Friday, February 25, 2011

झूठ ही झूठ का उपाय है

मन से टूटा आदमी

किसी का आशीर्वाद या

कृपा चाहता है

मन की कमजोरी को

मानसिक बल ही जरूरत है

इसीलिए यह चाहना होती है कि

कोई पास आ कर हमारी पीठ पर

आश्वासन का हाँथ रखे, हमें कहे कि

घबराओ मत सब ठीक होगा

जो चाहो वही मिल जाएगा

अगर ऐसा कहने के लिए कोई सामने न हो

तो आदमी किसी मूरत के चरणों में सर रखकर

या उसके सामने झुककर मन ही मन

उससे यह कहलवा लेता है

मानसिक विपदाएं या अडचने भी

काल्पनिक है और उनसे निपटने के उपाय भी

काल्पनिक

झूठ ही झूठ का उपाय है

सच को किसी उपाय की

जरूरत नही

........................................................... अरुण

Thursday, February 24, 2011

केवल क्रिया, प्रतिक्रिया नही

तालाब के जल में

एक कंकड भी फेंको तो

जल में तरंगे उठती हैं

मन तरल के जल में

इच्छा, प्रेरणा, भावना,

प्रतिक्रिया एवं प्रतिसाद के कंकडों की

वर्षा सतत चलते रहने से

मन तरंगित है, कम्पित है

इस कम्पन को रोकना तब तलक

असंभव है जब तक

दृष्टि में बदलाव के कारण प्रतिक्रिया के

कंकड सजीव ही न हों

दृष्टि में बदलाव यानी

जीवन को इस सकलता और व्यापकता से

देखना बन पाए कि केवल

क्रियाओं का ही वर्षण हो

प्रतिक्रियाओं का नही

................................. अरुण

Monday, February 21, 2011

भगवान सर्वव्याप्त सो निराकार

अगर भगवान कण कण में है

क्षण क्षण में है,

अगर अस्तित्व की हर प्रक्रिया ही

भगवान है

तो फिर उसका अपना क्या रूप और

आकार हो सकता है

निश्चित ही कोई नही

...................................... अरुण

Monday, February 7, 2011

संकट तो है पर संकट, संकट नही लगता

अपने कमरे में शांत बैठे व्यक्ति का ध्यान

कमरे के किसी कोने पर जाते ही अगर

उसे आग लगी दिखाई देती है तो

ऐसे में यही स्वाभाविक है कि

वह तत्काल आग बुझाने के काम में

सक्रीय होता हुआ

पूरा का पूरा ध्यान उस संकट से उबरने में लगा दे

वह ऐसा न सोचेगा कि

चलो

संकट की इस स्थिति से

निपटने के उपायों का अध्ययन करें

किसी गुरु का आश्रय ले लें

इस सम्बन्ध के किसी धर्म से जुड जाएँ

और इसतरह परिवर्तन और सुधार के माध्यम से

इस परिस्थिति को बदल दें

मनुष्य को अपनी मूल गहरी भ्रांतियां दिख तो रही हैं

पर उसे यह बात आग लगने जैसी गंभीर

नही लग रही और

इसीलिए

सदियों से आदमी सुधार का

के मार्ग अपनाए हुए है और

उसकी भ्रांतियां भी

उसके आचरण में बरकरार हैं

............................................ अरुण

Sunday, February 6, 2011

इंसान और कायनात

इंसान चिंतित है

अपने जन्म और मृत्यु को लेकर

मगर सारी कायनात का अस्तित्व बस

जीवन की धारा के

बहते रहने में है

कायनात

एक एक आदमी के जन्म मृत्यु का

हिसाब लगाते नही बैठती

........................................ अरुण

Saturday, February 5, 2011

‘ईश्वर’ का अवतरण

मनुष्य जैसे सामाजिक प्राणी की

मूल समस्या यह है कि

इसके वर्तमान को

इसका भूत निगल जाता है

भूत के ही पेट में

इसकी वर्तमान चेतना

इतनी सन जाती है कि

सारा भूत ही चेतनामय हुआ जान पडता है

यह जान पडने वाली चेतनामयता ही

मनुष्य जीवन का आधार बन जाती है

और मनुष्य को वर्तमान का विस्मरण हो जाता है

वर्तमान का स्मरण ही जीवन में

ईश्वर का अवतरण है

.................................... अरुण

Friday, February 4, 2011

बिना प्यास पानी पीना

जब तक सपना

वास्तविकता ही लग रहा हो

सपने से जागने का विचार उठेगा ही नही

अगर उठता है तो मतलब ऐसा विचार

सपने ने ही तैयार किया

एक कपट मात्र है

जब तक नींद में कोई रस या रूचि बची हो

जागने का विचार न ही उठे तो अच्छा है

जब तक संसार में रस है

तब तक परमार्थ की बातें एक छलावा है

एक ऊपरी उपचार मात्र है

बिना प्यास पानी पीनेवालों जैसा है

.............................................. अरुण

Thursday, February 3, 2011

सच्चाई जानना और देखना

पृथ्वी गोल है इस सच्चाई को

मानव की बुद्धि ने

कभी का जान लिया था

परन्तु इसकी गोलाई को

मानव ने पहली बार तब देखा

जब उसकी आँखे पृथ्वी की कक्षा छोड़

अंतरिक्ष में जा पहुंची

जीवन की वैश्विक सच्चाई को

मनुष्य बुद्धि से जान ले

यह पर्याप्त नही है

उस सच्चाई को देखने के लिए

मन संचालित बुद्धि की कक्षा को छोड़

सकल दृष्टि वाले अंतरिक्ष से

जीवन अवलोकन जरुरी है

............................................... अरुण

Wednesday, February 2, 2011

बंधन हमें नही, हम बंधन को पकडते हैं

किसी भी ख्याल कल्पना या धारण से बंध जाना

बहुत बड़ी भूल है

हमें किसी से भी बंधना नही है-

ऐसे विचार से भी बंध जाना

वैसी ही

बड़ी भूल होगी

.............................. अरुण

Tuesday, February 1, 2011

गुड के गणेश और .......

गुड के गणेश जी और

गुड का ही प्रसाद

ठीक ऐसी ही स्थिति

मन-सामग्री के बाबत है

मन ही मन के टुकड़े बनाकर,

एक टुकड़े को गणेश यानी नियंत्रक और

दूसरे को प्रसाद यानी नियंत्रित की

भूमिकाओं में बाँट देता है

मन पर नियंत्रण यानी दो टुकड़ों में आपसी संघर्ष

यानी फिर अशांति ही

टुकड़ों का फिर से एक दूसरे में विलीन हो जाना ही

अध्यात्मिक कैवल्य है

............................................. अरुण