Friday, December 31, 2010

खोज भगवान की

भगवान

खोजने से मिलने वाला नही

खोजने वाले को खोजनेपर

भगवान

मिल जाए शायद

................................. अरुण


Thursday, December 30, 2010

मन की पकड़

मन किसी भी वस्तु,

घटना, प्रसंग या स्थिति को

शुद्ध समझ से देख नही पाता

शब्द नाम और संकल्पनाओं की गति में

मन हमेशा उलझा हुआ है

जो जैसा है उसे वैसा ही देखने की जगह

देखने पर जो प्रतिमा बनती है उस

प्रतिमा को ही मन

वास्तविकता का स्थान देता है

परिणामतः

शुद्ध समझ बन ही नही पाती

............................................ अरुण


Wednesday, December 29, 2010

अहंकार से अहंकार टकराये

अहंकार करता दुजा अपने मन पर घात

अगला कद ऊँचा करे हम खुद छोटे पात

.....

यदि सामनेवाला आदमी

हमारे सामने अहंकार से

भरा आचरण करता हो

और यह बात अगर हमें चुबती हो

तो यह स्पष्ट है कि

उसका आचरण हमारे अहंकार को

ठेस पहुँचा रहा है

सामने वाला खुद की स्तुति करे यह

हम सहन कैसे कर सकते हैं क्योंकि

वह जब अपना कद बढाता है

हमें हमारा कद छोटा होता मालूम पडता है

आपसी संबंधों की यह पेचीदगी

समझने जैसी है

................................. अरुण

Tuesday, December 28, 2010

व्यक्तित्व से छुटकारा ही मुक्ति है

शख्सियत घुलती नही है प्राण-धारा में

ऊपरी है रंग, पानी पर नही चढ़ता

...................................................अरुण

Monday, December 27, 2010

आईना और जीवन

आईने के भीतर

आईने का प्रतिमा-विरहित

शुद्धतमरूप देखने के लिए

जब भी झांकता हूँ

वहाँ अपनी ही प्रतिमा के सिवा

मुझे कुछ नही दिखता

..

ये तो आइना है जिसका

सरोकार किसी से भी नही

जो भी सामने आए

प्रतिबिंबित तो हो जाता है

पर किसी भी प्रतिबिम्बन को

आइना पकड़ कर नही रखता

जीवन का शुद्धतम स्वरूप

ऐसा ही प्रतिमा विरहित

प्रतिबम्बन मात्र है

........................................ अरुण




Sunday, December 26, 2010

पूजा होती संघ की लेकर झूठ उपाय

कई पुजारी सत्य के मिलकर संघ बनाय

पूजा होती संघ की लेकर झूठ उपाय

...........

सत्य पूजने की नही

खोजने की बात है

सत्य- खोज पूरी तरह से

निजी है, संगठनात्मक नही

जहाँ संगठन बना

राजनीति या झूठ का

अवतरण होना लाजमी है

................................. अरुण


Saturday, December 25, 2010

सुगंध और लोगों की भीड़

यहाँ का माहोल, यांत्रिक भीड़

शोरोगुल और लोगों में चेहरों पर

दिखता यांत्रिक अहोभाव देखकर लगा

मानो

कोई फूल यहाँ उमड़ पड़ा होगा

अपनी सुगंध को चहुँओर फैलाते

इधर उधर से लोग खींचते चले आये होंगे

उस सुगंध के कारण

समय के बीतते फूल मुरझाया और

कालांतर से गंध भी खो गई

समय के आकाश में

परन्तु भीड़ का सिलसिला चालू रहा

भीड़ ने अपनी ही गंध को

उस सुनिसुनायी सुगंध का नाम दिया

अब भीड़ को देखकर

व्यापारियों की भी रूचि बढ़ी

उन्होंने खड़ा किया भव्य मंदिर

चढाओं की परम्परा चलाई

प्रसाद बांटना शुरू किया

भीड़ इतनी बढ़ी कि उस सुगंध के नाम से

होटलों, बसों, और टूरिस्ट सेंटरों का

भी धंधा चल पड़ा है अच्छी तरह

................................................... अरुण

Sunday, December 19, 2010

राजनीतिज्ञों की मूल कमजोरी

राजनीतिज्ञों की मूल कमजोरी

यह है कि वे हमेशा

या तो सत्ता का अवसर चूकने या

पाई हुई सत्ता खो देने के भय से ग्रस्त है

और इसीलिए अपने मन कि बात सीधे सीधे

उजागर नही कर पाते

सत्ताधारी भी डरा है

और विरोधी भी

जिनकी मौलिक धारण संविधान से मेल

नही खाती वे भी संविधान में अपना

विश्वास जताते है

और जो संविधान की मूल मान्यता से हटकर

अपनी राजनीति चलाते है वे भी

दुहाई संविधान की ही देते रहते हैं

निष्कर्ष यह कि

जिनका मन कुछ और

तो आचरण कुछ और -

ऐसों को ही राजनीतिज्ञ कहा जाता है

............................................... अरुण


Saturday, December 18, 2010

एक कैफियत वेदना भरी

क्यों न की मेरे अंतिम यात्रा की शुरुवात

उसी दिन जिस दिन मैं इस धरती पर आया

क्योंकि उसी दिन से तो शुरू कर दिया आपने

गला घोटना मेरी कुदरती आजादी का

उसी दिन तो शुरू किया आपने

मेरे निरंग श्वांसों में अपनी जूठी साँस भरकर

उसमें अपना जहर उतारना

उसी दिन से तो मुझे कैद कर लिया

आपके विचारों, विश्वासों और आस्थाओं ने

आपने बड़ा किया, बढ़ाया मुझे एक

इस अच्छे-भले कैदखाने में

अच्छी तरह से जीना सीखाया

यह कैदभरी जिंदगी,

मुझे सामान बनाया सामाजिक प्रतिष्ठा का

अब पहुँचने जा रहा हूँ अंतिम छोर पर

उस राह के

जिसका आरम्भ

कभी हुआ ही नही

.......................................... अरुण

Friday, December 17, 2010

सत्य का स्पर्श जीवंत प्रवाह में

सत्य का स्पर्श

जीवन के जीवंत प्रवाह में ही

होना है

सभी संबंधों में, अंतःक्रियाओं में.

रोजमर्रा जिंदगी में ही होना है

जैसे नदी का स्पर्श उसकी

बीच-धारा में है

तट पर बैठकर उसकी पूजा आराधना

जप-जाप करने में नही

...................................... अरुण


Thursday, December 16, 2010

जागरण कों भी जब होश आता हो .....

सपने और वास्तव के
बीच का भेद
नींद और जागरण की स्थिति के भेद
द्वारा समझाया जाता है
जब जागरण में भी नींद सक्रीय रहती है
तो जागरण कों निद्रस्थ-जागरण कहना चाहिए
प्रायः इसी निद्रस्थ -जागरण में हम सब जी रहे हैं
ऐसे जागरण कों भी जब होश आता हो
तो उस स्थिति कों ही बुद्धत्व कहते होंगे शायद
...................................................................... अरुण

Wednesday, December 15, 2010

अच्छापन या सच्चापन

सभी धर्मों का आशय इतना ही है कि

आदमी में सत्पुरुष अवतरित हो

ऐसा होने के लिए

आदमी क्या करे, यह कोई भी धर्म

न सिखाता है और न सिखा सकता है

इस प्रकार की सीख देने के प्रयास में

लौकिक अर्थ में कई तथाकथित धर्म

प्रचलित हुए पर सभी अधिक से अधिक

अच्छापन सिखा सके सच्चापन नही,

क्योंकि

सच्चापन आदमी की अपनी निजी खोज से फलता है

किसी सामाजिक अभियान से नही

...................................................... अरुण


Tuesday, December 14, 2010

सच का सच

सच का सच जब कहना चाहा सच्चों ने मुंह फेर लिया

इतनी सच्ची कडवी लगती, अच्छों ने मुंह फेर लिया

............

सच्ची बातें प्रायः सभी को अच्छी लगती है

जैसे ईश्वर की नजर में सभी एक हैं

कोई भेद नही- न जाति का, न धर्म का, न किसी तरह का’’

इस तरह के विचार अच्छों के ह्रदय को छू लें यह तो

स्वाभाविक है

परन्तु यदि ईश्वर के अस्तित्व को लेकर

कोई संदेह व्यक्त किया जाए तो

अच्छे भले लोग भी दुखी हो जातें हैं

सच का सच जानने और कहने का साहस

प्रायः सब में नही होता

................................................. अरुण

Monday, December 13, 2010

संतुलित जीवन

जो हमें थामे हुए है वह है

हमारा प्राकृतिक (आजाद) धर्म

जिसे हम थामे हुए है वह है हमारा

नीति=नियमाधीन (आरोपित) धर्म

ऐसा धर्म जो हमें हमारी

प्राकृतिक आजादी के खिलाप खड़ाकर

कमजोर बना देता है,

हमारी मूल प्रवृति को दबाता है

ताकि वह हमपर

आसानी से सत्ता बनाये रख सके

नैसगिक धर्म है हमारी आजादी और

नीति-नियमों वाला धर्म है

हमारी आजादी पर लगाम कसने वाला, पर

समाज को भानेवाला,

समाज ने रचा हुआ

तथाकथित धर्म

........

जो अपनी मूल आजादी से जुड़े हुए

समाज-धर्म निभाने का कौशल्य रखते हैं

उनका जीवन संतुलित है

जो अपनी मूल-प्रवृत्ति के खिलाफ

समाज-धर्म को ही सही माने में धर्म समझकर

जी रहे हैं उनका जीवन ढकोसले से भरा हो तो

आश्चर्य नही

..................................................... अरुण


Sunday, December 12, 2010

शांति की बात, अशांति का माहोल

हिंदू जगत में शांति चाहता है

इस्लाम भी शांति का ही पक्षधर है

दूसरे तथाकथित धर्म भी शांति के लिए ही हैं

फिर भी एक दूसरे को सामने पाकर अशांत हैं

बात तो अयुद्ध की कर रहे है पर

जी रहे हैं युद्ध के माहोल में

........................................................ अरुण

Saturday, December 11, 2010

होश सही, बेहोशी गलत

होश में जो भी होता है

सही है

बेहोशी में होनेवाली हर बात

है गलत

होश की नजर में हर रास्ता साफ़ है

सो कदम गलत जगह पड़ते ही नही

बेहोशी सोयी रहती है

विचारों में, कल्पनाओं में, अच्छे -बुरे या

सही - गलत के चयन में

कुछ पाने में, कुछ छोडने में और

इस कारण

भटक जाती है धुंधले रास्तों पर

Friday, December 10, 2010

ध्वनि है शब्द, संकेत है अर्थ

सृष्टि ने दिए

ध्वनि नाद और आकार के रूप में

शब्द

जीव ने दिया उसे

संकेत या मन्शा के रूप में

अर्थ

इसी से बनी सारी भाषा और

इसी से बना भाषाकार

...

सृष्टि न होती तो

जीव न होता और न ही होते

शब्द और अर्थ

और न ही होते

भाषा और भाषाकार

................................... अरुण









Thursday, December 9, 2010

जिंदगी छोटी, बहुत छोटी.....

जिंदगी छोटी बहुत छोटी, बहुत छोटी है

ना समझ पाए जेहन जिसकी पकड़ मोटी है

और इसीलिए जेहन या मन से

पार जाकर ही जिंदगी को जाना जाता है

.......................................................... अरुण

Saturday, December 4, 2010

बुद्धिमान और बुद्ध

केवल बाहर दुनिया को देखनेवाली बुद्धि

बुद्धिमान या पंडित का

बहुमान पाने योग्य है

परन्तु जब वह स्वयं को देखती है

बुद्ध बन जाती है

........................................... अरुण

Friday, December 3, 2010

आशय एक, अभिव्यक्ति भिन्न

नींद ही नींद से करती बातें

जागनेवालों में होती नही चर्चा कोई

....

देखना बंद हुआ बोलना हुआ चालू

ये जहाँ बोलनेवालों से ही आबाद हुआ

.....

ये घना फैल चुका है लफ्जों का नगर

के समझ लफ्जों तले घुंटती मरी जाती है

.....

ख़ामोशी- भीड़ में रहती है अकेली न हुई

हर दो लफ्ज के दरमियान बसा करती है

.....

बोलने और सुनने वाले में न फर्क कोई

एक ही जहन निभाता, दो अलग किरदार

................................................... अरुण


आशय एक, अभिव्यक्ति भिन्न

नींद ही नींद से करती बातें

जागनेवालों में होती नही चर्चा कोई

....

देखना बंद हुआ बोलना हुआ चालू

ये जहाँ बोलनेवालों से ही आबाद हुआ

.....

ये घना फैल चुका है लफ्जों का नगर

के समझ लफ्जों तले घुंटती मरी जाती है

.....

ख़ामोशी- भीड़ में रहती है अकेली न हुई

हर दो लफ्ज के दरमियान बसा करती है

.....

बोलने और सुनने वाले में न फर्क कोई

एक ही जहन निभाता, दो अलग किरदार

Thursday, December 2, 2010

सत्य की खोज को समर्पित

एक दोहा

मछली से क्या पूछना पानी कैसा होत

पानी जिसके प्राण हैं पानी जीवन ज्योत

...........

एक चिंतन

मै कौन हूँ ? इस सवाल का

कोई जबाब नही

यह एक सघन-गहन खोज है

जिसका कोई अंत नही

.............................................. अरुण


Wednesday, December 1, 2010

वही जीवंत है

सामने खड़े वर्तमान को देखना

हो ही नही पाता

क्योंकि वर्तमान में दिखता हुआ

बीता और भविष्य ही

सारा ध्यान आकर्षित कर लेता है

जो भूत और भविष्य में विचरते हुए भी

वर्तमान के स्पर्श को हर क्षण महसूस करता रहता है

वही जीवंत है

.................................... अरुण


Tuesday, November 30, 2010

जिंदगी की लम्बाई......

जिंदगी की लम्बाई

चौड़ाई, ऊंचाई और गहराई

क्षण या साँस की

लम्बाई चौड़ाई, ऊंचाई और

गहराई से अधिक नही

यह तो आदमी की याददास्त का आंगन है

जिसमें जिंदगी

दिन, सप्ताह, वर्ष, दशक, शतक

और युगों के पैमाने में फैलती दिखती है

................................................, अरुण



Sunday, November 21, 2010

मन एक भूमिका अनेक

रंगमंच पर एक ही पात्र

एक साथ

अनेक भूमिकाएं इस सटीक ढंग से निभाता है कि

लगता है - कई पात्र मिलकर

विभिन्न भूमिकाएं

कर रहें है

दर्शक भी इतने रम जातें हैं कि

उन्हें प्रतीत होता है कि मानो

रंगमंच पर कई पात्र साकार हो चुके है

मन भी इसीतरह का

एक पात्र और बहुभूमिका वाला नाटक है

मन के इस नाटक में

अभिनेता-दर्शक

(दोनों एक ही यानी मन )

इस सच्चाई से बेखबर हैं कि

वही एक (स्वयं) अनेक भूमिकाएं

निभा रहा है

....................................... अरुण

अब कुछ दिन विराम

Saturday, November 20, 2010

नैतिक मूल्यों में गिरावट

ऐसी गिरावट के एक नमुने के रूप में,

किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा किए गये कुछ ऐसे बयान

आजकल भारत में पढने-सुनने को मिलते हैं

--

हमारी पार्टी आपके पार्टी जैसी

भ्रष्ट नही है. यह ईमानदार लोगों की पार्टी है

हमारे यहाँ अगर कोई मिनिस्टर अपने रिश्तेदारों में

सार्वजनिक जमीन गलती से बाँट भी देता है

तो यह बात सार्वजिक तौर पर उजागर होने पर,

उनसे वापस लेकर जनता को लौटा भी देता है.

आपके पार्टी के मिनिस्टर जैसा नही कि खाए और डकार जाए

........................................... अरुण

Friday, November 19, 2010

दृष्टिमय बोध

संसार की हर वस्तु, तथ्य, दृश्य, या प्रक्रिया

का वर्णन किया जा सकता है

परन्तु हर वर्णन के बाद भी

कुछ अवर्णित (unexplained) शेष बचता ही है

और इसीलिए कहते हैं कि

वर्णन हमेशा अधूरा है

अतः जरूरत है इस अधूरेपन को भी देख सके

उस दृष्टि की,

केवल वर्णन की नही

........

वर्णन करना काम है विज्ञान का

अधूरे के साथ साथ पूरे को

देख सकना काम है

दृष्टिमय बोध का

इस दृष्टिमय बोध के अभाव के कारण ही

सदियों से सच समझाना जारी है और

कभी भी पूरा नही हो पा रहा

......................................... अरुण

Thursday, November 18, 2010

दुहराता वही शेर

अपनी ही हर खुशी से परेशां हैं सारे लोग

किसको खुशी कहें , हर दिल में हो तलाश

अँधेरा काट लेगा, डर के न भागो यारों

इसी जगह पे छुपा है, रौशनी का चिराग

सवाल उठने से पहले जबाब हाजिर हो

ऐसे माहोल में नयी सोच नही बन पाती

जहाँ खिला है फूल खुश है जिंदगी पाकर

पिरोके माला में मौत उसे मत देना

महलों को गरीबी में सादगी दिखती

गरीबी में ख्वाब उठते हैं महलों के

अँधेरा–ओ-उजाला, बेखुदी-ओ-होशियारी

दोनों ने नही देखा एक-दूजे को

................................................. अरुण


Wednesday, November 17, 2010

आज का तीसरा शेर

अँधेरा–ओ-उजाला, बेखुदी-ओ-होशियारी

लफ्ज दोनों साथ, न ताल्लुक बीच में

................................................. अरुण

आज के दो शेर

जहाँ खिला है वहाँ खुश है जिंदगी पाकर

पिरोके माला में फूल, उसे मौत न दे

..............

अच्छा है, गर महलों को गरीबी में सादगी दिखती

और दिखते गरीबों को महलों के ख्वाब

................................................. अरुण

Tuesday, November 16, 2010

आज का शेर

सवाल उठने से पहले जबाब हाजिर हो

ऐसा माहोल गुलामों के लिए अच्छा है

................................................. अरुण

Monday, November 15, 2010

एक शेर

अँधेरा काट लेगा, डर है ?- न भागो यारों

इसी जगह पे छुपा है, रौशनी का चिराग

................................................. अरुण

Sunday, November 14, 2010

एक शेर

अपनी ही हर खुशी से परेशां हैं सारे लोग

किसको खुशी कहें , हर दिल में हो तलाश

.................................................. अरुण


Saturday, November 13, 2010

सारा अस्तित्व एक का एक

सारा अस्तित्व एक का एक है

कहीं कोई भेद नही, कोई टुकड़ा नही

मेरा अस्तित्व अलग और तेरा अलग

- ऐसा भी नही

कुदरत स्वयं को जिस दृष्टि से देखती है

उसी दृष्टि से देखने पर सारा अस्तित्व क्या है

यह समझ आता है

.........

टुकड़ों में जो दिखे कैसा वजूद?

मेरा वजूद, तेरा वजूद, उसका वजूद?

कुदरत को जिस तरह से दिखे, वैसा दिखे

वही सच्चा है- तेरा और मेरा, सबका वजूद

................................................ अरुण


Friday, November 12, 2010

एक निर्बोझ जीवन-प्रवाह

ठीक से देखना बने तो

दिखे कि बाहर,

पेड की छाया बनती है,

बनायीं नही जाती

पेड उगता है,

उगाया नही जाता

धरती चलती है,

चलाई नही जाती

ऐसे ही भीतर,

साँस चलती है चलाई नही जाती

धडकन चलती है चलाई नही जाती

विचार भी चलते हैं, चलाए नही जाते

चलानेवाले के बिना ही सबकुछ चल रहा है

चलानेवाला है ही नही

और सब हो रहा है

इस सच्चाई से जुडी जीवन्तता

ही है एक निर्बोझ जीवन-प्रवाह

..................................... अरुण


Thursday, November 11, 2010

आनंद जिंदगी के बहाव में

किनारे खड़ा आदमी

अगर बहती नदी के बहाव को देखकर

प्रसन्न है तो

मतलब

प्रसन्नता बहाव के कारण है

केवल जल के कारण नही

ऐसे आदमी को संग्रहित जल,

बहाव का आनंद नही दे सकता

जिंदगी का आनंद भी उसके बहाव में है

अनुभवों के संग्रह में नही

......................................... अरुण

Wednesday, November 10, 2010

कुछ अजीबसी अटपटी अभिव्यक्ति

करने वाला हो तो वह कुछ करेगा ही

कुछ नही करना भी

करने के बराबर ही है

करते करते जब उसने खुद को

गहराई और व्यापकता से देखना शुरू किया

वह खुद देखना बन गया

फिर कुछ करने का सवाल ही कहाँ?

देखना ही- देखने को- देखता रहा

करनेवाला अपने देखने के साथ

दिखता रहा

पहले था केवल करना करना करना

अब है केवल देखना देखना देखना

................................................... अरुण

Tuesday, November 9, 2010

क्या यह सब किसी ‘महान शक्ति’ का परिचायक है?

भारत के सही प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाला

समस्त भारतीय मीडिया

गये दो दिन केवल इस बात को लेकर परेशान था कि

बराक ओबामा साहब पाकिस्तान को हमारे समर्थन में

कुछ सुनाते क्यों नही ?- पाकिस्तान के नाम पर चुप्पी क्यों साधे हुए है?

गहरे में सोचा जाए तो कहीं न कहीं

हमारे भीतर से मानसिक गरीबी और लाचारी की

गंध आ रही थी

सामने का पक्ष (अमेरिका) खुले तौर पर

बिना किसी ढकोसले के, समान धरातल पर खड़े होकर,

हमारा आर्थिक सहयोग मांग रहा था

फिर भी, हमसे सौदे की पेशकश करने वाले इस मित्र-सौदागर से सौदा करने के

बजाय (यानी हाँ या ना करने के बजाय ) हम उससे कह रहे थे

पहले कुछ आँसू जतलाइए और फिर बात होगी

सामने का पक्ष भारत को दुनिया की महान शक्ति कह कर संबोधित कर रहा था

(दिल से हो या मतलब से) और हम एक लाचार की तरह

उससे सहानुभूति की मांग कर रहे थे

क्या यह सब किसी महान शक्ति का परिचायक है?

...................................................................... अरुण

Monday, November 8, 2010

स्मृति को रोग विस्मृति का

बीते क्षणों, दिनों और वर्षों की गठडी

स्मृति के रूप में

बन गई एक सजीव पुतला

हर नूतन क्षण, दिन और वर्ष को

पुरातन बनाती

हर नए जागे को

पुराने में सुलाती और

सोये हुए को ही मौत के पूर्ण विराम तक

ले जाती

लहर को कभी भी सागर न बनने देती

किरण में न सूर्य को उभरने देती

स्मृति की इस गठडी को विस्मरण हुआ

सारे समस्त सकल अस्तित्व का

अपने ही अस्तित्व में डूब जाने के कारण

........................................... अरुण


Sunday, November 7, 2010

दृष्टिवानो को चुनना नही पडता

दृष्टि यदि साफ हो और

सामने फैला प्रकाश हो

तो रास्ता चुनना नही पडता

कदम सही रास्ते पर पड़ते हैं

अपने आप

कोई निर्णय लेना नही पडता

न ही गलती से बचने की

किसी जिम्मेदारी का बोझ ढोना पडता है

ये सारी बातें कि

क्या सही, क्या गलत,

कौन सा अपना कौन सा पराया

केवल दृष्टिविहीनों के लिए हैं

दृष्टिवानो के लिए नही

...................................... अरुण



Saturday, November 6, 2010

यात्रा नही केवल यातायात

जीवन की यात्रा अजीब है

यहाँ आदमी अपनी ही जगह खड़ा है

और रास्ता पीछे की तरफ ढल रहा है

आदमी को लगता है कि

उसने एक लंबी दूरी पार कर ली

हिसाब बताता है कि कदम अभी

वहीं के वहीँ खड़े है

यह यात्रा नही केवल

यातायात है

........................... अरुण

Friday, November 5, 2010

बेहोश-होश

नींद में गाड़ी चलाना जो उसे आता है

बिन टकराए रास्तों से गुजर जाता है

-बात ट्रक चालक की हो रही है

कई बार ऐसा होता है रात को जागकर

गाड़ी चलाते चलाते

भोर में अचानक झपकी

लग जाती है

इसी झपकी में ट्रक-चालक मीलों तक

बिना कहीं टकराए ट्रक को हांककर ले जाता है

ऐसी अर्ध-निद्रावस्था में भी शरीर बिना त्रुटि काम करता है

कहीं, इसी तरह के बेहोश-होश में तो

हम सब नही जी रहे ?

यानी Not living, just managing the life

पूर्ण होश ही जागरण है

सच्चे प्रकाश का आगमन है

.................................................. अरुण



Thursday, November 4, 2010

एक सम्यक दीपक जल उठे

क्या ही अच्छा हो कि

एक ऐसा सम्यक दीपक जल उठे

सभी के जीवन में

जो अँधेरा भी मिटाए और

उजाले की चकाचौंध भी

कष्ट से छुटकारा दे और

सुख पाए हुए को समाधान

.................................... अरुण


Wednesday, November 3, 2010

सब मुश्किल बन जाता

अच्छा है जो

मेरी सांसे

मेरे प्राण, मेरी धड़कने

मुझसे पुछ कर नही चलती

वरना विचारों के तल पर

मै जिस तरह फडफडा रहा हूँ

शरीर के तल पर भी

फडफडाता रहता

उठना बैठना चलना फिरना

सब मुश्किल बन जाता

.......................... अरुण


Tuesday, November 2, 2010

और अब सब अलग अलग

सारी कहानी एक ही जीवंत क्षण में

घट रही है

सूरज है, किरणें हैं, धूप है

गर्मी है, है पसीना

है पसीने की नमी का बदन को छूता स्पर्श

सूरज से लेकर उस स्पर्श और उसके भी

आगे का सारा अनुभव एक ही क्षण में

भीतर के खालीपन को छूता है

पर जैसे ही उस खालीपन में देखनेवाला उभर आता है

सारी बातें बट जाती हैं

सूरज अलग, किरणे अलग, धूप भी कहीं दूर अलग

और पसीने का अनुभव भी अलग ही अलग

पहले एक का एक और अब

सब अलग अलग

....................................... अरुण



Monday, November 1, 2010

विचार बहुत शरारती हैं

विचार बहुत शरारती हैं

आदमी में बोध या जागरण का

भ्रम जगाते हैं

अपनी नकली दुनिया में ही

आदमी को उलझाये हुए,

उसमें मुक्ति का आकर्षण पैदा करतें हैं

फिर विचारों के रसायन से बना

यह मन

मन ही मन मुक्ति ढूँढने लगता है

मुक्ति तो पाता नही

मुक्ति की लालसा में

उलझे हुए आदमी को

कई बाबाओं, ग्रंथों, क्रियाकलापों

और उपायों तंत्र मंत्र आदि की

दुनिया में भटकाता है

........................................... अरुण



Saturday, October 30, 2010

मानुष ना हम जन्म से......

अनुवांशिकता और जन्मोपरांत का लालन पोषण

दोनों के मिलन से बना रसायन

निर्धारित करता है कि

पृथ्वी पर आए प्राणी को

मनुष्य कहा जाए या लोमड़ी या कुछ और

मनुष्य के पिल्ले को जंगल में उठाकर ले गई लोमड़ी के यहाँ पला बढ़ा

वह पिल्ला लोमड़ी की तरह ही आचरण करने लगा-

यह सत्य कथा प्रायः सब को ही पता है

निष्कर्ष यह कि हम जन्म से मनुष्य नही है

जैसा और जहाँ लालन पोषण हुआ वैसे ही हम ढले

-----

मानुष ना हम जन्म से मानुष एक विकास

जिस प्राणी का पालना उसका मुख में ग्रास

............................................................... अरुण

Friday, October 29, 2010

जो जैसा है वैसा ही देखना

राह चलता यात्री जो दृश्य जैसा है

वैसा ही देखे तो उसे नदी नदी जैसी, पर्वत पर्वत जैसा,

चन्द्र- चंद्र की तरह और सूर्य में-

सूर्य ही दिखाई देगा

परन्तु यदि दृश्य पर

पूर्वानुभवों, पूर्व-कल्पनाओं और

पूर्व-धारणाओं का साया चढाकर

यात्रा शुरू हो तो शायद

नदी लुभावनी परन्तु पर्वत डरावना लगे

चंद्र में प्रेमी की याद तो सूर्य में

आग का भय छुपा दिख जाए

सारी सीधी सरल यात्रा

भावनाओं और प्रतिक्रियाओं से बोझिल बन जाए

................................................................ अरुण