Tuesday, November 30, 2010

जिंदगी की लम्बाई......

जिंदगी की लम्बाई

चौड़ाई, ऊंचाई और गहराई

क्षण या साँस की

लम्बाई चौड़ाई, ऊंचाई और

गहराई से अधिक नही

यह तो आदमी की याददास्त का आंगन है

जिसमें जिंदगी

दिन, सप्ताह, वर्ष, दशक, शतक

और युगों के पैमाने में फैलती दिखती है

................................................, अरुण



Sunday, November 21, 2010

मन एक भूमिका अनेक

रंगमंच पर एक ही पात्र

एक साथ

अनेक भूमिकाएं इस सटीक ढंग से निभाता है कि

लगता है - कई पात्र मिलकर

विभिन्न भूमिकाएं

कर रहें है

दर्शक भी इतने रम जातें हैं कि

उन्हें प्रतीत होता है कि मानो

रंगमंच पर कई पात्र साकार हो चुके है

मन भी इसीतरह का

एक पात्र और बहुभूमिका वाला नाटक है

मन के इस नाटक में

अभिनेता-दर्शक

(दोनों एक ही यानी मन )

इस सच्चाई से बेखबर हैं कि

वही एक (स्वयं) अनेक भूमिकाएं

निभा रहा है

....................................... अरुण

अब कुछ दिन विराम

Saturday, November 20, 2010

नैतिक मूल्यों में गिरावट

ऐसी गिरावट के एक नमुने के रूप में,

किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा किए गये कुछ ऐसे बयान

आजकल भारत में पढने-सुनने को मिलते हैं

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हमारी पार्टी आपके पार्टी जैसी

भ्रष्ट नही है. यह ईमानदार लोगों की पार्टी है

हमारे यहाँ अगर कोई मिनिस्टर अपने रिश्तेदारों में

सार्वजनिक जमीन गलती से बाँट भी देता है

तो यह बात सार्वजिक तौर पर उजागर होने पर,

उनसे वापस लेकर जनता को लौटा भी देता है.

आपके पार्टी के मिनिस्टर जैसा नही कि खाए और डकार जाए

........................................... अरुण

Friday, November 19, 2010

दृष्टिमय बोध

संसार की हर वस्तु, तथ्य, दृश्य, या प्रक्रिया

का वर्णन किया जा सकता है

परन्तु हर वर्णन के बाद भी

कुछ अवर्णित (unexplained) शेष बचता ही है

और इसीलिए कहते हैं कि

वर्णन हमेशा अधूरा है

अतः जरूरत है इस अधूरेपन को भी देख सके

उस दृष्टि की,

केवल वर्णन की नही

........

वर्णन करना काम है विज्ञान का

अधूरे के साथ साथ पूरे को

देख सकना काम है

दृष्टिमय बोध का

इस दृष्टिमय बोध के अभाव के कारण ही

सदियों से सच समझाना जारी है और

कभी भी पूरा नही हो पा रहा

......................................... अरुण

Thursday, November 18, 2010

दुहराता वही शेर

अपनी ही हर खुशी से परेशां हैं सारे लोग

किसको खुशी कहें , हर दिल में हो तलाश

अँधेरा काट लेगा, डर के न भागो यारों

इसी जगह पे छुपा है, रौशनी का चिराग

सवाल उठने से पहले जबाब हाजिर हो

ऐसे माहोल में नयी सोच नही बन पाती

जहाँ खिला है फूल खुश है जिंदगी पाकर

पिरोके माला में मौत उसे मत देना

महलों को गरीबी में सादगी दिखती

गरीबी में ख्वाब उठते हैं महलों के

अँधेरा–ओ-उजाला, बेखुदी-ओ-होशियारी

दोनों ने नही देखा एक-दूजे को

................................................. अरुण


Wednesday, November 17, 2010

आज का तीसरा शेर

अँधेरा–ओ-उजाला, बेखुदी-ओ-होशियारी

लफ्ज दोनों साथ, न ताल्लुक बीच में

................................................. अरुण

आज के दो शेर

जहाँ खिला है वहाँ खुश है जिंदगी पाकर

पिरोके माला में फूल, उसे मौत न दे

..............

अच्छा है, गर महलों को गरीबी में सादगी दिखती

और दिखते गरीबों को महलों के ख्वाब

................................................. अरुण

Tuesday, November 16, 2010

आज का शेर

सवाल उठने से पहले जबाब हाजिर हो

ऐसा माहोल गुलामों के लिए अच्छा है

................................................. अरुण

Monday, November 15, 2010

एक शेर

अँधेरा काट लेगा, डर है ?- न भागो यारों

इसी जगह पे छुपा है, रौशनी का चिराग

................................................. अरुण

Sunday, November 14, 2010

एक शेर

अपनी ही हर खुशी से परेशां हैं सारे लोग

किसको खुशी कहें , हर दिल में हो तलाश

.................................................. अरुण


Saturday, November 13, 2010

सारा अस्तित्व एक का एक

सारा अस्तित्व एक का एक है

कहीं कोई भेद नही, कोई टुकड़ा नही

मेरा अस्तित्व अलग और तेरा अलग

- ऐसा भी नही

कुदरत स्वयं को जिस दृष्टि से देखती है

उसी दृष्टि से देखने पर सारा अस्तित्व क्या है

यह समझ आता है

.........

टुकड़ों में जो दिखे कैसा वजूद?

मेरा वजूद, तेरा वजूद, उसका वजूद?

कुदरत को जिस तरह से दिखे, वैसा दिखे

वही सच्चा है- तेरा और मेरा, सबका वजूद

................................................ अरुण


Friday, November 12, 2010

एक निर्बोझ जीवन-प्रवाह

ठीक से देखना बने तो

दिखे कि बाहर,

पेड की छाया बनती है,

बनायीं नही जाती

पेड उगता है,

उगाया नही जाता

धरती चलती है,

चलाई नही जाती

ऐसे ही भीतर,

साँस चलती है चलाई नही जाती

धडकन चलती है चलाई नही जाती

विचार भी चलते हैं, चलाए नही जाते

चलानेवाले के बिना ही सबकुछ चल रहा है

चलानेवाला है ही नही

और सब हो रहा है

इस सच्चाई से जुडी जीवन्तता

ही है एक निर्बोझ जीवन-प्रवाह

..................................... अरुण


Thursday, November 11, 2010

आनंद जिंदगी के बहाव में

किनारे खड़ा आदमी

अगर बहती नदी के बहाव को देखकर

प्रसन्न है तो

मतलब

प्रसन्नता बहाव के कारण है

केवल जल के कारण नही

ऐसे आदमी को संग्रहित जल,

बहाव का आनंद नही दे सकता

जिंदगी का आनंद भी उसके बहाव में है

अनुभवों के संग्रह में नही

......................................... अरुण

Wednesday, November 10, 2010

कुछ अजीबसी अटपटी अभिव्यक्ति

करने वाला हो तो वह कुछ करेगा ही

कुछ नही करना भी

करने के बराबर ही है

करते करते जब उसने खुद को

गहराई और व्यापकता से देखना शुरू किया

वह खुद देखना बन गया

फिर कुछ करने का सवाल ही कहाँ?

देखना ही- देखने को- देखता रहा

करनेवाला अपने देखने के साथ

दिखता रहा

पहले था केवल करना करना करना

अब है केवल देखना देखना देखना

................................................... अरुण

Tuesday, November 9, 2010

क्या यह सब किसी ‘महान शक्ति’ का परिचायक है?

भारत के सही प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाला

समस्त भारतीय मीडिया

गये दो दिन केवल इस बात को लेकर परेशान था कि

बराक ओबामा साहब पाकिस्तान को हमारे समर्थन में

कुछ सुनाते क्यों नही ?- पाकिस्तान के नाम पर चुप्पी क्यों साधे हुए है?

गहरे में सोचा जाए तो कहीं न कहीं

हमारे भीतर से मानसिक गरीबी और लाचारी की

गंध आ रही थी

सामने का पक्ष (अमेरिका) खुले तौर पर

बिना किसी ढकोसले के, समान धरातल पर खड़े होकर,

हमारा आर्थिक सहयोग मांग रहा था

फिर भी, हमसे सौदे की पेशकश करने वाले इस मित्र-सौदागर से सौदा करने के

बजाय (यानी हाँ या ना करने के बजाय ) हम उससे कह रहे थे

पहले कुछ आँसू जतलाइए और फिर बात होगी

सामने का पक्ष भारत को दुनिया की महान शक्ति कह कर संबोधित कर रहा था

(दिल से हो या मतलब से) और हम एक लाचार की तरह

उससे सहानुभूति की मांग कर रहे थे

क्या यह सब किसी महान शक्ति का परिचायक है?

...................................................................... अरुण

Monday, November 8, 2010

स्मृति को रोग विस्मृति का

बीते क्षणों, दिनों और वर्षों की गठडी

स्मृति के रूप में

बन गई एक सजीव पुतला

हर नूतन क्षण, दिन और वर्ष को

पुरातन बनाती

हर नए जागे को

पुराने में सुलाती और

सोये हुए को ही मौत के पूर्ण विराम तक

ले जाती

लहर को कभी भी सागर न बनने देती

किरण में न सूर्य को उभरने देती

स्मृति की इस गठडी को विस्मरण हुआ

सारे समस्त सकल अस्तित्व का

अपने ही अस्तित्व में डूब जाने के कारण

........................................... अरुण


Sunday, November 7, 2010

दृष्टिवानो को चुनना नही पडता

दृष्टि यदि साफ हो और

सामने फैला प्रकाश हो

तो रास्ता चुनना नही पडता

कदम सही रास्ते पर पड़ते हैं

अपने आप

कोई निर्णय लेना नही पडता

न ही गलती से बचने की

किसी जिम्मेदारी का बोझ ढोना पडता है

ये सारी बातें कि

क्या सही, क्या गलत,

कौन सा अपना कौन सा पराया

केवल दृष्टिविहीनों के लिए हैं

दृष्टिवानो के लिए नही

...................................... अरुण



Saturday, November 6, 2010

यात्रा नही केवल यातायात

जीवन की यात्रा अजीब है

यहाँ आदमी अपनी ही जगह खड़ा है

और रास्ता पीछे की तरफ ढल रहा है

आदमी को लगता है कि

उसने एक लंबी दूरी पार कर ली

हिसाब बताता है कि कदम अभी

वहीं के वहीँ खड़े है

यह यात्रा नही केवल

यातायात है

........................... अरुण

Friday, November 5, 2010

बेहोश-होश

नींद में गाड़ी चलाना जो उसे आता है

बिन टकराए रास्तों से गुजर जाता है

-बात ट्रक चालक की हो रही है

कई बार ऐसा होता है रात को जागकर

गाड़ी चलाते चलाते

भोर में अचानक झपकी

लग जाती है

इसी झपकी में ट्रक-चालक मीलों तक

बिना कहीं टकराए ट्रक को हांककर ले जाता है

ऐसी अर्ध-निद्रावस्था में भी शरीर बिना त्रुटि काम करता है

कहीं, इसी तरह के बेहोश-होश में तो

हम सब नही जी रहे ?

यानी Not living, just managing the life

पूर्ण होश ही जागरण है

सच्चे प्रकाश का आगमन है

.................................................. अरुण



Thursday, November 4, 2010

एक सम्यक दीपक जल उठे

क्या ही अच्छा हो कि

एक ऐसा सम्यक दीपक जल उठे

सभी के जीवन में

जो अँधेरा भी मिटाए और

उजाले की चकाचौंध भी

कष्ट से छुटकारा दे और

सुख पाए हुए को समाधान

.................................... अरुण


Wednesday, November 3, 2010

सब मुश्किल बन जाता

अच्छा है जो

मेरी सांसे

मेरे प्राण, मेरी धड़कने

मुझसे पुछ कर नही चलती

वरना विचारों के तल पर

मै जिस तरह फडफडा रहा हूँ

शरीर के तल पर भी

फडफडाता रहता

उठना बैठना चलना फिरना

सब मुश्किल बन जाता

.......................... अरुण


Tuesday, November 2, 2010

और अब सब अलग अलग

सारी कहानी एक ही जीवंत क्षण में

घट रही है

सूरज है, किरणें हैं, धूप है

गर्मी है, है पसीना

है पसीने की नमी का बदन को छूता स्पर्श

सूरज से लेकर उस स्पर्श और उसके भी

आगे का सारा अनुभव एक ही क्षण में

भीतर के खालीपन को छूता है

पर जैसे ही उस खालीपन में देखनेवाला उभर आता है

सारी बातें बट जाती हैं

सूरज अलग, किरणे अलग, धूप भी कहीं दूर अलग

और पसीने का अनुभव भी अलग ही अलग

पहले एक का एक और अब

सब अलग अलग

....................................... अरुण



Monday, November 1, 2010

विचार बहुत शरारती हैं

विचार बहुत शरारती हैं

आदमी में बोध या जागरण का

भ्रम जगाते हैं

अपनी नकली दुनिया में ही

आदमी को उलझाये हुए,

उसमें मुक्ति का आकर्षण पैदा करतें हैं

फिर विचारों के रसायन से बना

यह मन

मन ही मन मुक्ति ढूँढने लगता है

मुक्ति तो पाता नही

मुक्ति की लालसा में

उलझे हुए आदमी को

कई बाबाओं, ग्रंथों, क्रियाकलापों

और उपायों तंत्र मंत्र आदि की

दुनिया में भटकाता है

........................................... अरुण