Tuesday, February 16, 2010

आज के रूहानी शेर

जुबां से बयाने सच, मुमकिन मगर
सच पकड़ना, जुबां के बस में नही
.........................
शक उठाने औ उसे दूर किये जाने पर
बात तह तक समझ में आती है
........................
पल पल जिए, सच्चाई अपनी
नजारा- ए- वक्त, बदलता रहता है
.......................
जमीं से उठ्ठी भाप के दरिया सी शख्सियत
कैसे जमीं को थामे जो गहरी हकीकत
................................................ अरुण

Monday, February 15, 2010

जीवनगत एक गज़ल

सभी कामनाएँ सफल हो गयीं पर
नही तृप्त होती मनस प्यास पूरी

सारे सवालात जीवंत मन के
जबाबों से उनकी नही कोई दूरी

किसी भी शिला से निकालो निरर्थक
बचे शिल्पसा एक सार्थक जरूरी

व्यक्तित्व की तब निद्रा विखंडित
अचानक सजगता, करे वार भारी

कभी शेर में ढल , कभी मुक्त कविता
मनन चिन्तना की, बहे धार सारी
................................................ अरुण

Sunday, February 14, 2010

आज के ताजे शेर

जो भी होता ठीक ही है इस जहाँ में
अच्छा बुरा तो आदमी का इक हिसाब
.................................
जेहनी कोशिशें जेहन से पार जाने की
साहिल पे खड़े दरिया में तैरने जैसा
......................
अँधेरा देख लेना, मुकम्मल देख लेना एक ही पल में
इसी को जागने की इंतिहा कहते है
............................................................. अरुण

Saturday, February 13, 2010

आज के शेर

सीखकर जिंदगी की राह पे बढ़नेवाले
हर कदम राह छोड़ नक्शों पे चलतें है
....................................
बहती धारा है धरम कुदरते जीवन का बहाव
पूजे जाते जो धरम, ठहरे हुए पानी हैं
.................................................. अरुण

Friday, February 12, 2010

आज के नये शेर

दिमागी खेल हुआ करती दुनियादारी
कुदरती जिंदगी तो दिल को समझ आती है
................
दौड़ते जिस्म ने जानी जो लहू की गर्मी
किसी पोथी में समझाई नही जा सकती
.................
हिन्दू हो या मुसल्मा या कोई धरम
ये तो चोलें हैं, इनके परे है सच्चाई
..............................
न चलना है न जाना है न पहुँचना है कहीं
जहाँ पे खड़े हैं, वहीँ पे लौट आना है
.................................................... अरुण
इस ब्लॉग पर ठीक एक साल पहले लिखना शुरू किया.
लगातार लिख रहा हूँ. पाठकों का आभारी हूँ
----- अरुण खाडिलकर

Thursday, February 11, 2010

मिले वैसी ही जिंदगी तो .......

जिसने कोई न सुनी और पढ़ी ज्ञान की बात
क्या कभी ज्ञान को उपलब्ध नही हो सकता ?
....................
पूरी कुदरत की रूह जिस तरह से जिन्दा है
मिले वैसी ही जिंदगी तो कितना अच्छा हो
...........................
चेहरे सत्पुरुषों के आइनों से कम नहीं
उनमें दिखती है असल जो भी है सूरत अपनी
.......................
तोड़कर फूल पिरोकर जो बनाते माला
फूल से बच्चे, मरे जाते अदब के खातिर
.......................
जिसने दिन ढलते ही आँखों को मूँद रखा हो
सुबह हो गई हो उसको पता कैसे हो
................................................ अरुण

कुछ शेर

जिसने कोई न सुनी और पढ़ी ज्ञान की बात
क्या कभी ज्ञान को उपलब्ध नही हो सकता ?
....................
पूरी कुदरत की रूह जिस तरह से जिन्दा है
मिले वैसी ही जिंदगी तो कितना अच्छा हो
...........................
चेहरे सत्पुरुषों के आइनों से कम नहीं
उनमें दिखती है असल जो भी है सूरत अपनी
.......................
तोड़कर फूल पिरोकर जो बनाते माला
फूल से बच्चे, मरे जाते अदब के खातिर
.......................
जिसने दिन ढलते ही आँखों को मूँद रखा हो
सुबह हो गई हो उसको पता कैसे हो
................................................ अरुण

Wednesday, February 10, 2010

कुछ शेर

बस मेरे पास रहो साथ तेरा काफी है
दिल को देते रहो माहोल, बदल जाने को
.............................
महफिल में पांव रखते नज़रों में आ बसी वो
दिखता नही जहाँ में महफिल को छोड़ कुछ भी
..........................
हम नए थे के रिवायत ने लपककर पकड़ा
हर नया दिन नयी साँस से महरूम हुआ
..................................................... अरुण

Tuesday, February 9, 2010

दो शेर

ख़ुशी की खोज में निकले हुए नाकाम हुए
थक के बैठे ही थे के बादल ख़ुशी के आ बरसे
.......................
है जान लिया मैंने अपना जो पागलपन
फिर भी न उसे देखा इस दिल ने अच्छे से
....................................................... अरुण

Monday, February 8, 2010

राजनैतिक बवालबाजी- मुंबई में

तुम जनता की आवाज हो, यह कहते हो
फिर प्रोपर्टी जनता की जलाते क्यों हो
.........................................
दहशत की है जुबान, हिंसा का है फरमान
और कहतें हो, ये डेमोक्रेटिक हक़ है हमारा
.............................
तुम्हे मालूम है के जनता कुछ कहती नही
उसकी नुमाईंदगी के नाम पर बवाल करते हो
.....................................
माइकल चलता है फिर छठ पूजा क्यों नही
छठ पूजा से भी फंड रेजिंग हो सकती है
........................
उसके कहने का तरीका बवालिया है
मकसद सही न हो पर कहने में कुछ दम तो है
.......................................................... अरुण

Saturday, February 6, 2010

तिकड़मे राजनीति

तुम जनता की आवाज हो, यह कहते हो
फिर प्रोपर्टी जनता की जलाते क्यों हो
.........................................
दहशत की है जुबान, हिंसा का है फरमान
और कहतें हैं, हमारा हक़ है ये
.............................
तुम्हे मालूम है के जनता कुछ कहती नही
उसकी नुमाईंदगी जताके बवाल करते हो
.....................................................अरुण

प्रपंच मन में है, ध्यान में नही

सिनेमा हाल में मूव्ही चल रही है। बालकनी के ऊपर कहीं एक झरोखा है जहाँ से प्रकाश का फोकस सामने के परदे पर गिरते ही चित्र चल पड़ता है, हिलती डोलती प्रतिमाओं को सजीव बना देता है। हमें इन चल- चित्रों में कोई स्टोरी दिख रही है। हम उस स्टोरी में रमें हुए हैं।
परन्तु जैसे ही ध्यान, झरोखे से आते प्रकाश के फोकस पर स्थिर हुआ, सारी स्टोरी खो गई। केवल प्रकाश ही प्रकाश , न कोई स्टोरी है, न कोई चरित्र है, न घटना, न वेदना, न खुशी, कुछ भी नही। ये सारा प्रपंच परदे पर है, प्रकाश में नही। संसार रुपी इस खेल में भी, प्रपंच मन में है, ध्यान में नही।
.................................................................................. अरुण

Friday, February 5, 2010

कुछ शेर ताजा ताजा

सरहदें हैं जबतलक महफूज दिल में
इरादा जंग का मिटता नही
.........
तशनालब को ही है तलाश उस पानी की
बाकी तो बस जाम लिए बैठे हैं
...................
झूठ से भागोगे तो बात बिगड़ जाएगी
झूठ को जाने बिना सच को देखा किसने
.................
जंगल में पेड़ तनहा चुपचाप खड़ा
हो तनहा तो इन्सान बडबडाता है
................................................ अरुण

Thursday, February 4, 2010

प्रगाढ़ होश

प्रगाढ़ होश आते ही गहराया
और छाया
शुरू से शुरू तक
होश गंगोत्री के स्रोत पर खड़ा ही रहा
अंत तक बिना टूटे ..........
और बिना टूटे ही गिर पड़ा
गहरी खाई में गंगा के प्रपात बनकर
आगे की ओर बहता हुआ विशाल धारा बना
घाटों, गावों और शहरों को छूता
उनसे सुसंवाद साधता हुआ
गुजरा एक तरंगमयी बहाव बन कर
मीलों का अंतर काटता हुआ
सागर की गोद में आ गिरा
और डूब गया अथाह में ......
अचानक एक कोमल झटके ने उसे
ध्यान दिलाया कि अभी भी वह खड़ा है
गंगोत्री के स्रोत पर
............................ अरुण

आज के दोहे

निर्बाधित ऊर्जा रमें परमशक्ति की गोद
मन की बाधा रोक दे, परमशक्ति का बोध
.........................
सपने के सब यार दें, निद्रा में ही साथ
उनसे कैसी दोस्ती, दिवस गया जब जाग
.........................
सपना देखे आदमी वास्तव को अनदेख
माया उभरे सत्य को गलत तरह से देख
............................................... अरुण

Wednesday, February 3, 2010

आज के दोहे

बादल पे चलना नही, गर जाना घन-पार
मन-प्रयास सब व्यर्थ हैं, गर जाना मन-पार
..................................
सूरज देता रोशनी, आँख चलाती राह
आँखे सूरज पे टिकीं तो रुक जाती है राह
....................................
संसारी को मिल गये, साधन मन के पास
साधन ना वे काम के, जब निर्मन का वास
...................................................... अरुण

Tuesday, February 2, 2010

आज के दोहे

दुख का काटा ना चुभे, सुख ना देत सुगंध
देखो गर नजदीक से, दोनों मन के बन्ध
............................
जिसने देखा साच को वो न धरे विश्वास
जिसके मन संदेह है, विश्वासों का दास
.............................
पेटी में का चीज है खोले से दिख जात
बिन खोले ही मान ले, उसकी मूरख जात
........................................................अरुण

Monday, February 1, 2010

तीन दोहे

दुनिया भर के ज्ञान को, माथे में धर लेत
माथे का सत देखते, सत पे माथा टेक
..............
सभी पुजारी सत्य के मिलकर संघ बनाय
पूजा होती सत्य की लेकर झूठ उपाय
...................
अगला कोई न जानता, अगले छन काय होय
यह सच जिसमे रम गया, बिना किसी डर सोय
.............................................................. अरुण