Friday, November 30, 2012

मनाधीन बनाम स्वाधीन



मनाधीन आदमी
मंदिर में बैठे बैठे
बाजार में टहल रहा है,
घर में खाना खाते समय भी
उसका चित्त कहीं दूसरी जगह
किसीसे वाद-विवाद में उलझा है  

स्वाधीन वह है जो
जहाँ है और जो कुछ कर रहा है
उसे वह पूरे मन से कर रहा है
उसका चित्त उसकी वास्तविक स्थिति और
कृति में पूरी तरह उपस्थित है
-अरुण  

Thursday, November 29, 2012

निजता और संस्कार



चल पड़ा था निजता लेकर
ढल गया हूँ संस्कारों से
संस्कारों में प्राण अटककर
निजता सारी भूल चुके हैं
-अरुण

Tuesday, November 27, 2012

यांत्रिक बनाम अयांत्रिक जीवन



यांत्रिक बनकर जीने में सहूलियत है
परन्तु इसतरह जीते हुए जीवन को
समझ पाने में दिक्कत होती है
इसीलिए अधिकांश लोग
जीवन को समझने के ख्याल से दूर ही रहते हैं
समाज अपने हित में
व्यक्ति को नियंत्रण में रखने के लिए
उसे यंत्रवत बना देता है   
-अरुण 

    

Monday, November 26, 2012

परम बनाम संकोच



परम आकाश में व्याप्त
जागरूकता
कण कण की
गहराई में प्रकाश की तरह
उपस्थित है
परन्तु किसी भी संकुचित चेतना
से उलझा मस्तिष्क
परम आकाश की केवल  
कल्पना कर सकता है
वहां उपस्थित नहीं हो सकता
तात्पर्य यह कि
परम यानि सत्य,
संकोच यानि असत्य
या भ्रम/माया से गुजरकर
उसे अनुभव कर सकता है
परन्तु असत्य
सत्य को समझ नही सकता
-अरुण   

Sunday, November 25, 2012

सभी भेद हॉरिज़ान्टल हैं



उपवन में सभी फूल जी रहे हैं
अपने एक जैसे जीवंत वातावरण में
परन्तु बाजार नहीं पहचानता उनके इस
सम-समान सहस्तित्व को,
बाजार के मूल्य-जगत में तो
गुलाब महंगा है और
गेंदा सस्ता
परमात्म जगत में
सभी एक जैसे हैं
परन्तु समाज या इस वस्तुजगत में
कोई ऊँचा है और कोई नीचा
-अरुण