Saturday, July 31, 2010

दृष्टि है, ध्यान नही

आँखें खुली हैं

पर सामने की वस्तु दिखाई नहीं देती

क्योंकि दृष्टि तो है पर ध्यान बटा है

किसी विचार ,तन्द्रा या स्वप्न में

सत्य भीतर, बाहर, चहुँओर व्याप्त है

फिर भी समझ में नही उतरता

क्योंकि समझ उलझी है

भय, चिंता, वासना, आकांक्षा और

कई भले बुरे विषयों में

...................................... अरुण

Friday, July 30, 2010

मूर्ख दो प्रकार के

मूर्ख दो प्रकार के

एक वे जो सयानेपन के

अभाव में मूर्ख हैं

दूसरे वे जो सयानेपन के

भाव में मूर्ख हैं

.................................. अरुण

Thursday, July 29, 2010

साँस है जीवन, मन है मृत्यु

साँस पर जागा चित्त

न खोता है आस में और

न इतिहास में

साँस पर सोया चित्त

बह जाता है

मन की भड़ास में

............................... अरुण

Wednesday, July 28, 2010

सबसे कम आत्मनिर्भर है आदमी

सबसे कम आत्मनिर्भर है आदमी

उसका समाज पराधीन लोगों का

आत्मनिर्भर जमावड़ा है

हर चीज,उपाय,ज्ञान, कौशल, के लिए

वह दूसरों की तरफ ताकता है

दूसरों की कल्पनाओं,उपदेशों,बताए सिद्धांतों को

से जुड जाने को ही अपनी उपलब्धि मानता है

पिछलों से लेता है, अगलों को देता है

जितने समय उसके पास हो

अपना समझ लेता है

अपनी समस्याओं को, कष्टों को, विवंचनाओं को

बिना ठीक सी देखे या परखे

रचे रचाए हल या उपायों की

खोज में वह दर दर भीख मांगता है

.................................................... अरुण


Tuesday, July 27, 2010

शून्यत्व दिखे तो धार्मिक.......

सांसारिकता में उलझा जीवन

शून्य था, है और रहेगा

जीवनभर चलते जोड़-घटानों के बाद भी

शून्य ही है

जिसे यह शून्यत्व, क्षण-प्रतिक्षण दिख रहा है

वह धार्मिक है

.................................. अरुण


Monday, July 26, 2010

दवा का सेवन नही केवल पूजन

मूढता में निद्रस्थ को

जगाने हेतु

पहले से जागे लोगों ने

आवाज दी, उच्चार किया

पर निद्रस्थ जागा नहीं

हाँ, इतना ही हुआ कि

निद्रा में ही वह

उस आवाज या उच्चार की

प्रतिमाओं को पूजने बैठ गया

....................................... अरुण

Sunday, July 25, 2010

दवा का सेवन नही केवल पूजन

मूढता में निद्रस्थ को

जगाने हेतु

पहले से जागे लोगों ने

आवाज दी, उच्चार किया

पर निद्रस्थ जागा नहीं

हाँ, इतना ही हुआ कि

निद्रा में ही वह

उस आवाज या उच्चार की

प्रतिमाओं को पूजने बैठ गया

....................................... अरुण

Saturday, July 24, 2010

अरुणोदय से रात तक - जीवन के सभी रंग

गगन में अरुणोदय संकेत

अभी मै जगत-रहित,पर चेत

हुआ अब अरुणोदय नभ में

लो आया जन्म लिए जग में

तो नभ में देख उषा आयी

हंसी अब मुख से लहराई

प्रभा का आया शुभ्र प्रभात

बनकर अब मै शिशु से बाल

चला था रवि सह तीव्र प्रकाश

न था अब आयु वृद्धि अवकाश

हुआ अब मध्य दिवस का काल

कर्म अब यौवन का अभिमान

मिटा दिन संध्या तब आयी

कलि अब तन की मुरझाई

रात ने दिन को डाला त्याज

देह पर कागों का था राज

..................................... अरुण

Friday, July 23, 2010

आध्यात्मिक प्रवचन किसे कहें ?

यह प्रवचन कई तत्वों का

केवल जोड़ नहीं

उनका संगम है

प्रवचन केवल जानकारी नहीं

केवल प्रेरणा नहीं

केवल जीवन के प्रति सोच-समझ

देना भी नहीं

प्रवचन शब्दों और वचनों का

एक ऐसा सहज सरल प्रवाह है

जिसके चेतन स्पर्श से

सुननेवाला अपनी बाह्य स्थित्ति से हटकर

अपने अन्तस्थ से जुड जाए

........................................ अरुण




Thursday, July 22, 2010

जो बोले सुनता वही ....

संवाद के लिए

कम से कम दो चाहिए

दो छोर, दो व्यक्ति, दो समूह

मस्तिष्क के भीतर एक भी नहीं

फिर भी संवाद की एक अटूट

धार बहे जा रही है

जो बोलता है वही सुनता है

वही जबाब भी देता है और

वही फिर सुनकर आगे ......



मस्तिष्क के भीतर केवल ख्वाब

उसके भीतर हैं कई ख्वाब

एक दूसरे से बोलते

एक दूसरे को देखते

इतना ही नहीं

भीतर के ये ख्वाबी बादल

ढक देते हैं

बाहरी जगत को भी

....................................... अरुण

Wednesday, July 21, 2010

फिर मन से मौन की ओर

आदमी मौन लेकर

पैदा होता है और

अनायास ही

समाज का संपर्क होते ही

उसमें मन फल उठता है

पर मन से मौन प्रयास करने पर भी

फल नहीं पाता

जो चीज टूट गई

वह जुड सकती है

पर अटूट नहीं हो सकती

द्वैत से अद्वैत फल नहीं सकता

इस बात का जीवंत बोध ही

कि द्वैत शुद्ध भ्रान्ति है

अद्वैत है

.................................... अरुण





Tuesday, July 20, 2010

भागना भी है और ठहराना भी

या तो भागते रहो

या ठहर जाओ

दोनों बातें एक

ही वक्त नहीं हो सकतीं

हाँ एक काल्पनिक उपाय है

भागते हुए ही

कल्पना करो कि

ठहरे हुए हो

आदमी धर्म को

अपने जीवन में कुछ इसीतरह

अपना रहा है

............................................ अरुण

Monday, July 19, 2010

तर्क और समझ का रिश्ता

समझहीन तर्क यानी अज्ञान

तर्कहीन समझ यानी ज्ञान

तर्कपूर्ण समझ यानी विज्ञानं

समझपूर्ण तर्क यानी प्रज्ञान

प्रज्ञान का अर्थ बोध से है

तर्क है दिमागी गणित और

समझ है वास्तविकता का दर्शन

................................... अरुण

Sunday, July 18, 2010

ध्यान और ज्ञान

अस्तित्व में

पशु-पक्षियों द्वारा

जीवन सुरक्षा के लिए

उपयोग में आता है

उनका समग्र ध्यान

और थोडा थोडा

कामचलाऊ ज्ञान

पर आदमी जी रहा है

अपने संचित ज्ञान से

ध्यान का थोडा थोडा

कामचलाऊ उपयोग

करते हुए

थोड़ी अतिशयोक्ति की छूट हो तो

कहना पड़ेगा -

पशु-पक्षियों के ध्यान में ही

उनका ज्ञान है

और आदमी के

ज्ञान में उसका ध्यान

.............................. अरुण


Saturday, July 17, 2010

कबीर रहस्यवादी नहीं हैं

सीधा सादा जगत है, सीधे सीधे देख

तिरछी को तिरछा दिखे, दिखती तिरछी रेख

सीधा सादा आदमी

अपनी सीधी नजर से

जगत को सीधे सीधे देखता है

पर उसकी बानी रहस्य

मालूम पड़ती है उनको

जो जगत को सीधे सीधे

देख नहीं सकते क्योंकि

उनकी नजर तिरछी है

संस्कारित है

कबीर रहस्यवादी नहीं हैं

न उनकी बानी किसी रहस्य

को दर्शा रही है

हम उन्हें समझ नहीं पा रहे

क्योंकि नजर हमारी

सीधी नहीं है.

........................................... अरुण


Friday, July 16, 2010

कहानी की किताब में कहानी नहीं बसती

कहानी की किताब में छपे

शब्द/वाक्य पढते ही

सारी कहानी समझ आ जाती है

परन्तु किताब कों कितना ही

उलटो,पलटो, फाडो, जलाओ

उसमें से न कहानी गिरेगी और

न कहानी जलेगी

शरीर के मस्तिष्क यन्त्र में भी

कुछ ऐसा ही है

मस्तिष्क देता है

विचार, प्रतिमाएं, स्वप्न,

आशय

पर मस्तिष्क में अगर झांको

इसमें कुछ

न दिखेगा

सिवा मस्तिष्क की

बनावट के

......................................... अरुण

Thursday, July 15, 2010

इच्छा-वृक्ष

इच्छाएँ अनेक हैं

एक दूसरे पर निर्भर

एक इच्छा के भीतर से पनपती है

दूसरी इच्छा

फिर दूसरी से तीसरी .......

जिस तरह वृक्ष में शाखाओं से

शाखाएं फूटती है

ठीक उसीतरह

इच्छा-वृक्ष के बीज पर

ध्यान जाते ही वृक्ष हुआ

न-अस्तित्व

इच्छा-वृक्ष की शाखाओं को

जानने का काम है मनोविज्ञान का


पर बीज देख सकता है

केवल आत्म-ज्ञानी

............................... अरुण





Wednesday, July 14, 2010

क्षण ही जीवन

हर क्षण स्वतन्त्र है

न पिछले क्षणों से इसका

कोइ जोड़ है और

न अगलों से कोई लगाव

पर हमारी जिंदगी में

ऐसा नहीं क्योंकि

यह हमारी है और

इसीलिए यह पिछले क्षणों को

दुहराने और

अगलों (भविष्य) को

साकारने में लगी हुई है

यह हमारी है इसीलिए जिन्दा नहीं है

हमेशा गाडी हुई है

पिछलों और अगलों में

................................. अरुण





Tuesday, July 13, 2010

किताबें अनुभव नहीं देतीं

योगी अपने अनुभवों की लिखकर

योग पर किताब छापे

यह बात तो समझ में आती है

पर उस किताब को पढकर

कोई योगाभ्यास करे ये बात

समझ में नहीं आती

अनुभवों पर किताब लिखी जाती है

पर किताब पढ़ने से अनुभव नहीं होते

हाँ, अनुभव की कल्पना की जा सकती है

कल्पना सघन हो तो अनुभव की

भ्रान्ति भी हो सकती है

पर अनुभव नहीं

............................................... अरुण


Monday, July 12, 2010

बंधन कों देख लेना ही है आजादी

बंधन तोडने की

प्रक्रिया का नाम आजादी नहीं

बंधन को जन्म देनेवाली

प्रकिया के प्रति सजग रहना ही

आजादी है

मतलब -

सजगता ही आजादी है

आजादी के लिए किसी

अलग से की गई कृति की

जरूरत नहीं

............................... अरुण




Sunday, July 11, 2010

खींचातानी

यह जीवन कई भिन्न

परस्पर विरोधी एवं विभिन्न स्तरीय

इच्छाओं का आपसी संघर्ष है

एक ही मन में, एक ही समय में है

पाप की इच्छा भी है और पुण्य की वासना भी

युद्ध की जरूरत भी और शांति की प्रेरणा भी

मित्रों से दुश्मनी और शत्रु से समझौता

एक ही समय में -

बाप का बोझ भी है और पुत्र से मिल रही

लताड भी ..........

एक ही समय कई दिशाओं में

खींचातानी और फलतः

मानसिक तनाव

.................................... अरुण

Saturday, July 10, 2010

उगता- फलता- फला देखा, बीज न देखा

अंकुर फूटा, देख लिया

पौधा बना, देख लिया

वृक्ष लहराता, देख लिया

लेकिन जमीन में दबे

जिस बीज से

यह सब घटा उसके बाबत

मै बेखबर रहा और बेखबर हूँ.....

अब भी भीतर

कई जहरीले बीज

(क्रोध, भय, लालसा जैसे)

जो मुझसे फूटते रहतें है,

दबे पड़े हैं मगर

मै बेखबर हूँ उनके बाबत

.............................. अरुण


Friday, July 9, 2010

मन है एक आड

प्रकाश के आड़े आने वाली चीज

धरती पर अपनी परछाई बनी देखती है

वह चीज प्रकाश के रास्ते से हट जाए तो

उसकी परछाई लुप्त हो जाती है

अपनी जगह पर खड़े खड़े वह चीज

अपनी परछाई को हटा नहीं सकती, मिटा नहीं सकती

न ही उसे किसी भी तरह गायब कर सकती है

जीवन की सीधी अनुभूति के आड़े खड़ा

मनुष्य का मन

जीवन को अपनी ही

परछाई से ढक देता है

जबतक मन

निर्मन न हो जाए

जीवन प्रकाशमान न हो सकेगा

.................................................. अरुण


Thursday, July 8, 2010

दिखता तो है पर धुंधला धुंधला

मिचकाती आँखों से जिंदगी का सारा तमाशा

दिखता तो है

पर धुंधला धुंधला

बात समझ में आती तो है पर

थोड़ी थोड़ी

इन धुंधली धुंधली

आधी-समझी बातों से छुटकारा नहीं

तबतक

जबतक मिचकाती आँखों और उनमें

समाये सारे तमाशे को

अस्तित्व की खुली आँख

देख नहीं लेती एक ही पल में

अचानक

......................................................... अरुण

Wednesday, July 7, 2010

चलती को गाड़ी कहे.......

अस्तित्व प्रवाही रहा है- बहता रहा है, बह रहा है और रहेगा. वह लगातार क्षण प्रति क्षण बदल रहा है. कहीं भी कभी भी ठहरा हुआ नही है. जिसे हम देह कहते हैं या जिसे हम पदार्थ कहतें हैं, वह भी पल पल सुप्त या स्पष्ट रूप से बदलता जान पड़ता है. इस क्षण जो चीज जैसी है उस क्षण वैसी नही रहती. अभी जो जिया अगले क्षण मरा एक नया जन्म लेने के लिए - जन्म-मृत्यु एक दूसरे में मिले हुए हैं. एक दूसरे में रूपांतरित हो रहे है, इस ढंग के रूपांतरण की निष्पत्ति है - निरंतर चला आता हमारा यह जीवन प्रवाह.

प्रवाह में स्थिरता की कल्पना भी नही की जा सकती फिर भी आदमी की उत्क्रांति-यात्रा स्थिरता की कल्पना इजाद करती रही. उसने, 'चलती' में 'गाड़ी' (गाड़ी हुई ) बनना चाहा. जो नही हो सकता उत्क्रांति ने वह करना चाहा. ऐसी चाह (या Natural selection) मनुष्य के लम्बे उत्क्रांति क्रम में क्यों पैदा हुई ये कहना कठिन है.


परन्तु अपने प्रति दिन के जीवन को निहारने पर एक बात स्पष्ट होती है. आदमी जिन बातों को स्थिर कहता है वे अस्तित्व की नजर में स्थिर नही है. फिर भी नित्य के व्यवहार में, संबंधों में, संवाद में आदमी उसका उपयोग स्थिर इकाई के रूप में करता दिखाई देता है. शायद, अस्तित्व मनुष्य की इस 'समझ' से बेखबर हो. क्योंकि अस्तित्व ने अपने को ठहरा नही पाया. अस्तित्व को शायद मानव- मन का भी पता न हो. मानव मन का पता शायद मानव को ही हो, वह भी प्रत्यक्ष रूप में और केवल व्यक्तिगत स्तर पर उसके अपने मन द्वारा ही
मानव-मन जिन बातों से अपने स्वयं के होने का हमें (मनुष्य को ) परिचय देता है वे हैं - विचार, मनन, अहम एवं पर-भाव, गत घटनाओं का प्रतिमा-संचय तथा उन प्रतिमाओं के उपयोग से रची जाने वाले भविष्य की कल्पना या नियोजन...... इन सभी विषयों के अंतर- आन्दोलनों से मानव का भावना व्यापार, सामाजिक सम्बन्ध-व्यवस्था, ज्ञान - यंत्रणा एवं भाषा प्रपंच तैयार होता हुआ मालूम पड़ता है. वैसे तो मस्तिष्क की कई क्षमताएं हैं जिनमे से स्मरण शक्ति तथा बुद्धि का योगदान मन- निर्मिती की प्रक्रिया में विशेष रूप से दिखाई देता है.

कल्पना करें यदि मनुष्य की स्मृति बहुत छोटी होती, केवल कुछ क्षण पूर्व की ही बातें उसे याद रहती तो क्या होता ? उस स्थिति में मनुष्य की व्यक्तित्व-धारणा, सम्बन्ध-रचना, भाषा-रचना , तुलना से उत्पन्न भली बुरी भावनाओं जैसी बातों का क्या होता?

शायद संत कबीर जैसा सरल व्यक्तित्व 'गाड़ी' में गाड़ीपन न देखकर उसका असली स्वरूप यानि चलन, गति, बदलाव या प्रवाह देखता रहा है. परन्तु मुझ जैसे असरल को ( संस्कारित) को 'चलती' में 'गाड़ी' का आभास है जो मेरी एक आदत बन गई है. सांसारिक जीवनक्रम में ऐसी आदतों की ही मुझे जरूरत है.

उपर्युक्त बातें चिंतन में उभरे विचारों के आधार पर लिखी गई है. किसी वैज्ञानिक तथ्य का दावा करने के लिये नही. यह एक चिंतन मात्र है, इसपर केवल चिंतन हो, विवाद नही.
......................................................................................................
अरुण


Tuesday, July 6, 2010

सांसारिक- इच्छाओं के पीछे की बाध्यता

मनुष्य कुदरत से न अलग है

और न ही अलग हो पाता है

फिर भी उत्क्रांति में हुई भूल के कारण,

वह समाज-मग्न होते ही

उसमें कुदरत से विभक्त होने का

भाव-भ्रम खिल उठता है

यही भाव- भ्रम उसमें कर्ताभाव के साथ ही

संकुचन की पीड़ा भी जगाता है

अनायास ही अपना

संकुचन दूर करने के लिए

वह फैलकर एवं पसरकर

कुदरत से पुनः

एक रूप हो जाना चाहे,

फिर सकल एवं असीम बन जाना चाहे,

यह सहज- स्वाभाविक है

उसकी सभी सांसारिक इच्छाएँ

जैसे धन, नाम, सत्ता, प्रतिष्ठा,

फैलने और पसरने की

सहज-प्रेरणा की ही

परिचायक हैं

....................................... अरुण



Monday, July 5, 2010

अज्ञेय

अज्ञेय का मतलब रहस्य नहीं

अज्ञेय का मतलब अदभुत नहीं

अज्ञेय का मतलब असाधारण नहीं

अज्ञेय यानी कोई दिव्य-भव्य नहीं

अज्ञेय यानी वह जिसे

मनुष्य का ज्ञान-यन्त्र

यानी

मन-बुद्धि-स्मृति-तर्क- विज्ञानं

जानने में असमर्थ है

अज्ञेय यानी सकल-अस्तित्व

जिसे अस्तित्व ही जान सकता है,

ज्ञान-यन्त्र से जाना ज्ञान

जो ना-अस्तित्व है

अस्तित्व को छू नहीं पाता

.................................................... अरुण


Sunday, July 4, 2010

अंतिम सत्य तो एक ही.....

दौड़ती रेलगाड़ी का एक डिब्बा

भीतर यात्री चल फिर रहे हैं

डिब्बे के एक छोर से दूसरे छोर के बीच

दोनों तरफ की दीवारों के बीच

उनके चलने-फिरने में भी कोई न कोई गति

लगी हुई है, कोई न कोई दिशा का भास है

कहने का मतलब डिब्बे के भीतर

चलते फिरते लोगों से पूछें तो हर कोई

अपनी भिन्न दिशा और गति की बात करेगा

जबकि सच यह है कि

सभी यात्री दौड़ती रेल की गति और दिशा से बंधे है

उनकी अपनी गति और दिशा

एक भ्रम मात्र है

सभी का अंतिम सत्य तो एक ही है

भले ही हरेक का आभास भिन्न क्यों न हो

.......................................................... अरुण




Saturday, July 3, 2010

देखने में हुई भूल ही है असत्य

सभी बुद्धों के कहने का तात्पर्य

यह है कि

सत्य तो हमेशा ही विद्यमान है

उसे देखने में हुई भूल के कारण ही

मानव-मस्तिष्क को

असत्य की बाधा होती है

और फिर असत्य ही

सत्य जैसा लगने लगता है

परन्तु जब अचानक ध्यान में

असत्य पूरी तरह,

गहराई से उतर कर,

पारदर्शी बन जाता है तब

उसके पार छुपा हुआ सत्य

प्रकट हो उठता है

मतलब - देखने में हुई भूल ही असत्य है

असत्य का अपना कोई अस्तित्व नहीं है

................................... ..........................अरुण


Friday, July 2, 2010

प्यास तो है पर .......

प्यास का समाधान है पानी

यह सब ने ही जान लिया है

कल्पना करें

अगर प्यास तो होती पर

पानी के बारें में कुछ भी पता न होता तो

पानी छोड़ किसी भी अन्य पदार्ध से

प्यास बुझाने की कोशिशें जारी रहती

पूजा-पाठ, मंत्र-तंत्र, जप-जाप और ऐसी ही

कई बातों को देखकर

लगता है 'प्यास' तो है

पर सही समाधान की खोज अभी भी

जारी है

.................................................... अरुण

Thursday, July 1, 2010

विज्ञान और अध्यात्म का रिश्ता

दुनिया की हर चीज को माथे में धर लेत

माथे का सत् जानते सत् पे माथा टेक

जगत को वस्तु जानकर

विज्ञानं ने उसका विश्लेषण किया

और वस्तु के अन्तस्थ को

जानना चाहा

पर जब अनायास

जानने का अन्तस्थ

स्वयं को अनुभूत करने लगा

विज्ञान जानने में रम गया

............................. अरुण