Monday, September 26, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय २ - दुःख और आपदा (भाग २)

धर्म-शब्द

धर्म मनुष्य-निर्मित नही है अपनी सोयी हुई यानी मन के भीतर दबी हुई अवस्था में रहकर मनुष्य धर्म के बारे में जो भी कोशिशे करता है और इस तरह जो भी रचता है, उसे मनुष्य का सुप्त-मन धर्म मान रहा है बीता हुआ वास्तव (Reality) जिसे यदि हम Actuality (तथ्य) कहें, तो कहना होगा कि वर्तमान जो एक जीवंत (spirit) है, न तो बीते (Actuality) और न ही किसी भी वास्तव के प्रभाव में है क्योंकि यह हमेशा स्मृति-मुक्त है मनुष्य सोयी अवस्था में रहने के कारण स्मृति कलापों से बंधा रहता है, बीते और वर्तमान को जाने बिना (उसे जागृत अवस्था में देखे बिना) ही उसे किसी प्रतिमा या प्रतीकों में बदल कर संग्रहित करता जाता है सारी धर्म-पुस्तकें या लिखे-कहे-सुने सन्देश धर्म नही हैं अलिखित जीवंत ही धर्म है धर्म को जैसे ही कहा-लिखा-सुना गया वह केवल स्मृति संग्रह बन कर रह गया धर्म केवल प्रत्यक्ष देखा जाने वाला जीवंत है, कोई लिखा-कहा-सुना धर्म शब्द नही ......... क्रमशः आगे अध्याय २ (भाग ३)


Thursday, September 22, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय २ - दुःख और आपदा (भाग १)

मनुष्य समाज कई समूहों और संगठनों में बट गया है, हमारे दुःख के कारणों में यह एक महत्वपूर्ण कारण है एक समूह अपने मंदिर को बड़ा समझता है तो दुसरे के लिए मस्जिद उसके गर्व का स्थान है किसी को अपने हिंदू होने का गर्व है तो दूसरा मुस्लिम धर्म को ही सच्चा धर्म मानकर जीवन जी रहा है परस्पर विरोधी श्रद्धाओं और दुराग्रहों के कारण घृणा और वैमनस्य का माहोल उभर आया है

मनुष्य, मनुष्य होने की अपनी मूल पहचान को भूलकर वह अपनी गौण पहचानों को ही अधिक महत्त्व देता दिखता है, इसका कारण है उसकी मंद-मति, जिसके प्रभाव में रहकर ही वह अपने जीवन जी रहा है इसी कारण समाज में इतनी असहिष्णुता और असुरक्षा विद्यमान है धरम के नाम पर खुनखराबा होता आया है और ऐसे हालात में मनुष्य दुःख के साये में न दिखे तो ही आश्चर्य होगा

सभी जागे हुए महात्माओं ने वर्तमान में ही ठहरते हुए गत और भावी को समझने की बात कही परन्तु अनुकरण करने वालों ने वर्तमान से हटकर गत और भावी में ही विचरते हुए, (विचार करते हुए) महात्माओं की बात समझ आ गयी ऐसा मान लिया जो बात spiritual या आत्मिक हो उसपर किसी भी धर्म की स्थापना संभव नही है परन्तु सभी तथाकथित धर्मों ने इसी असंभव को संभव बनाने का प्रयास किया है यही कारण है कि समाज में धर्म तो है परन्तु आदमी धार्मिक नही है ......... क्रमशः आगे अध्याय २ (भाग २)

Wednesday, September 21, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय १ (अंतिम भाग ८)

क्रमशः………मनुष्य निर्मित धर्म (Man Made Religions)
बुद्ध ही की तरह क्राइस्ट ने भी किसी धर्म-स्थापना की बात कभी नही सोची थी उनके चले जाने के बाद, अनुयायियों ने क्रिश्चन धर्म की स्थापना की मंदबुद्धि लोग ही ऐसा करते हैं क्योंकि वे गत-काल पर आधारित सोच के इर्द-गिर्द अपनी काल्पनिक सुरक्षा के लिए धर्म जैसी संस्था बनाने के लिए प्रेरित हो जाते हैं इसतरह बिना जाने वे बीते की गुलामी स्वीकारते हैं उनके प्रेरकों ने भले ही जीवंत समय में जीने की बात कही हो, पर अनुयायी तो अपनी मंद-बुद्धि की समझ के कारण गत-काल की गुलामी में ही अपने को सुरक्षित महसूस करते नजर आते हैं अनुयायिओं की समझ में इस तरह की गलती घटने का कारण है, अपने प्रेरक की बातों को सीधे और शुद्ध ढंग से सुनने की उनकी असमर्थता बात को सुनते समय अपने पूर्व संचित ज्ञान के माध्यम से नई बात को सुनी जाने के कारण ही ऐसी भूल हो जाती है यानी चुंकि बात असावधानी की अवस्था में सुनी जाती, बात समझने में भूल होना स्वाभाविक ही है सभी मनुष्य-निर्मित धर्म ऐसी ही भूलों के परिणाम हैं मानव मस्तिष्क को स्मृति या Memory की सुविधा प्राप्त है परन्तु यही सुविधा अंतिम-यथार्थ को समझने के मार्ग में एक बहुत बड़ी अड़चन है स्मृति चित्त को गत काल की ओर खींच ले जाती है और इस कारण वर्तमान या जीवंत समय का अनुभव होने से पहले ही गत-काल समय को अपनी पकड़ में ले लेता है और इस कारण मनुष्य जीवंत को जानने की अपनी स्वाभविक क्षमता का उपयोग ही नही कर पाता सकल मस्तिष्क प्रक्रिया के प्रति जो क्षण-क्षण सावधान हो उसी का चित्त सभी गत-वृत्तियों से मुक्त रह सकेगा

बच्चों को इस बारे में सजग करने की आवश्यकता है इस तरह की समझ जगाने वाली बातों का भी हमारी शिक्षा-व्यवस्था में समावेश हो जाए तो आनेवाली पीड़ी के लिए बहुत ही अच्छा होगा

अध्याय समाप्त

Tuesday, September 20, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय १ (भाग ७)

क्रमशः………ईश्वर (God)
वैज्ञानिकों द्वारा जिस अंतिम-यथार्थ की बात की जाती है, क्या ईश्वर वैसा ही है ? मानव वंशवादियों ने उसे मनुष्य के रूप में देखा और उसे संप्रदाय और जाती वाचक संबोधनो से नवाजा और इसीलिए प्रायः बुद्ध और जे कृष्णमूर्ति ने उसे मनुष्य के रूप में देखने की कल्पना को टालना चाहा जीसस क्राइस्ट ने ईश्वर को एक रूह कहकर उसे अंतिम-यथार्थ के रूप में देखने की बात अपने सन्देश में सुझाई है जीसस को स्व-ज्ञान होते ही उन्होंने अपने को मानव-पुत्र से आगे बढ़कर ईश्वर-पुत्र के रूप में देखना चाहा और इसी कारण उन्होंने कहा की रूहमग्न हो जाना ही ईश्वरीय रूह की सच्ची आराधना है

.......क्रमशः आगे अध्याय १ (भाग ८)

Sunday, September 18, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय १ (भाग ६)

क्रमशः ..... समय - अब-अभी और तब-तभी (Time - Present and Past)
वर्तमान यानी अभी जो है वह क्षण या काल ही जिन्दा रूह है, बीता वक्त तो है मृत-काल; इस बात को जीसस क्राइस्ट और उसके सन्देश वाहकों द्वारा कुछ उदाहरणों के साथ समझाया गया है उन्होंने यही कहा कि ईश्वर हमेशा जिन्दा रूह में ही विद्यमान है, मृत-काल या बीते समय में नही

उदाहरण- जीसस ने शिष्य से कहा आओ मेरे पीछे आओ तो शिष्य ने कहा पहले मुझे मेरे पूर्वजों को समाप्त करने का मौका दीजिए तात्पर्य यही की गत को समाप्त किये बिना जीवंत में रहना कठिन है जो लोग अपने होने से दूर बनने या संग्रह वृत्ति में रम जाते हैं वे सब बीते या past में खोये हुए हैं वे सब रूह के बाबत मृत हैं कुछ बिरले ही जो आत्म-ज्ञान या अवधान में रहते हैं, वर्तमान में उपस्थित रहकर जीवन जी रहे हैं

बीते या गत काल से आच्छादित जीवन जीने वाले लोग अंतिम या परम वास्तव या रूह को न जानने वाले ऐसे मंद-बुद्धि लोग हैं जो बुद्धि-प्रकाश विहीन होते हैं नवानुभुती, मन और दृदय तीनो ही वर्तमान से जुड़े हैं जबकि पुरानुभुती और गत हमारे बीते काल से संबद्ध है

मस्तिष्क, मन और हृदय इनके भेद को समझना भी रुचिकर लगता है मनुष्य शरीर के मस्तिष्क तथा ह्रदय की तो सर्जरी संभव है परन्तु मन की शल्य चिकित्सा नही की जा सकती शरीर में मन का न तो कोई विशेष स्थान है जहाँ वह रहता हो और न ही उसे देखा जा सकता है इस आधार पर इतना कहा जा सकता है कि मस्तिष्क और ह्रदय, दोनों पदार्थ हैं पर मन पदार्थ नही, एक जीव-धारा है मस्तिष्क में स्मृति जैसी यंत्रणा है जो बीते अनुभवों की छाप को संचित करती है, परन्तु मन और ह्रदय के पास ऐसी कोई व्यवस्था नही है स्मृति, - अनुभव, विचार और इसी से बने ज्ञान का- संग्रह स्थान है मस्तिष्क में संग्रहित ये तीनो ही बातें गत से जुडी हुई हैं, परन्तु मन और ह्रदय वर्तमान को ही अनुभूत करता है शुद्ध मन जब मस्तिष्क में संग्रहित गत के संपर्क होता है तब गत काल में भ्रमण करने के कारण मंद हो जाता है और इसीलिए हम जैसे अधिकतर लोग मंद-बुद्धि लोग हैं ऐसे मंद-बुद्धि या अशुद्ध-मन के सहवास में रहकर दी और ली जाने वाली कोई भी धार्मिक दीक्षा या सन्देश अंतिम सत्य को दर्शाने में असमर्थ होगा ऐसी धार्मिक शिक्षा शुद्ध शैतानी है जो मंद बुद्धि लोगों को भ्रमित करती है .......क्रमशः आगे अध्याय १ (भाग ७)

Saturday, September 17, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय १ (भाग ५)

क्रमशः ..... मंद-बुद्धि या अशुद्ध-मन (Dull or impure Mind)
चित्त जब उपस्थित समय या वर्तमान में न रहकर बीते या गत काल में विचरता रहता है, मन की ऐसी ही स्थिति को मंद-बुद्धि या अशुद्ध-मन कहते हैं वर्तमान ही जीवन की रूह या spirit है, न की गतकाल या बीता समय वर्तमान समय में अगर बीते कल का कुछ भी अंश या दाग है तो वह वर्तमान है ही नही जब हमारा पूरा ध्यान वर्तमान में जीवंत रहने पर होता है तभी सही अर्थ में प्रज्ञा (Intelligence) जागती है परन्तु मानवता के प्रारंभ से ही, मनुष्य ने गत-काल में जीना जाना या सीखा है और यही कारण है कि वह परम-बुद्धिमत्ता को उपलब्ध नही हो पाया .......क्रमशः आगे अध्याय १ (भाग )

Thursday, September 15, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय १ (भाग ४)

क्रमशः ..... स्व-ज्ञान (Self Knowledge)
गरीबी मिटाने के प्रयासों से जुड़े लोगों को ख्याल रहे कि यद्यपि उनका काम सराहनीय है पर उनके प्रयासों से गरीब खुश होगा, इसकी कोई निश्चिती नही जो व्यक्ति अपने स्व को या अपने होने को पूरी तरह से जान रहा हो, वह अपनी गरीबी की अवस्था में भी खुश है साधनों से सुविधा मिलती है पर सुख दुःख का स्रोत केवल साधन नही होते, यह बात अब दुनिया ने अनुभव से जान ली है जीसस क्राइस्ट और महात्मा गाँधी के जीवन से हम यह सीखते हैं कि स्व-ज्ञान केवल कष्ट-वेदना का निवारक ही नही, जीवन में सुख, शांति, मुक्ति. सम-भाव, करुणा, सहिष्णुता तथा क्षमा-भाव भरता है स्व को जानने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है हमारे में संचार करती कुछ बनने या पाने या कुछ हासिल करने की आकांक्षा एक तरफ आदमी अंतःकरण को किसी भी पूर्व संस्कार के मुक्त रखने की आवश्यकता महसूस करता है तो दूसरी तरफ, वह पाने, संग्रहित करने, या हासिल करने की ललक से बेचैन है, अपनी स्व-केंद्रित क्रियाकलापों में व्यग्र है जब तक प्रज्ञा पूरी तरह नही जागती, यह अंतर-संघर्ष बना ही रहेगा ऐसी प्रज्ञा के अभाव को जीसस ने मंद-बुद्धि तो गौतम बुद्ध ने अशुद्ध-मन की संज्ञा दी है............क्रमशः आगे अध्याय १ (भाग )

Tuesday, September 13, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय १ (भाग ३)

क्रमशः ..... हमारा अस्तित्व कैसा है?
बच्चों कों घर और स्कूल में, माँ-बाप और शिक्षक, दोनों ही, कुछ बनने और नाम धन पद हासिल कर समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने की होड़ में लगा देतें हैं। कोई कहेंगे कि इसमें गलत क्या है? अपने जीवन यापन के लिये कुछ कमाने या पाने की इच्छा तो स्वाभाविक ही है, इसमें गलत कुछ भी नही। परन्तु जब अपना महत्त्व बढ़ाने और दूसरे पर सत्ता ज़माने का ख्याल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में भीतर घर कर रहा हो, तब समझ लीजिए कि गलती घट गई।
जरूरत और लालच इन दोनों में जो अंतर है वही अंतर जीवन यापन के लिए कुछ करने और कुछ बनने के लिये कुछ करने में है। अपने 'होने' (Being) कों समझते हुए जीना और इसे बिना समझे कुछ 'बनने' (Becoming) के लिये जीना गुणात्मक रूप में दो बिलकुल ही भिन्न बातें हैं। जीवन, हम क्या हैं - इसे कहते हैं, हमारे पास क्या है - इससे जीवन का मूल स्वभाव निर्धारित नही होता।
शिक्षा प्रणाली ऊपर लिखे आशय के समाधान के लिये हो, व्यर्थ क़ी होड़, आपसी संघर्ष, निराशा और हताशा जगाने के लिए नही। जो स्वयं के प्रति जागा होगा वही अपने 'होने' (Being) में स्थिर रहकर सामान्य जीवन जीने के लिए सक्षम है। जो कुछ 'बनने' (Becoming) में जुट गया वह अपने स्थान से भटक गया। हमारी शिक्षा ऐसी हो जो हमें आत्म-ज्ञान दे यानी भीतर के प्रकाश में ही अन्दर-बाहर क़ी दिशाएं दिखलाये। संग्रह, शक्ति-संचय और प्रदर्शन क़ी इच्छा ही आपसी संघर्ष, अशांति, कलह, हिंसा और अराजकता का बीज है। यह इच्छा तभी जागती है जब स्वयं के प्रति अज्ञान हो। हमारी शिक्षा प्रणाली आत्म ज्ञान क़ी प्रेरणा देने वाला हो तो फिर ऐसी समस्याएं हल हो सकती हैं।
क्रमशः आगे अध्याय १ (भाग ४)

Sunday, September 11, 2011

The Joy of Living Together - अध्याय १ (भाग ३)

क्रमशः पीछे से ……………
जीसस क्राइस्ट ने भी यहूदी धर्म द्वारा लिखित नियमों को मानने के बजाय जीवंत वर्तमान के नियमों के अनुसार जीने की सलाह दी क्योंकि जीसस ने यह अनुभव किया कि ईश्वर (अंतिम सत्य) जीवंत वर्तमान में ही है, किसी लिखित पोथी में यानी शब्दों, प्रतीकों और प्रतिमाओं में नही. सत्य का अस्तित्व एवं सत्य के बारे में लिखी पोथियों का अस्तित्व, इन दोनों में कोई भी आपसी नाता नही, दोनों एक दुसरे के परस्पर विरोध में खड़े हैं. जिन्हें भी शब्दों और प्रतिमाओं की निरर्थकता समझ आ गयी, उन्हें ही सत्य का अस्तित्व अनुभूत हुआ. ऐसे ही सत्य को अस्तित्वमयी या स्वाभाविक धर्म या वैश्विक-धर्म कहा जा सकता है. जो प्रत्येक जीवंत क्षण में जागा है, किसी पूर्व-निर्धारित संकल्पनाओं में भटका हुआ नही, वही सही अर्थ में धार्मिक है. उसे ही धर्म ने धारण किया है. वह किसी काल्पनिक धर्म को धारण किये हुए नही है. तात्पर्य यह कि मनुष्य समाज में ऐक्य, सामजस्य और शांति का माहोल तभी बनेगा जब व्यक्ति किसी भी संगठित धर्म या धर्म-पुस्तक के प्रभाव से बचा होगा. ऐसा माहोल तैयार करने के लिए समाज के वर्तमान संविधान में कुछ सुधार की भी जरूरत होगी. किसी भी पूर्वग्रह या नियम से मुक्त व्यक्ति ही असत्य की असत्यता को समझ सकने की सक्षमता पा सकेगा. समाज में ऐसे व्यक्ति ही बहु-वंशीय एवं बहु-संस्कृति वाले समुदाय में परस्पर आदर एवं सामंजस्य लाने में सहयोगी हो सकते हैं. क्रमशः आगे …. अध्याय १ (भाग ४)

Saturday, September 10, 2011

The Joy of Living Together- अध्याय 1 (भाग २)

..........इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त ज्ञान से मुक्ति की स्थिति में शुद्ध मन यानी पूर्ण अवधान जागता है । इस जागृत अवस्था में सभी भेद मिटते हैं एवं एकात्म भाव सक्रीय होंने से, ऐसी भाव स्थिति में शांति, आनंद एवं एकलयता की अनुभूति होंने लगती है।
ज्ञान हमेशा ही गत काल से जुड़ा है अतः उसे वर्तमान की कोई खबर नही होती। जीवंत वर्तमान का जीवन जीने के लिये किसी भी ज्ञान, शब्द, प्रतिमा, चिन्ह, चित्र, प्रतिक या कोई भी चीज जो वर्तमान का प्रतिनिधित्व करे, की आवश्यकता नही है।
सेंट पाल, अष्टावक्र, गौतम बुद्ध एवं जे कृष्णमूर्ति, सभी ने स्वर्ग, भय, मुक्ति ऐसी संकल्पनाओं एवं नियमों में ढाले गये धर्मों कों स्पष्टतः नकारा है। उनके अनुसार संगठित (संकल्पनाओं पर आधारित) धर्म ही सभी मानव-पीडाओं के मूल कारण हैं। इस तरह के धर्मों (मार्गों) से सत्य समझने वाला नही, इस विचार कों जे कृष्णमूर्ति ने आगे रखा। इसी लिए सामान्य जन कों किसी भी संगठित धर्म का अनुपालन, समर्थन या प्रचार करने की प्रवृति से मुक्त रखना जरूरी है। .............. क्रमशः आगे अध्याय १ (भाग ३)

Friday, September 9, 2011

अध्याय एक - सही शिक्षा - परंपरा से निकले धर्म बनाम शांति एवं सामंजस्य

हम जिस समाज में रहते हैं वहां कुछ पाने या अर्जित करने तथा अर्जन करने की इच्छा को बहुत महत्व दिया गया है. समाज ऐसे ही लाभ-इच्छुक व्यक्तियों से बना हुआ है . हर कोई कुछ बनने की सोचता है. 'स्वयं वह है क्या, उसका अस्तित्व क्या है' - इसे ठीक से जाने बिना ही कुछ अधिक बनना चाहता है. स्वयं के बारे में पूरी तरह अनिभिज्ञ होते हुए भी स्वयं की उन्नति चाहता है. इस प्रकार की अनिभिज्ञता या अज्ञान को दूर करने के मार्ग में अगर कोई सबसे बड़ी अड़चन है तो वह है उसका ज्ञान. उसके द्वारा प्राप्त किया ज्ञान ही उसके अज्ञान का प्रमुख कारण है .
जीसस क्राइस्ट ने भी कहा है -
"You will listen and listen, but not understand, you will look and look, but not see, because this people's mind are dull"
सेंट पाल ने कहा है - "God has shown that this world's knowledge is foolishness"
गौतम बुद्ध के अनुसार - "हमारा अस्तित्व नश्वर अनिजी है, इस बारे में हम पूरी तरह बेखबर हैं. ऐसे समझे गए अस्तित्व से जुड़ा तादात्म हमारे जीवन में दुःख ही दुःख लाता है "
अष्टावक्र ने कहा- - 'मै, और कुछ नहीं. अपना शुद्ध अन्तःकरण हूँ ' - इस
धृड-विश्वास की अग्नि से अज्ञान के जंगल को जला डालो और इसतरह एक आनंदपूर्ण कष्टविहीन जीवन जी लो
जे कृष्णमूर्ति अपने प्रवचन में कहते हैं - 'मै' - जिसे हम एक निरीक्षक, अनुभवक, विचार-कर्ता के रूप में देखते हैं, वह हमारे कुल निरिक्षण- अनुभव - विचारों का एकत्रित जोड़ है. इसका मतलब यही कि 'मै -स्व-अहं'- और कुछ नहीं, हमारे ही ज्ञान का मूर्तरूप है. इसी मूल समझ के आधार पर
जे कृष्णमूर्ति अपने जीवनभर - 'ज्ञान से मुक्ति ' का सन्देश देते रहे.... क्रमशः आगे

Thursday, September 8, 2011

The Joy of Living Together – प्राकथन (दुसरा व अंतिम भाग)

जानेमाने साधु-संतो के बोध-वचनों से चुने गये प्रत्ययकारी प्रमाणों को संकलित कर उन्हें इस पुस्तक में पेश किया गया है। अष्टावक्र, संत पोल, लाउत्से, जीसस क्राइस्ट, अब्राहम, गौतम बुद्ध एवं जे कृष्णमूर्ति जैसे महान संतो एवं बुद्धों के अनुभव-वचन उद्धृत किये गये हैं। उनके आधार पर यथार्थ, प्रति-यथार्थ एवं परम-यथार्थ जैसी संकल्पनाओं पर प्रकाश डाला गया है। चर्चा में उठ्ठे मुद्दों को समझाने के क्रम में वैज्ञानिक-शोधों, क्वांटम-भौतिकी एवं तकनीकी उपलब्धियों का भी जिक्र किया गया है।

इस पुस्तक में, इस बात की चर्चा की गई है कि किस तरह जागृत-ज्ञान (Total Awareness) यथार्थ, प्रतियथार्थ एवं परमयथार्थ के भिन्नत्व की समझ रखता है। किस तरह वह चिन्हों, संकेतों, प्रतिमाओं एवं संकल्पनाओ की सार्थकता एवं निरर्थकता, दोनों को संज्ञान में लाते हुए अस्तित्वजन्य और मनुष्य-निर्मित के मिलाप को नीर-क्षीर विवेक से देखता है।

अंत में सारी चर्चा इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि जीवंत-विवेक (Total awareness) ही असत्य को असत्य के तौर पर समझ सकने में सक्षम होने के कारण तथाकथित पवित्र-ग्रंथों एवं मनुष्य-निर्मित धर्मों की असारता को तथा संकीर्ण राष्ट्रीय, जातीय, भाषाई एवं विचारधारा पर आधारित पहचान के मिथ्यापन को समझते हुए उसके बंधन से मनुष्य को मुक्त रख सकता है। जिस व्यक्ति ने कुछ बनने (becoming) के प्रयोजन को छोड़ केवल अपने होने (being) पर ही अपनी समझ बनाए रखी वही परमयथार्थ को जान सका और जो इस तरह से मुक्त हुआ वही आदमी, बिना मार्ग-क्रमण किये एवं बिना कोई समय व्यतीत किये, अचानक ही अहिंसा, करुणा, ज्ञान एवं विद्या (wisdom) को प्राप्त हो जाता है।

............................................................................ अरुण

Wednesday, September 7, 2011

The Joy of Living Together - प्राकथन

इस पुस्तक में पृथ्वीतल पर मनुष्य का अस्तित्व -स्वरूप और उसकी मान्यता, खोज, अनुसंधान, रीती-रिवाज, विश्वास, श्रद्धा, आकांक्षा तथा अभिलाषा जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। वर्तमान में, साहित्य, इतिहास, दर्शन, धर्म, विज्ञान जैसे विषयों पर अनगिनत पुस्तकें उपलब्ध हैं और ऐसी सभी पुस्तकें इस बात को उजागर करती हैं कि आदमी एक सरल सुविधापूर्ण और सफल जीवन के उद्देश्य की पूर्ती के लिए अपनी सारी उर्जा खर्च कर रहा है । वह अपने जीवन में सत्ता, सम्पति, नाम और कीर्ति पाने के लिए बेचैन है। इस तरह के संघर्ष के दौरान उसे कई संकटों, परीक्षाओं, निराशाओं तथा पीडाओं से गुजरना पड़ता है। परन्तु ऐसी जिद्दोजहद के बाद भी जब आदमी कों प्राप्त - सफलता संतोष न दे पाई तो वह यह सोचने कों विवश हुआ कि शायद यह सारा प्रयास व्यर्थ ही रहा। इसतरह, व्यर्थता-भाव से आहत हुआ चिंतनशील आदमी यह सोचने में जुट गया कि कहीं यह जीवन एक आभास मात्र तो नही।
अपने सामुहिक जीवन में खुशहाली के लिए आदमी ने अनेक तरह के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सुधारों के प्रयास कियें हैं। परतु हर सुधार के बाद आदमी कों अगला सुधार करना पड़ा है और सुधारों का यह क्रम कभी भी समाप्त होता नही दिखाई देता । अंततः यही सोच उभरती है कि हम जिसे अपना जीवन समझ रहे है कहीं वह एक भ्रम तो नही । .............................. इसके आगे कल

The Joy of Living Together - प्राकथन

इस पुस्तक में पृथ्वीतल पर मनुष्य का अस्तित्व -स्वरूप और उसकी मान्यता, खोज, अनुसंधान, रीती-रिवाज, विश्वास, श्रद्धा, आकांक्षा तथा अभिलाषा जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। वर्तमान में, साहित्य, इतिहास, दर्शन, धर्म, विज्ञान जैसे विषयों पर अनगिनत पुस्तकें उपलब्ध हैं और ऐसी सभी पुस्तकें इस बात को उजागर करती हैं कि आदमी एक सरल सुविधापूर्ण और सफल जीवन के उद्देश्य की पूर्ती के लिए अपनी सारी उर्जा खर्च कर रहा है । वह अपने जीवन में सत्ता, सम्पति, नाम और कीर्ति पाने के लिए बेचैन है। इस तरह के संघर्ष के दौरान उसे कई संकटों, परीक्षाओं, निराशाओं तथा पीडाओं से गुजरना पड़ता है। परन्तु ऐसी जिद्दोजहद के बाद भी जब आदमी कों प्राप्त - सफलता संतोष न दे पाई तो वह यह सोचने कों विवश हुआ कि शायद यह सारा प्रयास व्यर्थ ही रहा। इसतरह, व्यर्थता-भाव से आहत हुआ चिंतनशील आदमी यह सोचने में जुट गया कि कहीं यह जीवन एक आभास मात्र तो नही।
अपने सामुहिक जीवन में खुशहाली के लिए आदमी ने अनेक तरह के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सुधारों के प्रयास कियें हैं। परतु हर सुधार के बाद आदमी कों अगला सुधार करना पड़ा है और सुधारों का यह क्रम कभी भी समाप्त होता नही दिखाई देता । अंततः यही सोच उभरती है कि हम जिसे अपना जीवन समझ रहे है कहीं वह एक भ्रम तो नही । .............................. इसके आगे कल

Monday, September 5, 2011

The Joy of Living Together

कल तक ५०० पोस्ट इस ब्लॉग पर डाल चुका हूँ । अब रुकना चाहता हूँ । कल से एक पुस्तक The Joy of Living Together से सारांश रूप में चुने विचारों को इस ब्लॉग पर डालने जा रहा हूँ । यह पुस्तक श्री व्ही एस जाधव जैसे प्रबुद्ध महानुभाव ने लिखी हुई है । मेरा नाम सह- लेखक के रूप में उनके द्वारा जोड़ दिया गया है। मेरा सहयोग यत्किंचित होते हुए भी मुझे उन्होंने इतना बड़ा सन्मान दिया, यह उनके उदार ह्रदय का परिचय है ।
पुस्तक में यथार्थ, प्रति-यथार्थ और परम- यथार्थ, इन तीन फेनोमेनोज को लेकर चिंतन किया गया है।
पुस्तक का नाम - The Joy of Living Together - अद्वैत के आनंद की शाब्दिक अभिव्यक्ति है।
ब्लॉग पर जो भी लिखूंगा वह अनुवाद न होकर मेरी समझ से निकला निष्कर्ष होगा अतः मेरा यह दावा नही कि जो भी मै लिखने जा रहा हूँ वह पुस्तक का सही सही प्रतिबिम्ब है । अगर कहीं भूल दिख जाए तो वह मेरी होगी और अगर लिखा भा जाए तो उसका श्रेय पुस्तक के प्रथम लेखक श्री व्ही एस जाधवजी को दिया जाना चाहिए ।
- अरुण खाडिलकर, डोम्बिवली, महाराष्ट्र मोबाईल - ९८२०३६७२४६

Sunday, September 4, 2011

कुदरत से लेकर कुदरत को ही देना

सबका भला इसीमें है कि

आदमी अपनी गन्दगी को

कुदरत के हांथो

इसतरह सौंपे कि कुदरत उस गन्दगी को

शुद्ध एवं स्वास्थ्यकर बनाकर आदमी को

पुनः लौटा सके

चर चर से कचरा बना और पानी से नाला /

यह उसको ही सौपना जिसने इसको पाला //

कुदरत से लेकर अपने मतलब के लिए

उपयोग में लाए पदार्थ से उत्पन्न त्याज्य को अधर में फेंकना

बहुत ही गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है

उस त्याज्य को कुदरत के लिए उपयोगी बनाकर

उसे वापस देना हमारी जिम्मेदारी है

........................................................................ अरुण

Saturday, September 3, 2011

नीति नियम सामाजिक व्यवस्था के लिए हैं – -वे जीवन की अंतिम सच्चाई नही हैं

सामाजिक स्वास्थ्य एवं व्यवस्था

के लिए नीति नियम बने है,

वे उपयोगी तो हैं परन्तु उनका पालन करते समय

जीवन की क्षण क्षण की चलायमान

सच्चाई के प्रति सावधान रहना भी जरूरी हैं

बिना सावधानी के नियमों का पालन करना

एक यांत्रिक और असम्बद्ध कृति है

समुद्र में विहार करती मछलियाँ

आपस में बिना टकराए तैरती हैं किसी भी नियम का पालन किए बगैर

उनकी आपसी समझ और निरंतर बनी सावधानी ही

उन्हें किसी भी टकराहट से बचाती है

............................................. अरुण

Thursday, September 1, 2011

तभी नया जीवित रहेगा

मन नये से डरता है

क्योंकि

स्वयं पुराना है

पुराना ही बना रहना चाहता है

इसीलिए

नये को नया रहने ही नही देता

उसे पकडते ही पुराना बना देता है

मन खो जाए

तभी नया जीवित रहेगा

............................................. अरुण