Thursday, May 31, 2012

भ्रष्टाचार का भूत


चुंकि काम अच्छा है, शक जताया नही जाता
हालांकि, पाप भीतर है बाहर से मिटाया नही जाता
जबकि टीम में सिमट बैठीं है कई चिडचिडी रूहें
ऐसी रूहों के बल पे भूत भगाया नही जाता
-अरुण

Wednesday, May 30, 2012

एक अजीबसा रिश्ता


वे सब मेरी आरती उतारते हैं
और मै उनसे अपनी आरती उतरवाकर
अपने को धन्य हुआ पाता हूँ.  
मै उनको मन की शांति के लिये
मोह-मुक्ति पर प्रवचन देता हूँ   
और वे सब
अपनी वासनाओं की तृप्ति के लिए
मुझे पूजते रहते हैं
मेरे उनके बीच एक अजीबसा रिश्ता है
-अरुण     

Tuesday, May 29, 2012

पुस्तकों में दबे मजबूर शब्द


जब आतंरिक या बाहरी बाध्यता
जोर पकड़ गई,
जो कहा नही जा सकता,
उसे भी कह देने की कोशिशे हुईं
शांति को शब्दों से सजाया गया
शांति सज तो गई परन्तु न कही और न ही सुनी गई
जो कही और सुनी गई वह शांति न थी.
वह थे गीता, कुरान, उपनिषद, और ऐसी ही
कई पुस्तकों में दबे मजबूर शब्द
-अरुण  

Monday, May 28, 2012

हर आदमी को उसकी Space दी जाए


हर आदमी को स्वयं की मर्जी के अनुसार
निर्णय लेने और कृति करने की आजादी है
ऐसी आजादी के समर्थन में
उस आदमी के लिए
उचित जगह या space छोडनी होगी.
अपने निर्णय और
कृति में अगर वह कोई
चूक करता है तो
जो परिणाम निकलेंगे उसका
सामना करने की जिम्मेदारी भी उसी की है.
चूक करने का और उससे निपटने का, दोनों का 
उसे अधिकार है , यह बात भुलनी न चाहिए
-अरुण   

Sunday, May 27, 2012

समाज की न्याय-व्यवस्था


समाज की न्याय-व्यवस्था
कितनी ही प्रगतिशील और
मानवतापूर्ण क्यों न हो.
समाज का ही पक्ष लेते हुए
न्याय प्रदान करती है. उसी के आधार पर सजा का
निर्धारण करती है.
परन्तु इस व्यवस्था को यह हक नही है
कि वह इस बात का धैर्य और ख्याल रखे कि
व्यक्ति को दी जानेवाली सजा
कहीं व्यक्ति के अन्तः-परिवर्तन की
प्रक्रिया में बाधा तो नही बन रही.
इसका मूल कारण यह है कि
न्याय-व्यवस्था अपराध से पीड़ित
व्यक्ति या लोगों को न्याय दिलाने के
विचार से ही बंधी हुई है, उसे घोषित अपराधी के
भविष्य में परिवर्तन की
संभावन का विचार करने की कोई आजादी नही है
-अरुण

Saturday, May 26, 2012

संदेह-विरहित अंतर-मन


टिमटिमाती मोमबत्ती की
कदमभर रोशनी में भी
चलना हो पाता है
और दिन के घने पूरे आच्छादित
प्रकाश में भी,
पहला कदम-ब-कदम वाला सफर
अनसुलझे संदेहों को थामे हुए
आगे बढता है 
तो दूसरा
संदेह-विरहित अंतर-मन से    
-अरुण

Friday, May 25, 2012

यह सच न भूल जाना


करता नही कुई भी, सब यूँ ही हो रहा है
करना-ओ- करनेवाला दोनों ही हो रहा है
नाचे वही है नर्तन, गाये वही है गाना
सब भेद है खयाली यह सच न भूल जाना
-अरुण

Thursday, May 24, 2012

असुरक्षित सरकार तो देश भी असुरक्षित


सरकार चलानेवाली पार्टी, दल या सत्ताकी
यह जिम्मेदारी है कि वह देश/प्रदेश में
विकास की प्रक्रिया को बनाये रखते हुए
जनता के सभी तबकों के लोगोंका
कल्याण करे और उन्हें खुशहाल रख्खे
केवल यही चिंता कि जनता खुश रहे  और हमें जिताती रहे
सरकार को कमजोर बना देती है.   
ऐसी चिंता से त्रस्त लोग या पार्टियां
सरकार चला नही सकते.
इस समय देश में सरकार डरी हुई है
जनता का विश्वास खोने का भय उसे सता रहा है.
ऐसी अवस्था में उसके द्वारा
देश के लिए लिये जाने वाले
सभी निर्णय गलत साबित हो रहे हैं.
सरकार की खूब हसाई हो रही है.
-अरुण

Wednesday, May 23, 2012

भाव अलगाव का


अस्तित्व का हर कण -
कण नही बल्कि सकल अस्तित्व ही है
परन्तु जब उसमें अपने अलग होने
या अलगाव का भाव जागता है
वह एक स्वतन्त्र इकाई के रूप में
अहम भाव से विचरने लगता है
जहाँ अलगाव जागा,
स्व-बचाव, स्व-संवर्धन, हिंसा, स्वार्थ, मोह,
स्पर्धा, महत्त्वाकांक्षा जैसे भावों का
जागना लाजमी है
-अरुण  

Tuesday, May 22, 2012

सजगता और चेतना


सजगता और चेतना
क्या इन दो अवस्थाओं में
कोई मूलभूत अंतर है? ....
इस प्रश्न पर चिंतन करने पर
जो बात स्पष्ट हुई लगती हैं
वह यह कि -
सजगता एक सर्व-व्यापक स्थिति है
जबकि चेतना किसी
विशेष वस्तु/प्रसंग/परिस्थिति
के बारे में रहती है
सजगता केंद्रित नही पर
चेतना केंद्रित या focused
रहती है
-अरुण

Monday, May 21, 2012

सकल अस्तित्व अभेद्य है


सकल अस्तित्व एक का एक,
अभेद्य है
फिर भी आदमी
उसे टुकड़ों में बाटने की चेष्टा
कर रहा है,
जो बट नही सकता उसे भी बाटने
का आभास पैदा कर देता है
अँधेरा-उजाला, यहाँ-वहाँ, अभी-तभी,
ध्यान-अध्यान जैसे
मायावी उपाय
भेद का भाव जगा देते हैं
ॐकार यानी आकार-निराकार के
परे वाली जो स्थिति है,
आदमी ने उसमें बुद्धि-प्रयोग द्वारा
अनगिनत ध्वन्याकर (शब्द) पैदा
कर दिये हैं
-अरुण    

Saturday, May 19, 2012

‘स्वयं’ को जानना


स्वयं को जानने की बात जब होती है,
समझ में एक भूलसी  घटती है
ऐसा जानना
स्वयं और उसे जाननेवाला
इन दो टुकड़ों में बटा हुआ लगता है
जबकि स्वयं को जानना
एक ऐसी बात है जिसमें
स्वयं
(एक ही पल और दृष्टि में)
अपना कर्तापन, कार्य, परिणाम और
Intrinsic (अंतर्भूत) अस्तित्व को
निहार लेता है
-अरुण

Friday, May 18, 2012

जिंदगी के दो समानांतर रास्ते


आदमी की जिंदगी
दो समानांतर रास्तों से गुजरती है,
सांसारिकता और अस्तित्वता,
यही वे दो रास्ते हैं.
दोनों एक दूसरे से पूरीतरह अलग और
अछूते होते हुए भी, चुंकि एक साथ और
एक संगती में चलते हैं,
लगता है कि
दोनों एक दुसरे के मिलेजुले अंग है
अस्तित्व से आदमी जन्मता है.
अपने जीवित प्राणों के साथ जीता है और
प्राणों के बंद होते ही निष्प्राण अस्तित्व के रूप में
बना रहता है
परन्तु संसार का जन्म,
जन्मे हुए आदमी के अस्तित्व के
आतंरिक संवाद से फलता है
और प्राणों के लुप्त होते ही
वह लुप्त हो जाता है
-अरुण    

Thursday, May 17, 2012

परिवर्तन व्यक्ति में होता है


परिवर्तन व्यक्ति में होता है
समाज में नही,
जलता तो पेड है
जंगल नही,
सभी समुदायवाचक
संज्ञाओं के साथ यह भूल होती है.
भूल केवल समझने में ही नही तो
समझ की भूल के कारण
दृष्टि और कृति में भी घटती है
समाज से भ्रष्टाचार हटाने वालों को
यह बात ठीक से समझ लेनी होगी
-अरुण 

Wednesday, May 16, 2012

बच्चे जीवनभर बच्चे ही रहते हैं


बचपन में बच्चे गुड्डा-गुड़ियों में
मग्न रहते हैं,
उनसे दिल बहलाते हैं,
वे ही उनकी रूचि बन जाते हैं
और बच्चे जीवनभर
बच्चे ही रहते हैं.
परिवर्तन तो केवल
गुड्डा-गुड़ियों में होता जाता है
पैसा, प्रतिष्ठा, प्रगति, सत्ता ....
ये सब गुड्डा-गुड़ियों के ही
परिवर्तित रूप हैं
-अरुण

Tuesday, May 15, 2012

जीवन-मुक्ति का मतलब


बेडियाँ हैं पर बंधन नही
रिश्तों में कोई अनुबंधन नही
चहरदिवारी भी रोके न ताजी हवा
मै के अखाड़े में तू ना हुआ
बटकर भी भीतर से बटता नही
माया में रहते भी धोखा नही
-अरुण

Monday, May 14, 2012

सत्य-कथन


सत्य-कथन के लिए
सुसाहस की जरूरत है
परन्तु समाज क्या सोचेगा? या
समाज के प्रस्थापित मूल्यों के समर्थन में
आम लोग कहीं नाराज न हो जाएँ-
इस भय से भी
सत्य-कथन को टाल दिया जाता है
या उसपर मीठे-झूठ का
मुलामा चढा दिया जाता है

अंधविश्वास फैलाने वालों के खिलाफ
आवाज उठती है तो यह  ठीक ही है,
परन्तु अविश्वास स्वीकारने वाली आम जनता के
खिलाफ आवाज उठाने का ढाढस तो पत्रकार भी नही करते.
सब लोग ढोंगी बाबाओ की निंदा करते हैं
परन्तु इन ढोंगियों के ग्राहक
यानी अज्ञानी लोगों की (जिनकी संख्या बहुत है)
कोई भी खुलकर निंदा नही करता
- अरुण    

Saturday, May 12, 2012

सुबह और मुर्गे की बांग


सुबह की पहली किरण और
मुर्गे की बांग, इनके रिश्ते से प्रायः
सभी परिचित हैं. रिश्ता कारक और परिणाम
(cause and effect) वाला नही
बल्कि सह-क्रियण (synchronization) वाला है.
प्रातः की किरण निकलते ही
मुर्गे में बांग देने की
प्रेरणा जागती है और
वह बांग देता है,
ठीक इसीतरह का रिश्ता
मन और शरीर के बीच में है.
मन शरीर का प्रेरक है, कारक नही.
मन की प्रेरणा से
मस्तिष्क प्रभावित होता है
और प्रभावित मस्तिष्क (मन नही)
शरीर को संचालित करता है,
शरीर और मस्तिष्क
एक ही संगठन के हिस्से हैं
परन्तु मन और शरीर तो केवल
सह-क्रियाएँ हैं (synchronized actions)
-अरुण 

Friday, May 11, 2012

मै उस कच्चे फल की तरह


मै उस कच्चे फल की तरह हूँ
जो परिपक्वता को भलीभांति निहारता तो है
पर खुद पक नही पाता

परिपक्वता के लिए जो माहोल
जरूरी है, उसमें शायद
वह खुद को
घोल नही पाता
-अरुण

Thursday, May 10, 2012

खुद की सच्चाई अपनी नज़रों से न देखो


एक अटपटा और  
असहज सुझाव यह है
कि
खुद की सच्चाई देखनी हो तो
अपनी नज़रों का उपयोग न करो,
तुम्हें समेटे हुए जो पूरा अस्तित्व है,
उस अस्तित्व की नज़रों से देखो
-अरुण

Wednesday, May 9, 2012

सफर अंधा और मुसाफिर भी अंधा


जिस दुनिया में
सांसारिकता विचरती है
वहाँ अँधेरा है.
सफर अंधा और
मुसाफिर भी अंधा.

मुसाफिर के पास
अँधेरे की चमक
देखने वाली ऑंखें है
और सफर के रास्ते में
अंधे को दिख सकने वाली
चमचमाती रोशनी.

तमसभरी यह सांसारिकता
प्रवचनों और ग्रंथों को सुन-पढकर
चाहे जितनी भी कोशिश करे,
सांसारिकता के तमस को
देख नही सकती और न ही
असली रोशनी को पहचान सकती है
-अरुण

Tuesday, May 8, 2012

नया- नया और पुराना-नया


आज का सूरज
कल जैसा दिखता है
हर नई सोच में 
पुराना महकता है .....

कल का डूबा ही नही
सूरज आज का, उगे कैसे   
यादों के धागों से
नई सोच सिले कैसे
-अरुण 

Monday, May 7, 2012

भीतरी भाव का ही प्रभाव


जो भी भीतर भाव जागे,
उसका ही प्रभाव आगे आचरण में
व्यक्त होता हुआ दिखता है.
उत्क्रांति और सामाजिक प्रकिया
के आधीन रहा हर आदमी,
जन्म से कुछ ही दिनों के बाद
भीतर विभाक्ति-भाव जाग उठते ही, 
अपने को भिन्न अस्तित्व के रूप में
देखता-समझता है. इसी भिन्नत्व भाव के कारण
उसे जिंदगी भर संघर्ष से होकर गुजरना पड़ता है  
-अरुण      

Sunday, May 6, 2012

एक सूतभर भी उसकी नही


मेरी यह छोटीसी जिंदगी,
मेरे अपने तजुर्बे गिने चुने है
ढेर सारे दूसरों से लेकर बुने हैं
ये इकठ्ठा जमा तजुर्बे ही
मेरी शख्सियत है
कैसे कहूँ इसे कि
यह मेरी व्यक्तिगत है
अब समझा कि यहाँ अपना
व्यक्तिगत कुछ भी नही
परछाई जितनी भी चाहे
जमीन घेर ले
एक सूतभर भी उसकी नही
-अरुण    

Saturday, May 5, 2012

कल आज और कल


बीते क्षण-कण ही
सनातन को छूते हैं
और उसे अभी की
पहचान दे देते हैं
यही पहचान
अगले क्षण-कणों
को खुद पर ओढती हुई,
अपना लिबाज और स्वरूप 
बदलते हुए
अपना
कल, आज और कल
बनाती रहती है
-अरुण