Monday, April 30, 2012

दोहरा आचरण


आदमी में समझ भी है
और समझ से भागने की प्रवृत्ति भी,
बैसे ही उसे अपनी मूर्खता का तो
परिचय है पर वह इसकी जिम्मेदारी
बाहरी तत्वों पर थोपने की
प्रवृत्ति का भी शिकार है.
जबतक आदमी में अपने
स्वतंत्र अस्तित्व के होने का
मोह बरक़रार है
आदमी के इस दोहरे आचरण का
कोई इलाज नही
- अरुण     

Sunday, April 29, 2012

जान और जानना


जान और जानना
ये दोनों ही शब्द
एक दूसरे के करीब दिखते तो हैं
पर एक दुसरे के विरोध में खड़े हैं
सत्य अस्तित्व की जान है
परन्तु सत्य को जानने वाले
अस्तित्व को जी नही पाते
अस्तित्व को तन मन और ह्रदय की
समग्रता से जीनेवाले,
जरूरी नही कि
अस्तित्व के सत्य को जानते ही हों
-अरुण

Saturday, April 28, 2012

किसलय की छावों में छुपकर


किसलय की छावों में छुपकर मेरी बाँहों में आ जाना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

तेरी पूजा के खातिर मै, अंतर में हूँ नव-स्वप्न लिए
तेरा सिंगार रचाने को, प्रेमाश्रु का मै रत्न लिए
बैठा हूँ मै कितने पल से, वो पल पल सार्थक कर देना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

तेरे दर्शन के खातिर अब, इन नयनों में आशाएं हैं
मस्तिक पट पर अब तेरी ही स्मृतियों की रेखाएँ हैं
तुम आज प्रतिक्षा-भूमि पर, क्षण मधुर मिलन के बो देना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

मधुमिलन-पर्व के खातिर अब, सब पर्वों ने धीरज खोया
क्षण क्षण प्रीती ही मेला जब, मेलों से चित्त नही भाया
सब पर्व मानने के खातिर सहजीवन पर्व दिला देना 
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना

किसलय की छावों में छुपकर मेरी बाँहों में आ जाना
दुनिया की नज़रों से बचकर मेरी नज़रों में आ जाना
-अरुण

Friday, April 27, 2012

यूँ ही बाँहों में सम्हालो के


यूँ ही बाँहों में सम्हालो के
सहर होने तक,
धड़कने दिल की उलझ जाएँ
गुफ्तगू कर लें

जुबां से कुछ न कहें,
रूह्भरी आँखों में
डूबकर वक्त को खामोश
बेअसर कर लें

जुनूने इश्क में बेहोश और
गरम सांसे
फजा की छाँव में
अपनी जवां महक भर लें

बेखुदी रात की
तनहाइयों से यूँ लिपटे
बेखतर दिल हो,
सुबह हो तो
बेखबर कर ले
-अरुण

Thursday, April 26, 2012

कुदरत न जनमती है


कुदरत न जनमती है
न मरती है वो कभी
कुदरत से जो जनमी है
वो है मेरी शख्सियत
-अरुण

Wednesday, April 25, 2012

समय को विश्राम दो


समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर
आस में जो थक गया उस रूप का श्रृंगारकर  

नयन में बन ढल गये जलकण तुम्हारे धीर के
ओंठ पर अब सो रहे हैं गीत लंबे पीर के
तपन में जो जल रहा सौंदर्य उसका ख्यालकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

धडकनों में भय समाया है गमक न प्रीत की
वेदना की गूँज है, अब गूँज ना मधु-गीत की
शुभ स्वरों को जन्म दो इस रुदन संहारकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

असहायता का बिम्ब अब मुखपर चमकता जा रहा
नैराश्य का ही भाव अब दिल में सुलगता जा रहा
लो आसमय दुनिया इन्ही हांथो का लो आधारधर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर
-अरुण

Tuesday, April 24, 2012

एक युगल गीत


आओ मिलकर चांदनी में हसते गाते जाएँ
मंजिल की सूनी राहों पर, सपने-फूल सजाएँ

देखो ये चांदनी, चंदा के नज़रों में खो गई
देखो ये चांदनी, चंदा का दिल भी तो ले गई
नर्मसी हवाओं पर, ये प्यार झूल जाए
प्यार के समन्दर की हर लहर मुस्कुराए

पूछो क्यों प्यार के, आसमाँ का पंछी तू हो गया
पूछो क्यों खुद को, फूल चमन का मेरे बन गया
शर्म की घटाओं से ये हुस्न भींग जाए
आसमाँ के तारों से हम तुझको ढूंढ लाए

आओ मिलकर चांदनी में हसते गाते जाएँ
मंजिल की सूनी राहों पर, सपने-फूल सजाएँ
-अरुण

Monday, April 23, 2012

मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब


खुली राहों में सिसकती हुई रातों के सिवा
मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब

अब तो जीवन में कहीं ख्वाब का सिंगार नही
मेरी रातों में पला दर्द है बहार नही
मेरी डूबी हुई हसरत को सिवा मरने के
किसी रंगीन किनारे से सरोकार नही
घने जंगल में सुलगती हुई शाखों के सिवा
मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब

मेरी आँखों में बसे अश्क बसी चाह नही
मै अकेला हूँ मेरा कोई हमराह नही
मेरी नाकाम उमंगों को सिवा रोने के
गम हटाने की मिली और कोई राह नही
गम के बोझ से दबती हुई सांसों के सिवा
मै तुम्हें कौन से तोहफे सजा के लाऊं अब
-अरुण

Sunday, April 22, 2012

इक थम जाता सब हिल जाते


इक थम जाता सब हिल जाते, ऐसे रिश्तेनाते हैं
फिर भी अपनी अपनी रट ही, क्यों बंदे दुहराते है

कल तक थे तुम गैर पराये, कोई भी नाता ना था
आज अचानक क्या हो बैठा, सुध तेरी हम लेते हैं  

तुझको दुख में देख सिहरता, आँखें भी नम होती हैं
वक्त गुजरते, पल दो पल का, जैसे थे हो जाते हैं

लोग यहाँ पर आते जाते, मिलन विरह का खेल यहाँ    
लब्ज बदलते रहते किस्से वही पुराने रहते हैं  

जिसकी खुलती आँखें उसको कांटे कांटे दिख जाएँ
नींद पड़ी हो आँखों में गर, सपने चुबते रहते हैं    
-अरुण

Saturday, April 21, 2012

किसने जाना था के


किसने जाना था के बदल जाएगा, वक्त का नूर
कल करीब होंगे खयालों में, निगाहों से तो दूर

वक्त के साथ बदलनी है तो बदले हर बात
जो गई बीत, उसे कौन बदल पाए हुजूर

दिन गुजरते हैं तो सब घाव भी भर जाते हैं
फिर भी रह जाते हैं हर हाल में, कुछ दाग जरूर

चंद लम्हों की मुलाकात का जादू कैसा
जिंदगीभर उन्ही लम्हों का किया करते गरूर

इश्क में जारी रहे सिलसिला गुनाहों का
ये एहम बात नही, किसने किया पहला कसूर
- अरुण

Friday, April 20, 2012

न शरमाओ हमारे गीत पढकर


तुम्हारी साद इसमें है, तुम्हारा प्रेम इसमें है
तुम्हारे रूप मदिरा का मधुरतम जाम इसमें है
गंवाता ही गया मै खुद को ऐसे गीत गढ़कर
न शरमाओ हमारे गीत पढकर

तुम्हारी लाज को पाकर, भरी हर आह इसमें है
तुम्हारे संग जीने की बनी हर चाह इसमें है
सजाये याद के मोती इन्ही गीतों में जड़कर
न शरमाओ हमारे गीत पढकर

बिछुड़कर हमने पाया विरह जिसका राग इसमें है
मिलन होते दृदय ने जो मनाया फाग इसमें है
विरह-आँसू, मिलन के पर्व आए इसमें चलकर
न शरमाओ हमारे गीत पढकर

तुम्हारे और मेरे जज्ब की तस्वीर इसमें है
इन्ही दो दिल को जो जकडे वही जंजीर इसमें है
हंसी आँसू मोहब्बत के, गिराए इसमें खुलकर
न शरमाओ हमारे गीत पढकर
- अरुण

Thursday, April 19, 2012

मै तो तनहा ही रहा ...


तुझे इस दिल में बसाने की हवस जागी तो
मेरे सोये हुए ख्वाबों के दिये जल ही गये
याद हर राह ओ- हर मोड पे जब जागी तो
जज्बे उल्फत के नरम जहन में अब पल ही गये

तेरे ख्यालों के सितारों को चमक आयी तो
मेरे हर वक्त का अब चैन सब्र ढल ही गया
आँखों आँखों में जहां नर्म से जज्बे जागे  
सब्र की डोर से बांधा हुआ दिल हिल ही गया

तेरी आँखों से बुलाहट की सदा आई तो
दिल को एहसास हुआ प्यार तेरा झुक ही गया
छुपी राहों से दर दिल पे चले आने पर
मै तो तनहा ही रहा प्यार मेरा बिक ही गया
-अरुण  

Wednesday, April 18, 2012

जिस प्यार पे इस दिल का कोई हक ही नही था


जिस प्यार पे इस दिल का कोई हक ही नही था
वो प्यार सजाने से भला क्या होगा?
जिस आस के सीने में सितारे ही नही थे
उस आस पे जीने से भला क्या होगा?

जिस साज में ना तर्ज थी बस गरज दबी थी
वो साज बजाने से भला क्या होगा?
जिस दिल में रफाकत नही दौलत की हवस थी
बाँहों में समाने से भला क्या होगा?

जिस रात की तकदीर में बस रात लिखी थी
वो रात हटाने से भला क्या होगा?
गर हांथ की तकदीर में कांटे ही लिखे थे
फूलों पे झुकाने से भला क्या होगा?
- अरुण   

Tuesday, April 17, 2012

ये काटा चुबता जाएगा


माना कि तुमने पायी है फूलों के सेजों कि दुनिया
साथी भी ऐसा पाया जो क़दमों पे रखेगा खुशियाँ

पर जब भी आँखें मिचोगी
ये प्यार नजर ही आएगा
जब जब फूलों से खेलोगी
ये काटा चुबता जाएगा

तुम लाख, चमकते बादल पे
बीते की याद भुला दोगी
पर उसी चमकते बादल से
ये गम हमेशा झांकेगा

तुम नयी सुनहली माटी में
वो चाह पुरानी रौन्दोगी
पर उसी फूटती माटी में
तेरा पैर फिसलता जाएगा

घायल बाँहों में जब तेरी
एक बाँह नयी ही आएगी
घायल बाँहों का घाव मगर
वो वही पुराना रोयेगा

माना कि तुमने पायी है फूलों के सेजों कि दुनिया
साथी भी ऐसा पाया जो क़दमों पे रखेगा खुशियाँ
-अरुण

Monday, April 16, 2012

जब कभी गम का तूफां उभरने लगता है


जब कभी गम का तूफां उभरने लगता है
मै उसे सतहे नगमों पे बसा देता हूँ

मेरी राहें अब उम्मीद भरी राहें हैं
और मंजिलकी तरफ चाह की निगाहें हैं
मै न चाहूँगा मेरा दर्द यहाँ आ जाए
मै उसे फूल ए नगमों से सजा देता हूँ

मेरी रंगीन मुरादों का ये सवेरा है
जमी की हर खुशी और हर हंसी का डेरा है
गर कभी रात मोहब्बत की पास आती है
मै उसे सेज ए नगमों पे सुला देता हूँ

जमीं पे और भी हैं दर्द, वो हटाने हैं
अमन-ओ-दोस्ती के झोपड़े बसाने हैं
जब मेरा दर्द इरादों को चोट देता है
मै उसे दर्द-ए- नगमों में मिला देता हूँ

जब कभी गम का तूफां उभरने लगता है
मै उसे सतहे नगमों पे बसा देता हूँ

-अरुण

Saturday, April 14, 2012

कभी बीती हुई बातों का खयाल आता है


कभी बीती हुई बातों का खयाल आता है
खोया दिल खुद से यही कह के सम्हल जाता है

नजरें जिन्होंने मिल के बुझाई न दिल प्यास
वो मेरे पास न होती तो बहोत अच्छा था
सोये तुम्हारी जुल्फ के साये में मेरी आस
ये हवस दिल में न होती तो बहोत अच्छा था

जनम जनम का रहे साथ यह कह कर बढे थे हांथ
गर मिले हांथ न होते तो बहोत अच्छा था
जाहिर हुआ था जिससे छुपाया न गया प्यार
प्यार जहिर ही न होता तो बहोत अच्छा था

जीता था तेरा प्यार बैठा हूँ तुझे हार
प्यार जीता ही न होता तो बहोत अच्छा था
-अरुण

....... तुम्हे ही रोना आता है?


बिदाई की घडी पाकर तुम्हे ही रोना आता है?
हमारे दिल ने भी हर दर्द का एहसास जाना है
शिकायत है अगर तुझको, हमें रोना नही आया
तो मतलब, तुझको मेरे दिल की गहराई को पाना है

मै जानता हूँ कि तुमने अश्कों को दबाया था
लबों पे मुस्कराहट की लकीरें हीं बनाई थी
तुम्हारे दिल में जो उभरी हुई थी सख्त बेचैनी
छुपाओ लाख, फिर भी तेरे चेहरे पर समायी थी

बेचारा दिल, मोहब्बत की बड़ी उलझन सम्हाले था
के तेरी उलझनों को देखकर मुश्किल न हो जाए
के औरों से बचाकर जिसको ख़ामोशी में ढाला है
वही उल्फत कहीं अश्कों में ढल जाहिर न हो जाए

कहती हो तो तेरे अश्क का हर्जाना भर दूँगा
मगर इक शर्त है, मुझको कभी भी याद ना लाना
अगर एहसास हो जाए कि तुमने याद लाया था
खुशी से झूमकर, मै अश्क को अनजाना कर दूँगा
-अरुण  

Thursday, April 12, 2012

कल हमारे गर्म आँसू ......


कल हमारे गर्म आँसू गम भुलाकर थम गये थे
आज गम की दास्ताँ ही खत्म होकर थम गयी है

अब नही उम्मीद कोई अब अपना गैर होगा
अब न दिल में प्यार का गम ना किसी से बैर होगा
हर घडी सब भूलने के ख्याल में ही रम गयी है
आज गम की दास्ताँ ही ...........

अब न गीतों में कोई भी रंज और अफ़सोस होगा
और न उम्मीदों से भरमाता हुआ कुई जोश होगा
अब हकीकत की सतह है भावना सब जम गयी है
आज गम की दास्ताँ ही ...........

आज मेरे जिंदगी की राह कोई मोड लेगी
और तजुर्बे को सिरा-ए- जिंदगी से जोड़ लेगी
मेरे गीतों के लिए है जो मिला वो कम नही है
आज गम की दास्ताँ ही ...........
-अरुण

Wednesday, April 11, 2012

नही मुमकिन भुला देना


तुम्हारा प्यार सच्चा था नही मुमकिन भुला देना के
जिसकी हो चुकी हो तुम उसे भी प्यार वो देना

जरुरी ये नही हर ख्वाब सच्चा हो ही जाता है
तमन्ना का उजाला हर किसी आंगन में होता है
लकीरें याद की जो बन चुकी हैं सब मिटा देना
तुम्हारा प्यार सच्चा था नही ...............

नही कुछ प्यार से शिकवा ये झूठी जिंदगानी है
हमारे भावना की ये महज कोरी कहानी है
नये सपनों के मेलों में नये ही गीत अब गाना
तुम्हारा प्यार सच्चा था नही ...............

-अरुण

Tuesday, April 10, 2012

कैसे तुम्हे सुनायें?


तुमने ही जो दर्द दिया था
जिसकी धुन दिल गाये
कैसे तुम्हे सुनायें? 

नगमा बन गया,गम इस दिल का
तर्ज बन गयी आहें
खतम न होगी जो धुन दिल की
वो कैसे दुहरायें
कैसे तुम्हे सुनायें? 

जिस धुन के संग साज भी रोये
महफिल अश्क बहाए
वो धुन अपने लब पे लाकर
कैसे जी बहलाएँ
कैसे तुम्हे सुनायें? 

जिस धुन का हर मोड है घायल
जिसमें दर्द कराहे
गम देकर खुद हसनेवाले
कैसे तुम्हे सुनायें? - कैसे तुम्हे सुनायें? 

तुमने ही जो दर्द दिया था
जिसकी धुन दिल गाये
कैसे तुम्हे सुनायें? 
-अरुण

Monday, April 9, 2012

भूलने की कोशिश करूँगा अगर ......


तुझे भूलने की मै कोशिश करूँगा
अगर सामने तुम कभी फिर न आओ
तेरे बने हैं जो मुझसे बिछुड़कर
उन्हें भी मेरे सामने से हटाओ

झूठी शिकायत करो न किसी से  
के मुझको थी तुझको मोहब्बत नही थी
खुदा के लिए, ऐसी बातें बनाकर
अपने गुनाहों को यूँ ना दबाओ

अपना बनाने ही तुझसे मिला था
तेरे साथ ही फैसला जो किया था
ये  बात खुदगर्ज इरादों की खातिर
दुनिया की नज़रों से यूँ ना छुपाओ
-अरुण