Friday, November 29, 2013

देह–मन-प्राण से संग



“देह के जाले को, मनस का कीड़ा
दो सांसो के बीच, जगत की पीड़ा”
इस मूल सूत्र को जिसने तत्व से जान या देख लिया
वह पाएगा की वह हमेशा से ही बन्धनों के पार है
सारे बंधन माने हुए हैं, देह–मन-प्राण से संग
केवल मान्यता के कारण ही है. इस कल्पना के
चलते ही सारे बंधन सता रहे हैं
-अरुण

Thursday, November 28, 2013

चेतना बंटी और मन उभरा



नदी का पानी हर क्षण बहती धारा में नया का नया है।
किनारे खड़े पेड़ की छाया ने प्रवाह का कुछ हिस्सा ढक दिया है।
ढका हिस्सा रुका, थमासा लगता है।
नदी दो टुकड़ों में बँट गई ।
वर्तमान पर भूत की छाया पसरी
चेतना बंटी और मन उभरा
- अरुण

Wednesday, November 27, 2013

तब पता नहीं क्या होता होगा ?



समानअर्थी शब्दों का उपयोग करते हुए
यह कहना होगा कि
आत्मा-साक्षी-बोध-जागृति या Total Awareness
(या ईश्वर) निरावारण है.
साधन के रूप में जबतक ध्यान का उपयोग होता रहता है,
यह किसी न किसी आवरण में ही हुआ प्रतीत होता है.
ध्यान की ऊपरी सतह पर
यह अहंकार-धारी शरीर, मस्तिष्क या मन का आवरण पहने दिखता है
ध्यान की भीतरी अवस्था में यह निरहंकारी ‘सकल-जीववस्तु-जगत’ का
चोला पहने होता है
परन्तु जब ध्यान और साक्षी एक हो जाते हैं
तब पता नहीं क्या होता होगा ?
- अरुण  

Tuesday, November 26, 2013

भक्ति बनाम निर्भरता



भक्ति किसीपर निर्भर हो जाना नहीं,
दूसरे में सम्मिलित हो जाने का नाम है.
सम्मलेन में गुरु-शिष्य, बड़ा-छोटा, महाराज-भगत ...
इस तरह के रिश्ते नहीं होते,
सम्मेलन में सभी घटक एक दूसरे में
समर्पित सक्रियता के साथ बसते हैं
-अरुण  

Monday, November 25, 2013

शुद्ध बोध या चेतना



पारस पत्थर होता है या नहीं –
मालूम नहीं पर
इतना निश्चित है कि
यह ‘होना’ (शुद्ध बोध या चेतना) जिसे भी छूता है
वैसी ही बन जाता है. जब हम सोचते या कहते हैं कि
‘मै आदमी हूँ, हिन्दू हूँ, युवक हूँ, भारत का हूँ’
तो इन सब स्थितियों में ‘हूँ-पन’ या ‘होना’ (mere being ) ही केवल है,
अस्तित्व में मै-पन, आदमीपन, हिन्दूपन, युवकपन या
भारतपन .. इन सब को कोई स्थान नहीं
-अरुण       

Sunday, November 24, 2013

प्रवचन किसके लिए ?



प्रवचन के शब्द तो खुले आकाश में तैरते है 
जो मैदान साफ हो वहीँ पर रेंगते है
तुम उन्हें सुन पाओ तो ठीक
दिमाग का आँगन साफ़ रख पाओ तो ठीक

ख्याल रहे ...
फूल महकता है
पर किसी खास के लिए नहीं
बादल बरसता है
किसी मकसद से नहीं
जो भी गुजर जाए पास से
गंध पाता है
जो भी धरा हो धरा पर
भींग जाता है ...
अगर प्रेरणा हो पास से गुजरने की,
बरसते आकाश के नीचे टहलने की
तो गंध फूल की छू जाएगी
बूँद बूँद सूखी रुक्ष दरारों में उतर आएगी

मतलब ये कि सत्य के प्रवचन हैं
केवल प्रेरणाओं के लिए
किसी संकल्प या वासनाओं के लिए नहीं
किसी खोज या खोजी के लिए नही
बल्कि उनके लिए जिनकी सारी खोजें
थम चुकी हैं, खोजी में ही सारी खोजें सन चुकीं है
- अरुण