Monday, September 28, 2015

पेज ७२ तक

एक गजल
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क्योंकर सज़ा रहे हो परछाईयों के घर?
जागोगे जान जाओगे सपने के तू असर

कुछ साँस ले रहे हैं .,ज़माने के वास्ते
कुछ मेहरबाँ बने हैं ज़माने से सीखकर

जो ख़ुद को देखता है..दूजों की आँख से
दूजों को जान देता है अपनी निकालकर

उसको ही लोग कहते खरा साधु खरा संत
जिस 'संत' का है मोल किसी राजद्वार पर

जिसके लिए बदन हो किराये का इक मकान
उसको न चाहिए.......कोई दीपक मज़ार पर
अरुण


Please meditate on this –
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Mind cannot be total awareness only because it is a byproduct of unawareness. Yes, mind can be aware of itself (within) and others (without).

Awareness is not being ‘aware of’. Awareness is a state which is off (or beyond) the mind.

‘Being aware of’ is a focusing by a subject on an object, whereas, awareness is beyond subject-object duality
Arun

मेरी बातें....
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मेरी बातें सुनके शायद तुम बदल जाओ
मै बदल पाऊँ न पाऊँ कह नही सकता

रास्ते होते नही मंजिल अजब ऐसी
ऐसी मंजिल को बयां मै कर नही सकता

भीड़ बाहर भीड़ भीतर पर अकेलापन
ऐसा ख़ालीपन कि जिसको भर नही सकता

जीना मरना अलहिदा जाने जो ये बंदा
साँस लेते चरते फिरते मर नही सकता

कायनातें जी रही हैं चलती साँसों में
साँस थमते कुछ भी बाकी रह नही सकता

चाहतों से दिल लगा तो ग़म का ना कर ग़म
रिश्ता ग़म और चाहतों का टल नही सकता
- अरुण




इसपर ग़ौर करें
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हम... रूप रंग ढंग देखे जानते सिर्फ... ......शख़्सियत
बुद्ध.. स्वयं पर एक्सरे-दृष्टि डाल.. बूझ लेते आदमीयत
अरुण
एक शेर
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अल्फ़ाज़ों को रट लेने से बात नही बनती
अल्फ़ाज़ जो दिखलाते हैं वही देखना होगा
अरुण





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एक शेर
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साथ चलता  है साया मगर साथ नही देता
अंधेरे की आहट सुनते ..भाग निकलता है
अरुण

एक शेर
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दूसरों की बनाई लकीरों पर चलकर क्या जाना?
मै.. मै नही हूँ , है कोई और ही........यही जाना
अरुण

एक शेर
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अंधेरे को रौशनी... और मौत को जिंदगी कह दो
फिर न बचती जूस्तजू... ..फिर न कोई भी तलाश
अरुण


समय को विश्राम दो.........
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समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर
आस में जो थक गया उस रूप का श्रृंगारकर

नयन में बन ढल गये जलकण तुम्हारे धीर के
ओंठ पर अब सो रहे हैं ......गीत लंबे पीर के
तपन में जो जल रहा सौंदर्य उसका ख्यालकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

धडकनों में भय समाया है गमक न प्रीत की
वेदना की गूँज है.. अब गूँज ना मधु-गीत की
शुभ स्वरों को जन्म दो इस रुदन का संहारकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

असहायता का बिम्ब अब मुखपर चमकता जा रहा
नैराश्य का ही भाव अब दिल में सुलगता जा रहा
लो आसमय दुनिया इन्ही हांथो का लो आधारधर
समय को विश्राम दो ......इस बाह में तन डालकर
अरुण
एक शेर
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ओढ़ लेते तंग दिल भी शराफ़त का चोला
अच्छा वही लिबाज जो न हो तंग, न ढीला
अरुण
एक शेर
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सलीक़ा आ गया जिसमें पका वो ही बुढ़ा वो ही
बुढ़ापा वैसे तो, नादान को भी है हुआ हासिल
अरुण












एक शेर
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चाहत के मुताबिक करने की आज़ादी है .....पर बंधन में
संस्कारों में जकड़ी बैठी चाहत खुद ही है..........बंधन में
अरुण
एक शेर
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ज़ाहिर है के ये ज़मीं सबकी आसमां सबका,
फिर लफ़्ज़ मेरा या तेरा कहाँ से आ टपका ?
अरुण

तीन शेर
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ख़्यालों में, नामों में, ज़हन में.. अलग हैं सब
ख़्याल थमे, नाम छुपे... सब के सब एक हैं
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तमन्ना से बच निकलने का ख़याल
क्या किसी तमन्ना से कम है?
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मुझसे पहले जो भी आये अप्नी कहानी छोड गये
उसी कहानी की धरती पर मेरी कहानी खड़ी हुई
अरुण
एक शेर
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उठा सकता अगर लहर समंदर से तो
सतहे समंदर हो जाती टुकड़ा टुकड़ा
अरुण
एक शेर
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कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण











मानवता चहुँओर
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गंध का काम है फैलना चहुँओर, .............'अपने पराये' का कोई नही ठोर
जिसको सुगंध लगे पास हो आवेगा, .......जिसको सतायेगी दूर भग जावेगा
गंध तो गंध है... होती निर्दोष,  ...................चुनने में दोष है, चुनना बेहोश
मानव में मानवता हरपल महकती है, करुणा को भाये वो स्वारथ को डसती है
अरुण

एक शेर
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कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण

एक शेर
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कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण

एक शेर
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कहने को मैंने किया, किया जिस्ने वो मैं नहीं
किया कोई या हो गया.. उत्तर इसका ना कुई
अरुण

एक शेर
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गिनते गिनते मौजों को कट गई जिंदगी पूरी
एक बार भी इन आँखों ने देखा न समंदर पूरा
अरुण

एक ऐसी बात ......
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एक ऐसी बात है जो ध्यान में उतर आये तो बहुत कुछ कह जाती है
बात यूँ है-
आदमी अंधेरा भी देखता है और प्रकाश भी और इसीवजह अंधेरे में प्रकाश की और प्रकाश में अंधेरे की कल्पना करता  हुआ...अंधेरा या प्रकाश देखता रहता है। परंतु प्रकाश का मूल स्रोत - सूर्य,..न तो अंधेरा देखता है ओर न ही प्रकाश क्योंकि वह स्वयं प्रकाश ही है।

वास्तविकता में जीनेवाले हमसब अज्ञानयुक्त ज्ञान से काम चला रहे हैं।मगर सत्यप्रकाशी न तो अज्ञानी है और न ही ज्ञानी...क्योंकि वह स्वयं ज्ञान ही है
अरुण
एक शेर
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असलियत देखे बिना ही....कुचलते हो चाहतें
डोर को ही साँप समझे.. जड़ रहे हो लाठियाँ
अरुण

एक शेर
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धरती से हटकर... आसमां दिखता नही है
देह से ही झांक सकते रूह का फैला गगन
अरुण

कुछ शेर
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जो नही है सामने, होता बयाँ
नजर को ना चाहिए कोई जुबाँ

इन्सान के जेहन ने जो भी रची है दुनिया
भगवान दब चुका है उसके वजन के नीचे

घडे में भर गया पानी जगह कोई नही खाली
कहाँ से साँस लेगा अब घडे का अपना खालीपन

- अरुण

दो दोहे
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आदमी द्वारा होनेवाला चुनाव उसके संस्कारों से बँधा हुआ है

पहले मिर्ची खाय दे सो फिर जले जुबान
मीठा तीता सामने .........चुन मेरे मेहमान

मन को साधन बना कर जो जी पाए, वे आनंदित हैं.
जो मन द्वारा चलाए जा रहे हैं, वे त्रस्त हैं

चढ़ चक्के पर होत है दुनिया भर की सैर
जो चक्के में खो गया उसकी ना कुई खैर
अरुण
एक शेर
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है वही दिखता, वही देखनेवाला भी है
एक ही वक़्त आदमी के हैं दो दो चेहरे
अरुण

एक शेर
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वक्त तो होता नही अस्तित्व में, पर
मन चले तो... वक्त को गिनता चले
अरुण

वास्तव पर माया का परदा
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परदा आँखों पर पसरा हो या
वास्तव को ढकता हो, दोनों ही स्थितियों में वह हमें
माया में
(यानि सत्य का आभास पैदा करने वाला असत्य)
उलझाये रखता है.
इस परदे का वास्तव दिख जाते ही
आँखें और वास्तव
दोनों ही स्पष्ट हो जाते हैं
-अरुण

ज़िन्दगी रूहानी
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देखना... सबकुछ बराबर की नज़र से
ज़िन्दगी होगी तभी .....असली रूहानी
कुछ पे ज़्यादा ध्यान देना कुछ बिसरना
व्यर्थ में ही मोल लेते ...........परेशानी
अरुण


खोज रुहानी
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है जाना या नहीं गूढ़, शंका जिसको भी
खोज बनाए रखता है ....होते विनीत वह
जिसको हो अभिमान कि उसने जान लिया है
जिज्ञासा और खोज त्याज रहता भ्रमीत वह
अरुण

एक शेर
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शिकायत है के दुनिया मतलबी है
शिकायत भी तो मतलब से बनी है
अरुण
एक शेर
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दो साँस का ही फ़ासला है ज़िन्दगी
साल सालों लग गए....यह बूझने को
अरुण

६५ पेज तक का संकलन

वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
अरुण

हिंदी
ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
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मराठी
आकाश नसते तर धरणी नसती
भिंती नसत्या तर मने ही नसती
अरुण





मराठी- बोध-स्पर्शिका
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व्यक्ति आणि व्यक्तिमत्व
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कोणती भाषा लिहिणे आहे, यावर
कागदा चा पोत ठरत नसतो
कसे ही असो व्यक्तिमत्व
व्यक्ति मात्र एकच असतो
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तहानल्यां चे गोत
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तहान केवळ माझीच...
ओलावतो माझेच मी ओठ
असती जर ती सामुहिक.. तर
बनले असते 'तहानल्यांचे' ही गोत
...............................
अरुण

हिंदी - चिंतन
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विज्ञान और आध्यात्म का आपसी सहयोग
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विज्ञान और आध्यात्म आपस में एक दूसरे से सहयोग करते हुए ही... सृष्टि और उसके जीवन संबंधी सत्य को समझ सकते हैं। विज्ञान के पास सही explanations हैं तो आध्यात्म के पास सही समझ । वैज्ञानिक Explanations के सही आकलन के लिए आध्यात्मिक स्पष्टता चाहिए और आध्यात्मिक स्पष्टता के लिए वैज्ञानिक दृष्टि । विज्ञान.... ज्ञान का (यानि बोध का.. जानकारी का नही) यंत्र है तो ज्ञान या आध्यात्म...... विज्ञान का अंतिम प्रतिफल । वैज्ञानिकों की अहंता (egoism) केवल तथ्य को सामने लाती है....सत्य को नही,  तो दार्शनिकों का गूढगुंजन ( mysticism)  सत्य को केवल विभूतित करता है... अनुभूतित नही । सत्य है मनोत्तर (Beyond mind) स्पष्ट समझ.... जिसके लिए दोनों ही  ज़रूरी हैं.... वैज्ञानिक तथ्यों का स्पर्श और चित्त का उत्कर्ष ।
अरुण

हिंदी
अपनी बनाई क़ैद में जकड़ा है आदमी
न आसमां न ज़मीं कुछ भी नही क़ैद है यहाँ
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मराठी
पाहिजे ते घडत नाही, घडले ते नको आहे,
घडण्याला फक्त घडणेच माहीत, 'हवे नको' नको आहे
अरुण






.....अन्यथा सबकुछ निरर्थक
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हालाँकि बचपन से ही एक बात सुनते-पढ़ते आया हूँ ।
Health is wealth, मनुष्य भले ही यह बात स्वीकार करे,
उसके ह्रदय की गहराई को यह बात छू नही पाती, क्योंकि
उसका मन अनेक अनेक विषयों को महत्व देने लगता है।
देश, धर्म, चरित्र, पारंपरिक संपदा, विकास,शिक्षा....... एेसी कई बातें....
इधर कुछ दिनों से अस्वस्थ हूँ ।
और इस बात का अब पूरा एहसास ( या कहें की तत्व से ज्ञान हुआ है।)
हो चुका है के कि अगर स्वास्थ्य ठीक हो तो ही आदमी दुसरी बातें सोचे
अन्यथा सबकुछ निरर्थक।
अरुण

गति तो हो पर दुर्गति नहीं
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हमारी रोजाना की जिंदगी किन्ही
तात्कालिक इच्छाओं या/और लम्बे स्पष्ट -अस्पष्ट इरादों की
दिशा में बढती रहती है, या यूँ कहें उस दिशा में
खिंची जा रही होती है.
इसतरह से धकेली गई या खिंची जा रही जिंदगी
में तनाव, चिंता, भय, स्पर्धा, इर्षा, संघर्ष, द्वेष,
मतलबी नजदीकी आदि बातों का होना स्वाभाविक ही है.
इच्छाओं और इरादों की पूरी की पूरी प्रक्रिया
को साक्षीभावसे  (बिना स्वीकार या नकार के) जो देख रहा होता है
उसकी जिंदगी में गति तो है पर कोई दुर्गति नहीं
-अरुण    

गौर करें !
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ध्यान चला जाता है हमेशा अभाव की तरफ
'जो है'- उसका ध्यान ही नही रहता
- अरुण
सच्ची बात
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सकल चेतना एक ही है,
सभी की एक ही एक,
एक ही सर्वव्याप्त प्रवाह है
जो सब में से होकर
सभी दिशाओं में बहता रहता है
परंतु हरेक व्यक्ति
उसके अपने मस्तिष्क से होकर  जो मिक्शचर बह रहा है
उस मिक्शचर को अपनी व्यक्तिगत सत्ता मान बैठा है
अरुण

स्पष्ट अभिव्यक्ति  के लिए ही अधिकाधिक शब्दों
बनते जाते होती हैं।
जब कि अनुभूति के स्तर पर शब्दोंकी आवश्यकता ही नही होती।
'इच्छा' की प्रतीति में  स्व का भाव है, भय है,
विश्वास करने की वृत्ति है, संघर्ष की संभावना है,
द्वैत से जन्में सभी विकारों को दर्शाने वाले शब्दानुभव हैं ।
जिस मस्तिष्क  को केवल आवश्यकता का बोध हो, इच्छा का मोह नही,
वह मस्तिष्क भ्रममुक्त होगा।
अरुण
एक शेर
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झूठ के साये ही.... अच्छे लग रहे हैं जिंदगी को
सच की बातें मन को बहलाने में काम आती यहाँ
अरुण

यह बात तो अब टीवी चेनल्स भी समझ गए हैं
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संकट  निवारण या  टालन के या सफलता का आश्वासन  देनेवाले
मन- समझाऊ उपायों का बाजार  हमेशा ही गरम रहता आया है और रहेगा ।
जबतक  सांसारिक प्रपंच  में उलझा चित्त  पृथ्वीतल पर जिंदा है,
इन उपायों के लिए ग्राहकों की कोई कमी नहीं रहनेवाली,
यह बात तो अब टीवी चेनल्स भी समझ गए हैं
ज्योतिष्य, ग्रहमान,  टोटके व निर्मल बाबा ब्रैंड वाले कई कमर्शियल्स में
चैनलों की रुचि दिनोंदिन बढ़ रही है।
अरुण

एक जीवनोपयोगी दृष्टान्त
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किसीने सूचित किया
 “सेठजी घोडागाडी पर सवार होकर बाजार जा रहे थे.”
इस सूचना में निहित तथ्य हैं –
सेठजी का प्रयोजन बाजार जाने का था
गाडीवान सेठजी के आदेश का पालन कर रहा था
घोडा गाडीवान के लगाम-सकेतों के अनुसार अपनी दिशा और गति संवार रहा था
घोड़े के कदम घोड़े की मस्तिष्क के आधीन होकर काम कर रहे थे
इसतरह सेठजी अपने प्रयोजन से, गाडीवान मिले आदेश से, घोडा लगाम से और घोड़े के कदम घोड़े के मस्तिष्क से संचालित थे. हरेक का संचालक अलग होते हुए भी देखनेवाले की दृष्टि और समझ में सभी – गाडीवान, घोडा और घोड़े के कदम – मिलकर एक ही प्रयोजन की दिशा में संचलित लग रहे थे.
इसीतरह, अहंकार, मन, मस्तिष्क और शरीर मिलकर संचलित होते दिखते हैं, किसी बाजार या काल्पनिक प्रयोजन की दिशा में.
-अरुण





एक शेर
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नादानियों को देखो भागो न जिंदगी से
जन्नत हो जहन्नुम दोनों ही इस ज़मीं पे
अरुण

एक शेर
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परेशानियों की जड़ है मन का जला चिराग़
ख़ुद को ही रौशनी दे  .. ..बाहर न देख पाए
अरुण


एक शेर
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गिन गिन के थक रहा हूँ सागर से उठती लहरें
सागर को सब बराबर क्या लहर क्या समंदर
- अरुण
It is the individual, who is eager to understand the Universe. Universe is not aware of any individual or individuality
अरुण

भ्रमित, संभ्रमित, पंडित और तत्व-स्पर्शी
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जो भ्रमवश अज्ञानी हैं.....
डोरी को साँप  समझते हैं और भयभीत हैं ।
कुछ ऐसे हैं जो देख रहे हैं कि
यह डोरी ही है, फिरभी संभ्रमवश साँप होने की आशंका से भयभीत हैं,
कुछ साँप  और डोरी के भेद का सही सही विश्लेषण कर सकते है –
वे वैज्ञानिक, पंडित या दार्शनिक हैं
और जो यथार्थ से जुड़े रहकर डोरीपनही में डूबे हुए
डोरी को देख पा रहे हैं - वे तत्व-स्पर्शी हैं
-अरुण

एक शेर
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पत्ते का पेड से क्या रिश्ता हुआ, वे सोचें
जिनको ख़बर नही के पत्ता भी पेड़ ही है
अरुण









अस्तित्व –
खयाल-ए-इन्सा की अमानत नहीं
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जगत या अस्तित्व मनुष्य की व्याख्याओं,
उसकी गढ़ी परिभाषाओं से नहीं चलता
और न ही (जैसा की आदमी सोचता है)
अस्तित्व कहीं से आता है और
न ही कहीं जाता है, वह न बढ़ता है और
न घटता है।
मनुष्य की अपनी समझ ने
अस्तित्व को बढ़ते –घटते, आते जाते,
बदलते हुए देखा है
पर अस्तित्व हमेशा ही इन सब बातों से परे
अपने में ही स्थित है, अपने में है चालित है,
अपने में ही बढ़घट या बदल रहा है
न उसे किसी अवकाश का पता है
और किसी काल का
-अरुण

जब दीवार ढहेगी तब ...
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भीतर प्रकाश कायम है, लाना नहीं है,
फिर भी आदमी अदिव्य (unenlightened) क्यों है?
क्योंकि कल्प-सामग्री (image-material) से बने ज्ञान-समझ-अहंकार की
दीवार ने प्रकाश को उसतक पहुँचने से रोक रख्खा है,
जब दीवार ढहेगी तब ....
दिव्यत्व जागेगा
-अरुण  
एक शेर
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है ख़ुदही एक उलझन दुनिया को कोसता है
ये आदमी है.............. आदम से रो रहा है
अरुण














एक शेर
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पेड़ की छांव को लटके हुए फल खा खा कर
क्या कभी भूक जिंदगी की मिटा पाया कुई?
अरुण

एक शेर
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बह जाना चाहता हूँ सहज जिंदगी की धार में
ये वज़न मेरा मुझे साहिल तक आने नही देता
- अरुण

एक शेर
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सोच छोटी है, टूटी हुई है, है मालूम,
फिरभी, आदमी पूरा समझना चाहता है

(सत्य को जानने में एक परेशानी है ।
शेर उसी को बयां करता है।)
अरुण

धरा सत्य आकाश एक कल्पना सी.....
***********************************
धरा सत्य आकाश एक कल्पना सी
क्षितिज तो अनूठा मिलन नभ धरा का
**
यहाँ साँस जीना मगर आस माया
मनु से उसीकी लिपटती है छाया
खुले नैन जिनमे सपन हैं प्रवासी
धरा सत्य ..........
**
उठो पंख लेकर धरो ध्यान धारा
क्षितिज से भ्रमों पर भ्रमण हो तुम्हारा
धरो नित्य अवधान जो साधना सी
**
धरा सत्य आकाश एक कल्पना सी
क्षितिज तो अनूठा मिलन नभ धरा का
-अरुण
एक शेर
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कोशिशों में शोर है.. ना शांति की कोई उमीद
फेंक कंकड़ झील में .....ना रोक पाओगे तरंग
अरुण


एक शेर
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खुदा होगा अगर कहीं हंस रहा होगा
इंसान की सोच पर तरस रहा होगा
अरुण
एक शेर
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हांथ छोटे, पांव छोटे, कुल पकड सकता नही
समझ में यह आ गया है,अब नही कोई गिला
अरुण

गुरू
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अँखियाँ अंदर जोड़ दे.... वह तेरा गुरू होय ।
गर अँखियाँ गुरू से जुड़ीं अंदर का सत खोय ।।
अरुण

एक शेर
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ख़ुशी जागी.. न बतलाए....वजह क्या है
ख़ुशी में डूबने वाला ख़ुशी ही बन चुका है
अरुण

एक शेर
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एक ही साँस में सच चल पड़े...और माया भी
जिस्म का पेड़... तो मन की तिलस्म छाया भी
अरुण
दोस्त
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सारे अपनों में ये अधिक अपना
दिल के पास है एक भरोसा सा
अरुण

एक दोहा
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आँखों से ना सुन सको, कानों से ना देख
शब्दों से क्या जानना, परम मौन आवेग
अरुण

एक शेर
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अंधेरे की चमक में ही, जी रही ये जिंदगी
हकीकत और सच्चाई से ......कोसो दूर है
अरुण


एक दोहा
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जड, पत,डाली और फल- ..सभी पेड़ ही पेड़
अलग अलग कर जानते, सभी, सिवा बस पेड़
अरुण

एक शेर
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काग़ज़ की नाव चाहे समंदर पे सैर करना
कुछ ऐसी ही...... बंदे के ज़हन में उमंग है
अरुण
समझने जानने की ....
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समझने जानने की
आदत-ओ-हवस ने
रोक रख्खा है हमें
यह देखने से कि
हम भी तो एक चीज हैं, बीज हैं,
पल पल घटती घटना की एक तसबीर हैं
जिसे बाहर झांकने और जानकारी बटोरने
में ही मजा आता है
अरुण
आदमी और उसका भीडपन
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आदमी अपनी सुरक्षा के लिए
अपनी भीड़ बनाकर रहने लगा,
उस भीड़ ने अपना ‘भीड़पन’
सुरक्षित रखने के लिए आदमी में से
उसका ‘आदमीपन’ निकालकर
उसे एक मशीनी पुर्जा बना डाला.
अब दोनों, आदमी और उसकी भीड़,
एक दूसरे का इस्तेमाल करते
दिखते हैं
-अरुण

एक सच
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हवा पर खिंची हैं हवा की लकीरें
ये मुद्दत गँवाई मगर मिट न पाई
नज़र भर के देखो ये सारा तमाशा
ये किसने बनाई और किसने मिटाई ?
- अरुण















जहाँ से चल पड़ा वही था ठिकाना मंजिल
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जहाँ से चल पड़ा वही था ठिकाना मंजिल
भटक चुका है आदमी समाज में गिरते
नये नियम समाज ने जो उसको बांधे हैं  
वे नियम, दूर निकल जाने के ही काम आते

उन्ही नियम से आदमी, गर तलाशे मंजिल
कैसे पाएगा उसे दूर निकल जाएगा
उलट जो चल पड़े, जहाँ से चल पड़ा था कभी
वही मंजिल  पे सही हाल में लौट आएगा
-अरुण

एक शेर
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जब अचानक सामने ख़तरा उभर आये
तबही होती कारवाई, सोचना होता नही
अरुण

एक सच
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जहाँ धूप पहुँची नही.. वह छाया है
उसको सच मान लेना ही.. माया है
अरुण
एक सच
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जाननेवाला अधूरा जानता है
जागनेवाले को सारा दिख रहा
अरुण

एक शेर
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खुदा कहें तो कहें किसको?... संजीदा तलाश
इसी तलाश में शायद...... खुदा से हो पहचान
अरुण
एक शेर
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दूसरे का क्या भरोसा सत्य अपने में ही देखो
इल्म ऐसा जो के ......सिखलाया नही जाता
अरुण




देश का बस नाम लेती
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देश का बस नाम लेती
उल्लु  सीधा करती अपना
पार्टियाँ ये राजनीति की बडी चालाक हैं
अपने पापों को छुपाना
दोष रखना दूसरों पर
अपनी छबि को शुभ्र करने में बडी निष्णात हैं
अरुण

आज स्वतंत्रता दिवस.....
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
सभी देशवासियों को मुबारक....
इन शुभकामनाओं के साथ कि
देश का जनतंत्र ऐसी ऊंचाईंयों को छू ले
जहाँ सत्ताधारीययों को सत्ता का मद न हो
विपक्ष को मतलबी असहयोग का रोग न हो
लोग एक भीड़ का हिस्सा बनकर वोट न करें
मतदाताओं के पास अपना व्यक्तिगत
राजनैतिक मत रचने की क्षमता हो ताकि वे
किसी 'हवा' का शिकार न बन सकें
अरुण

एक विनम्र सुझाव
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अब तक तो आप उनकी बेईमानियों का
ज़िक्र करते रहे क्योंकि आप को जीतना था
अब जीतकर भी आप......वही  सब दुहराए चले जा रहे हो.....
ये तो बेईमानी है
लोग आपकी कारगुज़ारीयों को देखना चाहते हैं
पहले जो भी हुआ....उसका जवाब तो वे ख़ुद ही दे चुकें हैं
आप अपना समय जाया न करें.. काम में लग जाएँ
अरुण



एक  शेर
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तमन्नाओं ने जिंदगी मुश्किल कर दी
चाह पे अड गई... हवस पैदा कर दी
अरुण
एक शेर
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जो तुम हो...... गर वही चाहते हो हो जाना
फिर किधर जाना, क्या पाना, क्या खो देना?
अरुण

एक शेर
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दिलासा दे नही पाई ख़ुशी क्या काम की वह
ख़ुशी के पार जाने पर मिला करती तसल्ली
अरुण

बिदाई की घड़ी आते .........
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बिदाई की घड़ी आते.. तुम्हें ही रोना आता है ?
हमारे दिल ने भी हर दर्द का एहसास जाना है
शिकायत है अगर तुझको हमें रोना नही आया
तो मतलब तुझको मेरे दिल की गहराई को पाना है

मै जानता हूँ ......तुमने अश्कों को दबाया था
लबों पे मुस्कुराहट की लकीरें ही बनाई थी
तुम्हारे दिल में जो उभरी हुई थी सख़्त बेचैनी
छुपाओ लाख.. फिर भी तेरे चेहरे पर समाई थी

बेचारा दिल मुहब्बत की बडी उलझन सम्हाले था
के तेरी उलझनों को देखकर मुश्किल न हो जाए
के औरों से बचाकर जिसको ख़ामोशी में ढाला है
वही उल्फत कहीं अश्कों में ढल ज़ाहिर न हो जाए

गर कहती हो तो तेरे अश्क़ का हर्ज़ाना भर दूँगा
मगर ये शर्त है मुझको कभी भी याद ना लाना
अगर एहसास हो जाए कि तुमने याद लाया था
ख़ुशी से झूम अपने अश्क़ को अनजाना कर दूँगा
अरुण

एक शेर
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क़ुदरत को जो मिली है वैसी नज़र को चूके
इंसान अपनी हद से बाहर निकल न पाया
अरुण

एक शेर
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जो बयां करते नज़ारा... लफ़्ज़ कहलाते मगर
आँख को जो खोल देते लफ़्ज़ से बढ़कर हुए
अरुण
एक शेर
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आदतें मजबूर हैं ..........झूठ को सच मान लेतीं
बंद आँखों को दिखा जो भी.. उसे सच मान लेतीं
अरुण

एक शेर
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चाँद को भी .............खोज लेता है इरादा
यह इरादा जागे कैसे, खोज असली है यही
अरुण

एक प्रेम गीत
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न शरमाओ हमारे गीत पढ़कर
तुम्हारी साद इसमें है.. ..तुम्हारा प्रेम इसमें है
तुम्हारे रूप-मदिरा का मधुरतम जाम इसमें है
गवांता ही गया मै ख़ुद को ऐसे गीत गढ़कर
न शरमाओ....

तुम्हारी लाज को पाकर भरी हर आह इसमें है
तुम्हारे संग जीने की .....बनी हर चाह इसमें है
सजाये याद के मोती, इन्हीं गीतों में जड़कर
न शरमाओ ....


तुम्हारे और मेरे जज़्ब की ...........तस्वीर इसमें है
इन्हीं दो दिल को.. जो जकड़े वही ज़ंजीर इसमें है
हँसी-आँसू ..मोहब्बत के ......गिराये इसमें खुलकर
न शरमाओ हमारे गीत पढ़कर
अरुण

एक शेर
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नातों रिश्तों की ज़रूरत को निभाता.. ये दिमाग़
रुहानी सांस की वह पहली झलक भूल गया
अरुण
एक शेर
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नही है एहसास अपनी नाकाबिलियत का..सही माने में
यही वजह के .................उछलकूद अभी भी जारी है
अरुण

रुबाई
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जितनी हो कशिश तेरे मेरे दरमियाँ
अल्फ़ाज़ भी उतने ही गरम होते हैं
मिलन से ख़त्म हुई जाती है हर दूरी
दौर जज्बों के उतने ही नरम होते हैं
अरुण
एक शेर
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परसों क़रीब डेड घंटे general anaesthesia के प्रभाव में रहा।
बाद में यह सूझा कि.....
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जहां में रहते हुए भी न कुछ भी जान सका
यही तो मौत थी मेरी इसके सिवा और क्या था?
अरुण

एक शेर
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जिंदगी चलती है अपले आप, ......न चलाता कोई
यह सोच कि चलाता मै हूँ, सिरफ है इक सोच कोई
अरुण

एक शेर
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किसी भी बात का हो ज़िक्र या कोई याद आए
हम अपनी मौजूदगी को ......न कभी भुला पाए
अरुण

संत भी संसारिकताजन्य मनोविकारों के शिकार
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सभी मनोविकार, माया-मोह (मूल-भ्रम) की ही संताने हैं।ये विकार संतत्व-प्राप्त लोगों को भी खा जाते हैं।उनका मोह दिखने में भले ही अलग दिखता हो पर स्वभावतः  मोह ही होता है......
संत के इर्दगिर्द जमा होनेवाली भीड़,बड़ी तादाद में आनेवाला चढ़ावा, मिलनेवाला राजशाही सन्मान, बढती संगठन शक्ति ....ऐसी कई बातें उनके संतत्व को खा जाती है, और वह भी छुपी तर्ज में अहं-गीत गाने लगता है।
जिन्हें ऐसे लोगों पर अपनी भक्ति जताना, एक सुरक्षा-उपाय या गौरवपूर्ण कार्य प्रतीत होता है,  वे उन संतों के अहं को खुराक देते रहते हैं
-अरुण
एक शेर
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अपनी जगह से हटके सिरफ सोचना बना
अपनी जगह रहा......उसीसे देखना हुआ
(सोचना विकल्प नही है..देखने का )
अरुण
एक शेर
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( मंजिल एक फिर रास्ते अलग अलग क्यों?)

जो जहाँपर था वहीं से चल पड़ा फिर घाट पहुँचा
घाट जो नज़दीक..उसकी सीढ़ियाँ से उतर पाया
अरुण
इस कथन पर ग़ौर करें
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आदमी मरता नही है ......आदमी के रूप में मरता भले हो
दूरियाँ होती नही हैं.. कालपथ धर आदमी चलता भले हो
- अरुण


इस कथन पर ग़ौर करें
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आदमी स्वयं जिसकी गोद में है.. उसे ढूँढने के लिए वह
अपने से बाहर निकल पड़ता है और अपने ही रचे रास्तों पर
भटकता रहता है
अरुण

आजकल राजनीति के अखाड़े में ' विकास' (इस शब्द का) उच्चार/ घोषणा/दावा बड़े धड्डले से होता दिख रहा है । इस फॅशनेबल शब्द के जाल से मतदातागण को बचना होगा। इस शब्द का विस्तृत आशय हरेक के दिमाग़ में अलग अलग हो सकता है । किसी वर्ग या समूह विशेष की आज़ादी का शोषण करते हुए भी देश को बलशाली और तथाकथित रूप से विकसित किया जा सकता है। विकास का नाम लेकर जन-आज़ादी का बली देनेवाले और वोटों के लिए आरक्षण की पहल कर देश को कमज़ोर करनेवाले, दोनों ही एक ही श्रेणी के विचार हैं।

परंतु मीडिया अगर सशक्त व तटस्थ होगा तभी लोगों को विकास का सही आशय समझाने की प्रक्रिया चालू रह सकती है।

५० पेज तक का संकलन

सच्ची बात
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कोई तो क़रीबी होते हैं......कोई तो पराये होते हैं
ऐसे भी कई रिश्ते जोके  शिद्दत से भुलाये होते हैं
अरुण
सच्ची बात
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हर जगत की सहुलियत को रच दिया है सोच ने
सहुलियत ने सोचने की...रच दिया ईश्वर सहज
अरुण
सच्ची बात
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आदमी है जब..... आदमी से ही डरा हुआ
फिर अमन-ओ-चैन कहां और किधर से आएगा ?
अरुण
सच्ची बात
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इशारे करने वालों से न नजरें जोड़ के रखना
इशारा जिस तरफ़ हो उस तरफ़ ही देखना वाजिब
अरुण
सच्ची बातें
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रौशनी हो तो नज़ारा साफ़ दिखता है,
बात सही है पर....
न रौशनी न नजारा.. एक दूसरे पे निर्भर है
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भगवान रौशनी है ........ऐसी प्रखर प्रगाढ़
जिसमें सभी उजागर हैं दिल के कारोबार
अरुण
सच्ची बात
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शख़्स में हर- 'मै अलग हूँ' - ख़्याल आया
जहनियत हिलने लगी भूचाल आया
अरुण
सच्ची बात
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हज़ारों क़ायदे आये अमन-ओ-चैन के ख़ातिर
न होगा कुछ असर.....हर ज़हन में ही जंग जारी है
अरुण

सच्ची बात
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क़ुदरत को क्या पता हो... के उसका क्या वजूद
जिसमें वजूद जागा वह  क़ुदरती नही
अरुण

सच्ची बात
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ना जुडा मस्तिष्क से मन...
भिन्न दो बातें
'मै' नही होता तभी....
 यह समझ आए
अरुण

सच्ची बात
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मन तो कहता आ रहा यह जिस्म उसका ही हुआ
जिस्म का कोई नही इस जिस्म की मर्ज़ी सिवा
अरुण
सच्ची बात
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क़ुदरत को जो मिली है......वैसी निगाह दे दो
फिर देखना ही होगा सिरफ.......खोजना नही
- अरुण

सच्ची बात
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गली बाज़ार कूचे में जिसे मै ढूँढता था....घर से निकल
निकल आया के  मेरा  घर ही था वो, जहाँ मै रह रहा था
अरुण

सच्ची बातें
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छांव में छुपकर रहे.... ..होवे उजागर धूप में
छांव हो के धूप हो, सच हर जगह हर रूप में
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अधजगा हूँ, सोचता या देखता सपना कोई ?
मुझ सवाली को जगा दे नींद से पूरा कोई
- अरुण


सच्ची बात
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सूरज चमक रहा जब, तारे नज़र न आये
बुद्धों की आँख में तो दोनों सहज समाये
अरुण
सच्ची बात
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न उनमें डूबकर और न ही उनसे भागकर.....
सांस लेनी है....बवालों झंझटों के बीच रहकर
अरुण

सच्ची बात
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राह चुनने की लगन थी.....हौसला था
पर न थी मंजिल कोई ना फासला था
अरुण

सच्ची बात
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हर मंजिल कोशिश के चलते पायी जाती है
इक ऐसी भी, कोशिश के थमते... पास चली आती
अरुण
सच्ची बात
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चेहरे देखकर ही दिल से दिल जुड़ते नही हैं
फकत पढ़ शब्द गीता के प्रभु मिलते नही हैं
अरुण






















कुछ छुपी-खुली बातें
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नदी पे थिरकते हुए पानी को.... है कौन रोक पाए
ख़ुद रुकना.. रोके रखना, ये इल्म... हवा से सीखें
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
आकाश ने कहा .....
आओ मेरी चादर को ओढ़कर उड़ते रहो....
परंतु अपनी मैली फटी पुरानी चादर लपेटे हुए ही
आकाश के सपने देखता रहा है.. इंसान







एक ही रखता क़दम  हर बार वो
सोचता रहता जो...मीलों दूर की
जिस जगह बैठे नही उसकी जगह
उभर आती  मिल्कियत मगरूरस
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
बाहर न था सुकून... सो अंदर निकल गया
अंदर वही थी भीड जिसे टालता था मै
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
क़दम बढ़ा तो घटा फ़ासला क़दम भर का
मिला तो कुछ भी नही हो गई कवायत बस
अरुण

जहाँ से देखता हूँ आदमी को
आदमी के नक़्श  के
परचम बदलते जान पड़ते हैं
कभी लगता तरक़्क़ी कर रही
है क़िस्म इक सब प्राणियों के बीच
कभी दिखता कि अपनी आँख पे पट्टी
लगाकर गुनहगारी कर रहा है आदमी
कभी हल जोतकर है

एक प्रासंगिक शेर (हिंदी)
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जब तक न कर सको तुम दुश्मन का रंग फीका
अच्छाइयाँ जो तुझमें ........रौशन न हो सकेंगी
अरुण




28-5-2015

आज के लिए चार शेर
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इक दबोचे एक भागे आसमां में सब उड़ें
है खुलापन आसमां यह, आसमां में सब जिएँ

तुमने तोहफ़ा दे दिया जो उसने झुककर ले लिया
क्यों दिए.. वह क्यों झुका, ये बात कहने की नही

बयां करने से तकलीफें घनी मज़बूत होती हैं
चुभन को देखते गहिरे चुभन का दम निकलता है

शिकायत ये कि हर मसले को वो पूरा निगल जाए
उसे मालूम ........हर मसले के भीतर हैं कई मसले

अरुण

































दोन शेर व त्यांचा मराठी आशय
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नज़र के दायरे में ...जो भी आते एक हैं
नज़र गर आसमां हो, रात दिन सब एक हैं

आशय-
दृष्टी जेवढी व्यापक मनातला अभेद किंवा समत्व भाव ही तेवढाच मोठा. आकाशा साठी दिवस आणि रात्र एकच असतात. आकाशा च्या नजरेत एकाच वेळी दोन्ही घटना एकत्वाने घडत असतात.
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मंझधार तक  पहुंचकर स्वयं को भूल जाना
आसां नही है ............खुदा से रूबरू होना

आशय-
सत्य किंवा देव किंवा परम रहस्या चे दर्शन घेणे सोपे नाही..... नदी च्या अति वेगवान मध्यधारेत पोहचून त्या धारेत स्वत:ला मिसळून टाकण्या सारखी साहसी कृती आहे ही.
- अरुण







हर कोई आइने के सामने, हटना नही चाहता
जहाँ भी जाता उसे .......साथ साथ ले जाता

एहसास के जर्रों पे तजुर्बों की जमी धूल
जिंदगी.. खिदमत-ए- माज़ी में है मश्गूल
 - अरुण
चार शेर
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बुझाई आग तो तूफ़ाँन ने है सर उठाया
जनतंत्र है,  इन्तेखाब तक रुकना होगा
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घरबार सबकुछ छोड बैठे हो मगर, साधो !
इस बात का करते जिकर क्यों बार बार
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जब किनारे पर डला लंगर समझ से दूर हो
पतवार हो, हो हौसला किस काम के दोनों हुए
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हवा मलीन हुई...... लोग भी हुए नादां
न कुछ भी हो सके ख़ुशबू के लौट आने तक
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- अरुण


वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
अरुण

ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
अरुण
हिंदी शेर
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वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
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ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
अरुण
किसीपर तो भरोसा करना होगा
जो घर से आ गया हूँ निकलकर
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एक ग़लती की वजह से इतनी सारी जहमतें
बूँद ने अपने को सागर से अलहिदा कर लिया
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दूर की शुरुवात होती अपने घर से ही, मगर
घर को तो देखा नही ब्रह्मांड की बातें करें
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बिना तोड़े दिवारों को मिले मुक्ती वही  मुक्ती
"दिवारें तोड़ने का ख़्याल" भी दीवार ही तो है
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हिंदी
पूरीतरह से जानना आनंददायी
आधा-अधुरापन महज़ मन की व्यथा
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मराठी
जर उरे काही अजुन जे जाणणे आहे
जाणले ते व्यर्थ..... नुसता ताप आहे
अरुण
हिंदी
सर पे बोझ ये जो है...हज़ारों साल का है
यही कारण यहाँ जो भी मिले पहचान का है
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मराठी
जग पुराणे भेटते जावे जिथे
जन्मतो मी... पण नवा ना जन्मतो
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अरुण
हिंदी
बीज को...पेड़ बनने में...समय लगता हो, मगर
पेड के अंतस्थ झांको... बीज जिंदा है वहाँ
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मराठी
जग केंव्हाही केवळ असते, काळा ची ओळख नसते
जग म्हणजे मन नाही कि ज्याला काल-आज-उद्या असते
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- अरुण

हिंदी
ब्रह्मांड का ही जीवमय इक पिंड मानव देह भी
इस तथ्य को जो जी रहा योगी उसी को जानिए
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मराठी
भ्रम द्वैताचा लोपताच तुकड्यां चा 'योग' होतो
'योग' शब्दाचा सध्या... वेगळाच उपयोग होतो
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अरुण

हिंदी
गहरा, धूसर, फीका अंधेरा..बंद आँखों में है तीनों का बसर
रौशनी छेडती है पलकों को ..पलके हैं मगर बेख़बर बेअसर
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मराठी
कळते रात्र आणि दिवस ही दिसतो..पण सूर्य अवधाना चा उगत नाही
शहाणपण रेंगाळत राहते सभोवती पण घराच्या आंत मात्र शिरत नाही
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अरुण




६ जून २०१५
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हिंदी
ख़ुद की जगह से ही दिखे गर साफ़ सबकुछ ज़हन को
ज़हन को खोजने की, 'सोचने' की क्या ज़रूरत आ पड़े
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मराठी
अस्पष्ट अंध धुंद मन
गुदमरते भिरभिरते बावचळते
विचारा चे रूप घेऊन पळत सुटते
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अरुण




हिंदी
खोया नही कुछ भी यहाँ बंदा सिरफ भूला हुआ है
मुश्किल घनी है ये के ..भूला है यही भूला हुआ है
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मराठी
विसरलाच असता तर फक्त डोस स्मरणाचा पुरेसा होता
पण इथे दुप्पट विसर घडतो... विसरतो विसर पडल्याचे  
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अरुण

हिंदी
इधर से हो जाना वहाँ तक अगर, फिर समय चाहिए
यहाँ से यहीं तक जो मन का सफ़र, ध्यानमय चाहिए
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मराठी
पाय श्रमतात, वेळ जातो खरा... पण अंतर ही मिटतं
मनाचा प्रवास आंतल्या अांत, बाहेर कांही ही न घडतं
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अरुण
हिंदी
भीड़ में हर आदमी की दास्ताँ निजी अलग
हसना रोना एक जैसा ही मगर हर शख्स का
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मराठी
रूप रंग नाव गाव वेगळे दिसले तरी
सारखी मन वेदना संवेदना सर्वांतली
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अरुण
हिंदी
चेत धारा विश्व- मन बन बह रही है
पर हर किसी में मन बनाती उसका खास
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मराठी
चेतने चे वारे वाहे अक्ख्या मानव जगतातुन
तरी  प्रत्येकाला 'मी पणा' ची झाली बाधा
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अरुण


हिंदी
किसी ने सच देखा बोला.. तो नींद ने सुन लिया,
अब, सुना जो भी नींद ने वह, बन गया है फ़लसफ़ा
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मराठी
उघड्या डोळ्यांना सत्य दिसताच.. डोळे पुटपुटले
अन् बंद डोळ्यांनी ते ऐकताच, त्याचे शास्त्र बनले
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अरुण
हिंदी
वक़्त का हर एक ज़र्रा अंत भी शुरुआत भी है
ध्यान में ये बात आते, वक़्त मानो थम गया हो
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मराठी
अस्तित्वात नसणारा काळ....जाणीवेत येतो कसा
एक चे एक आकाश त्याचा तुकडाच दिसतो जसा
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अरुण

हिंदी
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चेतना ऊर्जा महज़.....पहचान उसपर आ बसे
पहचान की ही कोख में पहचानने वाला बसे

मराठी
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कारंजा च्या जलकण रेषांना  बाहेर चा प्रकाश ओळख देतो
ही ओळख आपल्या मनांत रुजली की कारंज जीवमय होतो
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- अरुण