Monday, August 30, 2010

शब्दों की राजनीति

दो भिन्न व्यक्ति राम शब्द

का उच्चार करतें है

उच्चार समान होते हुए भी

जरूरी नही कि उसका आशय एक ही हो

एक के राम में पूरा अखंड, असीम विश्वरूप है तो

दूसरे का राम दशरथ-पुत्र राम की

बात करता है

शब्दों को लेकर बहस छेड़ना आसान है

राजनीतिज्ञों को ऐसी बहसें अच्छी लगती हैं

........................................................... अरुण

Sunday, August 29, 2010

ध्यान वैज्ञानिक है फिर भी विज्ञान-स्वीकृत नही

मन को मन से समझने का काम

मनोवैज्ञानिक ढंग से हो जाता है

इसमें वैज्ञानिक पद्धति का ही उपयोग है

परन्तु तन-मन-अस्तित्व को सकल रूप में

समझने के लिए ध्यान का उपयोग होता है

जिसमें वस्तु-निष्ठता और व्यक्तिनिष्टता

दोनों का ही समावेश होते हुए भी इसे

अभीतक विज्ञान नही माना गया

विज्ञान - सार्वजनिक वस्तुनिष्ठ निरिक्षण है और

ध्यान - व्यक्तिगत वस्तुनिष्ठ-निरिक्षण

चूँकि यह व्यक्तिगत है, विज्ञान इसे अपनी श्रेणी में

रखने को तैयार नही

............................................. अरुण

Saturday, August 28, 2010

मनोवैज्ञानिक गुलामी

अगर रेल के डिब्बे में सीट रिझर्व हो

तो उस सीट पर दूसरे को बैठा देख

अचानक गुस्सा आ जाता है

कारण क्या है?

विश्लेषण दर्शाता है कि -

यह चीज मेरी है

ऐसा आशय जब मन में उभरता है

तब दो में से कोई एक भाव

सक्रीय हो जाता है

एक यह कि

यह चीज मेरे उपयोग के लिए उपलब्ध हुई है

या दूसरा यह कि

इस चीज पर मेरी अपनी मालकी है

पहला भाव तथ्य का परिचायक है तो

दूसरा भाव हमारी मनोवैज्ञानिक गुलामी का

.......................................................... अरुण

Friday, August 27, 2010

अनेकता में एकता

अनेकता में एकता

इस नारे को भारत में बड़ा सन्मान है

परन्तु ऐसी एकता तभी

संभव है जब

सभी एक दूसरे को

समझते हुए

एक साथ रहते हों

एक दूसरे को अड़चन समझकर

एक साथ रहना

एकता नही ला पाता

............................... अरुण

Thursday, August 26, 2010

चुनौती से भिडना-भागना या गुजर जाना

जीवन में

हर पल की चुनौती

सामने आते ही मन

या तो उससे भिड़ता है या

उससे भागने का रास्ता खोज लेता है

दोनों ही स्थितियों में मन

चुनौती से मुक्त नही है

प्रायः हम सभी जीवन

चुनौतियों से लढकर या

भागकर बीतातें हैं

जो तन-मन-दृदय से जागा हो

चुनौती उससे या

वह चुनौती से होकर

गुजर जाता है

चित्त पर चुनौती की कोई

छाप नही छूटती

...................................... अरुण

Wednesday, August 25, 2010

इच्छा यानी मानसिक उपभोग

किसी भी वस्तु या अनुभव का

मानसिक उपभोग शुरू होते ही

हम कहते है

हमें वस्तु की इच्छा हो रही है

उदाहरण के लिए

जलेबी खाने की इच्छा होने का अर्थ है

हमने मन से जलेबी खाना शुरू कर

दिया है

मानसिक उपभोग को ही

इच्छा कहा जाता है

.................................. अरुण


Tuesday, August 24, 2010

शब्दों की गाड़ी हमेशा ही खाली

शब्दों की गाड़ी हमेशा ही खाली

न इसपर कोई अर्थ लदता है और न ही

उतरता है

फिर भी इसपर लादने-उतारने का काम जारी है

इसपर अर्थ लादने वाले ने

क्या अर्थ लादा

यह लादनेवाला ही जाने

अर्थ उतारने वाले ने क्या उतारा

यह उतारने वाला ही जाने

फिर भी व्यावहारिक जगत में

यह खाली गाड़ी

अर्थ-वहन का काम करती रहती है

शब्दों से संवाद तो हो जाते हैं

पर संमिलन नही

.................................. अरुण


Monday, August 23, 2010

पहले चखें, फिर पढ़ें

बच्चे को पहले अन्न पानी जैसी चीजें

चखने को मिलती हैं

और बादमें वह उनके बाबत कुछ सुनता है,

बाद में, वह उसके ज्ञान का विषय बनती हैं

यानी पहले प्रत्यक्ष अनुभव और बाद में उसपर चर्चा हो

तो चर्चा सार्थक होगी

धर्म की चर्चाओं को ही चखने वाले

पंडित बन सकते हैं,, दार्शनिक कहला सकते हैं

जो जीवन में अपने हर अनुभव को

प्रत्यक्ष अपने अवधान से चख रहा हो

वह दार्शनिक न भी हो तो कोई बात नही

क्योंकि वह सही माने में धार्मिक है

................................................. अरुण


Sunday, August 22, 2010

प्यासे को कतरा पानी भी ......

अगर खोज गहरी हो

तो एक ही चौपाई या दोहा

काफी है

सबकुछ समझाने के लिए,

नही तो,

सारा ग्रन्थ भी किसी काम का नही

तप्सील पे तप्सील की प्यासे को क्या गरज

प्यासे को कतरा पानी भी दरिया सा लग रहा.

......................................................... अरुण


Saturday, August 21, 2010

द्विज यानी वह जो दूसरा (नया) जन्म लेता हो

माँ -बाप बच्चों को जन्म तो देते है

परन्तु अपनी ही (पुरानी)

संस्कृति, मान्यता, विश्वास, पक्ष-विपक्ष

विचार, दृष्टिकोण ......

हस्तांतरित कर अनजाने ही,

वे बच्चे को

नए जीवन (जन्म) से वंचित ही रखते हैं

माँ-बाप से पाया जन्म नया न बन पाया

क्योंकि बच्चा पुराने को ही जीता रहा



पुराने से, या यूँ कहें,

हस्तांतरित बोझ से जो

मुक्त हुआ उसी को द्विज कहा गया

द्विज यानी वह

जो दूसरा (नया) जन्म लेता हो



............................................. अरुण

Friday, August 20, 2010

न प्रारंभ और न अंत

अस्तित्व में किसी चीज का

न प्रारंभ है और न अंत

हर चीज अपना रूप बदलते हुए

प्रगट और फिर लुप्त होती है

................................... अरुण


Thursday, August 19, 2010

जनता ठंडी, नेता उबलते हुए

उबलने के लिए

जितना जरुरी होता है

उतना गरम होने से पहले ही

अगर पानी उबलने लगे तो

बात अटपटी सी लगेगी

संसद, विधानसभाओं और

सड़कों पर ऐसा अटपटा उबाल

रोज ही देखने, सुनने और पढ़ने को

मिल रहा है

................................... अरुण


Wednesday, August 18, 2010

छिटक कर सागर से ......

छिटक कर सागर से

मछली तट पर आ गिरी

छटपटाती है लौट जाने को

धीरे धीरे ...

एक नही, दो नही,

कई छटपटाती मछलियाँ मिलती हैं

बनाती हैं - समाज

समाज- जो बुनता है

अपना कल्पना-जाल

जिसके नीचे छुपकर मछलियाँ

दबा देती हैं

अपनी छटपटाहट

................................. अरुण

Tuesday, August 17, 2010

प्रायः हम सभी अस्वस्थ हैं

स्वस्थ शब्द का अर्थ है वह

जो अपनी जगह पर है

अस्तित्वमें मनुष्य हर पल

वर्तमान में ही बना हुआ है

परन्तु सांसारिकता में उलझा मनुष्य-चित्त

(प्रायः हम सभी)

हर पल वर्तमान से दूर

किसी भविष्य या भूत में टहलता रहता है

यानी वह अपनी जगह पर नही है

स्वस्थ शब्द के मूल आशय के

हिसाब से, बिरले ही होंगे

जो स्वस्थ हैं

.................................... अरुण

Monday, August 16, 2010

मन है ....

मन है मालकी

मन है तुलना

मन है कुछ पाने और बनने को

तडपना

हर क्षण या हर पल का नयापन

खो देना और ढल जाना

किसी चुने विचार में

किसी चयन या विकल्प में

सभी सामन्यताओं को भुलाकर

कुछ विशेष बनने की ललक में

.......................................... अरुण

Sunday, August 15, 2010

भारत को वाद नही, निर्विवाद की जरूरत है

आजाद भारत को

जरूरत है सिर्फ -

राष्ट्र का हित चाहने वालों की

किसीपर भी अन्याय न हो यह सोचनेवालों की

पूरे भारत को भारत समझनेवालों की

सभी धर्म केवल ऊपरी चोलें हैं ऐसा

देखने समझनेवालों की

भेद हो सकतें है पर मनो में

भेदभाव न हों इस आशय से जीनेवालों की

अब आजाद भारत को मुक्ति चाहिए

सभी वादी यों से

राष्ट्रवादियों से, साम्यवादीयों से,

अलगाववादियों से, धर्मवादियों से

बहुजन अल्पजन वादियों से

सभी वादी आंशिक सोच के शिकार हैं

हठ और जिद से बीमार है

.......................................... अरुण



Saturday, August 14, 2010

अपना बंधन चुनने की आजादी

यह मेरी अपनी राय है

कोई सिद्धांत नही,

गलत भी हो सकती है

भारत में प्रायः व्यक्तिगत स्तर पर

बहुतेरे राजनीतिज्ञ समझदार और सुलझे हुए हैं

पर पार्टीका झंडा उठाने के बाद

पार्टी की आवाज में आवाज मिलाते हुए

कुछ भी बोलने और करने को

तैयार हो जातें हैं

आजाद भारत के राजनीतिज्ञ

आजाद नही हैं

हाँ, अपना बंधन चुनने की

आजादी तो है उनके पास

................................... अरुण

Friday, August 13, 2010

सत्य नही पर सत्य-सूचक

कला शब्द को

परिभाषित करनेवाले

कहते हैं

कला एक ऐसा झूठ है जो

सत्य को अभिव्यक्त करता है

यही बात सारे पुराणों पे भी लागू

होती है

पुराणों में कही गई कहानियाँ

सत्य को समझानेवाले दृष्टांतों

जैसी हैं

सत्य नही,

सत्य-सूचक होतीं हैं

........................................... अरुण


Thursday, August 12, 2010

चार तरह के लोग – चतुर, दुर्बल, विवेकी एवं जागे हुए

मन से ऊठे संघर्षों और विकारों से

निपटनेवाले लोग व्यवहार-चतुर माने जातें है

जो ठीक से निपट नहीं पाते उन्हें भावनिक एवं

दुर्बल समझा जाता है

कुछ लोग अपने विवेक के आधीन

शांत एवं स्थिर रहतें हैं

तो कुछ ही ऐसे बिरले मिलेंगे

जिनके मन से संघर्ष और विकार उठने से पहले ही

ओझल हो जाते हों

............................................... अरुण

Wednesday, August 11, 2010

मानवता को भी है अहंकार

नवजात शिशु कों

समाजिक बनाने की

प्रक्रिया के शुरू होते ही

उसमें अपना स्वतन्त्र अस्तित्व होंने का

भाव फलने लगता है

उसका अहंकार ढलने लगता है

परन्तु सारी मानवता का भी अपना एक

अहंकार है

अस्तित्व में मानव स्वयं कों

विशेष मानता है

क्या वह विशेष है?

....................................... अरुण



Tuesday, August 10, 2010

चार तरह के लोग – चतुर, दुर्बल, विवेकी एवं जागे हुए

मन से ऊठे संघर्षों और विकारों से

निपटनेवाले लोग व्यवहार-चतुर माने जातें है

जो ठीक से निपट नहीं पाते उन्हें भावनिक एवं

दुर्बल समझा जाता है

कुछ लोग अपने विवेक के आधीन

शांत एवं स्थिर रहतें हैं

तो कुछ ही ऐसे बिरले मिलेंगे

जिनके मन से संघर्ष और विकार उठने से पहले ही

ओझल हो जाते हों

............................................... अरुण


Monday, August 9, 2010

सम्पूर्णनिष्ठता

विज्ञान वस्तुनिष्ठ है और

कला है व्यक्तिनिष्ठ

रहस्य को जाननेवाला

क्षण क्षण सम्पूर्णनिष्ठ है

जगत में अपने को देखते समय ही

अपने में जगत को देखता रहता है

दृष्टि की व्यापकता ही

उसका स्वभाव है

------

कोई देखे वस्तु को कोई मन की छाय

अपने को देखत रहो देखत जगत सराय

...................................... अरुण


Sunday, August 8, 2010

कठनाई राजनीतिज्ञों की

तथाकथित राजनीतिज्ञों की

सबसे बड़ी

कठनाई यही है कि

उनकी सारी प्रेरणा

स्वार्थ से भरी होते हुए भी

उन्हें लोक-कल्याण में रूचि दिखानी पड़ती है

लोगोंकी निगाह में अपनी अच्छी प्रतिमा

बनाए रखने के लिए

खुद से ही झगडते रहना पडता है

........................................... अरुण

Saturday, August 7, 2010

दरवाजा अनुसंधान का

अनुसंधान के दरवाजे

बंद रखनेवाले विश्वास

जीवन को आगे बढनें से रोक देतें हैं

अनुसंधान में काम आतें हैं

सहज स्वाभाविक संदेह

जो दिला सकतें है

सत्य का आनंद

केवल सच्चाई से भागनेवालों

को ही चाहिए

विश्वास की गुफाओं में

छुपने की जगह

................................. अरुण


Friday, August 6, 2010

समुद्र की लहरों को अहंकार....

समुद्र की लहरों को अगर

ख्याल हो जाए अपने लहर होने का

तो वे समुद्र के बहाव पर अपना जोर आजमाएंगी

बहाव को अपने मनचाहे ढंग से मोडने की

कोशिश करेंगी

अपना अस्तिव बचाने के लिए संगठित होंगी

किसी भी संगठन में होता है वही बात

उनमें भी होगी

वे भी आपस में लढेंगीं

अपने गुट बनाएंगी

.................................. अरुण

Thursday, August 5, 2010

सत्य – व्यावहारिक और पारमार्थिक

आकाश में विचरनेवाला पक्षी

धरती और आकाश के भेद को

सही सही देख लेता है

परन्तु वैश्विक अवकाश में

विचरनेवाली प्रज्ञां के लिए

आकाश और धरती जैसी

संज्ञाओं का कोई अस्तित्व

नही बचता

--------

व्यावहारिक सत्य से

असत्य भिन्न दिखाई देता है

परन्तु पारमार्थिक सत्य के अवतरण से

सत्य-असत्य के आपसी भेद का

कोई औचित्य नही बचता

...................................... अरुण


Wednesday, August 4, 2010

अँधेरा ढूँढ रहा है उजाला ......

सत्य कठिन है क्योंकि असत्य प्रिय है

असत्य प्रिय है क्योंकि सत्य कटु है

सत्य कटु है क्योंकि वह असत्य को काटता है

असत्य कट नही पाता क्योंकि

वह सत्य के सन्मुख ठहरता ही नही

असत्य पाना चाहता है सत्य को पर

बिना उसका सामना किए

मानो अँधेरा ढूँढ रहा हो उजाला

उससे बचकर, उससे भागकर

उससे डरकर

......................................... अरुण

Tuesday, August 3, 2010

प्रतिप्रकाश

संघर्ष

प्रकाश और अँधेरे

के बीच नही

जब प्रकाश हो तब अँधेरा बचता ही नही

तो फिर संघर्ष का सवाल कहाँ

संघर्ष अँधेरा और प्रतिप्रकाश के बीच है

सारा ज्ञानात्मक बोध प्रतिप्रकाश है

और सारा ध्यानात्मक बोध है स्वयं प्रकाश

..................................................... अरुण

Monday, August 2, 2010

धीरे धीरे कुछ नही ...

धीरे धीरे कुछ नही

यहाँ अचानक जाग

या तो मन में चेतना

या तो नींद खराब

----------

शब्दों को नही अर्थ कछु

जो जोड़ा वह अर्थ

शब्द, भाव संकेतमय

ध्वनि केवल, सब व्यर्थ

----------

एक सकल को बूझता

मुख से कहता राम

दुजा बैठ मंदिर जपे

राम राम श्रीराम

......................................... अरुण

Sunday, August 1, 2010

नंगा भूले नंगपन

माया में लिपटे हुए

सत् तो जात बिसार

नंगा भूले नंगपन

सोचत वस्त्र हजार

.......................... अरुण