Wednesday, March 31, 2010

मन की तरंग

परम-वास्तव
सभी वास्तविकताओं को जानना तथ्य को जानना है
वास्तविकताओं की परम वास्तविकता को समझ के भीतर उतारना
सत्य से साक्षात्कार है
.............
संख्या का जन्म
संख्याएँ केवल दो ही हैं - 'उपस्थिति' एवं 'अनुपस्थिति'
'होना' एवं 'न होना'
'होंने' की गणना से संख्या की संकल्पना पैदा हुई
.......................
प्रज्ञान
वास्तव एवं कल्पना का मिश्रण है यह संसार
इस मिश्रण से वास्तव एवं कल्पना को (अपनी समझ में)
अलग अलग कर देख लेने को
प्रज्ञान कहते हैं
मिश्रण में ही रम जाने को अज्ञान कह सकते हैं
.................................................................... अरुण

Tuesday, March 30, 2010

मन की तरंग

सर्वव्यापी
हर जगह व्याप्त है भगवान,
मंदिर में, मस्जिद में,
घर में, बाजार में,
मुझमें, तुझमें, सबमें
इतना ही नही वह स्वयं के भीतर भी है
और बाहर भी
.................
मन का स्वाद
जगत तो निस्वाद है, स्वाद है कहीं
तो वह है हमारे मन में,
जगत तो आनंद है परन्तु
सुख दुख है निर्मिती
हमारे मन की
......................
समझ
अपनी ना समझी को ध्यानपूर्वक देख लेना ही
समझ है - इसी को ज्ञान कहें
............................................................... अरुण

Monday, March 29, 2010

मन की तरंग

आज से कुछ दिनों तक अपनी पुरानी डायरी से चुनी रचनाएँ ब्लॉग पर रख रहा हूँ .
देखिये भाती हैं या नही

अंतर्ज्ञान
ज्ञान से दृष्टिकोण बदलतें हैं
अंतर्ज्ञान से दृष्टि ही बदलती है
......................
जागना
जागना हो तो जगत की हर चीज पर जागो
सोना है तो विचारों से भी सो जाओ

अहंकार क्या है
हवा पर खिंचीं है हवा की लकीरें
ये मुद्दत गंवायीं मगर मिट न पाई
नजर भर के देखो ये सारा तमाशा
ये किसने बनाई और किसने मिटाई
.............................................. अरुण

Wednesday, March 24, 2010

आज का शेर

चलती हुई है जिंदगी, मौत रुकने को कहें
जिन्दा है भगवान इक नदी की तरह
............................................. अरुण

Tuesday, March 16, 2010

आज का शेर

खुला जहन हो, दबी आड़ में कितनी बातें
जागा वही के जिसने मुकम्मल देखा
................................................. अरुण

Monday, March 15, 2010

आज का शेर

है जिन्दा कायनात ये, खुदा का है वजूद
खुदा नही खुदा जो किसी शक्ल में ढले
.................................................... अरुण

Sunday, March 14, 2010

आज का शेर

जिस्म में साँस, आस साथ में दुनिया के बवाल
एक ही वक्त कई जगहों पे इन्सान जिए
................................................. अरुण

Saturday, March 13, 2010

बड़े अंतराल के बाद

यहाँ पाना कुछ नही बस खोना है
जो मिला यहाँ आकर उसे ढोना है
उस गठड़ी की तरह जो कभी थी ही नही
लगता रहा कि '' है " -यही रोना है
.............................................. अरुण