Wednesday, August 31, 2011

अभी भी भ्रष्टाचार के पक्ष में कोई नारा नही

सभी तरह के लोग भ्रष्टाचार के निर्मूलन के विचार से सहमत दिखाई देते हैं, - वे भी जिन्हें भ्रष्टाचार करनेवालों से रोज ही सहयोग करना पडता है, वे भी जिनका दैनिक जीवन ही भ्रष्टाचार पर आधारित है, वे भी जिनको भ्रष्टाचार के बदौलत ही समाज में प्रतिष्ठा और सत्ता प्राप्त है और कुछ गिन चुने वे भी जो शायद सदाचारी हैं.

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आचरण का भले ही अवमूल्यन हुआ हो पर सामाजिक मूल्यों का नही. उदाहरण के लिए अगर रेलगाड़ी वक्त पर नही चलती तो इस बात से परेशान लोग रेल विभाग को कोसतें तो है पर अभी तक किसी ने यह नही कहा की रेल के टाइम टेबल की कोई जरूरत नही. अभी तक किसी ने भी भ्रष्टाचार के पक्ष में नारा नही लगाया

............................................................................................................................ अरुण

Monday, August 29, 2011

गलतियाँ जनता भी कर रही है

वास्तव में, हमारी चुनाव पद्धति प्रतिनिधियों के चयन का काम आंशिक रूप से कर रही है (क्योंकि वोटिंग का प्रतिशत बहुत कम है) और सही प्रतिनिधित्व दिलाने के काम में तो पूर्णतः विफल हुई लगती है क्योंकि हमारे प्रतिनिधि हमारी आवाज को संसद तक पहुंचाने के बजाय अपने स्वयं का अस्तित्व बचाने, अपने पार्टी का हित देखने और अपने व्यक्तिगत हित के लिए किये जाने वाले कारवाइयों से ही अधिक जुड़े दिखते हैं. यही कारण है कि अन्नाजी के जन-आंदोलनों जैसे कई जन-आंदोलनों की देश को जरूरत है.

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परन्तु जन-आंदोलनों को भी बहुत सतर्कता के साथ चलाना होगा. क्योंकि हो सकता है कि जिस तरह सांसदों की खरीद-विक्री होती है वैसी ही जन-अन्दोलकों की भी होने लगे.. कहीं पक्षीय-राजनीति का रोग इन समाज-संगठनों को भी न जकड ले

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संक्षेप में, उपाय कई हो सकतें हैं परन्तु जन-जागरूकता का कोई विकल्प नही. अगर प्रतिनिधि गलत हैं तो मतलब गलतियाँ इस देश की जनता भी कर रही है, इस तथ्य को नजर अंदाज न किया जाए.

.......................................................................................................................................................... अरुण

Sunday, August 28, 2011

अन्ना का अनशन आज समाप्त

यह बहुत ही समाधान की बात है कि आज सुबह अनशन टूटने जा रहा है भ्रष्टाचार का संकट तो है पर उसकी तो अब आदत पड़ चुकी है. इतनी अधिक आदत की अब उसके प्रति अभी कोई अर्जेंसी महसूस नही होती. अभी जो सबसे बड़ा संकट देश में था, वह था अन्ना का अनशन. यह अनशन न उनके स्वास्थ्य लिए ठीक था और न ही देश के स्वास्थ्य के लिए.

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जन आक्रोश के दबाव में कुछ न कुछ तात्कालिक हल निकालना जरूरी ही था और वह सांसदों ने एक मत बनाकर निकाल भी लिया पर यह सारा एपिसोड चिंतन के लिए कुछ विषय छोड़ गया है

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क्या यह सत्याग्रह सही उद्देश्य की दिशा में किया गया दुराग्रह नही था?- क्योंकि इसमे झलकती हठधर्मिता देश में आतंरिक अशांति और अराजकता फैला सकती थी. अच्छी बात यह थी की सारा आन्दोलन अहिंसा के दायरे में रहते हुए किया गया था और इसके लिए आन्दोलन के आयोजकों की सराहना करनी ही होगी. उनका धन्यवाद क्योंकि १२ दिन तक चला यह आन्दोलन शांति बनाये हुए था.

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कुछ निष्कर्ष

१) राजनीतिज्ञों और जनता के बीच का संपर्क क्षीण हो चुका है और यही कारण है कि न सरकारी पक्ष और न ही विपक्ष यह समझ पाया कि आन्दोलन इतना अधिक जन-समर्थन जुटा पाएगा. फलतः सरकार और विपक्ष दोनों ही असंमजस और अनिर्णय की परिस्थितियों में उलझे रहे. विफलता के लिए एक दूसरे पर आरोप करते रहे. राजनीति खेलते रहे. समस्या का अपने हित में कैसे उपयोग हो इसकी भी खोज करते रहे.

२) यह भी महसूस हुआ कि जन-सोसायटियों और जन-प्रतिनिधियों के बीच परस्पर विश्वास का अभाव है और इसीलिए दोनों पक्ष एक दूसरे से डर डर कर मिलते रहे, संवाद करते रहे.

३) जन-आक्रोश के दबाव में न मीडिया तथ्य बोलता है और न ही मीडिया में चर्चा करने वाले तथाकथिक विशेषज्ञ. सभी लोग जो श्रेयस है उसे कहने से डरते हुए केवल जो प्रेयस है वही बातें दुहराते रहते हैं.

४) संसद में सारे सदस्य तभी एक-मुखी होतें हैं जब उनके सामने कोई common संकट आ जाए या जब उनके किसी common हित की बात हो

५) लोक-संपर्क न होने के कारण सरकार द्वारा लिए गये सारे निर्णय गलत साबित होते गये और इस बात की खिल्ली उडाता विपश इसका राजनैतिक लाभ लेने का प्रयत्न करता रहा. सभी का आचरण गैर-जिम्मेदाराना था. अन्नाजी की टीम भी इस आरोप से बच नही सकती

इन १२ दिनों में सभी संबधित लोगों और पक्षों ने बहुत कुछ सीखा होगा. उम्मीद यही है कि इस सीख का सभी सकारात्मक उपयोग करगें, परस्पर आरोप-प्रत्यारोप से बचेंगे. यही अब देश हित में होगा. जीत महसूस करने वाले अपनी जीत का सही मूल्यांकन करें. हार महसूस करने वाले इसे सीखने का अवसर समझें और मीडिया सभी पक्षों में सामंजस्य लाने की भूमिका निभाए. धन्यवाद

...................................................................................................................................................... अरुण

Saturday, August 27, 2011

भय के वातावरण में देश के निर्णय –अन्ना का अनशन

आज अगर कोई हल निकलता भी है

तो क्या वह सही और स्थायी हल होगा?

बेहतर यही होता कि

बात सीधे अन्नाजी से की जाती

मैनेजरों से नही.

अनशन के माध्यम से

सारी मांग प्रत्यक्ष रूप से

अन्नाजी कर रहे हैं और

उनके मैनेजर अन्ना के अनशन को

आगे रखकर

अपने स्वयं के

महत्वोत्थान और अपने को

प्रोजेक्ट करने की

अचेतन इच्छा के अधीन हुए दिखते हैं

अन्नाजी के पास काफी

अनशन-स्टेमिना है और

इसीलिए उनके मैनेजर

राष्ट्रहित के नाम पर

इस स्टेमिना का शोषण करते दिखते हैं

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दूसरी तरफ इस प्रसंग से

भयभीत सरकार, विपक्ष और सारी संसद

हडबडाहट में कुछ भी करने को तैयार हो गई है

क्या ऐसी हडबडाहट देश के हित में होगी ?

इस बात को मीडिया और समाज का

ऑब्जेक्टिव निरीक्षक भी जान रहा है

पर सच का उच्चार करने से डर रहा है

........................................................... अरुण

Friday, August 26, 2011

पकने से पहले टपकना

यदि कोई कहे -

देखकर जल ओंठ पर तृष्णा जगाऊंगा

अँधेरा छोड़ जाएगा तभी दीपक जलाऊंगा

- तो बात अटपटी लगेगी

क्योंकि

जल से तृष्णा बुझती है, जागती नही

दीपक आने पर अँधेरा जाता है,

अँधेरा जाने के बाद , दीपक नही आता

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कहने का मतलब

अज्ञान जब चुबता है तभी

ज्ञान की खोज शुरू होती है.

उससे पहले शुरू होनेवाली

खोज खोज के लिए होनेवाली

सामाजिक या मनोवैज्ञनिक

बाध्यता से फली कृति है, असली

खोज नही

यही कारण है कि आजतक

गीता पढकर

किसी को ज्ञान नही हुआ

हाँ, जिसे अज्ञान का बोध हुआ

ऐसो में से कुछ लोग

गीता पढ़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं

पर बहुदा अधिकांश लोग

आदतवश या संस्कारों के कारण

गीता जैसे ग्रंथोंको

पढने की औपचारिकता निभाते दिखते हैं

....................................................... अरुण

Thursday, August 25, 2011

हिंसा ही है पर अहिंसक

सामने वाले की छाती पर

छूरा रखकर उससे अपना काम

करवा लेना हिंसा कहलाता है

पर क्या अपनी ही छाती पर छूरा रखकर

दूसरे से अपना काम करवा लेना

हिंसा नही है?

हिंसा ही है पर अहिंसक

................................... अरुण

Wednesday, August 24, 2011

गजल – आग से उठ्ठा हुआ

खोजना है आग, कैसे पा सकूं ?

मै धुआं हूँ आग से उठ्ठा हुआ

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सोये हुओं के धर्म का आधार क्या

खाब उनको नींद में दिख्खा हुआ

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नाम बाहर से गया टांका मगर

घुस गया भीतर बड़ा पुख्तः हुआ

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पेड तो अपनी जगह ही मस्त है

जंगलों की गोद में रख्खा हुआ

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राह से जो जा चुका उस वक्त से

हाय, क्योंकर मै अभी लटका हुआ

................................................ अरुण

Tuesday, August 23, 2011

एक आध्यात्मिक शेर

खोजना है आग कैसे पा सकूं ?

मै धुआं हूँ आग से उठ्ठा हुआ

........................................ अरुण

Monday, August 22, 2011

संबंधों की नाजुकता

दो लोगों के बीच में

होनेवाले लेनदेन (transcations)

को आपसी सम्बन्ध कहते हैं

यह लेनदेन एक दूसरे के बीच

परस्पर बनी

धारणाओं से फलतें हैं

इन सम्बब्धो की नाजुकता को

ठेस न पहुंचे इस बात की जिम्मेदारी

दोनों पक्षों की होती है

उदाहरण के लिए

बाप की जिम्मेदारी है कि

वह यह देखे

कि वह कहीं अपने बच्चों पर

अनावश्यक

बोझ तो नही बन रहा

और उसी समय

बेटों-बेटियों को इस बात का ख्याल

रखना होगा कि उनके पिता कहीं किसी

जायज अपेक्षाओं से वंचित तो नही हो रहे हैं

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बाप यह कभी न समझें कि उनकी हिफाजत

बेटे-बेटियों का कर्तव्य है और

बेटे-बेटी यह न समझें कि

पिता को सम्भालकर वह कोई उपकार

या कोई बहुत बड़ा बोझ ढो रहे हैं

परस्पर परिपूरक समझ जरूरी है

................................................................ अरुण

Sunday, August 21, 2011

आकाश और समय एक का एक

दृष्टि-क्षेत्र की व्यापकता पर

हमारी समझ निर्भर करती है

जो अस्तित्व को पूरा का पूरा

देख लेता है

उसकी समझ में

अस्तित्व एक का एक है

कहीं कोई भेद नही

इसी तरह जो समय सनातनत्व को

अपने जीवंत अवधान में समझ रहा हो

उसके लिए समय-भिन्नत्व का

कोई अस्तित्व नही

................................................ अरुण

Saturday, August 20, 2011

केवल पेड दिखे, पत्ते नही

बीज फला और पेड बन कर उभरा

परन्तु मै केवल देख पाया

पेड को ही, पत्तों को नही

समय के गुजरते कुछ दिनों के बाद,

अचानक पत्ते दिखे

पर पेड लुप्त हुआ दृष्टि से

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ऐसा होने से मैंने समझा

पेड और पत्ते दो भिन्न बातें हैं

ठीक वैसे ही

जैसे मै जन्म को मृत्यु से भिन्न समझता हूँ

मै देख नही पाता कि

जन्म में ही मृत्यु और मृत्यु में जन्म है

.................................................................... अरुण

Friday, August 19, 2011

अस्तित्व की एकात्मकता

वर्षा होने वाली है, बदली छाई है

और

पंख-पसारे हुए मोर

नाचने लगे हैं अनायास-

ऐसा कहने के बजाय

किसी ने कहा

अपने बादलों और मोर-पंखी

रंगों को उछाले वर्षा नाच रही है

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पहली अभिव्यक्ति,

मन ने रची,

तो दूसरी-

दृदय से निकली

पहली में घटनाओं का क्रम है

तो दूसरी में अस्तित्व की एकात्मकता

...................................................... अरुण

Thursday, August 18, 2011

अभिव्यक्ति की गुणवत्ता

जल में डूबे हुए द्वारा

जल की अनुभूति का बयान

और

घाट पर बैठे हुए का जल-वर्णन

बिलकुल ही भिन्न होगा

पहले की अभिव्यक्ति जीवंत होगी

तो दूसरे की अनुमानात्मक

.............................................. अरुण

Wednesday, August 17, 2011

दो अध्यात्मिक शेर

रोशनी में छाँव की कोई वजह बनती नही

पर बनी ये छाँव मन की रोशनी के तार से

कोशिशों से पा लिया भगवान, ऐसे भी यहाँ

और कुछ ने सहज ही में पा लिया अवतार से

............................................................... अरुण

Tuesday, August 16, 2011

जिंदगी जीना और जिंदगी मरना

जो हर बीते पल के बाबत

मरना जानते हैं

वे जिंदगी जी रहे हैं

ऐसी जिन्दा जिंदगी

से दूर हैं जो,

वे जिंदगी मर रहे हैं

........................................ अरुण

Sunday, August 14, 2011

दो अध्यात्मिक शेर

सत्य को यह गंध माया ना पकड़ पाए कभी

हो प्रशंसा गलियां हों, ओंठ उनसे मुक्त हैं

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जागना इतना गहन कि रिक्त पूरा हो जेहन

इस स्थिति में जो भी पहुँचा वो ही असली भक्त है

........................................ अरुण

Saturday, August 13, 2011

दो तरह की आँखें

केवल बाहर के परिदृश्य को

देखनेवाली आँखें लेकर संसार में उतरा

यह आदमी समाज के सहयोग से

अपने भीतर

अपने अनुभवों पर बोलनेवाली

आँखें जगाता है

और फिर इन बोलती आँखों से

पूछकर ही

जिंदगी की राह पर

हर कदम रखता है

इसी लिए जो जैसा है

उसे, वैसा ही देख नही पाता

.............................................. अरुण

Friday, August 12, 2011

पूर्णत्व का भान ही सत्य-ज्ञान

मूलतः सामने का

परिदृश्य या वस्तु या रास्ता

बिलकुल साफ साफ दिखता हो तो

किसी भूल या दुर्घटना या भटकाव का भय नही रहता

सार यह की जब दृष्टि में स्पष्टता हो तभी

आदमी स्वयं को उपर्युक्त भय से मुक्त महसूस करता है

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जीवन के सफर में

देखने का काम केवल आँखें हीं नही करती

तो जानकारी, समझ, तार्किक सोच,

चिंतन-मनन, विश्लेषण जैसे साधनों का

आदमी उपयोग करता रहता है

परन्तु इन सभी का उपयोग तभी

सटीक और सही होगा

जब परिदृश्य पूरी तरह सामने खड़ा हो,

आदमी की दृष्टि और समझ से कुछ भी

छुपा न हो

परिदृश्य की व्यापकता और सघनता

अगर स्पष्ट हो तो

बातें भी साफ साफ अवगत होती हैं.

ऐसी ही स्पष्टता को ज्ञान या सत्य कहेंगे,

परिदृश्य की आंशिक समझ को

अज्ञान या असत्य कहना होगा

........................................................................ अरुण

Thursday, August 11, 2011

मेरी आत्मा

मै हूँ

भीतर लहराती

स्मृति, विचार,

मनन और

भावनाओं की आत्मा,

परन्तु मेरी आत्मा का

पता तो शायद

मेरी आत्मा को ही हो

.................................... अरुण

Wednesday, August 10, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १८

सृष्टि- दृष्टि का भेद फल, ज्ञान प्राण का भेद /

देव-कृपा के लाभ से कर्म होत संवेद //

बोध फले जब सकल का होत न दृश्य विभक्त /

ब्रह्म फले तब चित्त में, निष्कर्मी प्रभु-भक्त //

................................................ अरुण

Tuesday, August 9, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १७

वही भाव श्रद्धा हुआ जो सत् के संग होत /

भक्त वही जो कर्म को सुश्रद्धा से बोत //

ॐ-तत-सत् यह घोषणा, ब्रह्मरूप स्वीकार /

शेष नही कर्ता कुई, सभी ब्रह्म परिहार //

................................................ अरुण

Monday, August 8, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १६

सत्-स्वरूप को तत्व से जानत अहम हिराय/

अभय सहज फल चित्त में, मृत्यु से डर नाय //

काम क्रोध भय लोभ ही, पाप नरक के स्रोत /

आत्म-जागरण की स्थिति सब दोषों को खोत //

................................................ अरुण

Sunday, August 7, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १५

इस संसारी चित्त में, वृक्ष कल्पना एक /

उलटा टंगता मनस पर, स्वप्न- रौशनी फेक //

स्वप्न-रौशनी गुल हुई माया का हो नाश /

क्षर-अक्षर के पार ही, दिखता ब्रहम प्रकाश //

................................................ अरुण

Saturday, August 6, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १४

सत् रज तम के त्रिगुण से कैसे होऊं पार /
‘स्व-शरीर मेरा नही’ धर यह भाव अपार //

सत् सागर में डूबना, बनकर सागर नीर /
यही भक्ति का सार है, यही भक्त का तीर //
………………………………………… अरुण

Friday, August 5, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १३

ध्यान जगाए ज्ञान को, ज्ञान जगाए बोध /

बोध बदलता चित्त को पंडित बना अबोध //

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यह शरीर आत्मा मिले, फलती नश्वर सृष्टि /

आत्मा तो निर्दोष है, बिन कर्ता की दृष्टि //

................................................ अरुण

Thursday, August 4, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १२

भक्ति में सक्ती नही केवल स्थिर विश्राम /
जहाँ बहाए यह नदी बहता रह अविश्राम //

जो ईश्वर से जुड गया खुद को देत भुलाय /
फिर हरेक से दोस्ती हर हालत रम जाय //
................................................ अरुण

Wednesday, August 3, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय ११

बुद्धि तो गिनती करे उसकी जो न दिखात /
देखा जिसने सकल को वह गिनती बिसरात //

देव-मूर्ति में घुस पडो, विश्वरूप को जान /
भटक न पाए वह जिसे सकल रूप का ध्यान //
……………………………………… अरुण

Tuesday, August 2, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय १०

ॠषि मुनि सब चूकते, समझ न पाया वेद /
पूर्ण समर्पित भक्त में, बचा न कोई भेद //

टहनी छोटी या बड़ी, पत्ते गिनता कौन /
पेड दिखा अब बीज में, ध्यान बने तब मौन //
…………………………………… अरुण

Monday, August 1, 2011

तात्पर्य गीता अध्याय ९

तत्व भूलकर वस्तु से, अपना मोह लगाय /

मन की चुसनी चूसता आत्मबोध ना पाय //

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कण कण में ईश्वर भरा ऐसा भाव जगात /

क्षण क्षण खुद ओझल करे ईश्वर ही हो जात //

................................................ अरुण