Monday, May 30, 2011

सम्पूर्ण जागृति में घटा आचरण ही सही है

क्या करें और क्या न करें

इस तरह की सीख

जीवन बाबत का

एक समाज द्वारा दिया प्रशिक्षण है,

इस सीख का अनुपालन करनेवाले का जीवन

समाज-प्रतिष्ठित या मान्य तो होगा

पर ऐसे जीवन को

अंतर-विरोध और अंतर-संघर्ष का भी

सामना करना पडता है

......................

वैसे एक ही सूत्र सबसे सटीक है

वह है-

सम्पूर्ण जागृति में घटा आचरण

ही सही है

................................. अरुण

Saturday, May 28, 2011

समाधी यानि एकत्व की अनुभूति

अशरीर, शरीर और
प्रतिशरीर (मन)
ये तीनो हीं
एक ही उर्जा की
तीन भिन्न लयों पर ((Rhythm)
होनेवाली अभिव्यक्तियाँ हैं
Rhythm के भिन्नत्व के
कारण से
वे तीनों भिन्न हैं ऐसा लगने लगता है
जब अवधान जागता है तो
तीनों के एकत्व (Harmony) की
अनुभूति होती है
प्रायः एकत्व की इसी अनुभूति को
समाधी कहा जाता होगा

सिर्फ पहुंचे को पहुँचने पर रास्ता दिखे

दृष्टि (Vision)

उस स्थिति का

पूरा दृश्य

स्पष्ट कर देती है

जिसमे दृष्टिधारक

पहुँच चुका है और

इस पहुंचे हुए को

वह कैसे पहुँचा

इस बात का

तर्क-पथ भी दिखला देती है

परन्तु पहुँचने का प्रयास करने वाले को

ऐसे किसीभी तर्क-पथ का

ज्ञान नही हो सकता

जो उसे सही दृष्टि दे दे

...................

दृष्टि धारक

गीता की रचना कर देता है

परन्तु गीता का अभ्यासक

दृष्टि नही पा सकता

.................................. अरुण

Friday, May 27, 2011

सिर्फ पहुंचे को पहुँचने पर रास्ता दिखे

दृष्टि (Vision)

उस स्थिति का

पूरा दृश्य

स्पष्ट कर देती है

जिसमे दृष्टिधारक

पहुँच चुका है और

इस पहुंचे हुए को

वह कैसे पहुँचा

इस बात का

तर्क-पथ भी दिखला देती है

परन्तु पहुँचने का प्रयास करने वाले को

ऐसे किसीभी तर्क-पथ का

ज्ञान नही हो सकता

जो उसे सही दृष्टि दे दे

...................

दृष्टि धारक

गीता की रचना कर देता है

परन्तु गीता का अभ्यासक

दृष्टि नही पा सकता

.................................. अरुण

Wednesday, May 25, 2011

Mind- driving और Understanding

जानने का काम

मन (देह बुद्धि ) का है

समझना काम है

ह्रदय (अस्तित्व) का

.........

अभिव्यक्ति के मोह के आधीन होकर जब

समझ मन का प्रयोग शुरू कर देती है

तब वह जानने का काम करने लगती है

वह Mind- driving बन जाती है

वैसे तो शुद्ध समझ हमेशा मन के बाहर

खड़ी है

इसीलिए शायद उसे

understanding कहते हैं

..................................... अरुण

Tuesday, May 24, 2011

अस्तिव प्रारंभ और अंत के परे

शुरुवात मन की होती है

अंत भी मन का है

अस्तित्व की न तो शुरुवात है

और न ही अंत

इसी लिए अस्तिव की कोई

परिभाषा नही बन बाती

................

मन की छोटी सी भाषा

निर्भाष को अभिव्यक्त करने में

असमर्थ है

अस्तित्व केवल हैपन का

दूसरा नाम है

................................. अरुण

Monday, May 23, 2011

मन मन खुद को मत भटकाना

मन मन खुद को

मत भटकाना

दीप जाग्रति की आभा में

मन को रिता

बना आ आ ना

उस आभा के तार तार से

बनते मन के गलियारे

मन मानस में शब्द बुन रहा

जिसमें अंतर सुध हारे

तार तार को छोड़ सकल

ज्योति में खुद

खो जाना

................................. अरुण

Thursday, May 19, 2011

मन भी शरीर निर्मित

बाहरी काया यानी

भौगोलिक और सामाजिक पर्यावरण के

संपर्क में आकर जिसतरह शरीर

मल मूत्र पसीना खून और ऐसी ही

कितनी रासायनिक पदार्थों की निर्मिति करता है

वैसे ही मन की निर्मिति भी शरीर द्वारा ही होती है

अन्तर इतना ही की मन को निर्मित-मन ही महसूस करता है

कोई दूसरा बाहरी शरीर नही

..........

शरीर की और पर्यावरण की

पल पल की जागरूकता को जिस तरह मल मूत्र जैसी

बातें केवल एक पदार्थ मात्र जान पड़ती हैं

मेरा मल या मेरा मूत्र जैसा तादात्म वहाँ गहराता नही

ठीक इसी तरह ऐसी जागरूकता

मन को भी एक निर्मित पदार्थ मात्र ही समझ सकती है

बिना किसी तादात्म के

.......

बस, इतनी गहरी जागरूकता जागनी होगी

............................................................... अरुण

Wednesday, May 18, 2011

अवधान और परिधान

जीते रहना ही है,जानते रहना

जी लेना है, जान लेना

जिंदगी

जीते रहने का नाम है

जी लेने का नही

जी लेने पर मन निर्मित होता है

जीते रहने में अवतरित है - अवधान

जिंदगी अवधान है

और मन है परिधान

....................................... अरुण

Monday, May 16, 2011

एक रूहानी गजल

उसने तो रोशनी दी, दिख्खे सभी ओ साफ

अपने लिए ये रोशनी दीवार बन गई

उसको कहें खुदा, खुद उसमे से निकल

अब उसकी मेहरबानी सरोकार बन गई

मैदान में खड़ा हो तसब्बुर का कोई पेड

जब पेड हो तो छाँव की दरकार बन गई

ख्वाइश की की गुलामी, मकसद की चाकरी

नाकाम साँस वक्त की सरकार बन गई

खुद से ही चल रही थी खुद की ही जुस्तजू

पल पल की खबर मुझको दीदार बन गई

.......................................... ............अरुण

Sunday, May 15, 2011

परिवर्तन बीज में यानी व्यक्ति में जरूरी

वैसे तो खुले तौर पर

समाज हमेशा ही मोह ओर लोभ से

बचने की शिक्षा देता रहा है

परन्तु दूसरी ओर उलट,

प्रतियोगिता, सफलता, महत्वाकांक्षा,

समाज में अपना वजन बढ़ाने जैसी बातों को

प्रोत्साहन और प्रतिष्ठा भी देता रहा है

जब तक ऐसी चीजों को

समाज में सम्मान है

भ्रष्टाचार, दुराचार, लूट-खसोट,,

अनावश्यक संग्रह के किस्से बने ही रहेंगे

इन बातों का विरोध तो होगा परन्तु

मनुष्य के आचरण में परिवर्तन की किसी भी

सम्भावना की अनुपस्थिति में.

..............

परिवर्तन व्यक्ति में होगा तभी

समाज बदल पाएगा

परिवर्तन बीज में होगा तभी

वृक्ष में गुणात्मक बदलाव संभव हैं

....................................................... अरुण

Saturday, May 14, 2011

टूटन की पीड़ा

चेतना (Consciousness)

के सागर में कभी चेतना

इस लहर पर केंद्रित होकर

उस लहर को निहारती हैं

तो कभी

उस लहर पर सवार होकर इस लहर से

संवाद करती है

इसी लिए सारा अन्तस्थ-सागर

हमेशा टूटा टूटा सा रहता है

जब ध्यान में सागर

एक का एक छाया हुआ हो

तो टूटन की पीड़ा शेष नही बचती

.................................................. अरुण

Thursday, May 12, 2011

कविता किसे कहें ?

अस्तित्व के साथ बना हुआ

एकत्मिक भाव

मन की खिडकी से अभिव्यक्त हो उठता है

और इसतरह

कविता का जन्म होता है

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कविता मन से उभरती तो है

पर मन का उसपर कोई नियंत्रण नही रहता

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मन की कुशलता से बनी सभी रचनाएँ

सुन्दरतम कलाकृतियाँ हो सकती है

पर कविता की स्वयं-अभिव्यक्तता

उसमें देखने को नही मिलती

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यही बात संगीत, पेंटिंग

या अन्य अभिव्यक्तियों के सम्बन्ध में भी

सच है

......................................... अरुण

Tuesday, May 10, 2011

झूठ से उभरे झूठ

झूठ से उभरा झूठ,

झूठ को

वास्तव जान पडता है

झूठ की इस सारी प्रक्रिया के प्रति जो सजग है

वह इस मिथ्या-वास्तव (Vertual Reality) से परे रहता है,

मुक्त रहता है

........................................................................ अरुण

Saturday, May 7, 2011

वे पुराने लोग अब मिलते नही

रास्ते उनकी तरफ खुलते नही

वे पुराने लोग अब मिलते नही

अब भी जिनका जिक्र छूता है जुबां

अब भी बाकी रूह पर जिनके निशाँ

जिनके साये खाब से हटते नही

वे पुराने लोग अब मिलते नही

हो अचानक रोज इक उनका दीदार

है दबा सा जहन में इक इंतजार

फिर भी हैं जो फासले मिटते नही

वे पुराने लोग अब मिलते नही

क्या पता बिसरे या रखते मुझको याद

दिल में क्या मेरी बसी अब भी मुराद ?

इन सवालातों के हल मिलते नही

वे पुराने लोग अब मिलते नही

रास्ते उनकी तरफ खुलते नही

वे पुराने लोग अब मिलते नही

.............................................. अरुण

Friday, May 6, 2011

नदी लुप्त तो किनारे भी गायब

नदी बहे तो दो किनारे

अपने आप बन जाते हैं

दरअसल, किनारे अंदर से एक के एक हैं

फिर भी दो दिखते हैं

दोनों के अलग होने का भ्रम,

दोनों को अलग इकाई बनाकर

दोनों के बीच संवाद शुरू कर देता है,

एक किनारा व्यक्ति (Subject) तो दूसरा

वस्तु बन ( Object) बन जाता है

दोनों किनारे का एकत्व जानने के दो रास्ते हैं

एक नदी के तल में उतर जाना

दूसरा- नदी के अस्तित्व को को लुप्त कर देना

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चेतना के बहाव के कारण भी

व्यक्ति और वस्तु जैसे

दो टुकड़े उभर आतें हैं

सम्पूर्ण चेतना ध्यान में उतरते ही

लुप्त हो जाती है और किनारे भी

खो जाते हैं

............................... अरुण

Thursday, May 5, 2011

भ्रष्टाचार-विरोध कहीं ढकोसला तो नही ?

जिस समाज में

दूसरे के अधिकार क्षेत्र में

घुसपैठ करने के

व्यक्तिगत आचरण को

प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर

प्रतिष्ठा प्राप्त है

ऐसे समाज में

भ्रष्टाचार मिटाने की सोचना

व्यर्थ की बात होगी

....................

देश के भीतर व्यापक तौर पर

फैले भ्रष्टाचार की निंदा करने वाले

अपने व्यक्तिगत जीवन में यदि

भ्रष्ट आचरण की प्रेरणा रखते हुए

उसी के माध्यम से अपनी प्रतिष्ठा का संवर्धन करते हों

(महत्व की आकांक्षा रखते हों, संचय प्रेमी हों )

तो उनका भ्रष्टाचार-विरोधी पैतरा

एक ढकोसला मात्र है

.......................................... अरुण

Wednesday, May 4, 2011

पागलपन दो ढंग का

पागल दो प्रकार के होते हैं -

एक वे जिन्हें वास्तव न तो दिखता है और न

समझ आता है

और दूसरे वे जो

अपने पागलपन को ही

वास्तव मान लेतें हैं

---------

एक न जानने के कारण पागल

तो दूसरे मान लेने के कारण पागल,

दोनों प्रकार दोनों में ही देखने को मिलते हैं,

शिक्षितों में तथा अशिक्षितों में भी

............................................... अरुण

Tuesday, May 3, 2011

अंगुली निर्देश या अंगुली प्रपंच

अंगुली जहाँ और जिधर इशारा कर रही है

उसे देख लेने की क्षमता

जिनमें जागी नही

वे अंगुली में ही अटक जातें है

और उसके वर्णन को ही

निर्देशित-सत्य समझ बैठते है

...........

धर्म को समझने से जो चूक गये

वे धर्म-प्रपंच को ही धर्म समझने

की भूल कर बैठते हैं

.......................................... अरुण