Wednesday, February 26, 2014

सच्चाई ! तुम छुपी हो कहाँ?



संमंदर की लहरों पे पसरा नजारा
नजर में वही सो न दिखती है धारा
नज़ारों के रिश्ते नज़ारों की दुनिया
छुपी जाए सच्चाई, बचता.. किनारा
-अरुण

Monday, February 24, 2014

एक शेर-

शायद यही वजह है के परेशां है ये दिल
तुम्हे पाने से पहले तुम्हे पा चुका है दिल
- अरुण

Saturday, February 22, 2014

वास्तव एवं यतार्थ

 
कोई भी वस्तु या object प्रकाश लहरों के आड़े आ जाए तो परछाई बन ढल जाता है. ऐसे ही हरेक प्रत्यक्ष अनुभव विगत होते ही मनछाया बन जाता है. मनछाया,परछाई की तरह, वास्तविक तो है पर यतार्थ नही. मन का वास्तव यतार्थ को छू नहीं सकता. यतार्थ मन पर जागते ही मन खो जाता है.

-अरुण

Thursday, February 20, 2014

एक शेर

पता दूसरों का मेरी डायरी में
मेरे घर का मुझको नहीं है पता

- अरुण

Thursday, February 13, 2014

एक शेर -



आँखे गडा रहे हो चेहरे पे क्यों भला
चेहरा हवा हवा है आंखे धुवाँ धुवाँ
-अरुण

Wednesday, February 12, 2014

एक शेर



निकलते आंख से आंसू कभी तेरे कभी मेरे
अलहिदा है नही ये गम, ये तेरा हो के मेरा हो
-अरुण

Tuesday, February 11, 2014

अस्तित्व अखंडित, खंड काल्पनिक

कल्प-भ्रम-माया ही खंड का स्रोत है । सकल जागा चित्त ही है अखंडित, योगमय, भक्तिपूर्ण अस्मृत ज्ञान।

- अरुण

Monday, February 10, 2014

क्या अच्छा है ?



होश खोकर बेहोश हो जाने से अच्छा है
होश में बेहोश हो जाओ
असावधानी में भूल करने से अच्छा है
सावधानी से भूल को जन्मते देखो
-अरुण

Friday, February 7, 2014

आदमी और पल



आदमी को पल पल, पल बनकर जीना है
पर आदमी का हर पल, आदमी बन कर जीता है
-अरुण