Saturday, April 17, 2010

मन की तरंग

परिक्षा मन की
जो वस्तु आग के संपर्क में हो उसीकी
ज्वलनशीलता या तापधारकता को पहचाना जा सकता है
ठीक इसीतरह
समाज संपर्क में रहकर ही हम जान सकते हैं कि
हम धार्मिक हैं कि प्रापंचिक
'पानी' में डूबा क्या जाने कि वह
ज्वलनशील (प्रापंचिक) है या नही
भ्रमवश वह स्वयं को धार्मिक हुआ समझ सकता है
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Friday, April 16, 2010

मन की तरंग

अन्दर की आँखें
बाहरी आँखें खुलते ही देखती हैं
यहाँ से वहाँ
मुझसे तुझ को
इधर से उधर
नीचे से ऊपर
अन्दर की आँखें देख लेती हैं अचानक
सबकुछ एक ही दृष्टि में एक ही पल में
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Thursday, April 15, 2010

मन की तरंग

रिश्ता - अभौतिक समस्या और उसके समाधान के बीच
अभौतिक समस्या और उसके समाधान या
उपाय के बीच कोई भी अंतर नही
न समय का और न ही अवकाश का
समय गवांकर उपाय जान भी लिया जाए तो
कोई उपयोग नही क्योंकि
समय के बीतते समस्या भी अपना रूप बदल देती है
समस्या की घनीभूत समझ ही उसका समाधान है
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Wednesday, April 14, 2010

मन की तरंग

अखंड दृष्टि बनाम विश्लेषण
किसी भी वस्तु, दृश्य या फेनोमेनों को आदमी की
या तो बुद्धि देखे या उसकी समग्र दृष्टि
वह उसे टुकड़ों में बाँट कर देखे या पूर्ण की पूर्ण
टुकड़ों में बाँट कर और फिर उन टुकड़ों के ज्ञान को जोड़कर देखने से
पूर्ण को नही जाना जा सकता
पूर्ण को तभी समझा जा सकता है जब
समग्र दृष्टि से समग्र को ही देखा जाए
टुकड़ों में देखना या विश्लेषण बुद्धि की जरूरत है, जो
अध्यात्मिक समझ के मार्ग में एक बड़ी अड़चन है
विश्लेषण अंधे का बौद्धिक आचरण है जो
उसे वैज्ञानिक तथ्यों से मिलवाता है जब कि
अखंड दर्शन बुद्ध का परमज्ञान है जो उसे
सत्य में मिला देता है
................................................... अरुण

Tuesday, April 13, 2010

मन की तरंग

शोषण
दोषी कौन -शोषक या शोषित ?
दोनों ही की अपनी अपनी मजबूरीयाँ हैं
शोषित शिकार है अपनी भौतिक या/तथा मानसिक कमजोरी का
शोषक मजबूर है शोषण करने की अपनी स्वाभाविक प्रवृति के कारण
शोषित अभाव से पीड़ित है तो शोषक दुर्भाव से
दोनों ही आँखें मूंदे हुए हैं , अजग्रित हैं
होश में जीने वाला न तो शोषण करेगा और न ही
किसी शोषण को सहने को राजी होगा

शोषक या शोषित की वकालत करनेवाले प्राणियों के बारें में क्या कहें ?
वे तो समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखतें हुए
अपना उल्लू सीधा करते हैं
उनकी तो बात ही कुछ निराली है
वे भी शोषक हैं, शोषक एवं शोषित, दोनों ही के
........................................................ अरुण

Monday, April 12, 2010

मन की तरंग

एक गज़ल
बचपन से पाप पुण्य की घुट्टी पिलाई जाती
अपने ही दिल में बंदा गुनहगार बन गया

इच्छाएं कुदरती को दबाने की नसीहत
सारी बुराइयों का तलबगार बन गया

हर आदमी में दहशत भगवान की भरी
मजहब का हर सिपाही निगह्गार बन गया

किस्से कहानियों पे रख्खो कहे भरोसा
सच्चाई का जो दुश्मन, असरदार बन गया

कोई न मोहमाया भटका सके उसे
लम्हे की हर अदा का ख़बरदार बन गया
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.......................... अरुण

Saturday, April 10, 2010

मन की तरंग

जो अधधरी सो अधछूटी
जो चीज पकड़ी ही न गई हो
वह छूटेगी कैसे?
इसी तरह जो चीज पूरी तरह से पकड़ी न गई हो या
अधूरी पकड़ी गई हो उसे पूरी तरह से छोड़ने का सवाल ही नही
बात आदतों क़ी हो रही है
जो चीजे पूरी समझ से नही क़ी जाती वह आदत बन चिपक जाती हैं ,
अपनी बेहोशी में ( अध्यान अवस्था में )
बार बार क़ी गई कृति या विचार देह-मन क़ी आदत बन जाती है
आदत क़ी आंखोमें ध्यान गड़ाकर देखने वाला ही उसकी बाध्यता से
छुटकारा पा सकता है
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Friday, April 9, 2010

मन की तरंग

भीतर शब्दों क़ी बस्ती
शब्दों का काम है भीतर आना
और अर्थ सुझाकर लौट जाना
परन्तु वे अर्थ देकर लौटते नही
दिमाग में अर्थ को समेटकर बैठ जाते हैं
अर्थ को विचरने के लिये जगह ही नही छोड़ते
धीरे धीरे इतनी घनी बन जाती है शब्दों की बस्ती कि
समझ को साँस लेने भर क़ी जगह नही छूटती -
समझ या तो पैदा ही नही होती या पैदा भी हो तो
शब्दों के अतिक्रमण के कारण घुंटकर मर जाती है
...................................................................... अरुण

Thursday, April 8, 2010

मन की तरंग

जमीं परछाईयाँ
बुद्ध उभरतें हैं, ठहरतें हैं, चलें जातें हैं
उनकी परछाईयों को जमा देतें हैं
उनके अपने
और उन्ही जमी परछाईयों को समझ लेते हैं
धर्म अपना
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अक्षरभरा चित्त
कोरे कागज पर लिखा जानेवाला हरेक अक्षर
कागज के कोरेपन को भ्रष्ट करता है
परन्तु कागज और अक्षर के बीच के खालीपन को
जो देखने की कला जानता हैं
वह स्वयं कोरा है, निर्मल है, निर्मन है
................................................... अरुण

Wednesday, April 7, 2010

मन की तरंग

आवाज के भीतर ख़ामोशी का एहसास
इस आवाजभरी जिंदगी में
आवाज छुपा रखती है एक ख़ामोशी भीतर
जिसने आवाज सुनी- ठीक ठीक
उसे ख़ामोशी भी दिखी - ठीक ठीक
परन्तु ख़ामोशी के केवल सपने देखने वाले
न तो आवाज सुनतें हैं - ठीक ठीक
और न ही ख़ामोशी को देख पातें हैं - ठीक ठीक
........................................................... अरुण

Tuesday, April 6, 2010

मन की तरंग

'मेरा मेरा' ही तो चिंता की असली जड़
दूर कहीं आग दिखी
ज्वालायें धधक रहीं
इस अजीब दृश्य से
साक्षी था आकर्षित
और तभी कानों में स्वर गूंजा ...
दृश्य नही घर तेरा, तेरा घर जल रहा
बस तभी -
दृश्य का चेहरा ही बदल गया
दौड़ पड़ा वह साक्षी
चिंता से विकल हुआ
खुद से ही पूछ रहा
कैसे बच पाए घर
मेरा घर, मेरा घर
'मेरा मेरा' ही तो चिंता की असली जड़
................................................. अरुण

Monday, April 5, 2010

मन की तरंग

परिस्थिति और आदमी
ऐसा कहा जाता है कि
परिस्थिति बदलती है आदमी को और
आदमी परिस्थिति को --
सवाल यह है कि
क्या परिस्थिति और आदमी के बीच
कोई भिन्नत्व है भी ?
आदमी परिस्थिति का परिचय है
............................................... अरुण

Sunday, April 4, 2010

मन क़ी तरंग

सच्चाई
सच्चाई तो सच्चाई है
अलग आदमी, समुदाय या धर्म के लिए
अलग कैसे हो सकती है ?
हिन्दू की कोई और... क्रिश्चन की कोई और,
नही! -
ये कोई कहानी नही कि हरेक जुबां पे बदलती जाए
उसके आज और कल में फर्क आए
अलग अलग जगह पे अलग अलग सुनी जाए
ये सच्चाई है
अनाम, अनिजी,
बिना किसी व्यक्तित्व या भिन्नत्व के जीने वाली
यहाँ जैसी है वैसी ही वहाँ
इसके बाबत जैसी है वैसी ही उसके बाबत
ये सच्चाई अगर सब ने देख ली होती तो शायद
दुनिया में अलग अलग धर्म न होते, मान्यताएं न होती
आदमी झूठ का गुलाम न होता
वह अपनी साँस विश्वास के बल पर नही तो
एहसास के साथ लेता
अस्तित्व ही अस्तित्व को समझ सकता है
कोई आस्तिकता या नास्तिकता नही
.............................................................. अरुण

Saturday, April 3, 2010

मन की तरंग

भीड़ हूँ मै ......
भीड़ हूँ मै, जानता हूँ -भीड़ होना
खो चुका पूरी तरह से खुद का होना
बन चुकी है खुद की मेरी ऐसी सूरत
जो हो रिश्तों का हो पेचीदा सा जाला
जिसने अपनी असली काया को छुपाया
भय दबाया अपने भीतर
गिर न जाऊं अब कहीं मै भीड़ की गहरी पकड़ से
भीड़ के इतिहास से, अनुराग से, अनुबंध से
.......................................................... अरुण

Friday, April 2, 2010

मन की तरंग

अहम् ब्रह्मास्मि
पीपल का यह एक वृक्ष
हवा के झोंकों के साथ डोलती हैं शाखाएँ और पत्ते इसके
हर पत्ते से ध्वनि निकलती है
मै हूँ पीपल - मै हूँ पीपल
हर शाखा गूंजकर कह रही है
मै हूँ पीपल - मै हूँ पीपल
परन्तु-
मै - ब्रह्मा वृक्ष का एक पत्ता
कभी न कह पाया
मै हूँ ब्रह्म - मै हूँ ब्रह्म
.................................. अरुण

Thursday, April 1, 2010

मन की तरंग

क्या ईश्वर है ?
ईश्वर के बाबत अज्ञानियों के तीन प्रकार मौजूद हैं
पहले वे जिनके भीतर गहरे में संदेह तो है पर उस संदेह को दबाते हुए
'हम ईश्वर को मानतें हैं'- ऐसा कहतें हैं
दूसरे वे जो कुछ जाने बिना ही 'हम ईश्वर को नही मानते'- ऐसी घोषणा कर
जिम्मेदारी से भाग लेतें हैं
तीसरे वे जो ईमानदारी से स्वीकारतें है कि 'पता नही ईश्वर है भी या नही'
उन ईमानदारों के जीवन में ईश्वर को जानने क़ी कुछ तो संभावना बनती है
ज्ञानी वही है जिसे ईश्वर पर विश्वास नही उसका पूरा एहसास ही है
ऐसा एहसासी ऐसी कोई भाषा नही जानता जिसमें ईश्वर के बाबत
कोई भी संवाद किया जा सके
क्योंकि सभी भाषाएँ अज्ञानियों ने रचीं हैं
......................................................................... अरुण