Friday, December 31, 2010

खोज भगवान की

भगवान

खोजने से मिलने वाला नही

खोजने वाले को खोजनेपर

भगवान

मिल जाए शायद

................................. अरुण


Thursday, December 30, 2010

मन की पकड़

मन किसी भी वस्तु,

घटना, प्रसंग या स्थिति को

शुद्ध समझ से देख नही पाता

शब्द नाम और संकल्पनाओं की गति में

मन हमेशा उलझा हुआ है

जो जैसा है उसे वैसा ही देखने की जगह

देखने पर जो प्रतिमा बनती है उस

प्रतिमा को ही मन

वास्तविकता का स्थान देता है

परिणामतः

शुद्ध समझ बन ही नही पाती

............................................ अरुण


Wednesday, December 29, 2010

अहंकार से अहंकार टकराये

अहंकार करता दुजा अपने मन पर घात

अगला कद ऊँचा करे हम खुद छोटे पात

.....

यदि सामनेवाला आदमी

हमारे सामने अहंकार से

भरा आचरण करता हो

और यह बात अगर हमें चुबती हो

तो यह स्पष्ट है कि

उसका आचरण हमारे अहंकार को

ठेस पहुँचा रहा है

सामने वाला खुद की स्तुति करे यह

हम सहन कैसे कर सकते हैं क्योंकि

वह जब अपना कद बढाता है

हमें हमारा कद छोटा होता मालूम पडता है

आपसी संबंधों की यह पेचीदगी

समझने जैसी है

................................. अरुण

Tuesday, December 28, 2010

व्यक्तित्व से छुटकारा ही मुक्ति है

शख्सियत घुलती नही है प्राण-धारा में

ऊपरी है रंग, पानी पर नही चढ़ता

...................................................अरुण

Monday, December 27, 2010

आईना और जीवन

आईने के भीतर

आईने का प्रतिमा-विरहित

शुद्धतमरूप देखने के लिए

जब भी झांकता हूँ

वहाँ अपनी ही प्रतिमा के सिवा

मुझे कुछ नही दिखता

..

ये तो आइना है जिसका

सरोकार किसी से भी नही

जो भी सामने आए

प्रतिबिंबित तो हो जाता है

पर किसी भी प्रतिबिम्बन को

आइना पकड़ कर नही रखता

जीवन का शुद्धतम स्वरूप

ऐसा ही प्रतिमा विरहित

प्रतिबम्बन मात्र है

........................................ अरुण




Sunday, December 26, 2010

पूजा होती संघ की लेकर झूठ उपाय

कई पुजारी सत्य के मिलकर संघ बनाय

पूजा होती संघ की लेकर झूठ उपाय

...........

सत्य पूजने की नही

खोजने की बात है

सत्य- खोज पूरी तरह से

निजी है, संगठनात्मक नही

जहाँ संगठन बना

राजनीति या झूठ का

अवतरण होना लाजमी है

................................. अरुण


Saturday, December 25, 2010

सुगंध और लोगों की भीड़

यहाँ का माहोल, यांत्रिक भीड़

शोरोगुल और लोगों में चेहरों पर

दिखता यांत्रिक अहोभाव देखकर लगा

मानो

कोई फूल यहाँ उमड़ पड़ा होगा

अपनी सुगंध को चहुँओर फैलाते

इधर उधर से लोग खींचते चले आये होंगे

उस सुगंध के कारण

समय के बीतते फूल मुरझाया और

कालांतर से गंध भी खो गई

समय के आकाश में

परन्तु भीड़ का सिलसिला चालू रहा

भीड़ ने अपनी ही गंध को

उस सुनिसुनायी सुगंध का नाम दिया

अब भीड़ को देखकर

व्यापारियों की भी रूचि बढ़ी

उन्होंने खड़ा किया भव्य मंदिर

चढाओं की परम्परा चलाई

प्रसाद बांटना शुरू किया

भीड़ इतनी बढ़ी कि उस सुगंध के नाम से

होटलों, बसों, और टूरिस्ट सेंटरों का

भी धंधा चल पड़ा है अच्छी तरह

................................................... अरुण

Sunday, December 19, 2010

राजनीतिज्ञों की मूल कमजोरी

राजनीतिज्ञों की मूल कमजोरी

यह है कि वे हमेशा

या तो सत्ता का अवसर चूकने या

पाई हुई सत्ता खो देने के भय से ग्रस्त है

और इसीलिए अपने मन कि बात सीधे सीधे

उजागर नही कर पाते

सत्ताधारी भी डरा है

और विरोधी भी

जिनकी मौलिक धारण संविधान से मेल

नही खाती वे भी संविधान में अपना

विश्वास जताते है

और जो संविधान की मूल मान्यता से हटकर

अपनी राजनीति चलाते है वे भी

दुहाई संविधान की ही देते रहते हैं

निष्कर्ष यह कि

जिनका मन कुछ और

तो आचरण कुछ और -

ऐसों को ही राजनीतिज्ञ कहा जाता है

............................................... अरुण


Saturday, December 18, 2010

एक कैफियत वेदना भरी

क्यों न की मेरे अंतिम यात्रा की शुरुवात

उसी दिन जिस दिन मैं इस धरती पर आया

क्योंकि उसी दिन से तो शुरू कर दिया आपने

गला घोटना मेरी कुदरती आजादी का

उसी दिन तो शुरू किया आपने

मेरे निरंग श्वांसों में अपनी जूठी साँस भरकर

उसमें अपना जहर उतारना

उसी दिन से तो मुझे कैद कर लिया

आपके विचारों, विश्वासों और आस्थाओं ने

आपने बड़ा किया, बढ़ाया मुझे एक

इस अच्छे-भले कैदखाने में

अच्छी तरह से जीना सीखाया

यह कैदभरी जिंदगी,

मुझे सामान बनाया सामाजिक प्रतिष्ठा का

अब पहुँचने जा रहा हूँ अंतिम छोर पर

उस राह के

जिसका आरम्भ

कभी हुआ ही नही

.......................................... अरुण

Friday, December 17, 2010

सत्य का स्पर्श जीवंत प्रवाह में

सत्य का स्पर्श

जीवन के जीवंत प्रवाह में ही

होना है

सभी संबंधों में, अंतःक्रियाओं में.

रोजमर्रा जिंदगी में ही होना है

जैसे नदी का स्पर्श उसकी

बीच-धारा में है

तट पर बैठकर उसकी पूजा आराधना

जप-जाप करने में नही

...................................... अरुण


Thursday, December 16, 2010

जागरण कों भी जब होश आता हो .....

सपने और वास्तव के
बीच का भेद
नींद और जागरण की स्थिति के भेद
द्वारा समझाया जाता है
जब जागरण में भी नींद सक्रीय रहती है
तो जागरण कों निद्रस्थ-जागरण कहना चाहिए
प्रायः इसी निद्रस्थ -जागरण में हम सब जी रहे हैं
ऐसे जागरण कों भी जब होश आता हो
तो उस स्थिति कों ही बुद्धत्व कहते होंगे शायद
...................................................................... अरुण

Wednesday, December 15, 2010

अच्छापन या सच्चापन

सभी धर्मों का आशय इतना ही है कि

आदमी में सत्पुरुष अवतरित हो

ऐसा होने के लिए

आदमी क्या करे, यह कोई भी धर्म

न सिखाता है और न सिखा सकता है

इस प्रकार की सीख देने के प्रयास में

लौकिक अर्थ में कई तथाकथित धर्म

प्रचलित हुए पर सभी अधिक से अधिक

अच्छापन सिखा सके सच्चापन नही,

क्योंकि

सच्चापन आदमी की अपनी निजी खोज से फलता है

किसी सामाजिक अभियान से नही

...................................................... अरुण


Tuesday, December 14, 2010

सच का सच

सच का सच जब कहना चाहा सच्चों ने मुंह फेर लिया

इतनी सच्ची कडवी लगती, अच्छों ने मुंह फेर लिया

............

सच्ची बातें प्रायः सभी को अच्छी लगती है

जैसे ईश्वर की नजर में सभी एक हैं

कोई भेद नही- न जाति का, न धर्म का, न किसी तरह का’’

इस तरह के विचार अच्छों के ह्रदय को छू लें यह तो

स्वाभाविक है

परन्तु यदि ईश्वर के अस्तित्व को लेकर

कोई संदेह व्यक्त किया जाए तो

अच्छे भले लोग भी दुखी हो जातें हैं

सच का सच जानने और कहने का साहस

प्रायः सब में नही होता

................................................. अरुण

Monday, December 13, 2010

संतुलित जीवन

जो हमें थामे हुए है वह है

हमारा प्राकृतिक (आजाद) धर्म

जिसे हम थामे हुए है वह है हमारा

नीति=नियमाधीन (आरोपित) धर्म

ऐसा धर्म जो हमें हमारी

प्राकृतिक आजादी के खिलाप खड़ाकर

कमजोर बना देता है,

हमारी मूल प्रवृति को दबाता है

ताकि वह हमपर

आसानी से सत्ता बनाये रख सके

नैसगिक धर्म है हमारी आजादी और

नीति-नियमों वाला धर्म है

हमारी आजादी पर लगाम कसने वाला, पर

समाज को भानेवाला,

समाज ने रचा हुआ

तथाकथित धर्म

........

जो अपनी मूल आजादी से जुड़े हुए

समाज-धर्म निभाने का कौशल्य रखते हैं

उनका जीवन संतुलित है

जो अपनी मूल-प्रवृत्ति के खिलाफ

समाज-धर्म को ही सही माने में धर्म समझकर

जी रहे हैं उनका जीवन ढकोसले से भरा हो तो

आश्चर्य नही

..................................................... अरुण


Sunday, December 12, 2010

शांति की बात, अशांति का माहोल

हिंदू जगत में शांति चाहता है

इस्लाम भी शांति का ही पक्षधर है

दूसरे तथाकथित धर्म भी शांति के लिए ही हैं

फिर भी एक दूसरे को सामने पाकर अशांत हैं

बात तो अयुद्ध की कर रहे है पर

जी रहे हैं युद्ध के माहोल में

........................................................ अरुण

Saturday, December 11, 2010

होश सही, बेहोशी गलत

होश में जो भी होता है

सही है

बेहोशी में होनेवाली हर बात

है गलत

होश की नजर में हर रास्ता साफ़ है

सो कदम गलत जगह पड़ते ही नही

बेहोशी सोयी रहती है

विचारों में, कल्पनाओं में, अच्छे -बुरे या

सही - गलत के चयन में

कुछ पाने में, कुछ छोडने में और

इस कारण

भटक जाती है धुंधले रास्तों पर

Friday, December 10, 2010

ध्वनि है शब्द, संकेत है अर्थ

सृष्टि ने दिए

ध्वनि नाद और आकार के रूप में

शब्द

जीव ने दिया उसे

संकेत या मन्शा के रूप में

अर्थ

इसी से बनी सारी भाषा और

इसी से बना भाषाकार

...

सृष्टि न होती तो

जीव न होता और न ही होते

शब्द और अर्थ

और न ही होते

भाषा और भाषाकार

................................... अरुण









Thursday, December 9, 2010

जिंदगी छोटी, बहुत छोटी.....

जिंदगी छोटी बहुत छोटी, बहुत छोटी है

ना समझ पाए जेहन जिसकी पकड़ मोटी है

और इसीलिए जेहन या मन से

पार जाकर ही जिंदगी को जाना जाता है

.......................................................... अरुण

Saturday, December 4, 2010

बुद्धिमान और बुद्ध

केवल बाहर दुनिया को देखनेवाली बुद्धि

बुद्धिमान या पंडित का

बहुमान पाने योग्य है

परन्तु जब वह स्वयं को देखती है

बुद्ध बन जाती है

........................................... अरुण

Friday, December 3, 2010

आशय एक, अभिव्यक्ति भिन्न

नींद ही नींद से करती बातें

जागनेवालों में होती नही चर्चा कोई

....

देखना बंद हुआ बोलना हुआ चालू

ये जहाँ बोलनेवालों से ही आबाद हुआ

.....

ये घना फैल चुका है लफ्जों का नगर

के समझ लफ्जों तले घुंटती मरी जाती है

.....

ख़ामोशी- भीड़ में रहती है अकेली न हुई

हर दो लफ्ज के दरमियान बसा करती है

.....

बोलने और सुनने वाले में न फर्क कोई

एक ही जहन निभाता, दो अलग किरदार

................................................... अरुण


आशय एक, अभिव्यक्ति भिन्न

नींद ही नींद से करती बातें

जागनेवालों में होती नही चर्चा कोई

....

देखना बंद हुआ बोलना हुआ चालू

ये जहाँ बोलनेवालों से ही आबाद हुआ

.....

ये घना फैल चुका है लफ्जों का नगर

के समझ लफ्जों तले घुंटती मरी जाती है

.....

ख़ामोशी- भीड़ में रहती है अकेली न हुई

हर दो लफ्ज के दरमियान बसा करती है

.....

बोलने और सुनने वाले में न फर्क कोई

एक ही जहन निभाता, दो अलग किरदार

Thursday, December 2, 2010

सत्य की खोज को समर्पित

एक दोहा

मछली से क्या पूछना पानी कैसा होत

पानी जिसके प्राण हैं पानी जीवन ज्योत

...........

एक चिंतन

मै कौन हूँ ? इस सवाल का

कोई जबाब नही

यह एक सघन-गहन खोज है

जिसका कोई अंत नही

.............................................. अरुण


Wednesday, December 1, 2010

वही जीवंत है

सामने खड़े वर्तमान को देखना

हो ही नही पाता

क्योंकि वर्तमान में दिखता हुआ

बीता और भविष्य ही

सारा ध्यान आकर्षित कर लेता है

जो भूत और भविष्य में विचरते हुए भी

वर्तमान के स्पर्श को हर क्षण महसूस करता रहता है

वही जीवंत है

.................................... अरुण