राहते सभोवती पण घराच्या आंत मात्र शिरत नाही
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अरुण




६ जून २०१५
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हिंदी
ख़ुद की जगह से ही दिखे गर साफ़ सबकुछ ज़हन को
ज़हन को खोजने की, 'सोचने' की क्या ज़रूरत आ पड़े
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मराठी
अस्पष्ट अंध धुंद मन
गुदमरते भिरभिरते बावचळते
विचारा चे रूप घेऊन पळत सुटते
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अरुण




हिंदी
खोया नही कुछ भी यहाँ बंदा सिरफ भूला हुआ है
मुश्किल घनी है ये के ..भूला है यही भूला हुआ है
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मराठी
विसरलाच असता तर फक्त डोस स्मरणाचा पुरेसा होता
पण इथे दुप्पट विसर घडतो... विसरतो विसर पडल्याचे  
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अरुण

हिंदी
इधर से हो जाना वहाँ तक अगर, फिर समय चाहिए
यहाँ से यहीं तक जो मन का सफ़र, ध्यानमय चाहिए
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मराठी
पाय श्रमतात, वेळ जातो खरा... पण अंतर ही मिटतं
मनाचा प्रवास आंतल्या अांत, बाहेर कांही ही न घडतं
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अरुण
हिंदी
भीड़ में हर आदमी की दास्ताँ निजी अलग
हसना रोना एक जैसा ही मगर हर शख्स का
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मराठी
रूप रंग नाव गाव वेगळे दिसले तरी
सारखी मन वेदना संवेदना सर्वांतली
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अरुण
हिंदी
चेत धारा विश्व- मन बन बह रही है
पर हर किसी में मन बनाती उसका खास
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मराठी
चेतने चे वारे वाहे अक्ख्या मानव जगतातुन
तरी  प्रत्येकाला 'मी पणा' ची झाली बाधा
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अरुण


हिंदी
किसी ने सच देखा बोला.. तो नींद ने सुन लिया,
अब, सुना जो भी नींद ने वह, बन गया है फ़लसफ़ा
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मराठी
उघड्या डोळ्यांना सत्य दिसताच.. डोळे पुटपुटले
अन् बंद डोळ्यांनी ते ऐकताच, त्याचे शास्त्र बनले
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अरुण
हिंदी
वक़्त का हर एक ज़र्रा अंत भी शुरुआत भी है
ध्यान में ये बात आते, वक़्त मानो थम गया हो
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मराठी
अस्तित्वात नसणारा काळ....जाणीवेत येतो कसा
एक चे एक आकाश त्याचा तुकडाच दिसतो जसा
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अरुण

हिंदी
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चेतना ऊर्जा महज़.....पहचान उसपर आ बसे
पहचान की ही कोख में पहचानने वाला बसे

मराठी
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कारंजा च्या जलकण रेषांना  बाहेर चा प्रकाश ओळख देतो
ही ओळख आपल्या मनांत रुजली की कारंज जीवमय होतो
------------------------------------------------------------
- अरुण

Friday, May 8, 2015

सच्ची बातें और कुछ कविताएँ

सच्ची बात
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भीतर.. प्रकाश कायम है...लाना नहीं है,
फिर आदमी अदिव्य  (unenlightened) क्यों है?,
क्योंकि कल्प-सामग्री  (image-material)
से बने ज्ञान-समझ-अहंकार की दीवार ने
प्रकाश को उसतक पहुँचने से रोक रख्खा है,
जब दीवार ढहेगी तब ...दिव्यत्व जागेगा
-अरुण  

सच्ची बात
************
किसी अनजान शहर में ......राह चलते जो भी दिखता है
उसे हम देखते जाते हैं - आदमी, पेड़, वस्तुएं, दुकाने...
ऐसे ही  सबकुछ - उनसे एक रिश्ता तो बनता है
पर न तो हम उन्हें स्वीकरते हैं और न ही उन्हें नकारते हैं.
इसतरह जुड़कर भी अनजुड़े रहे रिश्ते में आदमी का स्व (Self) उघाड़ता जाता है
बिना किसी कोशिश के भीतर बाहर का अभिन्न्त्व खुला हो जाता है
आदमी के ‘भीतर’ का उसके ‘बाहर’ से यही खरा रिश्ता है.
परन्तु हम तो हमेशा ...पूर्वाग्रह ग्रस्त (baised और prejudiced)
रिश्तों में ही जीते हैं
-अरुण

रुबाई
*******
आसमां वक्त से हटते हुए........ ..देखा न कभी
हर सेहेर  बाद रात....सिलसिला बदला न कभी
कभी तूफान कभी मंद....... ..कभी ठहरा समीर
आसमां अपनी जगह ठहरासा,  हिलता न कभी
अरुण




सच्ची बात
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सच का दर्शन
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जिसने देखा, कहे बिना... रह न सका
अफ़सोस! के कहा सुना सच हो न सका
अरुण
सच्ची बात
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जिंदगी सबकी ख़ुशी और आँसुओं का नाम है
यह नही है खास मेरी या के तेरी दास्ताँ
अरुण

सच्ची बात
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अपने बनाये जहन्नुम में साँस लेते हैं मगर
सोचते हैं कब हमें जन्नतसी दुनिया हो नसीब
अरुण
सच्ची बात
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सज़ा-ईनाम पे निरभर है दुनिया का रव्वैया
कोई कारण बने ऐसा के इंसा खुद बदल जाए ?
अरुण
सच्ची बात
***********
है सच्चाई का सच ऐसा छुपाओ भी नही छुपता
मगर जज़्बात से देखो तो सारा धुँध दिखता है
- अरुण

सच्ची बात
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धुएँ से जंग करने के तरीके हों कई लेकिन कि
जिसने आग को जीता धुएँ से क्या उसे मतलब
- अरुण

फ़िल्मी गीत के तर्ज़ पर लिखी ही रचना
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मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब
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खुली राहों में सिसकती हुई रातों के सिवा
मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब

अब तो जीवन में कहीं ख्वाब का सिंगार नही
मेरी रातों में पला दर्द है बहार नही
मेरी डूबी हुई हसरत को सिवा मरने के
किसी रंगीन किनारे से सरोकार नही

घने जंगल में सुलगती हुई शाखों के सिवा
मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब

मेरी आँखों में बसे अश्क बसी चाह नही
मै अकेला हूँ मेरा कोई हमराह नही
मेरी नाकाम उमंगों को सिवा रोने के
गम हटाने की मिली और कोई राह नही

गम के बोझ से दबती हुई सांसों के सिवा
मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब

अरुण

सच्ची बात
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तमाशा देखता था हर तरफ़..... बनकर तमाशाई
दिखे अब साफ़... ..सबकुछ है तमाशा ही तमाशा
अरुण
सच्ची बात
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मै पानी हूँ और पानी में तैरता हूँ
मगर ख़याल कि हूँ देखता किनारे से
अरुण
सच्ची बात
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मुहब्बत जाग उठ्ठी... खूबसूरत थी घड़ी
घड़ी जब सोच में उतरी मुहब्बत खो गई
अरुण

समय को विश्राम दो.........
**********************
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर
आस में जो थक गया उस रूप का श्रृंगारकर

नयन में बन ढल गये जलकण तुम्हारे धीर के
ओंठ पर अब सो रहे हैं ......गीत लंबे पीर के
तपन में जो जल रहा सौंदर्य उसका ख्यालकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

धडकनों में भय समाया है गमक न प्रीत की
वेदना की गूँज है.. अब गूँज ना मधु-गीत की
शुभ स्वरों को जन्म दो इस रुदन का संहारकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

असहायता का बिम्ब अब मुखपर चमकता जा रहा
नैराश्य का ही भाव अब दिल में सुलगता जा रहा
लो आसमय दुनिया इन्ही हांथो का लो आधारधर
समय को विश्राम दो ......इस बाह में तन डालकर
-अरुण




















करीब ५०- ६० वर्ष पूर्व रचे जानेवाले फिल्मी युगल गीतों के ढंग का
मेरा यह गीत
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आओ मिलकर चांदनी में हसते गाते जाएँ
मंजिल की सूनी राहों पर, सपने-फूल सजाएँ

देखो ये चांदनी.... चंदा के नज़रों में खो गई
देखो ये चांदनी......चंदा का दिल भी तो ले गई
नर्मसी हवाओं पर.....ये प्यार झूल जाए
प्यार के समन्दर की ....हर लहर मुस्कुराए

आअो मिलकर...........

पूछो क्यों प्यार के आसमाँका.....पंछी तू हो गया
पूछो क्यों खुद को फूल चमन का मेरे..... बन गया
शर्म की घटाओं से ....ये हुस्न भींग जाए
आसमाँ के तारों से ....हम तुझको ढूंढ लाए

आओ मिलकर चांदनी में हसते गाते जाएँ
मंजिल की सूनी राहों पर, सपने-फूल सजाएँ
-अरुण


सच्ची बात
***********
सोये हुए सवालों के जवाब भी...सोये हुए
दिमाग तो जानना चाहे वही जो जाने हुए
अरुण
सच्ची बात
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इक पल लगा सारा नज़ारा दिख गया
जिसको बयां करते ज़माना थक गया
अरुण
सच्ची बात
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कैसे दे पाए सही अपना पता अपना व
एक ही वक्त कई जगहों पे रहता जो है
अरुण

किसलय की छावों में छुपकर.............

किसलय की छावों में छुपकर मेरी बाँहों में आ जाना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

तेरी पूजा के खातिर मै, अंतर में हूँ नव-स्वप्न लिए
तेरा सिंगार रचाने को, प्रेमाश्रु का मै रत्न लिए
बैठा हूँ मै कितने पल से, वो पल पल सार्थक कर देना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

तेरे दर्शन के खातिर अब, इन नयनों में आशाएं हैं
मस्तिक पट पर अब तेरी ही स्मृतियों की रेखाएँ हैं
तुम आज प्रतिक्षा-भूमि पर, क्षण मधुर मिलन के बो देना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

मधुमिलन-पर्व के खातिर अब, सब पर्वों ने धीरज खोया
क्षण क्षण प्रीती ही मेला जब, मेलों से चित्त नही भाया
सब पर्व मानने के खातिर सहजीवन पर्व दिला देना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

किसलय की छावों में छुपकर मेरी बाँहों में आ जाना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना
-अरुण

सच्ची बात
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दिल पे नज़ारा पसरे जन्नत लगे जहान
मन के दखल ने जीना दुश्वार कर दिया
अरुण
सच्ची बात
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जनम हो के मौत दोनों आ रहे पूछे बगैर
प्यार है जो इसतरह ही घटता अपने आपही
अरुण

सच्ची बात
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अपने पैरों पर चले तो बोझ अपना जान जाए
दूसरों की सोच से सीखे न कुछ भी हात आए
अरुण
सच्ची बात
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गुजर जाता न टकराये न छोडे है निशां कोई
खुले आकाश में पंछी न उलझा है न है सुलझा
अरुण
1- Inside outside
2- Self body image continuity
3 - Self esteem
4- self extension  myness
5- self image - reaction rebellious
6- reason rationality education
7 - goal becoming achieving name fame


सच्ची बात
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डर मौत का जैसे इधर बढ़ता गया
आत्मा तो है अमर .....कहता गया
अरुण

सच्ची बात
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जो सच पर जागने के काम आती है....समझ
किताबों में लिखी जाए... तो फिर क्या काम की ?
अरुण

सच्ची बात
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तुम ही मंज़िल हो तुम्हारी तुमही उसकी रहगुज़र
मेरी क्यों करते इबादत........तू तो मेरा ही असर
अरुण
 सच्ची बात
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मुक्त होना दूसरों की क़ैद से..काफ़ी नही
ख़ुद में बंधन देख लेना ही मुक्कमल मुक्ति है
अरुण
सच्ची बात
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आकाश बन देखो तो सबकुछ है यहीं पाया हुआ
समय को तो कोशिशों के साथ ही ....चलना पड़े
अरुण
सच्ची बात
**********
जुबां जो भी कहे सुन ले अरुण
नज़र से असलियत छुपती नही है
- अरुण

Tuesday, April 14, 2015

कुछ सच्ची बातें

सच्ची बात
**********
कोईभी रचाता नही है जगत ये
है रचना जो खुदसे रची जा रही है
जिसे ये समझ आ गई बात गहरी
उसे हर जटिलता सुलभ लग रही है
- अरुण
सच्ची बात
**********
न किसी की मेहरबानियों के लिए
हूँ झुकता..... जमीं चूमने के लिए
है कुदरत में घुलना.. सही जिंदगी
नही उससे......कुछ माँगने के लिए
अरुण
सच्ची बात
************
सृष्टि की न भाषा कोई.. न है बोलना उसे
सृष्टि बनकर रहना और फिर .भोगना उसे
संवाद विवाद न चक्कलस न चर्चा ज़रूरी
जिओ केवल उसमें समाए, न परखना उसे
अरुण
सच्ची बात
**********
जिंदगी हाँ.. ना......में दिया जबाब नही
हिसाब रखनेवालों का ......हिसाब नही
अनगिनत अक्षर हैं ....नये नये तजुर्बों के
कुछ जानेपहचाने अक्षरों की किताब नही
अरुण
सच्ची बात
***********
डर नही है मौत का.. है जिंदगी खोने का डर
जी नही पूरीतरह से ..अधुर रह जाने का डर
लम्हा लम्हा जिंदगी का जो जिया पूरी तरह
मर रहा लम्हे में उसको खाक मर जाने का डर
अरुण
सच्ची बात
************
सत्य और शांति की तलाश में
हिमालय जैसे निर्जन
(जहाँ कोई जन न हो)
स्थलों पर जाना भी ठीक होगा,
अगर तलाश करनेवाला अपनी
‘जन’ ता को यही दुनिया में
छोड़कर जा सके
-अरुण
सच्ची बात
***********
समय यानि स्मृति
एक अजीबसा कारागृह है..
जहाँ आदमी पहुँचने से पहले ही
पहुँच जाता है और...
जहाँ से निकलने के बाद भी
निकल नही पाता
-अरुण
सच्ची बात
**************
सत्य के पटल पर ही असत्य का जन्म होता है,
ऐसे असत्य को.. न पकड़ना है और
न ही उससे भागना है,
असत्य के पीछे छुपे सत्य पर...
सिर्फ जागना है,
उसको जानना भी नही
क्योंकि उसे जाना ही नहीं जा सकता
-अरुण

सच्ची बात
***********
जो ‘है’ उससे सटा नहीं- .....पूरा का पूरा
जो ‘है नहीं’ उससे हटा नहीं-..पूरा का पूरा
जिंदगी खिलती नही- .........पूरी की पूरी
न माया मुरझाई कभी-.........पूरी की पूरी
-अरुण

सच्ची बात
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शून्य है शून्य के भीतर,
शून्य ही शून्य के बाहर
कितना ही गिन लो या
कितना ही नाप लो इसे
शून्य के गणित का उत्तर
शून्य के अलावा,
और क्या होगा?
-अरुण

सच्ची बात
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विकास की संभावनाओं से युक्त हुए एक यंत्र (शरीर )
जन्म लेता है
समाज का मंत्र (संस्कार) उस पर पड़ते ही
उसमे मन जागता है........ और शरीर को
एक कामचलाऊ  स्व-तंत्र  प्रदान करता है।
परन्तु अगर ‘जागरण’ (तंत्र) आ जाए ......
तो फिर शरीर
अपने पर डाले गए मंत्र से
मुक्त होकर अपने स्वभाव में लौट जाता है,
अन्यथा अपनी मृत्यु तक
मंत्र के बंधन में बंधा रहता है
-अरुण  

एक शेर
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'प्यास' जतलाई ही थी हमने  वे आबदार बन गये
 अब हम उनकी नसीहत के तलबगार बन गये
अरुण


आबदार = in charge of water

सच्ची बात
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धूप पसरी हुई है चहुँओर....
नीचे जल उठी भ्रममय मशाल
कि जिसने फैला दिया अपना उजाला
कि जिसमें खुद गयी है.....वो उलझ,
न रखते हुए धूप का कोई खयाल
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धूप = स्वयं (Real Self)
मशाल = मै (Substitute Self)
उजाला = मन (Mind/Thoughts)
-अरुण




सच्ची बात
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दबा है खजाना नीचे.....भीतर
सच्ची निर्मल जिंदगी का,
रख्खा है ऊपर एक पत्थर
वासनाओं की काल्पनिक जिंदगी का.....
आदमी इसी काल्पनिक बस्ती में,
इसी को सच्ची जिंदगी
समझते हुए जी रहा है
- अरुण

Thursday, March 19, 2015

रुबाई

रुबाई
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ज़र्रा ज़र्रा है जुदा ना मलकियत उनकी अलग
फिर करोड़ों में मेरी ये शख़्सियत कैसे अलग?
यह उतारा दिल में जिसने सच्चा बुनियादी सवाल
देखता ख़ुद में खुदाई ना खुदा जिससे अलग
- अरुण

Wednesday, March 18, 2015

तीन रुबाईयां

रुबाई १
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हकीकत को  नजरअंदाज करना ही नशा है
असल में होश खोता आदमी ही....दुर्दशा है
तरीके मानसिक सब,...होश खोने के यहांपर
ललक भी कम नही, बेहोश होना ही नशा है
- अरुण
रुबाई २
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बैसाखी के बल लँगड़ा ...चल पाता है
अंधा हर हांथ का भरोसा..कर लेता है
होश को चलना नही होता..ये अच्छा है
बिन चले जागी निगाहों से पहुँच जाता है
- अरुण
रुबाई ३
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ये बस्ती ये जमघट हैं सुनसान मेले
सभी रह रहे साथ.. फिर भी अकेले
जुड़े दिख रहे.....बाहरी आवरण ही
परंतु..ह्रदय धाग .... ......टूटे उधेडे

- अरुण

Saturday, March 14, 2015

६ रुबाईयां

रुबाई १
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हांथ वक्त का थामा तो माजी में ले जाता है
वक़्त का सरोकार... जिंदगी से हट जाता है
जिंदगी की साँस में सांसे मिलाओ ओ' जिओ
देख लो कैसा मज़ा जीने का... फिर आता है
- अरुण

रुबाई २
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बूंद चाहें कुछ भी कर लें ना समंदर जान पाएं
खुद समंदर हो सकें जब लहर में गोता लगाएं
जाननेसे कित्ना अच्छा ! जान बन जाना किसीकी
एक हो जाना समझना एक क्षण सारी दिशाएं
- अरुण

रुबाई ३
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तार छिड़ते.....वेदना से गीत झरता है
विरह के उपरांत ही मनमीत मिलता है
प्रेम शब्दों में नही...संवेदनामय दर्द है
आर्तता सुन प्रार्थना की देव फलता है
- अरुण

रुबाई ४
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हरारत जिंदगी की सासों को छू जाती है
लफ़्ज़ों में पकड़ो, बाहर निकल जाती है
लफ़्ज़ों को न हासिल है ये जिंदगी कभी
जिंदगी दार्शनिकों को न समझ आती है
- अरुण

रुबाई ५
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दूसरों के साथ रहो...नाम पहनना होगा
किसी भाष को जुबान पे ..रखना होगा
जिसका न कोई नाम भाषा, उस अज्ञेय को
भीतर शांत  गुफ़ाओं में ही जनना होगा
- अरुण

रुबाई ६
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पत्ते फड़फड़ाते हैं ......डोल रही हैं डालियाँ
किसने उकसाया हवा को ? लेने अंगडाईयां
उसने ही शायद......जिसने है मुझे फुसलाया
खुले माहौल ले आया, ..छीन मेरी तनहाईयां
- अरुण

Monday, March 9, 2015

आठ रुबाईयां

आठ रुबाईयां
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रुबाई १
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प्यार में गिरना कहो ....या मोह में गिरना कहो
इस अदा को बेमुर्रवत .....नींद में चलना कहो
नींद आड़ी राह ..जिसपर पाँव रखना है सरल
जागना चलना ना कह, उसे शून्य में रहना कहो
- अरुण
रुबाई २
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जिंदगी द्वार खटखटाती, हाज़िर नही है
टहलता घर से दूऽऽऽर, ..हाज़िर नही है
ख़याली शहर गलियों में भटकता चित्त यह
जहांपर पाँव रखा है वहाँ  हाज़िर नही है
- अरुण
रुबाई ३
*****
कुदरत ने जिलाया मन. ..जीने के लिए
होता  इस्तेमाल मगर......सोने के लिए
जगा है नींद-ओ- ख़्वाबों का शहर सबमें
मानो जिंदगी बेताब हुई....मरने के लिए
- अरुण
रुबाई ४
******
खरा इंसान तो इस देह के.. अंदर ही रहता है
वहीं से भाव का संगीत मन का तार बजता है
जगत केवल हुई मैफिल जहाँ संगीत मायावी
सतत स्वरनाद होता है महज़ संवाद चलता है
- अरुण
रुबाई ५
*****
बाहर से मिल रही है ..पंडित को जानकारी
अंदर उठे अचानक.......होऽती  सयानदारी
इक हो रही इकट्ठा........दुज प्रस्फुटित हुई
यह कोशिशों से हासिल, वह बोध ने सवारी
- अरुण
रुबाई ६
*******
'जो चलता है चलाता है उसे कोई'
ज़रूरी है?... ये पूछे स्वयं से कोई
चलाता जो... कहाँ से आगया चलकर?
नही उसके चलन की...वजह कोई?
- अरुण
रुबाई ७
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लिए निजता नींद में ....बस रहा हर आदमी
खाट वही सपन अलग चख रहा हर आदमी
जब सोना,  सोता है, अलग अलग सपनों में
एक ही धरातल... जब, जग रहा हर आदमी
- अरुण
रुबाई ८
******
दिन को दिन न कहो, कहो के रात कम है
हर हँसी के दूसरे छोर.......हंस रहा ग़म है
जगत में कुछ भी किसी से नही अलग होता
घाव की गहराई में ही....उसका मरहम है
- अरुण

Friday, February 27, 2015

तीन रुबाईयां

रुबाई
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बैद मन का.. मर्ज़ को अच्छा नही करता
टेढ़ को सीधा करे .....अच्छा नही करता
सबके सब सीधे से पागल.. ऐसे सीधों से
वह कभी मिलता नही ...चर्चा नही करता
- अरुण
रुबाई
*****
ठहराव नही है ......है बहाव जिंदगी
न रुका कुछ भी, न पड़ाव है जिंदगी
न चीज़, न शख़्स, न जगह है कोई
'है' का न वजूद यहाँ, बदलाव है जिंदगी
- अरुण



रुबाई
*******
सिक्के के पहलुओं में दिखता विरोध गहरा
भीतर से दोनों हिलमिल आपस में स्नेह गहरा
ऊपर से दिख रही हो आपस की खींचातानी
भीतर में बैरियों के ... बहता है प्रेम गहरा
- अरुण

Tuesday, February 24, 2015

रुबाई

रुबाई
*****
पेड़ जंगल में समाजिक नही....एकांत में है
भीड़ से हट के भी हर शख़्स खड़ा भीड़ में है
भीड़ में पला बढ़ा भीड़ का ही एक रूप हुआ
आसमां सब का एक ही न किसी भीड़ में है
- अरुण

Monday, February 23, 2015

तीन रुबाईयां

रुबाई
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ज़रूरत को सयाना ठीक से परखे
ज़रूरी जानकारी को टिकी रख्खे
निरा मूरख पढत-पंडित गलत दोनों
गिरे कोई तो कोई ज्ञान को लटके
- अरुण
रुबाई
******
दुनिया में नही होती कुई बात कभी पूरी
दिन रात जुड़े इतने .....छूटी न कहीं दूरी
हर रंग दूसरे से कहीं ज़्यादा कहीं फीका
इंसा ना समझ पाए क़ुदरत की समझ पूरी
- अरुण
रुबाई
******
यह जगत टूटा हुआ तो है नही....."लगता" ज़रूर
और फिर आते निकल.. ....स्वार्थ भय ईर्षा ग़रूर
इसतरह मायानगर आता नज़र.. ....बनता बवाल
"लगना" ऐसा जो निहारे....जगत उसका शांतिरूप
- अरुण

Friday, February 20, 2015

रुबाई

रुबाई
*******
जहांपर पाँव रख्खा है वहीं पर 'वो' खड़ा है
प्रयासों से मिले .....ऐसी न कोई संपदा है
नज़ारे जी रहें हैं ...हो नज़र सोयी या जागी
सभी मारग सभी खोजें समझ की मूढ़ता है
- अरुण

Thursday, February 19, 2015

रुबाई

रुबाई
********
है यहीं अभ्भी ....उसे पाना नही है
पाया हुआ है...ढूँढने जाना नही है
देख लेना है कहीं ना बंद हो आँखें
ख़्वाब में या याद में खोना नही है
- अरुण

Wednesday, February 18, 2015

रुबाई

रुबाई
*******
चुप्पी भी बोलती है चुप हो के फिर सुनो
अपनी ही सोच में हो...बाहर निकल,सुनो
कुछ जानना नही है ख़ुद को भी भूल जाओ
पूरे जगत की धुन में घुल जाओ फिर सुनो
- अरुण

Tuesday, February 17, 2015

रुबाई

रुबाई
******
दिल से समाना सकल में आराधना है
मन से हुई जो याचना... ना प्रार्थना है
अपनी बनाई मूर्ति को भगवान कहना
एक अच्छा और भला सा बचपना है
- अरुण

Monday, February 16, 2015

दो रुबाई

रुबाई
******
किसी के साथ भी हो लेता है तर्क
वकालत के बड़े काम आता है तर्क
तर्क करते लोग होशियार दिखते हैं,मगर
जिंदगी को समझ पाया न तर्क
- अरुण

रुबाई
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प्रेम में जो बात है.........सन्मान में नही
कागजी फूल में तो ..... कोई जान नही
प्रेम प्रेमी और प्रेयस सब बराबर के सगे
किसी का मान...किसी का अवमान नही
- अरुण

Friday, February 13, 2015

रुबाई

रुबाई
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पहनावा शख़्सियत का पहनो उतार दो
आदम से  जो मिला है उसको सँवार लो
अपने लिबास में ही जकड़ा है आदमी
तोडों ना बेड़ियों को बंधन उतार दो
- अरुण

Wednesday, February 11, 2015

रुबाई

रुबाई
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पादरी मौला ओ पंडित की रुचि रब में कहाँ
राह बेचू हैं सभी..मंज़िल से मतलब है कहाँ
यूँ,  सभी थाली कटोरी और प्यालों की दुकानें
भूक विरहित पेट हैं तो प्यास भी लब पे कहाँ
- अरुण

Tuesday, February 10, 2015

रुबाई

रुबाई
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सोचते हो जो...नही है जिंदगी वैसी
अंधता जो भी कहे...ना रौशनी वैसी
रौशनी रौशन हुई ना कह सकी कुछ भी
केहन सुन्ने की ज़रूरत क्या पड़ी वैसी?
- अरुण

Monday, February 9, 2015

रुबाई

रुबाई
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मन बिना यह तन चला होता न होती त्रासदी
अश्व ख़ुलकर भागता रहता न होता सारथी
हाय! तन में क्यों सभी के मन की विपदा आ ढली
रिश्ता तन मन का सही जिसमें घटा....सत्यार्थी
- अरुण

Saturday, February 7, 2015

रुबाई

रुबाई
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आँख देखे सामने का कण सकल सब साथ साथ
मोह होते शुद्र से ......होते विकल जन साथ साथ
आँख चाहे उस तरह से देखना ...........भूले सभी
देख पाए बुद्ध ही.....निरबुध सभी हम साथ साथ
- अरुण

Friday, February 6, 2015

रुबाई

रुबाई
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पत्थरों में भी दिखे जिसको रवानी
कह न पाता इस तजुर्बे को ज़ुबानी
आँख जिसको मिल गई हो ये अजूबी
तेज़ तूफ़ानों में देखे..... ठहरा पानी
- अरुण

Thursday, February 5, 2015

रुबाई

रुबाई
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हर जुड़ा रिश्ता तजुरबे पर करारों पर खड़ा है
आपसी सौदा हिसाबों के लिए ही वह बना है
बात सच है फिर भी कड़वी जान पड़ती हो भले
इस हकीकत से हटे उनके लिए दुनिया बला है
- अरुण

Wednesday, February 4, 2015

रुबाई

रुबाई
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सागर में मछली है .........मछली में सागर है
पीढ़ी दर पीढ़ी का ........इकही मन-सागर है
सागर से मुक्त कहां ..मछली जो कुछ भी करे
जबतक वह गल न जाय बन न जाय सागर है
- अरुण

Tuesday, February 3, 2015

रुबाई

रुबाई
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न कोई अकेला है और ...न है कोई अलग
यहाँ से वहाँ तक एक ही अस्तित्व है सलग
यह 'अलगता' है ग़लतफ़हमी सदियों पुरानी
दिल मानने को नही तैयार ...बात ये सख़त
- अरुण

Saturday, January 31, 2015

रुबाई

रुबाई
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दिल की धड़कन मन की मनमन धमनियाँ हैं तर
देख चलती जिंदगानी और .....उसका हर असर
अपने भीतर और बाहर..... जिंदगी जिंदा सबक़
व्यर्थ के प्रवचन सभी सब ....और चर्चा बेअसर
- अरुण

Friday, January 30, 2015

रुबाई

रुबाई
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सत्य है क्या.. यह खोजना.. बेकार है यारों
दोहा...'पानी बिच मीन'...   साकार है यारों
क्यों है मछली प्यासी?.....-बस खोजो यही
इसी में सत्य से............साक्षात्कार है यारों
- अरुण

Thursday, January 29, 2015

रुबाई

रुबाई
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असलियत सुलझी हुई है .कल्पना उलझा रही
कल्पना की सत्यता दिल की पकड ना आ रही
एक पल जागा हुआ.......तो दूसरा सोया हुआ
अंखमिचौली आदमी की समझ को गुमरा(ह) रही
- अरुण

Wednesday, January 28, 2015

रुबाई

रुबाई
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जिंदगी से है शिकायत सिर्फ़ बस इंसान को
और कोई ना बनाए....अलग ही पहचान को
सब के सब क़ुदरत की सांसे आदमी ही भिन्न है
आदमी इतिहास की रूह जी रहा अरमान को
- अरुण

Sunday, January 25, 2015

रुबाई

रुबाई
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यूँ अंधेरा न उजाले को मिटा पाता है
न उजाले को अंधेरे पे तरस आता  है
चिढा हुआ है सिरफ ऐसा जगा 'आस्तिक' वह
नींद में रहते  दूसरों को जो जगाता है
- अरुण

Saturday, January 24, 2015

रुबाई

रुबाई
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खड़ा हो सामने संकट भयावह काल बनकर
निपटना ही पडे ..उससे हमें  तत्काल बढ़कर
निरर्थक.. सोच चर्चा भजन पूजन..ये सभी तो
दिमागी फितूर... बैठे आदमी के भाल चढ़कर
- अरुण

Friday, January 23, 2015

रुबाई

रुबाई
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जब तलक ना आग लग जाती... न छिड़ जाती लड़ाई
तब तलक ना साथ आकर क़ौम.....'मन' पर सोच पाई
सब के सब ..........अपनी ही अपनी दास्ताँ में गुम हुए
ना कभी इंसानियत की.......... ..चेतना की समझ पाई
- अरुण

Wednesday, January 21, 2015

रुबाई

रुबाई
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खुद के भीतर जा उतर सीढी कुई लगती नही
दुसरों की आंख से दुनिया कभी दिखती नही
आइनें भी शक्ल दिखलाते मगर क्या काम के
आइनों  में शक्स की गहराईयां ...दिखती नही
- अरुण

Tuesday, January 20, 2015

रुबाई

 रुबाई
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बंद आँखों से जलाओगे दिये बेकार होगें
देखकर करना हुआ तो मनसुबे बेकार होंगे
बंद आँखे तर्क में विज्ञान में बाधा नही पर
भीतरी बदलाव के सब रास्ते बेकार होंगे
- अरुण

Monday, January 19, 2015

रुबाई

रुबाई
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सतह पे लहरें हैं, .....हैं संघर्ष के स्वर
संथतल पर शांतिमय एकांत का स्वर
सतह-तल दोनों जगह ....चैतन्यधारा
सतह..लहरें..संथतल सब एक ही स्वर
-अरुण  

Sunday, January 18, 2015

रुबाई

रुबाई
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आग पानी बन उड़ेगी और पानी बन धुआं
सीखने को कुछ नहीं है भूलने का सब समां
सब गिराओ ज्ञान अपना शून्य में रहकर रमों
शून्य में ही रह रही बुद्धत्व की संवेदना
- अरुण

Friday, January 16, 2015

रुबाई

रुबाई
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ग़रीबी एक विपदा है कि हो बाहर या भीतर
खरी वो संपदा जो जनम ले बाहर और भीतर
रहें आइन्स्टाइन बुद्धी में ह्रदय को बुद्ध भाएँ
तभी विज्ञान और आध्यात्म का घटता स्वयंवर
- अरुण

Tuesday, January 13, 2015

रुबाई

रुबाई
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तजुर्बात जहांतक सोच सकें..अंदाज़ा वहांतक जाता है
आँखों को दिखे जितना रस्ता ...उतना ही भरोसा होता है
हम दुनियादारी में उलझे.......अपने से परे सोचा ही कहां
धुँधलीसी नज़र ख़ुदगर्ज कदम....खुद से न आगे जाता है
- अरुण

Monday, January 12, 2015

रुबाई

रुबाई
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भूत ही भूत महल बनाता है
कल्पनाओं में रमा रहता है
महल में बैठे..महल के अंदर ही
वर्तमां को भी बुला लेता है
- अरुण

Saturday, January 10, 2015

रुबाई

रुबाई
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कह देते मैंने किया.. तुम नही करते
जो भी करे नाम महज़ ...अपना देते
नही कुई करे.....सिर्फ़ होना ही होना
कण कण जो खड़े...लगें उड़ते चलते
- अरुण

Friday, January 9, 2015

रुबाई

रुबाई
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सुनना है?.. सुनना भर..न समझने की फ़िक्र कर
मौन को साधे रहो.......मनमें न कोई ज़िक्र कर
हर सुनी बातें वचन क़िस्से तभी...., ताज़ातरीन
सुननेवाले ने सुने गर  ....ख़ुद की हस्ती भूलकर
- अरुण

Thursday, January 8, 2015

रुबाई

रुबाई
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रोग हो तो दूर कर दे.... ऐसा डाक्टर है यहाँ
अडचनों को दूर कर दे....ऐसा चाकर है यहाँ
नासमझ इंसान है सो.. मनगढों का है शिकार
मानसिक भ्रमरूग्णता हैं....मनरचे मशवर यहाँ
- अरुण

Wednesday, January 7, 2015

रुबाई

रुबाई
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तैरते वक़्त कोई प्यास से तिलमिलाता हो, बात सुनी नही
डूबता हो और पानी माँग रहा हो पीने को, बात जमी नही
वैसे तो तैरकर या डूबकर ही...........जानी गई है जिंदगी
चुल्लू चुल्लू पीकर जो जानना चाहें.. उनसे बात बनी नही
- अरुण

Monday, January 5, 2015

रुबाई

रुबाई
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देखने में भिन्नता का सब तमाशा
एक का ग़म दूसरे की मधुर आशा
देखनेवाले हज़ारों दृश्य केवल एकही
'भिन्नता' ने वाद जन्मे बेतहाशा
- अरुण

Sunday, January 4, 2015

रुबाई

रुबाई
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हवा से लहरें उठ्ठे टकराए लहर से लहर... दरिया ख़ामोश है
हो हल्की हलचल या के हो तूफ़ानी क़हर ... दरिया ख़ामोश है
बनते बिगड़ते रिश्तों का होश-ओ-असर सतहे जिंदगी पर ही
तहख़ाने में झाँक के देखो सब्र-ओ-सुकून है..जिंदगी ख़ामोश है
- अरुण

Saturday, January 3, 2015

रुबाई

रुबाई
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जिसे दिख गई यह सच्चाई की वह हवा में उड़ रहे पत्ते पे खड़ा है
भलाई इसीमें की वह जानले....कि नसीब उसका पत्ते से जुड़ा है
फिर भी अपने अलग नसीब की बातें करना ही हो जिसकी फ़ितरत
वह ज्योतिष से, बाबा से.....दिमाग़ी फितूरों से... जा जुड़ा है
- अरुण

Friday, January 2, 2015

रुबाई

रुबाई
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बीती कभी अनबीती को देखने नही देती
बिनचखे को  बिनचखा.....रहने नही देती
है स्मृती की यह करतूत .परेशां है आदमी
जिंदगी को जिंदा बने.......रहने नही देती
- अरुण

Thursday, January 1, 2015

रुबाई

रुबाई
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ख़ुशी मेरी या मेरा ग़म....सब दूसरों के हांथ
दूसरों की कारवाईयों का मैं हूँ...बस जवाब
है मशीनी जिंदगानी ख़ुद तो कुछ करती नही
ख़ुद करेगी कारवाई जब कभी जाएगी जाग
- अरुण