Saturday, June 30, 2012

असली खोज


खोज वही है जिसमें
खोजनेवाला नही होता
क्योंकि खोजनेवाला किसी
असर से बना होता है
और असली खोज-
किसी के असर में
संभव नही है
-अरुण       

Saturday, June 23, 2012

परहेज नही


होंठो को किसी लफ्ज से परहेज नही
धरती को किसी छाँव से परहेज नही
कुछ भी कहो, न फर्क उसे जान पड़े
कोई भी फलसफा हो, परहेज नही
-अरुण   

Friday, June 22, 2012

मन की स्कैनिंग और स्क्रीनिंग


जिस दिन हरेक व्यक्ति के
मन की स्कैनिंग और स्क्रीनिंग
सहज और संभव हो जाएगी व्यक्ति-व्यक्ति
के भीतर दबी राजनीति
अपना खेल न खेल पाएगी
-अरुण  

Thursday, June 21, 2012

पाप-निष्पाप


जिसके हांथो पाप घटना संभव नही
वह साधु है.
जो समझ और होश के साथ पाप न करे
वह सत्चरित्र है.
जो पाप करने से डरे
वह (पापभीरु) पापी है.
जिसके हांथो अनजाने में पाप घटता हो   
वह निष्पाप है 
जो अपने को सत्चरित्र कहलाने में रूचि रखता हो
वह ढोंगी है
और जो समझबूझकर पाप कर रहा हो
वह है पाप का सौदागर  
-अरुण  

Wednesday, June 20, 2012

सदियों से मनुष्य अशांत है


भाव से भावना और
भावना से
प्रतिक्रिया का जन्म होता है.
मनुष्य में,
उत्क्रांति की देन के रूप में,
सृष्टि से विभक्ति का भाव जागते ही
अहंकरात्मक प्रतिकियायें शुरू हो गयीं.
और इसतरह से
सृष्टि से अपनी एकांगता को भूलने के कारण
मनुष्य अन्यभाववश सृष्टि के प्रति अपने
दृष्टिकोण और आचरण रचने लगा
विभक्ति-भाव का जन्म होना,
इस मूल भूल के कारण ही
सदियों से मनुष्य अशांत है 
-अरुण

Tuesday, June 19, 2012

अस्तित्व में समाधिस्थ


देख-सुनकर चित्त में बने
अस्तित्व के स्मृतिरूप टुकड़े
अस्तित्व को चित्त में विभाजित कर देते हैं
अस्तित्व का सत्यरूप
न विभाजित होता है और
न हो सकता है ......
यह सच्चाई जिनके प्राण और ध्यान में
पल पल जीवंत है
वे अस्तित्व में पूर्णतःसमाधिस्थ हैं
-अरुण

Sunday, June 17, 2012

अस्तित्व और विचारशीलता


अस्तित्व में विचारशीलता का
अवतरण होते ही
अस्तित्व में आदमी के लिये,
नामों, संज्ञाओं, संकल्पनाओं,
विश्लेषणों और निष्कर्षों का
एक नया आयाम खुल गया.
जो न था, न है और न होगा-
उसका अस्तित्व पैदा हो गया
आदमी इसी नये अस्तित्व में रहकर 
मूल -अस्तित्व को समझने की चेष्टा कर रहा है 
-अरुण

Thursday, June 7, 2012

जागृति की तीन अवस्थाएँ


ये आसमां जो उगाता है, डुबोता सूरज 
मैदानों को उजालों और अंधेरों  का पता 
ये दो अलग हैं, ये बात न तहखाना जाने
आसमां से परे न उगता है न ढलता सूरज
- अरुण   

Wednesday, June 6, 2012

पर सत्य-स्पर्शी नही


अस्तित्वरुपी सत्य-जल में
पूरी तरह डूबा हुआ आदमी
अपने मन-जल में डुबकियां लगाता
विचर रहा है
और मन-जल में ही सत्य के बारे में
चिंतन कर रहा है.ऐसा चिन्तक
दार्शनिक तो है पर सत्य-स्पर्शी नही
-अरुण

Tuesday, June 5, 2012

दुनिया मन की रची हुई


अस्तित्व न बनता है
और न कुछ बनाता है
फिर भी इस अस्तित्व में
माया-बाधित आदमी
दुनियादार बनकर मन में
अपनी दुनिया रचता है
जबतक मन है, दुनिया कायम है
मन के ओझल होते ही
दुनिया ओझल और अस्तिव पूर्ववत कायम
-अरुण

Monday, June 4, 2012

दो शेर


तुम्हारे आनेकी उम्मीद ही मेरी जिंदगी थी
तुम्हारा आना, सो बन गया, मेरी मौत का सबब
- अरुण
रौशनी में खलल तो बने रात-ओ-सहर 
टुकड़ों में बट गया है जिंदगानी सफर
-अरुण

Sunday, June 3, 2012

जीवन का मक्सद


जो पूरा का पूरा हो
न बटा हो कहीं से भी,
जिसके न बाहर हो कुछ भी
न भीतर,
उसे न कोई आकार है और
न वह है कोई भी प्रकार
क्योंकि वह है पूरा का पूरा
अपने इस पूरेपन में
लौट आना ही है
जीवन का मक्सद
- अरुण    

Saturday, June 2, 2012

न जाना है कहीं ....


न जाना है कहीं
और न पाना है कुछ भी
न इंतजार में बैठे रहना है
जो है अभी इसी पल 
उस को ही देख लेना है
कोशिशे बेकार हैं,
न कोई राह है अलग
बस ये होश आ जाए कि
कैसे पड़ा हूँ
सच से अलग थलग
-अरुण