Tuesday, July 31, 2012

अंतर्ज्ञान


ज्ञान से दृष्टिकोण बदलते हैं,
अंतर्ज्ञान से बदलती है दृष्टि और
फलतः सृष्टि भी
-अरुण 

Monday, July 30, 2012

वक्त


वक्त बनाये इंसाकी मुराद
खुद बना,बिगडा,हुआ बर्बाद
ये वक्त जो है इंसा का दुश्मन
की इंसा ने ही इसकी इजाद
-अरुण

Sunday, July 29, 2012

अपनी ही आँखों से दिखता


फलसफों की आँखसे कुछ भी न दिखना
ज्ञान की दीवार के उसपार उठना
बुद्ध,शंकर या कि ओशो कोई भी हों
अपनी आँखों से ही अपना रूप चखना
-अरुण    

Saturday, July 28, 2012

खुद को अलग रखकर कुछ देखता नही


जो तथ्य देख लेता चुप बैठता नही (यानी वैज्ञानिक)
जो देखता रहे कुछ सोचता नही (जीवंत आध्यात्मिक, दार्शनिक नही )

विज्ञान बडबडाता, अध्यात्म चुप रहे जो
खुद को अलग रखकर कुछ देखता नही
-अरुण 

Friday, July 27, 2012

खोज सच की


खोजने से नही हासिल ,ये ऐसा सच
अच्छा यही कि तू खोजने से ही बच
ये देख, क्यों और कौन खोज रहा है
बस देखता जा उस खोजनेवाले का सच
- अरुण 

Thursday, July 26, 2012

संवेदनशीलता (contact ness)


जबसे दिल का दौरा पड़ा है
संगदिल ने दिल को है जाना  
Though heart is in the body but body is rarely aware of it.
-अरुण   

Wednesday, July 25, 2012

ये ‘एक’ हुआ क्या ?


खयालों से बना मन, बनी जिन्दा शख्सियत
सारा जहान जबकि हुई, एक हकीकत
इंसा को समझ आएना, ये एक हुआ क्या ?
देता रहा खयाल को ही,  सारी अहमियत
-अरुण    

Tuesday, July 24, 2012

आस्तिकता


 वो है- इसबात का पूरा पूरा और
गहरा एहसास ही आस्तिकता है
केवल वो है यह कहते रहना,
मेरा उसपर विश्वास है यह दुहराते रहना
या केवल उसके गुण गाना भी आस्तिकता है
पर बनावटी और कामचलाऊ
-अरुण  

Monday, July 23, 2012

सिर्फ देखना ही


अस्तित्व को देखते ही,
उसको लेकर जानने और बोलने की लत लगी है
उसको देखना, सिर्फ देखना ही
बन पड़े तो
जिंदगी का जिंदापन दिख पड़ेगा
-अरुण

Sunday, July 22, 2012

भ्रमित, संभ्रमित, पंडित और तत्व-स्पर्शी


जो भ्रमवश अज्ञानी हैं,
डोरी को साप समझते हैं और भयभीत हैं 
कुछ ऐसे हैं जो देख रहे हैं कि
यह डोरी ही है, फिरभी संभ्रमवश भयभीत हैं
कुछ साप और डोरी के भेद का सही सही
विश्लेषण कर सकते है वे वैज्ञानिक, पंडित या दार्शनिक हैं
और जो
डोरी के डोरीपनही में डूबकर उसे जानते हैं- तत्व-स्पर्शी हैं
-अरुण  

Saturday, July 21, 2012

किसी जागे हुए की अभिव्यक्ति


अँधेरे में रहकर अँधेरे से झगडना
काम न आया,
क्योंकि पता न था
कि वह अँधेरा नही,
मेरी ही परछाई थी
पीछे खड़े सूर्य पर ध्यान ही न गया
क्योंकि
अँधेरा परछाई का ध्यान को निगल चुका था.
इसतरह तब
अँधेरा भी था और जिसपर
मेरा ध्यान नही वह उजाला भी
पर अब
अँधेरा न तो अँधेरा है और
उजाला न तो उजाला ही
........ कोई भेद नही
-अरुण  

Friday, July 20, 2012

जीवनोपयोगी दृष्टान्त


किसीने सूचित किया
 सेठजी घोडागाडी पर सवार होकर बाजार जा रहे थे.
इस सूचना में निहित तथ्य हैं
  • सेठजी का प्रयोजन बाजार जाने का था
  • गाडीवान सेठजी के आदेश का पालन कर रहा था
  • घोडा गाडीवान के लगाम-सकेतों के अनुसार अपनी दिशा और गति संवार रहा था
  • घोड़े के कदम घोड़े की मस्तिष्क के आधीन होकर काम कर रहे थे
इसतरह सेठजी अपने प्रयोजन से, गाडीवान मिले आदेश से, घोडा लगाम से और घोड़े के कदम घोड़े के मस्तिष्क से संचालित थे. हरेक का संचालक अलग होते हुए भी देखनेवाले की दृष्टि और समझ में सभी गाडीवान, घोडा और घोड़े के कदम मिलकर एक ही प्रयोजन की दिशा में संचलित लग रहे थे.
इसीतरह, अहंकार, मन, मस्तिष्क और शरीर मिलकर संचलित होते दिखते हैं, किसी बाजार या काल्पनिक प्रयोजन की दिशा में.
-अरुण

Thursday, July 19, 2012

तनहाई में बडबडाता है


सरहदें हैं जबतलक महफूज दिल में
इरादा जंग का मिटना, नही मुमकिन

तशनालब को ही ये मय नसीब है
वैसे तो कई हांथों में प्याले दिखते

झूठ से भागो तो बात नही बनती अरुण
झूठ को देखे बिना, सच को जाना किसने

जंगल में पेड तनहा चुपचाप खड़ा
ये तो आदमी है, तनहाई में बडबडाता है
-अरुण            

Wednesday, July 18, 2012

भाषा की गुत्थी


निष्काम भाव से कर्म करो, फल की आशा मत रखो
यह वाक्य कई बार कहा जाता रहा है.
परन्तु इस वाक्य में एक स्वाभाविक गुत्थी है जो इस वाक्य के आशय को
भ्रष्ट कर देती है, और इस कारण आशय ठीक ठीक समझा नही जाता.
वास्तव में,  कर्म करो- इस कथन में तुम करो, तुम्हें करना है, तुम करनेवाले या
कर्ता हो ऐसी सलाह नही है क्योंकि निष्काम का अर्थ है कि तुम कर्ता हो ऐसा भाव न रखते हुए कर्म होने दो. यदि ऐसा भाव (निष्काम भाव) सघनता के साथ होगा तो स्वभावतः ही फल की आशा का अभाव होगा.
-अरुण           

Monday, July 16, 2012

सत्य-वचनों में विरोधाभास


कभी कभी दो सत्यवचन
परस्पर विरोधी लगते हैं पर
होते नही.
पढने-सुनने वाले अगर
परस्पर विरुद्ध दिशा या जगह पर
स्थित हों तो
वचनों की दिशा बदलना भी
लाजमी हो जाता है
-अरुण       

Saturday, July 14, 2012

‘कल’ और ‘कल’ की कलकलाहट


दोनों कल
बीता-कल और आनेवाला-कल, जिंदगी को
उसके आज से भगा ले जाते हैं,
वहाँ ठहरने ही नही देते.
जो आज और अब पर ठहरा
उसे ही जिंदगी के दर्शन हुए
-अरुण 

Friday, July 13, 2012

रिक्त ऑंखें


आँखों ने जो देखा था,
उतर आया है नज़ारे में
अब जो भी दिखता है ,
नया नही हो सकता

अब नया देखने के लिए,
आँखों को भुलाने होंगे वे सारे नज़ारे
जो आँखों ने पहले देखे हुए थे
-अरुण   

Thursday, July 12, 2012

अपने मूल स्वरूप का सतत स्मरण


नाटक या फ़िल्म में
जिस प्रकार अभिनेता अपने
मूल व्यक्तित्व और पहिचान को,
एक क्षण के लिए भी
न भुलाए हुए, अपनी भूमिका को
सही सही ढंग से निभाता है,
उसी प्रकार अपने मूल स्वरूप को
न भूलते हुए, इन संसारी भूमिकाओं को
जो आदमी ठीक ठीक निभाता होगा,
वह कितना मुक्त और आनंदी होगा,
यह सोचकर ही
मै गदगद हो जाता हूँ
-अरुण  

Wednesday, July 11, 2012

जन्म-मरण, आरम्भ–अंत


जन्म-मरण, आरम्भअंत जैसी
संकल्पनाएँ कामचलाऊ हैं
क्योंकि अस्तित्व में
न कहीं भी शुरुवात है
और न कहीं भी अंत.
मस्तिष्क जहाँ से देखना
या जानना शुरू करता है
मस्तिष्क के लिए वही शुरुवात है,
और यही बात अंत के बारे में भी.
जन्म-मरण भी आदमी की समझ के अनुसार
निर्धारित होते हैं, जबकि
वास्तविकता में वे
होते ही नही
-अरुण   

Tuesday, July 10, 2012

सौ रूपये की एक पूरी बंधी नोट


जिस तरह
सौ रूपये की एक पूरी बंधी नोट में ही
सौ रुपये मूल्य की
क्रयशक्ति समायी हुई है,
नोट का कोई भी छोटा बड़ा टुकड़ा
शून्य-कीमत का है,
ठीक ऐसे ही
पूरी की पूरी चेतना या स्मृति ही
बुद्धत्व (Intelligence) को जगाती है.
परन्तु चेतना के टुकड़े
(टुकड़ों की आपसी
प्रक्रियाएँ) नाना प्रकारकी पीडाएं
उभारने वाले संघर्ष को जन्म देते हैं
-अरुण 

Monday, July 9, 2012

हम भ्रम को आधार बनाकर जी रहे हैं


हिंसा चाहे अहिंसक बनना,
बन नही सकती
अँधेरा चाहे प्रकाश बनना
बन नही सकता  
............
ऐसे दो छोरों के बीच,जिनका
न कोई आरंभ हो या अंत,
हमेशा प्रकाश ही प्रकाश है,
प्रकाश निर्विचार का,
प्रकाश (भूत-भविष्य और वर्तमान जैसे)
विभाजन विरहित समय का.

ऐसी चिरंतन प्रकाश-अवस्था में
जब विचार या विचार-गति का अधेरा
चलने लगता है,
विभाजनयुक्त समय (या मनोवैज्ञानिक समय)
का भ्रम सक्रीय हो जाता है
ऐसे भ्रम ही हमारे जीवन के
आधार बन चुके हैं
-अरुण       

Saturday, July 7, 2012

एक सार्वजानिक भ्रम


पेड के उस पार देखा, चाँद लटका था उफक पर,
पर लगे कि चाँद पर ही पेड कोई उग रहा हो 
Because of the sense of embodiment or ownership (the third among the fivefold characteristic defining the ‘Self”), we feel ourselves anchored to our bodies.
-अरुण      

Friday, July 6, 2012

ख्यालात की माटी है


ख्यालात की माटी है,ख्यालात का कारीगर
माटी की नगरी में, माटी के तने महल
इन महलों में रहकर जितने सपने आये
उन सपनों से गुजरी इंसा की उम्र-डगर
-अरुण

Thursday, July 5, 2012

विश्व- न्यूक्लियर संशोधन के क्षेत्र में कल का दिन अतिमहत्वपूर्ण


कल सर्न
इस अणु-कण संशोधन संस्था ने
हिग्ज बोसन या देव-कण के अस्तित्व की
पुष्टि कर दी है.
समझा जाता है कि यही वे कण हैं
जो निराकार या अदृश्य सृष्टि को
आकार या द्रवमान देने के लिए जिम्मेदार हैं.
कहते हैं सृष्टि का ९६ प्रतिशत हिस्सा अभी भी
निराकारावस्था (पदार्थ और ऊर्जा दोनों की एकावस्था)
की स्थिति में हैं.

भारत में सदियों से यह बात
कही जाती रही है कि
निर्गुण निराकार से ही
सगुण साकार सृष्टि का अवतरण हुआ है
परन्तु यह बात मानव बुद्धि की समझ से हमेशा बाहर रही

शायद इस नये अनुसंधान के बाद
इस बात को समझने और समझाने में
सहुलियत हो जाए
-अरुण     

Wednesday, July 4, 2012

दो भिन्न जीवन गुण


कल्पना में सराबोर हुए सत्य में जीना और
सत्य में बने हुए कल्पना में विचरना -
दो भिन्न गुण हैं.
पहला गुण है सांसारिक व्यक्ति का
तो दूसरा है अवधानी का
-अरुण 

Monday, July 2, 2012

खुशी और गम


हर खुशी है किसी गम का सबब
हर गम में किसी खुशी की तलाश
जिंदगी इन दोनों को पकड़कर चलती
कभी खुशी का तो कभी गम का साथ
-अरुण

Sunday, July 1, 2012

खोज को हासिल नही है


किसी ने कहा है ....
जितना खोजोगे सच को
न पा सकोगे उसे,
अगर ये खयाल है कि
पा लिया है उसे तो
यह सच नही कुछ और है

क्योंकि सच किसी इच्छा का और
न ही किसी कोशिश का फल है
सच तो इच्छाओं और
कोशिशों के थम जाने पर मिलता है
-अरुण