Saturday, April 30, 2011

दो शेर

सारी दुनिया, जेहन पे पसरी ऐसी
किसी शीशे में आसमान उतर आया हो
.......................

साये मिटते नही मिटाने से
जो हटी आड़, तो धूप ही धूप
.......................................... अरुण

Thursday, April 28, 2011

मनुष्य जीवन

धरा सत्य

आकाश एक कल्पना सी

क्षितिज तो मिलन मात्र

है नभ-धरा का

................

मनुष्य का जीवन क्षितिज ही है

जो दूरसे सत्य और पास जाकर देखो

तो कुछ भी नही

.................................... अरुण

मनुष्य जीवन

धरा सत्य

आकाश एक कल्पना सी

क्षितिज तो मिलन मात्र

है नभ-धरा का

................

मनुष्य का जीवन क्षितिज ही है

जो दूरसे सत्य और पास जाकर देखो

तो कुछ भी नही

.................................... अरुण

Wednesday, April 27, 2011

माया क्या है ?

जो अस्तिव में न होते हुए भी

जिसका हमारे जीवन में

अस्तित्व बना हुआ है

वह है माया

माया सत्य तो नही

पर सत्य का सही सही

आभास मात्र है

जिसके आधार पर

मनुष्य अपना दैनिक

जीवन जी रहा है

................................... अरुण

Monday, April 25, 2011

चमत्कारों’ की अनावश्यक चर्चा से बचें

श्रद्धा आदमी की मानसिक जरूरत से जन्मा

एक ऐसा मनाचरण है

जिसके समुचित आधार के बारे में

कोई भी चर्चा उठाना

बहुतेरों को समाज में

अच्छा नही लगता

ऐसे ही श्रद्धालुओं का एक

श्रद्धा-स्थान सत्य साईंबाबा कल चल बसे

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भक्तों के दान से बने एक विशाल

साम्राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा

ऐसी चिंता का उठना अब स्वाभाविक ही है

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इस साम्राज्य द्वारा

पैसे के दुरूपयोग या राजनैतिक उपयोग की कोई बात

अभी तक

न तो नही सुनी गई या सामने आयी है

शायद इसी लिए बड़े बड़े लोग उनसे प्रभावित थे

इस बात को खुले तौर पर दर्शाया जा रहा है

इस श्रद्धा-सत्ता के माध्यम से किये गये

समाज-उपयोगी विकास कामों को सराहना ठीक ही है

परन्तु प्रशंसा के इस दौर में उनके तथाकथित

चमत्कारों की प्रशंसा न होने लगे

इस बात का ध्यान रहे

........................................... अरुण

Sunday, April 24, 2011

मनुष्य- जीवन प्रकृति के विरोध में

केवल जीना भी जिंदगी है

और जानते हुए जीना भी

जिंदगी

पेड फल जंगल सब जी रहे हैं

कुछ भी जाने बगैर

मनुष्य और दूसरे प्राणी भी जी रहे है

मगर जानने के साथ साथ

मनुष्य के जीवन में

जानने का अनुपात बहुत

बढ़ चुका है और इसी लिए

मनुष्य का जीना दुर्बल बन गया है

सभी दूसरे प्राणी अपनी प्राकृतिक अवस्था में

जितना जरूरी है उतना ही जानते हैं और

इस तरह पूरी तरह प्राकृतिक

जिंदगी जी रहे हैं

मनुष्य जरूरत से अधिक जानने के कारण

प्रकृति के विरोध में बना रहकर

संघर्ष का जीवन जी रहा है

........................................ अरुण

Saturday, April 23, 2011

अभी यहीं पर ही है सारी जिंदगी

सपनों में भविष्य और

यादों में

बीते वक्त को

तलाशता आदमी

यह भूल ही जाता है कि अभी और

यहीं पर

सपने भी जीवित हैं

और यादें भी

अभी यहीं पर ही है सारी जिंदगी

जो सपनों पर उछल पड़ती है तो

बीते में लगाते बैठती है गोते

.......................................... अरुण

Thursday, April 14, 2011

‘बेदागी’- शब्द को नया आयाम

आमतौर पर सार्वजनिक जीवन में

बेदागी व्यक्ति ऐसे व्यक्ति को कहा गया है

जिसके नाम पर कोई भी

अपराध या दुष्कृत्य दर्ज न हो और

उसकी सामाजिक प्रतिमा भी

अच्छी एवं आकर्षक हो

परन्तु अण्णा हजारे वाले एपिसोड ने इस परिभाषा को

एक नया आयाम दे दिया है

जिसके अनुसार

व्यक्ति का बेदागी होना ही काफी नही

वह जिस भीड़ के आधीन है या जिस

भीड़ को संचालित करता है

वह भी दाग-मुक्त हो

इस नए आयाम वाले बेदागी बहुत कम हैं

अगर हैं भी तो

सार्वजानिक दृष्टि-पथ से बाहर हैं

............................................... अरुण

Wednesday, April 13, 2011

सारा ध्यान कदमों के चलने पर है

कल रामनवमी थी

घर के कुछ सदस्यों को उपवास था

यानी उन्होंने रोज का

अन्न-भोजन सेवन करने की

जगह फलहार भोज किया

फलहार- केवल नाम मात्र का

जिसकी आड में तरह तरह के चटपटे व्यंजन बने

जो रोज के खाने से हट के थे

अपनी जगह से उकताया आदमी

नयी जगह की ओर चल तो पडता है

पर उसके कदम उसे अपनी ही जगह के ओर

ले आते हैं

सारा ध्यान कदमों के चलने पर है

कदमों की दिशा पर नही

...................................... अरुण

Tuesday, April 5, 2011

सामजिक मूल्य और अध्यात्म

समाज की मूल्य व्यवस्था

दो तरह की होती है

आदर्श -आधारित और

व्यवहार- आधारित

दोनों ही परस्पर विरोधी हैं

समाज ईमानदारी को पूजता है

और उस सफल व्यापारी को भी

जिसकी सफलता में

कई चालाकियों का हाँथ हो

आध्यात्म मूल्यों को नही पूजता

बल्कि सत्य की खोज से जुडकर

मूल्यों को प्रकट करता है

............................................ अरुण

Saturday, April 2, 2011

जानना और जीना

मन को मन ही जाने

तन नही जानता मन को

परन्तु

तन को तो मन

हर पल जानता रहता है

मूलतः मन का काम है जानना

और तन का काम है जीना

जानना और जीना एक दूसरे में

घुलमिल चुका है

जानने को अलग रखते हुए

केवल जीने का बोध होते रहना ही समाधी अवस्था है

................................................................. अरुण