Monday, May 31, 2010

द्वार ढूँढती रहती है .....

सत्य की खोज निराली है
यह सदा जारी है, बस जारी ही है
किसी दिवार से टकरा भी जाए
तो भी थमती नही
द्वार ढूँढती रहती है ,
रास्ते ढूँढती रहती है ,
दिवार पर लिखे निष्कर्षों को पढ़कर
लौटती नही
न ही दिवार पर नये निष्कर्ष
लिखते बैठती है
जिन्हें निष्कर्षों की जल्दी है
वे पंडित बन कर रह जातें है
रास्ते ढूँढना छोड़कर
रास्ते बतलाना शुरू कर देते हैं
..................................... अरुण

Sunday, May 30, 2010

अहंकार का तमस

जलती मोमबत्ती पकड़कर चलो
चारो ओर होगा प्रकाश और
ठीक हाँथ के नीचें होगा अंधकार
ठीक इसीतरह अहंकार कितना ही
सजग क्यों न हो
कितना ही ध्यान क्यों न फैलाये
उसके केंद्र में होगा उसका अपना तमस
अहंकार का एक भी तमस बिंदु
जबतक बाकी हो
सारा प्रकाश अज्ञानमय ही है
भले ही उसे प्रतिष्ठा क्यों न प्राप्त हो
........................................... अरुण

Saturday, May 29, 2010

दो मुक्तक

याद
याद बीते की
याद आते की
जिंदगी कैसे कटी
ये तो मुझे याद नही
.........
अँधेरा खुद जला ......
दिये की रोशनी से सब
अँधेरे को भगाते हैं
अँधेरा खुद जला और मिट गया
देखा किसी ने ?
...................... अरुण

Friday, May 28, 2010

घड़े का खालीपन

'मै' पन
पानी बनकर
घड़े में भरा हुआ है
पूरा का पूरा
और अब वह जानना चाहता है
कैसा होता है
घड़े का ख़ालीपन
घड़े का ख़ालीपन तो जीवित ही है
केवल 'मै' पन को
रिक्त होना होगा
........................ अरुण

Thursday, May 27, 2010

स्मृति की आँखे अंधी

रास्तों को ढूँढने में
स्मृति काम आती है
पर कदमों तले उभरनेवाली
पगडंडियों को वह देख नही पाती
उसपर से गुजर तो जाती है
पर उसे बिना देखे,
उसके प्रति सोये हुए
................................ अरुण

Wednesday, May 26, 2010

परमात्मा ही परमात्मा को जाने

परमात्मा स्वयं को अनुभूत कर रहा है
प्रति पल प्रति स्थल
इस सत्य को जानने के लिये
परमात्मा ही बन जाना होगा
इसका मतलब की
अपनी व्यक्तिगत पहचान को
भुलाना होगा
इस ऐसी पहचान की निरर्थकता को
पहचानना होगा
................................ अरुण

Tuesday, May 25, 2010

क्षण ही जीवन

मनुष्य 'समय' पर यात्रा करता है
जब की परमात्मा का
'समय' पर है निवास
मनुष्य का जीवन क्षण क्षण की कड़ी को
जोड़कर बनता है
परमात्मा हर उस कड़ी को
एक सम्पूर्ण जीवन के तौर पर
जी रहा है
मनुष्य का जीवन 'समय' का जुडाव है
और 'समय' है
परमात्मा का पड़ाव
..................... अरुण

Sunday, May 23, 2010

पुनर्जन्म

पानी में बुलबुले हैं -
कहीं एक टूटा तो कहीं एक उभरा
एक आया तो एक लौटा
आते और जाते बुलबुलों के बीच क्या कोई रिश्ता है ?
परन्तु बुद्धि उन में रिश्ता देख लेती है
बुद्धि कहती है जो गया वही तो आया
जो आया, वह लौटने के बाद ही तो आया
पुनर्जन्म की कल्पना क्या इससे अलग है ?
आते जाते बुलबुले,
पानी की बस अभिव्यक्ति है
पानी से वे अलग नही हैं
इतना ही ध्यान आ जाए तो काफी है
................................................... अरुण

Saturday, May 22, 2010

पाँच खिड़की वाला एक घर

शरीर पाँच खिड़की वाला एक घर है
इन्ही खिडकियों से दुनिया अन्दर प्रवेश करती है
बुद्धि से गुजरती है और इसीलिए
संकेतों में ही समझी जाती है,
स्मृति में संगृहीत हो विचारों में
अभिव्यक्त होती है
अव्यक्त से अभिव्यक्ति तक की यह यात्रा
अगर ध्यान प्रकाश में घटे
तो क्या ही अच्छा हो !
अभी तो यह यात्रा
अपने में ही प्रकाश में लिप्त है
अभी तो वह ध्यान विमुख है
...................................... अरुण

Friday, May 21, 2010

वेदना धरती की

अगर परछाईयाँ नोचने लगें, खरोचने लगें
धरती को तो
धरती त्रस्त होगी, कराहती होगी,
बेचैन होगी
ठीक उसी तरह जिस तरह
यह मस्तिष्क तनाव ग्रस्त है, चिंतित है, व्यस्त है,
व्यग्र है, विवंचित है, परेशान है -
विचारों, स्मृतियों, सपनों, चिंताओं और ऐसी ही
कई अंतर्छायाओं द्वारा सतत
नोचें जाने के कारण
................................... अरुण

Thursday, May 20, 2010

धर्म और धर्म की परंपरा

धर्म आएंगे,
धर्म जाएंगे,
पीछे छोड़ एक लाश परंपरा की
जिस लाश की पूजा में
रत हैं/ रहेंगी पीढीयाँ
सदियों तक
......................... अरुण

Wednesday, May 19, 2010

ओशो और कृष्णमूर्ति

ओशो काव्य में गणित समझातें हैं और
कृष्णमूर्ति गणित में काव्य
गणित प्रेमी ओशो को नकारते हैं और
काव्य प्रेमी कृष्णमूर्ति को
जिन्हें काव्य और गणित का नाता समझ आ जाता है
वे ओशो में कृष्णमूर्ति को देखतें हैं और
कृष्णमूर्ति में ओशो को
........................................ अरुण

Tuesday, May 18, 2010

उपज मस्तिष्क की

बीज से वृक्ष फला
केवल वृक्ष
पत्ते नही, फूल नही, फल नही, टहनियां नही,
न शाखाएं और न जड़ें
कुछ भी नही बस वृक्ष
और कुछ फला है तो वह हमारे मस्तिष्क में
मन में, ज्ञान या शब्द कोष में
स्मृति में, भाषा में, उच्चार में, संवाद एवं परिसंवाद में,
शास्त्र में, खंडन और मंडन में,
विश्लेषण या संश्लेषण में
अगर कुछ और फला है तो वह फला है
भीतर की यंत्रवत प्रक्रिया में
बीज से तो बस वृक्ष फला
बाकी सब उपज है हमारे मस्तिष्क की
बीज में तो बस वृक्ष ......
बीज ही वृक्ष, वृक्ष ही था बीज .......
मस्तिष्क ने ही अनेक अलग अलग नाम रचे,
वृक्ष को देखकर उसमें भिन्न भिन्न
वस्तुओं या अंगो का अस्तित्व इजाद किया
अस्तित्व में पत्ते भी अपने को वृक्ष ही समझते होंगे
टहनियों ने अपने को अलग न जाना होगा
................................................................ अरुण



Monday, May 17, 2010

अँधेरे में ही प्रकाश

अपने भीतर दबे अँधेरे को
देखना होगा
तभी दिख पड़ेगा घना प्रकाश
सारी कोशिश लगानी है
अँधेरा देखने के लिये
प्रकाश तो दिखेगा बिना कोशिश अनायास
क्योंकि
अस्तित्व तो प्रकाशमय ही है
देखने में हुई भूल का परिणाम है
ये अँधेरा
..................... अरुण

Sunday, May 16, 2010

क्रांति - बरगद बना गुलाब

बरगद का विराट वृक्ष
अपने विस्तार को समझ रहा है
हवा के टकराव से उभरते आन्दोलनों को देख रहा है
पत्ते पत्ते को देखता परखता
अपनी ही शाखाओं और टहनियों से गुजरता
लौट जाता है अपने ही बीज में जहाँ से चला था
तो अचानक क्रांति घटी -
बीज टूटा
तिनके तिनके बिखर गये और
इसी बिखराव में उभर आया
एक नया बीज गुलाब का
अब वह फले न फले
बढे न बढे
फूल खिलाये न खिलाये
सुगंध फैलाये न फैलाये
फिर भी अब है वह गुलाब
शुद्ध गुलाब
................................... अरुण

Saturday, May 15, 2010

अहंकार नही मिटता अहंकार से

अहंकार को स्वयं से लगाव इतना
मछली को पानी से जितना
स्वयं को मिटाना स्वयं को गलाना
मुश्किल है सपने में भी सोच पाना
अहंकार कहता है -
मै जल जाऊंगा पर अपनी ही राख को सजोकर
फिर उभर आऊंगा
स्वयं के मायातल पर मै मिट नही सकता
मुझे मिटाने की कोई भी चेष्टा व्यर्थ है
............................................ अरुण

Friday, May 14, 2010

भ्रम की चक्की

गीता बाइबल या कुरान जैसे सभी अध्यात्मिक ग्रन्थ
समझने वालों के लिये हैं,
समझाने वालों के लिये नही
जबतक भीतर समझ की संभावना नही फलती
इन ग्रंथों की कोई उपयोगिता नही
भ्रम की चक्की में कुछ भी डालो
असार ही बाहर आएगा
समझ की चक्की में भ्रम भी डालो तो भी
सार ही हासिल होगा
...................................... अरुण

Thursday, May 13, 2010

दर्शन भगवान का

(कुछ दिन के अन्तराल के बाद)
कहते हैं कि पतिव्रता
अपने पति में परमेश्वर देखती है
पति चरित्रवान हो या चरित्रहीन
उसी तरह
जिसे हर चीज में भगवान दिखा
उसे चीज के भौतिक, सामजिक या वस्तुगत मूल्य से
उसे कोई सरोकार नही
क्योंकि उसकी दृष्टि उनसब बातों के परे देखने लगाती है
....................................... अरुण